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Monday, September 7, 2020

जनवादी पत्रकार संघ

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फुरसत में है नेता अभिनेता सचमुच? @राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर

Posted: 07 Sep 2020 02:25 AM PDT


फुरसत में हैं नेता ,अभिनेता सचमुच ?
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इस देश के नेताओं और अभिनेताओं के पास लगता है कोरोनाकालमें सचमुच कोई काम नहीं है और वे लगातार फुर्सत में हैं. दोनों अपना-अपना काम न भूल जाएँ शायद इसीलिए बेवजह आपस में तलवारें भांजते रहते हैं .इस छद्म युद्ध से हमारे टीवी चैनलों को सुर्खियां और अख़बारों को मसाला मुफ्त में मिलता रहता है .सुशांत सिंह राजपूत काण्ड का उद्यापन होने से पूर्व ही कंगना रनौत बजने लगीं हैं .कंगना रनौत के बिना वजह मुखर होते ही साथ-साथ सत्तारूढ़ शिवसेना,कांग्रेस और विपक्ष में बैठी भाजपा को भी काम मिल गया है .
बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत अपनी अदाकारी के अलावा अपनी लम्बी जुबान और बेबाक बयानों के लिए जानी जाती हैं।आजकल फुरसत में हैं , इन दिनों शिवसेना नेता संजय राउत से उनकी ठनी हुई है। दोनों के बीच जुबानी जंग लगातार तेज होती जा रही है। कंगना और राउत एक दूसरे के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं। शिवसेना के शेर संजय राउत अपनी जुबान पर संयम खो बैठे और कंगना पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।एक निजी चैनल से बातचीत के दौरान कंगना रनौत को लेकर पूछे गए सवाल पर संजय राउत नाराज हो गए। और इस दौरान उन्होंने कंगना पर आपत्तिजनक टिप्पणी की। राउत ने अब मामले को छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराष्ट्र के अपमान से जोड़ दिया है ,हालांकि इसकी शिकायत न महाराष्ट्र ने की है और न शिवाजी महाराज ने .
देश की जनता को उलझाए रखना नेताओं और अभिनेताओं का पहला काम है ,इसीलिए संजय राउत के बयान के पर अब कंगना रनौत ने भी पलटवार किया है। उन्होंने याद दिलाया कि, 'साल 2008 में 'मूवी माफिया' ने मुझे एक 'साइको' घोषित कर दिया था। 2016 में उन्होंने मुझे एक 'चुड़ैल' कहा और 2020 में महाराष्ट्र के मंत्री ने मुझे एक अजीब सा खिताब दे दिया था ।कंगना कहतीं हैं कि इन सभी लोगों ने मेरे साथ ऐसा इसलिए किया क्योंकि मैंने कहा कि सुशांत की हत्या के बाद मैं मुंबई में असुरक्षित महसूस करती हूं। कंगना लगभग लकवाग्रस्त देश में इस छद्म युद्ध को असहिष्णुता की और मोड़ना चाहती हैं और सवाल करतीं हैं कि असहिष्णुता पर बहस करने वाले योद्धा कहां हैं?'
दरअसल ट्विटर पर संजय राउत के साथ हुई जुबानी जंग में कंगना ने कहा था कि उन्हें मुंबई पुलिस से डर लगता है। कंगना के इसी बयान पर शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि अगर उन्हें मुंबई में डर लगता है तो वापस नहीं आना चाहिए.बात का बतंगड़ बनाने में माहिर कंगना ने आरोप लगा दिया कि ,शिवसेना नेता संजय राउत ने मुझे खुली धमकी दी है और कहा है कि मैं मुंबई वापस ना आऊं। पहले मुंबई की सड़कों में आजादी के नारे लगे और अब खुली धमकी मिल रही है। ये मुंबई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की तरह क्यों लग रहा है?' इसके कुछ समय बाद कंगान ने कहा कि वह नौ सितंबर को मुंबई आएंगी किसी में हिम्मत हो तो रोक कर दिखाए.कंगना अचानक मणिकर्णिका बन गयीं हैं.उन्होंने दावा किया है कि वे असल राष्ट्रवादी हैं और उन्होंने ही रानी लक्ष्मीबाई पर पहली फिल्म बनाई,शिवसेना ने क्या किया ?अब कनगना को कौन बतायेकी वे अज्ञानी है और नहीं जानतीं कि रानी लक्ष्मीबाई पर सोहराब मोदी तब फिल्म ना चुके थे जब शायद उनके पिता का भी जन्म नहीं हुआ होगा .
इस विवाद को ज़िंदा बनाये रखने के लिए अब कंगना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने को लेकर दो अलग अलग शिकायतें दर्ज कराई गई हैं।कंगना रनौत के खिलाफ एक शिकायत वकील अली काशिफ खान देशमुख ने मुंबई के अंधेरी पुलिस थाने में शुक्रवार को दर्ज कराई। वहीं दूसरी शिकायत कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने आजाद मैदान पुलिस थाने में दर्ज कराई।
इन दोनों शिकायतकर्ताओं ने मुंबई पुलिस को बदनाम करने और दो समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने के लिए कंगना के खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की है। फिलहाल पुलिस ने कहा कि अभी कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है और वे शिकायतों की जांच कर रहे हैं।
कांग्रेस और शिवसेना कह रही है कि कंगना जो कर रहीं हैं सो भाजपा के कहने पर कर रहीं हैं और भाजपा कह रही है कि कंगना के बयानों से उनका कोई लेना-देना नहीं है. कंगना के बयान से सचमुच किसी का कोई लेना-देना नहीं है,न खुद कंगना का ,न शिवसेना का ,न कांग्रेस और भाजपा का. जनता का तो इससे कोई मतलब नहीं है लेकिन सबके सब देशहित में ऐसे विवाद पैदा करते हैं .जनता के मुख्य मुद्दों को धूमिल कर जनसंघर्ष को मोथरा करने वाले ये नकली राष्ट्रवादी निंदा और बहिष्कार के लायक हैं ,लेकिन कोई ऐसा करेगा नहीं ,क्योंकि सबको मसाला लगता है .
मुंबई से मेरा सीधा कोई रिश्ता नहीं है.मै मुंबई से हजार किमी दूर रहता हूँ लेकिन मुंबई मेरे दोहित्र की जन्मभूमि है इसलिए मुझे भी अपनीइ सी लगती है. मुंबई सचमुच किसी की बपौती नहीं है,मुंबई सबकी है .महाराष्ट्रियों की भी और गैर महाराष्ट्रियों की भी. सबने मिलकर मुंबई को बनाया है .शिवसेना की लाख कोशिशों के बावजूद मुंबई ने किसी को बाहर नहीं निकाला .कंगना को भी बेफिक्र रहना चाहिए .मुझे हैरानी ये है कि इस तरह की नौटंकियों में राज्य और केंद्र की सरकारें भी मूक दर्शक बनी रहतीं हैं .उनका कोई हस्तक्षेप नहीं आता,क्योंकि ऐसे विवाद सरकारों के लिए मुफीद पड़ते हैं.जनता उलझी रहती है और अपने सुख-दर्द भूल जाती है .
आपको याद होगा कि इस तरह के बेसिर-पैर के बयानों के कारण कुछ समय पहले अभिनेता आमिरखान,शाहरुख़ खान भी सुर्ख़ियों में रह चुके हैं.ऐसे लोगों की लम्बी फेहरिश्त है .दुर्भाग्य ये है कि इन बयान बहादुरों में से एक ने भी मुंबई को नहीं छोड़ा,वे भी अपनी जगह हैं और मुंबई भी .हाँ बीच-बीच में बेरोजगार संगठनों को ऐसे विवादों से काम जरूर मिल जाता है. टीवी चैनलों के पर्दे सुर्ख़ियों से भर जाते हैं .भगवान सभी को सद्बुद्धि दे .
@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर

*संविधान के रक्षक केशवानंद भारती@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर *

Posted: 07 Sep 2020 02:21 AM PDT


संविधान के रक्षक केशवानंद भारती
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चार दशक पहले जब विधि का विद्यार्थी था तब पहली बार केशवानंद भारती का नाम सूना था और दुर्भाग्य ये की उन्हें कभी देखा नहीं.देखि तो उनकी तस्वीर वो भी तब ,जब वे इस दुनिया से विदा हो गए .हमारे विधि के जितने भी व्याख्याता थे वे सब केशवानंद भारती का प्रकरण बड़ी रूचि लेकर पढ़ाते थे.मै विधि का गरीब और सबसे अधिक गंभीर छात्र था इसलिए बिना नागा अपनी कक्षाओं में उपस्थित रहता था,शायद इसीलिए केशवानंद भारती भी इसीलिए मेरे जेहन में ज़िंदा बने रहे .

आइये आपको संविधान और न्यायालय के लिए नजीर बने इन केशवानंद भारती से मिला देते हैं .केरल के कासरगोड़ में इडनीर नामक स्थान पर एक शैव मठ है। 1961 में केशवानंद भारती को इस मठ का प्रमुख बनाया गया था। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी। इस मठ का इतिहास आदि शंकराचार्य से जुड़ा है।एक धर्माचार्य होते हुए भी उन्होंने अपने अधिकारों के लिए अपने राज्य की सरकार के फैसले के साथ ही संविधान को भी चुनौती दी और लगातार संघर्ष करते रहे .अंत में वे जीते और एक जीती-जागती नजीर बन गए .क़ानून के प्रति मेरी दिलचस्पी जूनून की हद तक थी.मै ग्वालियर के महारानी लक्ष्मी बाई विधि एवं कला महाविद्यालय में विधि की अंशकालिक कक्षाओं का छात्र था.किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे सो नियमित कक्षाओं में बैठकर अपने प्राध्यापकों के प्रवचनों को शब्दश: उतार लेता था .सर्दी,गर्मी,बरसात मेरी पढ़ाई में कभी बाधा नहीं बनी.बाधा बना तो रोजगार जिसकी वजह से मेरी विधि की पढ़ाई अंतिम वर्ष में छूट गयी थी .
केरल के कासरगोड़ जिले में इडनीर मठ के उत्तराधिकारी केशवानंद केरल सरकार पर तब भड़के जब केरल सरकार ने दो भूमि सुधार कानून बनाए जिसके जरिए धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन पर नियंत्रण करने की कोशिश की दरअसल इस क़ानून के तहत मठ की 400 एकड़ में से 300 एकड़ ज़मीन पट्टे पर खेती करने वाले लोगों को दे दी गई थी। उन दोनों कानूनों को संविधान की नौंवी सूची में रखा गया था ताकि न्‍यायपालिका उसकी समीक्षा न कर सके। साल 1970 में केशवानंद ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो ऐतिहासिक हो गया। सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बेंच बैठी, जो अबतक की सबसे बड़ी बेंच है। 68 दिन सुनवाई चली, यह भी अपने आप में एक रेकॉर्ड है। फैसला 703 पन्‍नों में सुनाया गया।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का प्रकरण जब सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था तब मै ग्यारहवीं का छात्र था ,उस समय के अख़बारों में ये मामला खूब छाया रहा लेकिन तब अपने राम को क=इस तरह की खबरों में कोई दिलचस्पी नहीं थी,लेकिन जब दस साल बाद विधि कक्षाओं में बैठने का मौक़ा मिला तो यही मामला सबसे पहले कंठस्थ कराया गया .23 मार्च, 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। संसद के पास संविधान को पूरी तरह से बदलने की असीमित शक्तियों पर अदालत ने ऐतिहासिक रोक लगाई। चीफ जस्टिस एसएम सीकरी और जस्टिस एचआर खन्‍ना की अगुआई वाली 13 जजों की बेंच ने 7:6 से यह फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद के पास संविधान के अनुच्‍छेद 368 के तहत संशोधन का अधिकार तो है, लेकिन संविधान की मूल बातों से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि संविधान के हर हिस्‍से को बदला जा सकता है, लेकिन उसकी न्‍यायिक समीक्षा होगी ताकि यह तय हो सके कि संविधान का आधार और ढांचा बरकरार है।
जस्टिस खन्‍ना ने अपने फैसले में 'मूल ढांचा' वाक्‍यांश का प्रयोग किया और कहा कि न्‍यायपालिका के पास उन संवैधानिक संशोधनों और कानूनों को अमान्‍य करार देने की शक्ति है जो इस सिद्धांत से मेल नहीं खाते। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में 'मूल ढांचे' की एक आउटलाइन भी पेश की थी। अदालत ने कहा था कि सेक्‍युलरिज्‍म और लोकतंत्र इसका हिस्‍सा हैं। पीठ ने आगे आने वाली पीठों के लिए इस मुद्दे को खुला रखा कि वे चाहें तो सिद्धांत में कुछ बातों को शामिल कर सकती हैं।भारती का केस तब के जाने-माने वकील नानी पालकीवाला ने लड़ा था। 13 जजों की बेंच ने 11 अलग-अलग फैसले दिए थे जिसमें से कुछ पर वह सहमत थे और कुछ पर असहमत। मगर 'मूल ढांचे' का सिद्धांत आगे चलकर कई अहम फैसलों की बुनियाद बना। कई संवैधानिक संशोधन अदालत में नहीं टिके। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी व्‍यवस्‍था दी कि न्‍यायपालिका की स्‍वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्‍सा है, इसलिए उससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
हमारे शिक्षक कहते थे की इस मामले में भारती को व्यक्तिगत राहत तो नहीं मिली लेकिन 'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल' मामले की वजह से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत का निर्माण हुआ जिसने संसद की संशोधन करने की शक्ति को सीमित कर दिया.केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले से कई विदेशी संवैधानिक अदालतों ने भी प्रेरणा ली .कई विदेशी अदालतों ने इस ऐतिहासिक फ़ैसले का हवाला दिया.
लाइव लॉ के मुताबिक़, केशवानंद के फ़ैसले के 16 साल बाद, बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने भी अनवर हुसैन चौधरी बनाम बांग्लादेश में मूल सरंचना सिद्धांत को मान्यता दी ‌थी.वहीं बेरी एम बोवेन बनाम अटॉर्नी जनरल ऑफ़ बेलीज के मामले में, बेलीज कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत को अपनाने के लिए केशवानंद केस और आईआर कोएल्हो केस पर भरोसा किया.केशवानंद केस ने अफ्रीकी महाद्वीप का भी ध्यान आकर्षित किया. केन्या, अफ्रीकी देश युगांडा, अफ्रीकी द्वीप- सेशेल्स के मामलों में भी केशवानंद मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले का ज़िक्र कर भरोसा जताया गया.
देश का दुर्भाग्य ये रहा की संविधान के इस महान रक्षक के निधन की खबर को किसी समाचार संसथान ने अपनी सुर्खी नहीं बनाया .टीवी चैनल रिया चक्रवर्ती में उलझे रहे ,और अख़बारों में वे एक कालम की खबर बन कर रह गए.केशवानंद भारती किसी राजनितिक दल के लिए भी लमतवपूर्ण नहीं माने गए क्योंकि उनकी अपनी कोई राजनितिक महत्वाकांक्षा नहीं थी ,वे अगर किसी मंदिर आंदोलन से जुड़े होते तो भी शायद इन्हें याद किया जाता .बावजूद इसके केशवानंद जी क़ानून की दुनिया में अजर-अमर रहने वाले हैं भले ही कोई उनकी प्रतिमाएं लगाए या नहीं .इस अनाम योद्धा के चरणों में मेरा प्रणाम .
@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर

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