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Wednesday, September 9, 2020

जनवादी पत्रकार संघ

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सरकार है या सौत ?पता कीजिए@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर

Posted: 08 Sep 2020 10:36 PM PDT


सरकार है या सौत ?,पता कीजिये
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बेहद घटिया विषय है लेकिन लिखना पड़ता है .महाराष्ट्र की साझा सरकार कोविद से लड़ने के बजाय कंगना से लड़ रही है.कुछ लोगों की नजर में कंगना रनौत तो रिया चक्रवर्ती से भी गयी. बीती महिला है ,लेकिन महाराष्ट्र सरकार के लिए कंगना एक ढाल है भाजपा की इसलिए उससे लड़ना आवश्यक है .कंगना क्या है ,क्या नहीं इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है किन्तु हमारा मीडिया ये दिलचस्पी कायम रखना चाहता है ताकि उसे देश की महाराष्ट्र की असली तस्वीर न दिखाना पड़े .
महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ मुंह खोलने वाली किन्नर प्रदेश की मुंहफट अभिनेत्री के खिलाफ कार्रवाई करते हुए मुमबई महापालिका ने कंगना के मकान के अवैध हिस्से को ढहने का नोटिस दिया है .अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की जाना चाहिए लेकिन ये सवाल भी किया जाना चाहिए की बीएमसी को ये अतिक्रमण अचानक क्यों नजर आया ?सरकार कंगना को क्रांतिन करेगी ,करना चाहिए क्योंकि क़ानून है .मुंबई पुलिस ने तो बिहार पुलिस के एक आईपीएस अफसर को भी क्रांतिन कर दिया था क्योंकि वो सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत की जांच लड़ने मुंबई आया था .महाराष्ट्र सरकार और उसकी तमाम एजेंसियों के ये कारनामें सौतिया डाह जैसे हैं,इन्हें देखकर हंसी आती है .
मुमबई में पूरे देश के लोग नाम और नामा कमाने आते हैं.सबके अपने-अपने तरिके होते हैं,कुछ के गलत,कुछ के सही .जो गलत होते हैं वो गलत ही होते हैं .लेकिन दुर्भाग्य ये की इन गलत लोगों को तब नहीं पकड़ा या घेरा जाता जब वो सचमुच गलत होते हैं.उन्हें तब घेरा या पकड़ा जाता है जब वे सरकार के खिलाफ मुंह खोलते हैं या सरकार की आँख की किरकिरी बनते हैं .एक लेखक के रूप में अपना किसी से कोई लेना-देना नहीं है .किसी रिया या कंगना से कोई सहानुभूति या ईर्ष्या नहीं है .वे कैसी हैं,ये वे जानें ! मुश्किल ये है की सरकार इन किरदारों को लेकर हलकान है. सरकार के लिए रिया महाराष्ट्र की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है और कंगना भी. एक महारष्ट्र की अस्मिता को लांछित कर रही है तो दूसरी लांछित की जा रही है .
महाराष्ट्र की सरकार के लिए लगता है शेष महाराष्ट्र कुछ है ही नहीं,जो है सो मुंबई है अरे महाराष्ट्र में किसान हैं,मजदूर हैं बेरोजगार युवक हैं ,मछुआरे हैं,क्या इनकी कोई समस्या नहीं है ?क्या पूरे महाराष्ट्र में अमन-चैन है जो सरकार सब कुछ छोड़कर रिया और कंगना में उलझकर रह गयी है ?पिछले चार म्हणे से मुंबई रिया-सुशांत प्रकरण में उलझी थी और अब आज से कंगना के साथ महाराष्ट्र सरकार की मुठभेड़ है .महाराष्ट्र सरकार क्यों नहीं सोचती की इन मुठभेड़ों से महाराष्ट्र की निर्दोष जनता का कितना नुक्सान हो रहा है .आमची मुम्बई और महाराष्ट्रवाद का नारा देकर शिवसेना ने क्या हासिल किया.आज शिवसेना सत्ता में है भी तो एक गठबंधन के साथ.शिवसेना की हैसियत बीते चार दशक में राष्ट्रीय दल की नहीं बनी उलटे इस दौरान उसका एक विभाजन और हो गया .
महाराष्ट्र को आभासी मामलों में उलझाए रखने के लिए सभी राजनितिक दल जिम्मेदार हैं. मध्यप्रदेश की तरह महाराष्ट्र की साझा सरकार का तख्ता पलटने के लिए उतावली भाजपा भी और शिवसेना तो है ही. किसी को महाराष्ट्र की फ़िक्र नहीं है,सब सत्ता के दीवाने हैं .महाराष्ट्र में नशे का संगठित कारोबार आज से नहीं है ,युगों से है लेकिन किसी भी सरकार ने इसे जड़-मूल से खत्म करने को न प्राथमिकता दी और न इसे उखड फिंकने में कामयाबी हासिल की ,उलटे जाने,अनजाने इस जानलेवा कारोबार को प्रत्यक्ष या परोक्ष संरक्षण ही दिया .सुशांत जैसे मामलों से इस कारोबार की एकाध पार्ट खुलती है और फिर बंद हो जाती है.रिया के मामले में भी यही होगा.कुछ दिन बाद सब भूल जायेंगे की कोई रिया -शोभित ,मिरांडा भी मुंबई में था .कंगना को भी कोई याद करने वाला नहीं बचेगा .
दुर्भाग्य ये है की पिछले कुछ दिनों से देश का संघीय ढांचा आश्चर्यजनक रूप से शिथिल हो गया है.अब सब क्षेत्रवाद की बात करने लगे हैं .कोई रोजगार को लेकर ,कोई अस्मिता को लेकर .देश की बात पीछे धकेल दी गयी है.देश केलिए सेना है सो सीमाओं पर दुश्मनों से जूझ रही है .नेता सात तालों के भीतर सुरक्षित बैठे हैं .सरकारें वर्चुअल चल ही रही हैं. इस दुर्दिन में केवल राजनीति हो रही है .उसे न महामारी का भय है और न किसी दूसरे मुद्दे की चिंता .अब तो स्थिति ये आ गयी है कि जनता के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने के लिए भी कोई तैयार नहीं है .आने वाले दिन जैसे भी हों उनके लिए तैयार रहिये.
@ राकेश अचल

*सरकारों के मुंह पर कालिख पुतवाती पुलिस*@ राकेश दुबे जी वरिष्ठ पत्रकार भोपाल

Posted: 08 Sep 2020 10:34 PM PDT


*०प्रतिदिन* -राकेश दुबे
०९ ०९ २०२०
*सरकारों के मुंह पर कालिख पुतवाती पुलिस*
कोलिन्स के शब्दकोष में पुलिस को यूँ परिभाषित [ "The police are the official organization that is responsible for making sure that people obey the law."]किया गया है | आज पुलिस इस परिभाषा से इतर सरकारों को नीचा दिखाने वाले सन्गठन में बदलती जा रही है | चाहे वो महारष्ट्र में सुशांत राजपूत का मामला हो या मध्यप्रदेश में शनै:-शनै: नेपथ्य में भेजा जा रहा "हनी-ट्रेप"का गर्मागर्म किस्सा अथवा छत्तीसगढ़में १३ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर गढा गया झूठा मुकदमा | ये मामले पुलिस और राजनीति के कुत्सित गठजोड़ के नग्न सत्य है | अभी इसका परिणाम छत्तीसगढ़ सरकार एक –एक लाख रूपये का मुआवजा देकर भुगत रही है | यह देश की पुलिस के लिए कलंक से कम नही है |
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने छत्तीसगढ़ सरकार को उन १३ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विधिवेत्ताओं और शिक्षाविदों को एक- एक लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। जिनके खिलाफ अक्टूबर २०१६ में छत्तीसगढ़ पुलिस ने सुकमा, बस्तर में आर्म्स एक्ट के तहत आईपीसी की विभिन्न धाराओं में छह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ और आईपीए- यूएपीए के तहत सात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। १५ नवंबर २०१८ को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए तत्कालीन सरकार को आदेश दिया था कि वह कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार न करे और एसआईटी गठित करके मामले की जांच कराए, लेकिन नई सरकार बनने तक [२०१८] इस मामले की कोई जांच नहीं हुई। फरवरी २०१९ में एफआईआर भी वापस हुई ।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने फैसले में कहा है कि- हम मानते हैं कि उनके खिलाफ दर्ज की गई 'झूठी एफआईआर' के कारण उन्हें मानसिक रूप से परेशानी का सामना करना पड़ा है और यह मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है। छत्तीसगढ़ सरकार को उन्हें मुआवजा देना चाहिए। इसलिए, हम मुख्य सचिव के माध्यम से छत्तीसगढ़ सरकार को सलाह और निर्देश देते हैं कि प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय परते, मंजू और मंगला राम कर्म को उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजे के रूप में १ लाख रुपये दिए जाएं। इसी निर्देश में, आयोग ने तेलंगाना के अधिवक्ताओं के एक तथ्य खोजने वाले दल के सात सदस्यों के लिए मुआवजे का भी आदेश दिया है। पुलिस ने बस्तर में आगजनी की घटना पर तथ्य खोजने निकले इन अधिवक्ताओं की टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इन्हें भी सुकमा की जेल में सात महीने बिताने पडे थे। इस दल में सी.एच. प्रभाकर, बी दुर्गा प्रसाद, बी रबींद्रनाथ, डी प्रभाकर, आर लक्ष्मैया, मोहम्मद नज़र और के राजेंद्र प्रसाद शामिल थे।अब छत्तीसगढ सरकार ने मुआवजा देने का एलान कर दिया है | इस सारी व्यूह रचना को प्रश्रय देने वाली सरकार और व्यूह रचनाकार पुलिस अधिकारी तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक एसआरपी कल्लूरी अब पद पर नहीं है, परन्तु कालिख तो पुलिस सन्गठन के विधि पालन [obey the law} कर्तव्य पर पुत चुकी है |
सुशांत राजपूत मामले में महारष्ट्र पुलिस और राजनीति का गठजोड़ उस दिन ही सामने आ गया था जब बिहार पुलिस के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया गया था | एक पुलिस ने दूसरे राज्य की पुलिस को घटिया हथकंडे अपना कर जाँच करने नहीं दी थी | अब सी बी आई द्वारा उधेड़ी जा रही परतें अपराध जगत राजनीति और पुलिस के घालमेल की कुत्सित कथा पर से नकाब हटा रही हैं | यहाँ भी सारी जाँच जिस दिशा में जा रही है वो भी राजनीति,पुलिस और अपराध जगत के गंदे समीकरण ही हैं |
मध्यप्रदेश के इंदौर में दर्ज "हनी ट्रेप" का मामला भी ऐसा ही राजनीतिक खेल समझ आता है | एक सेवा निवृत मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी का मानना है "एक राजनीतिक दल के कारकूनो के पास से बेहिसाब धन मिलने की कहानी का यह उत्तरार्ध "हनी ट्रेप" है |सरकार बदलने के साथ जाँच की दिशा और जाँच अधिकारीयों का बदलना इस मामले के पूर्णविराम की और जाने के संकेत हैं | वैसे मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा जोर शोर से शुरू किये गये व्यापम कांड, मंत्री द्वारा अपने कर्मचारी से यौनाचार भी इधर उधर भटकते न्याय की दिशा को भटका रहे हैं | इस पर सरकार का यह तुर्रा की हमने दोषी मंत्रियों और अन्य को जेल भेजा सरकार के चेहरे पर लगी कालिख को कम नहीं करता | बल्कि यह सवाल पैदा होता है कि इन अपराधों के घटते समय प्रदेश का शीर्ष क्या सो रहा था ?मध्यप्रदेश में सरकार भले ही कुछ भी कहे सत्ता और प्रतिपक्ष की नुर्राकुश्ती जारी है | दुःख इस बात का है "देश भक्ति और जन सेवा" की शपथ लेने वाली पुलिस इनकी या उनकी अवैधानिक सेवा में लगी है |

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