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Thursday, September 10, 2020

जनवादी पत्रकार संघ

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*हिमालय गुजर रहा है, मानवीय स्वार्थ के संकट से*@ राकेश दुबे जी वरिष्ठ पत्रकार भोपाल

Posted: 09 Sep 2020 09:25 PM PDT

*०प्रतिदिन* -राकेश दुबे
१० ०९ २०२०
*हिमालय गुजर रहा है, मानवीय स्वार्थ के संकट से*
हम भारतवासी जिस हिमालय पर नाज़ करते आ रहे हैं, उस पर आसन्न संकट से अब हमें सावधान हो जाना चाहिए | हम अगर नहीं चेते तो भारत के साथ विश्व को भारी क्षति होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता | बेंगलुरु स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिक अनिल वी कुलकर्णी का एक शोध पत्र हैं जिसमे कहा गया है कि
हिमालय के ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं, वह चिंतनीय है। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलाव की दर में १९८४ के बाद से अबतक अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई है, वह खतरनाक संकेत है।
शोध पत्र में कहा गया है कि हिमालय के चंद्रा बेसिन के इन ग्लेश्यिरों के पिघलने की यही रफ्तार जारी रही, तो हमारी प्रमुख नदियों के सूखने का खतरा बढ़ जाएगा और नदियों के बिना इस भूभाग में मानव अस्तित्व की कल्पना बेमानी होगी। वैज्ञानिक कुलकर्णी का यह शोध पत्र "एनल्ज ऑफ ग्लेश्यिोलॉजी" में प्रकाशित हुआ है| शोध पत्र में कहा गया है कि "ग्लेश्यिरों का पिघलना इसी तरह जारी रहा, तो झेलम, चेनाब, व्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि नदियों का अस्तित्व मिट जाएगा। हिमालयी क्षेत्र की नदियों की जलधाराओं की क्षीण होती स्थिति इस चेतावनी की जीती-जागती मिसाल है।" इस सारे क्षरण में मानवीय करतूतों की अहम भूमिका है|
मानवीय जरूरतों का जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि में निरंतर हो रहे योगदान को नकारा नहीं जा सकता। ग्लेश्यिरों के पिघलने से हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाली शंखपुष्पी, जटामासी, पृष्पवर्णी, गिलोय, सर्पगंधा, पुतली, अनीस, जंबू, उतीस, भोजपत्र, फर्न, गेली, तुमड़ी, वनपलास, कुनेर, टाकिल, पाम, तानसेन, अमार, गौंत, गेठी, चमखड़िक और विजासाल जैसी प्रजातियों और जीवों की चिरू जैसी असंख्य प्रजातियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो असंख्य प्रजातियां इतिहास बन कर रह जाएंगी। यदि संयुक्त राष्ट्र के तथ्य पत्रों के तथ्यों को स्वीकार करें , तो अगले १०० वर्ष में २० प्रतिशत हिमालयी जैव प्रजातियां सदा-सदा के लिए विलुप्त हो जाएंगी। वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और समाज विज्ञानी अब मानने लगे हैं कि हिमालय की सुरक्षा के लिए सरकार को उस क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए पर्वतीय क्षेत्र के विकास के वर्तमान मॉडल को बदलना होगा।इससे कम में अब गुजारा संभव नहीं है |

हिमालय के हिमालयी संकट का प्रमुख कारण इस समूचे क्षेत्र में विकास के नाम पर अंधाधुंध बन रहे अनगिनत बांध, पर्यटन के नाम पर हिमालय को चीरकर बनाई जा रही ऑल वैदर रोड और उससे जुड़ी सड़कें हैं। हमारे नीति-नियंताओं ने कभी इसके दुष्परिणामों के बारे में सोचा तक नहीं, जबकि दुनिया के दूसरे देश अपने यहां से धीरे-धीरे बांधों की संख्या को को कम करते जा रहे हैं। सवाल यह है कि यदि यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा, तो इस पूरे हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण कैसे बचेगा? देश की करीब ६५ प्रतिशत आबादी का आधार हिमालय ही है। यदि हिमालय की पारिस्थितिकी प्रभावित होती है, तो देश प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। इसीलिए सरकार को बांधों के विस्तार की नीति बदलनी होगी और पर्यटन के नाम पर पहाड़ों के विनाश को भी रोकना होगा। बांधों से नदियां तो सूखती ही हैं, इसके खतरों से निपटना भी आसान नहीं होता। यदि एक बार नदियां सूखने लगती हैं, तो फिर वे हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी। पहाड़ जो हमारी हरित संपदा और पारिस्थितिकी में अहम भूमिका निभाते हैं, अगर नहीं होंगे, तो हमारा वर्षा चक्र प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। भारत जैसे देश में वर्षा चक्र का प्रभावित होना एक बड़ा संकट हे | हमारी सारी खेती और उससे जुड़ा जनजीवन खतरे में आ सकता है | इसका दुष्प्रभाव देश की आर्थिकी पर होगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता |

देश की वर्तमान नीति अत्यधिक दोहन की है क्षेत्र कोई भी हो |वर्तमान के अनुसार, नदी मात्र जल की बहती धारा है और पर्यटन आर्थिक लाभ का साधन। योजनाकारों ने हिमालय से निकलने वाली नदियों को बिजली पैदा करने का स्रोत मात्र मान लिया है। मानवीय स्वार्थ हिमालय से भी बड़े हो गये है। स्वार्थी प्रवृत्ति ने ही हिमालय को खतरे में डाल दिया है। इसी सोच के चलते हिमालय के अंग-भंग होने का सिलसिला और उसकी तबाही जारी है। हमे यह नहीं भूलना चहिये कि यह पूरा क्षेत्र भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील है। यहां निर्माण, विस्फोट, सुरंग, सड़क का जाल बिछने से पहाड़ तो खंड-खंड होते ही हैं, वहां रहने वालों के घर भी तबाह होते हैं। समग्र समावेशी विकास नीति बनाए बिना हिमालय को बचाना मुश्किल है।

सिंधिया की नहीं कमलनाथ की है अग्नि परीक्षा@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर

Posted: 09 Sep 2020 09:23 PM PDT


सिंधिया की नहीं कमलनाथ की है अग्निपरीक्षा
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मध्यप्रदेश विधानसभा की दो दर्जन से अधिक खाली सीटों के लिए उपचुनाव की घोषणा होने में एक सप्ताह शेष है और इसी के साथ शुरू हो रही है एक और अग्निपरीक्षा.लेकिन ये अग्निपरीक्षा कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की नहीं बल्कि अपनी हेंकड़ी की वजह से कांग्रेस की सरकार गिराने के दोषी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की है .इन उपचुनावों में कमलनाथ या तो हमेशा के लिए हाशिये पर जायेंगे या फिर हमेशा के लिए कांग्रेस पर बोझ बने रहेंगे .
कांग्रेस छोड़ भाजपा में आये ज्योतिरादित्य सिंधिया तो 2018 के विधनसभा में हुई अग्निपरीक्षा में अपने आपको प्रमाणित कर चुके हैं. उस विधानसभा चुनाव में मुकाबला शिवराज विरुद्ध कमलनाथ नहीं बल्कि शिवराज विरुद्ध महाराज था .ये स्वीकारोक्ति तब की भाजपा की थी .महारज की वजह से ही भाजपा हारी थी और प्रदेश में पंद्रह साल बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी ,लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की चमक को शायद पहचानने में गलती करती और फिर 18 महीने में इसका खमियाजा भी भुगता .जिन सिंधिया की वजह से सरकार बनी थी उन्हीं सिंधिया की वजह से कांग्रेस की सरकार भरभराकर गिर भी गयी .
होने वाले उपचुनाव में भी फैसला ग्वालियर-चंबल अंचल से ही होना है क्योंकि सर्वाधिक 16 सीटें इसी अंचल में हैं .सिंधिया और शिवराज मिलकर इस अंचल में चुनाव प्रचार का श्रीगणेश कर चुके हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह फिर से लगातार तीन दिन ग्वालियर -चंबल अंचल में रहने वाले हैं लेकिन कांग्रेस अभी तक अपने नेताओं को इस अंचल में उतार ही नहीं पायी है. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपना हवाई दौरा कर वापस लौट गए और कमलनाथ तो तारीख देकर भी आये नहीं .वे जब मुख्यमंत्री भी थे तब भी इस अंचल से उन्होंने खासी दूरी बनाये रखी थी और अब शायद उनके पास नैतिक साहस नहीं है इस अंचल में आने का .कमलनाथ ने जाते-जाते इस अंचल से बड़ा दगा तब किया था जब ग्वालियर के सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल के लिए धन न देते हुए छिंदवाड़ा को 1450 करोड़ की रकम दे दी थी .
ग्वालियर-चम्ब्ल अंचल में भाजपा के पास सिंधिया के आने से पहले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह के रूप में एक नेता था ही अब भाजपा की ताकत सिंधिया के आने से द्विगुणित हो गयी है.जमीन पर ये ताकत दिखाई भी दे रही है. कांग्रेस सिंधिया के विरोधः यकीनन सड़कों पर दिखाई दे रही है लेकिन नेतृत्व विहीन है .कांग्रेस के नेता अभी भी बिखरे-बिखरे हैं. डॉ गोविंद सिंह अपनी अलग ढपली बजा रहे हैं और लाखन सिंह यादव अलग .दोनों संभागों का कोई एक छत्र नेता कांग्रेस के पास नहीं है .भाजपा छोड़ कांग्रेस में आये पूर्व मंत्री बालेंदु शुक्ल और पूर्व मंत्री भगवान सिंह यादव का नयी पीढ़ी के कार्यकर्ताओं से कोई तादात्म्य ही नहीं है,दोनों उम्रदराज हो गए हैं सो अलग .
विधानसभा उपचुनाव में इस अंचल में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की टीम भी बुढ़ा चुकी है,कमलनाथ की कोई मजबूत टीम है नहीं ऐसे में विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की पुरानी स्थिति को बरकरार रखना लगभग असम्भव सा लग रहा है .कांग्रेस को अगर कुछ हासिल होगा भी तो वो कांग्रेस की वजह से नहीं अपितु प्रत्याशी की अपनी मेहनत से हासिल होगा .अब चूंकि शिवराज और महारज एक साथ हैं इसलिए उनकी आंधी का मुकाबला कांग्रेस कैसे करेगी ये अब तक स्पष्ट नहीं है .
अभी तक ये मिथक था की सिंधिया है न जहां कांग्रेस है वहां लेकिन अब ये मिथक टूटने वाला है.अब सिंधिया हैं जहां ,सत्ता है वहां का नया मिसरा गधा जा रहा है .इन उप चुनावों के बाद कांग्रेस का भविष्य तय हो जाएगा,भाजपा का भविष्य तो अभी से तय है .कांग्रेस की सरकार के लिए कांग्रेसियों को फिर तीन साल इन्तजार करना होगा,तब तक चंबल में कितना पानी बह जाएगा कोई नहीं जानता .भाजपा की केंद्र सरकार में अभी सिंधिया को शामिल किया जाना बाकी है.मुझे लगता है की संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले ये काम भी हो सकता है .ये काम अभी न भी हो तो भी इसे बहुत दिनों तक टाला नहीं जा सकता .
आपको ध्यान रखना होगा की सिंधिया ने भाजपा में आने के बाद बड़ी तेजी से अपने आपको बदला है.वे यदि संघ के नागपुर मुख्यालय गए तो ग्वालियर में भाजपा के जिला मुख्यालय में भी गए और उनके यहां भी भाजपा के दिग्गज लगातार आ-जा रहे हैं अर्थात वे तेजी से भाजपा में अपनी पैठ बनाने में लगे हैं .उन्हें स्थापित होने में ज्यादा समय भी नहीं लगने वाला.उनकी उपस्थिति राज्य शासन के निर्णयों पर भी साफ़ दिखाई देने लगी है .कांग्रेस के अठारह माह के शासन में सिंधिया के दैदीप्य को ढांकने की नाकाम कोशिश की गयी थी .
@ राकेश अचल जी वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर

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