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Sunday, August 2, 2020

जनवादी पत्रकार संघ

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*संपादकीय/ नई शिक्षा नीति-१*@ राकेश दुबे

Posted: 01 Aug 2020 08:41 PM PDT


*० प्रतिदिन* -राकेश दुबे
०२ ०८ २०२०
*नई शिक्षा नीति -१*
*नई शिक्षा नीति से पहले राष्ट्रभाषा तय करते*
जैसे ही मैं अपने नाती-पोतों के बारे में सोचता हूँ कि उनकी संपर्क भाषा २० साल बाद कैसी होगी तो हिंगलिश गुजराती मराठी जैसी किसी भाषा के मिलेजुले अविष्कार और उसके परिणाम सोच कर भ्रमित हो जाता हूँ | भले ही बेटा अच्छी नौकरी में है, उसकी पदस्थापना हर दो साल में देश के किसी भी कौने में हो जाती है, स्कूलों और राज्यों की संपर्क भाषा का प्रभाव उसके बच्चों पर वैसा ही हो रहा है जैसे देश के विभिन्न भागों में रह रहे १४ करोड़ प्रवासी लोगों के बच्चों का हो रहा है| ये सारे लोग मजबूरी में अंग्रेजी को गले लगाने को मजबूर हैं | बेहतर होता नई शिक्षा नीति से पहले राष्ट्र भाषा तय होती |
पता नहीं आप इस बात को कैसे लेते हैं कि मराठी भाषी विद्यालयों में छात्र नहीं आ रहे हैं. क्योंकि अंग्रेजी की मांग बढ़ रही है। नीति नियंताओं में से किसी ने नहीं सोचा कि १४ करोड़ प्रवासी श्रमिकों की संतानों को उनकी मातृभाषा में कैसे पढ़ाया जाएगा? दिल्ली, बेंगलूरु और मुंबई जैसे शहरों में आधी से अधिक आबादी ऐसे लोगों की है जिनकी मातृभाषा हिंदी, कन्नड़ या मराठी नहीं है। ऐसे में मातृभाषा को लेकर सपाट दलील जटिल हो सकती है। दिल्ली को अपने विद्यालयों में कितनी मातृभाषाएं पढ़ानी चाहिए: बांग्ला, मराठी, तमिल, गुजराती...? हिंदी और पंजाबी तो हैं ही। उर्दू को भी न भूलें। आंध्र प्रदेश सरकार ने शायद अपने विद्यालयों में शिक्षण का प्राथमिक माध्यम अंग्रेजी रखकर गलती की हो जबकि जम्मू कश्मीर बहुत पहले ऐसा कर चुका था।
इस नई नीति में शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल कहते है कि 'एक ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता है जिसमें इतना लचीलापन हो कि वह बदलती परिस्थितियों के साथ ढल सके। इसमें प्रयोगधर्मिता और नवाचार के महत्त्व को रेखांकित किया जाए...इस समय इकलौती सबसे जरूरी बात है मौजूदा व्यवस्था की जड़ता से निजात।' इसके अलावा इस बात पर भी जोर दिया गया है कि 'कार्यानुभव (जिसमें भौतिक श्रम, उत्पादन अनुभव आदि शामिल हों) और सामाजिक सेवाओं को सभी स्तरों पर सामान्य शिक्षण का अनिवार्य अंग बनाया जाए।' सबसे आखिर में कहा गया कि 'नैतिक शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को शामिल करने पर जोर दिया जाए।'
वस्तुत: ये रमेश पोखरियाल के शब्द नही हैं बल्कि ये बातें डीएस कोठारी ने सन १९६६ में उस वक्त लिखी थीं जब वह तत्कालीन शिक्षा मंत्री को अपनी अध्यक्षता वाले शिक्षा आयोग की रिपोर्ट सौंप रहे थे। तब आयोग की १०+२ शिक्षा पद्धति की अनुशंसा स्वीकार की गई लेकिन दसवीं के बाद के दो वर्षों में जहां व्यावसायिक शिक्षण की शुरुआत होनी थी, वहां व्यवहार में कुछ और होने लगा। यही हश्र व्यवस्थागत जड़ता से निजात पाने जैसी अन्य बातों का भी हुआ।
यह नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तो , कोठारी आयोग की रिपोर्ट से भी अधिक महत्त्वाकांक्षी है। इसमें कई सकारात्मक बातें शामिल हैं। मसलन शुरुआती शिक्षण में मातृभाषा पर जोर, विद्यालयीन शिक्षा से पहले की पढ़ाई को प्रमुख शैक्षणिक व्यवस्था में शामिल करना और पाठ्यक्रम के ढांचे में लचीलापन। इनकी सफलता ३० से अधिक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रतिक्रिया पर निर्भर है। यह इस बात पर भी निर्भर होगा कि १२ लाख से अधिक आंगनवाडिय़ों से नए ढंग से कैसे काम लिया जाता है और १५ लाख विद्यालय इसे कैसे अपनाते हैं। बहरहाल जब किसी नीतिगत दस्तावेज में समग्रता और विविध विषयों जैसे शब्दों की भरमार है तो आशंका पैदा होती है।
उदाहरण के लिए अंग्रेजी के प्रश्न पर विचार करें। क्या उसकी परिणति भी फ्रेंच जैसी होगी वैसी होगी जैसी लातिन अमेरिका में स्पेनिश या पुर्तगीज हैं? यानी विजेताओं की भाषा जो ९० प्रतिशत स्थानीय लोगों की भाषा बन गई। शायद दोनों में से कोई स्थिति न बने। भारत की स्थानीय भाषाओं का हश्र, गरानी और आयमारा जैसी भाषाओं की तरह नहीं होगा जो अब दक्षिण और मध्य अमेरिका के एक छोटे हिस्से में बोली जाती हैं। इसी तरह अंग्रेजी भारत के विद्यालयों में बतौर माध्यम सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है। कुल विद्यालयों के छठे हिस्से में अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई होती है (इसके आगे केवल हिंदी है जो आधे विद्यालयों का शिक्षण माध्यम है)। भारत ऐसे में क्या करेगा ?कोई समझने- बताने को तैयार नहीं |
सच तो यह है कि अंग्रेजी की स्वीकार्यता तो नहीं हिंगलिश की स्वीकार्यता मातृभाषा से अधिक होती जा रही है। बतौर भाषा अंग्रेजी कीत या राजनीति की प्राथमिक भाषा नहीं बन पाएगी। यह बात ध्यान रहे कि देश के १० सर्वाधिक लोकप्रिय अखबारों में से केवल एक अंग्रेजी में छपता है। टेलीविजन समाचार और मनोरंजन मीडिया में अंग्रेजी की हिस्सेदारी भी काफी कम है, परंतु अंग्रेजी कॉर्पोरेट और वित्तीय जगत तथा बड़ी अदालतों में अपने स्थान पर कायम रहेगी। निकट भविष्य में यह दो आधिकारिक भाषाओं में भी शुमार रहेगी। दुःख यह है कि भारतीय ही भारत की राष्ट्र भाषा का बारे में नहीं सोच रहे हैं |

सुमावली विधानसभा को चाहिए एक सशक्त युवा नेतृत्व

Posted: 01 Aug 2020 07:22 PM PDT




सुमावली /मध्यप्रदेश में आगामी दिनों में विधानसभा उपचुनाव होना है जिसमें ग्वालियर चंबल संभाग की 16 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होगा मुरैना में पांच विधानसभाओं में उपचुनाव है जिनमें क्रमशः अंबाह दिमनी मुरैना सुमावली जोरा में चुनाव होना तय है जहां चार विधानसभा में भाजपा की ओर से टिकट तय है जो पूर्व विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे उनका लड़ना निश्चित है केवल जौरा विधानसभा में ही अभी तक भाजपा का टिकट तय नहीं है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर उम्मीदवारों को लेकर कोई भी सूची जारी नहीं की गई है कांग्रेस आलाकमान में टिकट वितरण को लेकर मंथन जारी है ।और बड़े ही बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए कांग्रेस के टिकट होना तय है कांग्रेस आलाकमान की ऐसी मंशा भी है कि टिकट उन्हीं प्रत्याशियों को दिया जाए जो विधानसभा उपचुनाव में जीत का वरण कर कांग्रेस के पाले में सीट लाने का दम रखता हो सुमावली विधानसभा की बात करें तो सुमावली से भाजपा की ओर से मंत्री ऐदल सिंह कंसाना का चुनाव लड़ना तय है। और उनके मुकाबले कांग्रेस को भी एक मजबूत दावेदार की जरूरत है । सुमावली के राजनैतिक परिदृश्य के अनुसार पिछले विधानसभा चुनावों तक इस विधानसभा का नतीजा और राजनीति दो परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आई है। लेकिन अब हालात इसके इतर हैं
जब हमारे संवाददाता ने सुमावली विधानसभा के राजनीतिक हालात पर सुमावली के मतदाताओं से जानकारी इकट्ठा की तो कहीं ना कहीं इस विधानसभा के मतदाताओं में एक कसक देखने को मिली वह कसक जो बरसों से उनके मन में दबी हुई थी ।अब बलबूती होती दिख रही है और सुमावली का मतदाता एक अदद युवा नेतृत्व की दरकार रखता है जो विधानसभा के विकास में मजबूती से कार्य करता हुआ बदलाव का वातावरण निर्मित करें यहां बता दें कि कांग्रेस की ओर से दावेदारों में अजब सिंह कुशवाहा जिन्होंने अपना पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा से लड़ा था, उससे पूर्व बसपा से भी वह विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं ।कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर दावेदारी जता रहे हैं ।साथ ही राम लखन सिंह दंडोतिया और वीर प्रताप सिंह सिकरवार भी अपनी-अपनी दावेदारी जता रहे है। जहां तक वीर प्रताप सिंह सिकरवार के राजनीतिक जीवन की बात करें तो छात्र राजनीति के समय से ही वह आम जनमानस के बीच छात्रों और युवाओं के बीच काफी सक्रिय हैं। छात्र राजनीति के समय से लेकर अब तक किए गए राजनीतिक संघर्ष की एक लंबी फेहरिस्त उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ी हुई है ।और साथ ही वह युवा वर्ग में युवा होने के साथ-साथ एक भाईचारे का संबंध स्थापित किए हुए हैं। आम मतदाता के अनुसार और वर्तमान राजनीतिक हालातों के मद्देनजर युवा वर्ग ही बदलाव की सोच रखता है। सही को सही और गलत को गलत कहने की सोच रखता है विषम परिस्थितियों में भी निर्णय लेने की क्षमता युवाओं में बखूबी होती है। देश के बारे में क्षेत्र के बारे में युवा वर्ग की सोच सकारात्मक है ।राजनीति एक ऐसा माध्यम है। जिसके द्वारा अपने क्षेत्र और देश का प्रतिनिधित्व बेहतर तरीके से किया जा सकता है ।युवा वर्ग को राजनीति से जोड़ने व प्रेरित करने की जरूरत भर है।
    वर्तमान राजनीतिक हालात को देखते हुए युवा राजनीति से मुंह मोड़ का नजर आ रहा है ऐसे में उन्हें राजनीति की अच्छाई से अवगत कराने की जिम्मेदारी भी हम राजनीतिक दलों की है ।  राजनीति में परिवारवाद एवं जातिवाद का बोलबाला देश को नुकसान पहुंचा रहा है। वंशवाद से इतर यदि क्षेत्रीय स्तर से ही युवाओं को राजनीति की ओर मोड़ा जाए उन्हें प्रेरित किया जाए तो एक बेहतर संदेश समाज में दिया जा सकता है। कांग्रेस आलाकमान को इस बात पर गौर करते हुए यदि सुमावली विधानसभा से युवा नेतृत्व के तौर पर वीर प्रताप सिंह सिकरवार लल्ला का टिकट तय किया जाता हे। तो मुरैना जिले सहित ग्वालियर चंबल संभाग में युवाओं के बीच एक बेहतर संदेश दिया जा सकता है। और आम मतदाता एवं युवा वर्ग को काफी हद तक कांग्रेस की ओर मोड़ा जा सकता है ।इस पर विचार करने की जरूरत है हम पहले ही बता चुके हैं कि वीर प्रताप सिंह की राजनैतिक संघर्ष की दास्तान काफी लंबी है उसे देखते हुए कांग्रेस आलाकमान को सूझबूझ का परिचय दें ,वीर प्रताप के रूप में एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है ।                     सुमावली विधानसभा क्षेत्र में वीर प्रताप सिंह सिकरवार का जनसंपर्क अभियान निरंतर जारी है विधानसभा के प्रत्येक गांव मजरों टोला में जनसंपर्क कर कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने की अपील की जा रही है जिसका एक अच्छा असर देखने को मिल रहा है।                            प्रस्तुति नरेंद्र सिंह सिकरवार

*रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त -जानिए कब राखी बांधना रहेगा शुभ*

Posted: 01 Aug 2020 09:57 AM PDT




3 अगस्त को भद्रा सुबह 9 बजकर 29 मिनट तक है. राखी का त्योहार सुबह 9 बजकर 30 मिनट से शुरू हो जाएगा. दोपहर को 1 बजकर 35 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 35 मिनट तक बहुत ही अच्छा समय है. इसके बाद शाम को 7 बज कर 30 मिनट से लेकर रात 9.30 के बीच में बहुत अच्छा मुहूर्त है.2 दिन पहले

भद्रा, शनि की बहन है ज्योतिष में इसे अशुभ माना गया है , इसमें नहीं किए जाते रक्षाबंधन आदि शुभ कार्य

शास्त्रों के अनुसार. इस बार रक्षाबंधन पर सबसे खास बात ये है कि कि इस दिन ये पर्व भद्रा दोष थोड़ी देर का है तरह से मुक्त है, जिसके चलते दिन भर बहनें अपने भाइयों को राखी बांध सकेंगी।

जानिए भद्रा से जुड़ी खास बातें- ज्योतिषी के लिए कुछ ऐसे होंगे जिनको ज्ञान नहीं


भद्रा में क्यों नहीं बांधते राखी?
- कोई भी शुभ काम करते समय भद्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है,
क्योंकि पुराणों के अनुसार भद्रा सूर्यदेव की पुत्री और शनि की बहन है।
- शनि की तरह ही इनका स्वभाव भी क्रोधी है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें पंचांग के एक प्रमुख अंग विष्टि करण में स्थान दिया है।
- हिन्दू पंचांग के 5 प्रमुख अंग होते हैं। ये हैं- तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या 11 होती है। ये चर और अचर में बांटे गए हैं।
- चर या गतिशील करण में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि गिने जाते हैं। अचर या अचलित करण में शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न होते हैं।
- इन 11 करणों में 7वें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है। पंचांग शुद्धि में भद्रा का खास महत्व होता है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है।
- जब यह मृत्युलोक में होती है, तब सभी शुभ कार्यों में बाधक या उनका नाश करने वाली मानी गई है। जब चन्द्रमा कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टि करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। - इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है।

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