जनवादी पत्रकार संघ |
- एकता सामाजिक संस्था ने जरूरतमंदों को वितरित किए कपड़े
- *संपादकीय /रोजगार के आंकड़ों में जादूगरी और स्थाई समाधान*
- *शौचालय में ऊर्जा क्यों खपा रहे हैं मंत्री जी*
| एकता सामाजिक संस्था ने जरूरतमंदों को वितरित किए कपड़े Posted: 01 Aug 2020 01:14 AM PDT आगरा (अजय ) एकता सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था की तरफ से आगरा स्थित रुनकता साईं मंदिर पर दस दर्जन से अधिक गरीब निराश्रित बच्चों को कपड़े, फल और बिस्किट्स वितरण किए गए बताते चले एकता सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था द्वारा अगले माह की 13 तारीख को पर रक्तदान शिविर भी लगाया जायेगा जिससे आस पास के शहरों में जरूरत पड़ने पर वहाँ भी रक्त का प्रबंध किया जा सके इस मौके पर एकता जैन संस्थापक अध्यक्ष, कार्यवाहक अध्यक्ष संजीव चौधरी, उप महासचिव विवेक पोरवाल, गुलजार अली, जीशान, मनोज सत्संगी, मयंक, नितेश, अभिषेक, भरत, आदि लोग रहें थे |
| *संपादकीय /रोजगार के आंकड़ों में जादूगरी और स्थाई समाधान* Posted: 31 Jul 2020 07:48 PM PDT ०१ ०८ २०२० *रोजगार के आंकड़ों में जादूगरी और स्थाई समाधान* देश बेरोजगारी के बड़े संकट से गुजर रहा है | आज सरकार या अन्य कोई बेरोजगारी कम होने का दावा करें तो बेमानी है | खरीफ की फसल के दौरान मिला रोजगार या मनारेगा से मिला रोजगार स्थाई प्रकृति का नहीं है | इसके आधार पर जीवनयापन होना मुश्किल है |रोज बढती जनसंख्या और वर्तमान माहौल के मद्देनजर कुछ नये उपाय फौरन सोचना होंगे |गैर-सरकारी संगठन सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी [सीएमआईई ] के इस दावे से अनेक अर्थशास्त्री असहमत है कि भारत में बेरोजगारी की दर गिर रही है और वो महामारी से पहले के स्तर पर आ चुकी है|थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें, कि यह रिपोर्ट सही है तो इसका मतलब है तालाबंदी में ढील दिए जाने के बाद जो आर्थिक गतिविधि फिर से शुरू हुई है और उससे रोजगार का सृजन हुआ है| लेकिन, क्या वाकई ऐसा हुआ है? सीएमआईई ने पिछले कुछ महीनों में कहा था कि जो बेरोजगारी दर मार्च में८ .७५ प्रतिशत थी, वह अप्रैल में बढ़ कर २३.५ और मई में २७.१ प्रतिशत तक चली गई थी, लेकिन जून में इसमें गिरावट देखने को मिली| संस्था के अनुसार जून में बेरोजगारी दर गिर कर पहले १७.५ पर पहुंची, फिर ११.६ पर और फिर ८.५ प्रतिशत पर पहुंच गई|सीएमआईई के अनुसार यह गिरावट मुख्य रूप से ग्रामीण बेरोजगारी के गिरने की वजह से आई है|उसके अनुसार शहरी बेरोजगारी में भी गिरावट आई है, लेकिन यह अब भी ११.२ प्रतिशत पर है, जब कि तालाबंदी से पहले यह औसत ९ प्रतिशत पर थी| इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार में बड़ा बदलाव आया है|ग्रामीण बेरोजगारी दर तालाबंदी से पहले मार्च में ८.३ प्रतिशत थी, तालाबंदी के दौरान यह औसत २० प्रतिशत पर रही | सीएमआईई का कहना है कि वैसे तो तालाबंदी में ढील दिए जाने से बेरोजगारी का दबाव सामान्य रूप से कम ही हुआ है, ऐसा लगता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में फायदा मनरेगा के तहत गतिविधियों के बढ़ने से और खरीफ की फसल की बोआई में हुई वृद्धि की वजह से हुआ है| ये सब आंकड़ेबाजी की बात है मई में मनरेगा के तहत ५६.५ करोड़ श्रम दिन दर्ज किए गए और ३.३ करोड़ परिवारों को इस योजना का लाभ मिला, यह सिर्फ तालाबंदी से पहले के मुकाबले ही नहीं, बल्कि एक साल पहले की भी अवधि के मुकाबले भी बड़ी उछाल है| ये आंकड़े सहज बुद्धि से विश्वसनीय नहीं है |सीएमआईई का यह भी कहना है कि दक्षिण-पश्चिमी मानसून समय से शुरू हुआ और मध्य और पश्चिम भारत में समय से पहले पहुंचा| पहले पखवाड़े में लंबी अवधि के औसत से ३२ प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई और इसकी वजह से खरीफ की बोआई पिछले साल के मुकाबले ३९.४ प्रतिशत ज्यादा हुई| कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं कि सीएमआईई का डाटा काफी विश्वसनीय रहा है, इसलिए कोई कारण नहीं है कि इस डाटा पर विश्वास नहीं किया जाए. लेकिन वो यह भी कहते हैं कि समस्या यह है कि रोजगार के आंकड़ों में उछाल के बावजूद खपत नहीं बढ़ी होगी और आर्थिक विकास से सीधा जुड़ाव खपत का है|कुछ और विशेषज्ञ तो मनरेगा और मौसमी कृषि गतिविधि के दम पर दर्ज की गई रोजगार में इस वृद्धि को असली वृद्धि मानते ही नहीं हैं| उनका मानना है कि सबसे पहले तो सीएमआईई जिस आधार पर आंकड़ों का आकलन कर रहा है वो पुराने हैं और अब प्रासंगिक नहीं हैं| इसके अलावा उनका मानना है कि जो व्यक्ति शहर में किसी नियमित रोजगार या स्वरोजगार में था और वो सब बंद हो जाने से उसने गांव जा कर मनरेगा के तहत कुछ काम किया तो इसे रोजगार के आंकड़ों में नहीं जोड़ना चाहिए, क्योंकि वह व्यक्ति जिस तरह का काम कर रहा था और उस से उसकी जिस तरह की आय हो रही थी उसे ना तो वैसा काम मिला और ना वैसी आय|कुछ और भी अर्थशास्त्री सीएमआईई के आंकड़ों को सही नहीं मानते क्योंकि उनका कहना है कि वो जिन दूसरे तथ्यों को देख रहे हैं वो इन आंकड़ों की जरा भी पुष्टि नहीं करते| शहरों से तो अभी भी गांवों की तरफ पलायन ही चल रहा है, जो कि शहरों में नौकरियां ना होने का सबूत है| जहां तक गांवों की बात है कहीं तो लोगों के अभी तक मनरेगा के जॉब-कार्ड ही नहीं बने हैं और जहां बने हैं वहां ५ -७ दिनों में एक दिन काम मिलने की खबर आ रही है|सरकारी आंकड़ों के अभाव में इन आंकड़ों को पूरी तरह से मान लेना या नकार देना मुश्किल है| अब बात मौजूदा रोजगार और स्थाई रोजगार की है |देश में सब को सरकारी नौकरी या शहर में नौकरी देना संभव नहीं है और स्कूल कालेज से निकले युवाओं के हाथ में हुनर नहीं है | सबके पास खेती भी नहीं है| ऐसे में देश में चीन की तरह छोटे उद्ध्योगों का जाल बिछाना होगा, एक समेकित योजना बनाना होगी जो रोजगार के फौरी नहीं स्थाई समाधान खोजे | |
| *शौचालय में ऊर्जा क्यों खपा रहे हैं मंत्री जी* Posted: 31 Jul 2020 07:46 PM PDT ग्वालियर /पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादतीय सिंधिया के समर्थक और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर सचमुच जनसेवा के लिए राजनीति में काम कर रहे हैं लेकिन वे भूल जाते हैं की उन्हें जो काम सौंपा गया है वो पूरे प्रदेश में ऊर्जा व्यवस्था को सुधरने का है लेकिन मंत्री जी अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे पांव शौचालयों की सफाई करने में लगे हैं .मंत्री जी के सेवाभाव का विरोध करने का मेरा कोई इरादा नहीं है किन्तु इसे मै ठीक वैसा ही मानता हूँ जैसा की 'तेली का काम तमोली' से कराया जाये . ऊर्जामंत्री की ऊर्जा को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं है लेकिन उनके कृत्य से कुछ सवाल खड़े होते हैं जो अनुत्तरित हैं.सवाल ये है कि क्या शहर में नगर निगम नाम की कोई संस्था अपना काम नहीं कर रही है,या क्षेत्र का पार्षद अपने घर बैठा हुआ है या सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं ? कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि एक तरफ मंत्री जी शौचालय साफ़ कर रहे हैं दूसरी तरफ पूर्व महाआअपौर और वर्तमान सांसद की 30 चिठ्ठियों का निगम आयुक्त ने कोई उत्तर नहीं दिया है . अपने इलाके के मंत्री को शौचालय की सफाई करते देख मुझे एक तरफ गर्व होता है तो दूसरी तरफ लज्जा आती है .शहर में नगर निगम के पास सफाई कर्मियों की एक लम्बी फ़ौज के होते हुए यदि किसी मंत्री को शौचालय साफ़ करना पड़ें तो लानत है सरकार के सुशासन को !ऐसी दशा में सरकार को फौरन नगर निगम प्रशासन के खिलाफ सख्त कार्रावाई करना चाहिए और यदि ये हकीकत नहीं है और मंत्री जी केवल सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए शौचालय साफ़ करते दिखाई दे रहे हैं तो मुख्यमंत्री जी को उन्हें रोकना चाहिए .क्योंकि ऊर्जा मंत्री के दीगर कार्यों में व्यस्त रहने के कारण प्रदेश में विद्युत आपूर्ति का प्रबंधन बुरी तरह से लड़खड़ा रहा है प्रद्युम्न सिंह तोमर को ऊर्जा जैसा महत्वपूर्ण विभाग श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अड़कर दिलाया है किन्तु दुर्भाग्य है कि श्री सिंह ने इसे गंभीरता से नहीं लिया .प्रदेश में विद्युत कटौती और बिलों में गड़बड़ी की शिकायतें दूर करने की कोई कार्य योजना बनाने के बजाय वे शौचालयों की सफाई में उलझ गए .शौचालयों की सफाई कोई बुरा काम नहीं है लेकिन एक ऊर्जावान मंत्री के होते प्रदेश की जनता बिजली को लेकर परेशान रहे ,ये भी कोई अच्छी बात नहीं है .यदि तोमर ऊर्जा विभाग में अपेक्षित परिणाम न दे सके तो इससे सिंधिया की हेठी होगी . आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार का तख्ता पलट होने के बाद शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने कोरोना संक्रमण के संकट से जूझ रहे उपभोक्ताओं को बिलों में राहत देने की बात कही थी। 2 जून को ऊर्जा विभाग इसका आदेश भी निकाल चुका है। वहीं इसके उलट बिजली कंपनी हजारों रुपये के बिल थमा रही है। ये आरोप प्रदेश के बिजली उपभोक्ता लगा रहे हैं। हालांकि इसकी काट में बिजली कंपनी ने इंदौर में 24 जून से बिल सुधार शिविर लगाए हैं। अभी तक कितने उपभोक्ताओं के बिलों में कितनी राशि का सुधार किया है। इसकी जानकारी उपभोक्ताओं को नहीं दे रही है।मंत्री जी ने इस दिशा में ज्यादा ध्यान नहीं दिया . ऊर्जा मंत्री की ऊर्जा यदि संबल योजना के हितग्राहियों के हित में खर्च होती तो और बात थी. खबर है कि अप्रैल में जब लॉकडाउन था उस वक्त मीटर रीडिंग नहीं हुई। बिजली कंपनी ने अप्रैल 2019 को आधार मानकर अप्रैल 2020 के बिल जारी किये। अब छूट का आधार भी इसे ही बनाया जा रहा है, जबकि पहले ही उपभोक्ता बिजली बिल ज्यादा आने से परेशान हैं। कंपनी भी मान रही है कि सॉफ्टवेयर में भी 2019 में हुई खपत के मुताबिक जारी बिल पर ही छूट तय की जाएगी। ऐसे में कम ही लोगों को मुख्यमंत्री की बिल में छूट की योजना का लाभ मिल पाएगा।क्या ऊर्जा मंत्री शौचालयों की सफाई छोड़कर इस और ध्यान दे पाएंगे ?. इस समय मंत्रिमंडल में बिना विधानसभा के सदस्य होते हुए भी मंत्री बने जन प्रतिनिधि अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में जनता को रिझाने में जुटे हैं ताकि उन्हें दल-बदल के अपराध से क्षमा मिल सके और वे उपचुनाव में दोबारा जीतकर विधानसभा पहुँच सकें ,ऊर्जा मंत्री की समाजसेवा भी इसी कर्म में है .वे अपना जनसेवा अभियान जारी रखें लेकिन साथ ही यदि विभाग का कामकाज भी देखते रहें तो बात और बन सकती है .खबर है कि ऊर्जा विभाग में काम करने वाली तमाम कंपनियों के प्रतिनिधियों को अब मंत्री जी से बात करने बार-बार ग्वालियर आना पड़ रहा है फिर भी बात नहीं बन रही है .हकीकत क्या है राम ही जाने ! प्रदेश की कोरोना ग्रस्त सरकार में सभी मंत्रियों को जनसेवा के साथ-साथ अपना मूल काम भी करना चाहिए .मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल की वर्चुअल बैठक में इस विषय में कोई निर्देश दिए हैं या नहीं ,पता नहीं .ऊर्जामंत्री जिस तरीके से काम कर रहे हैं उसे जनता भले ही सही माने किन्तु प्रशासन की दृष्टि से इसे ठीक नहीं कहा जा सकता . साभार@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर |
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