बेसिक शिक्षा न्यूज़ । Basic Shiksha News | |
- MAN KI BAAT : प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापक यानि चौदह खाने की रिन्च
- MDM : नयी शिक्षा नीति, मिड डे मील के साथ - साथ नाश्ते का भी प्रावधान
- ADD SCHOOL, APPOINTMENT : बेसिक शिक्षा में एडेड स्कूलों में हुई नई नियुक्तियों की निदेशालय ने मांगी रिपोर्ट
- ONLINE, TRAINING : बेसिक और माध्यमिक के गुरुजी पढ़ेंगे सड़क सुरक्षा का ऑनलाइन पाठ
- BED, SHIKSHA NEETI, TEACHING QUALITY, APPOINTMENT : राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से बदलेगा बीएड का पैटर्न, जानिए नई नीति में शिक्षकों की गुणवत्ता को बढ़ाने व नियुक्ति के लिए क्या होंगे प्रावधान
- BSA, BEO, BRC : बीईओ कार्यालय / बीआरसी में न्यूनतम सुविधाएं न होने पर बीएसए से मांगा गया स्पष्टीकरण
| MAN KI BAAT : प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापक यानि चौदह खाने की रिन्च Posted: 03 Aug 2020 06:37 AM PDT MAN KI BAAT : प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापक यानि चौदह खाने की रिन्च डॉ. ओ.पी. निश्र शिक्षा मन्त्री का नाम नहीं आता। अब आप आसानी से इस बात को समझ दुनिया और समाज का पूरा ताना-बाना बदल गया। उद्योगों की संरचना सकते है कि जिन विद्यार्थियों को ये अध्यापक पढ़ायेगे उनका भविष्य क्या न केवल उ0प्र0 बल्कि शायद ही देश का ऐसा कोई ोगा? आगे चलकर वे बेरोजगारों की श्रेणी में आने के अलावा क्या कर पायेगे? आखिर सरकार यह क्यों नहीं सोचती कि 'बीएसएनल घाटे में जा विद्यालयों केवल शिक्षण कार्य होता है। इसे अगर रहा है जबकि 'जियो' प्रपुल्लित हो रहा है? सरकारी अस्पतालों में लोग इलाज में को तैयार है? लोग पोस्ट आफ्सि से काम लेने की बजाये कोरियर को पसन्द करते है? प्राइमरी स्कूल में जहाँ बच्चों को सरकार को मंशा शायद 'साक्षर' बनाने है, "शिक्षित' बनाने की नहीं। वैसे है वहा भेजने के बाे अि के के क की सन कुषछ मुफ्त मिलेता अपने बच्चों को ऐसे सवाल जिससे न केवल सरकार ये बल्कि बेसिक शिक्षा परिषद को भी तलाशना होगा वरना वह दूर नहीं की कोठी हो जायेगी। राज्य हो जहाँ के प्राथमिक विद्यालय या अपर प्राथमिक दूसरे शब्दों में कहे तो इन जाते है। इससे यह साबित होता है कि शायद पढ़ाई सरकार की पहली प्राथमिकता है ही नहीं? और अगर है भी तो की मिलती है उसके : भी जो रिपोर्ट पढ़ने को अनुसार जो स्कूलों में 'फर्जी छात्र स्कूलों में क्यों भेजते है? संख्या' के आधार पर नियुक्ति की जाती है, उसी के हिसाब से किताबें, बस्ते और डेअसे आती हैं तथा मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था उसी छत्र संख्या के िणा आधार पर होती ने मुझे एक बार बताया पत्नी का जिस स्कूल में ज्वाइन कराना था उस स्कूल की छात्र संख्या इतनी यो कि कि उन्हें अपनी एक और अध्यापक को उस विद्यालय में समायोजित किया जा शिक्षा सके। लेकिन चुँकि यह नियुक्ति हाई प्रोफाइल थी इसलिए खण्ड शिक्षा अधिकारी के उस समय 'डिप्टी साहब' हुआ करते थे को विश्वास में लेकर चालीस नाम चल फर्जी बढ़ाये गये फिर उसी स्कूल में अध्यापक को ज्वाइन कराया गया। यह तो एक उदाहरण मात्र है जबकि बेसिक शिक्षा परिषद इस तरह के उदाहरणों से ली जा भर पड़ा है। प्राथमिक विद्यालय के अध्यापकों को पुलिस के एक सब- इन्सपेक्टर से अधिक वेतन मिलता है इसके बावजूद उसका कोई जिम्मेदारी न करेगे, विभाग ने तय है और न ही विद्यार्थियों के प्रति या उनकी शिक्षा के प्रति कच्चा उनकी कोई जवाब देशी है। बेसिक शिक्षा विभाग की के लिए दोनों दकान दुर्दशा शरीके जुर्म' है यानी 50 प्रतिशत अध्यापक स्कूलों में बिल्कुल पढ़ाना चाहते। नहीं उनकी सारी चिन्ता वेतन' पर ही लगी रहती है इसके बदले उन्हें इस लगे बात की बिल्कुल चिन्ता नहीं है कि उनके विद्यालय के कक्षा पाँच के छात्रों को जरूर भी कक्षा तीन का ज्ञान नहीं है। वैसे ऐसा नहीं है कि शिक्षा के लिए केवल बच्चे अध्यापक ही जिम्मेदार है इसके लिए सरकार भी बराबर जिम्मेदार है। जिसका जाती लक्ष्य मिडडे मील तक ही सीमित है। बहुत पुरानी कहावत है कि जो वस्तु है। मिलती है उस वस्तु की विश्वसनीयता पर सदैव प्रश्न चिन्ह लगा 'खुले रहता है। वह चाहे सरकारी अस्पताल की दवाई हो या प्राथमिक विद्यालय की मे एसोसिएशन शिक्षा यूपी ग्रामीण पत्रकार । द्वारा पूरे उ0प्र0 में नवम्बर 2019 लेकिन पचास प्रतिशत में कराये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक प्राथमिक विद्यालय अध्यापक प्रतिदिन स्कूल नहीं जाते, पाँच प्रतिशत अध्यापक खण्ड शिक्षा रहते अधिकारी तथा बेसिक शिक्षाधिकारी के कार्यालयों में बैठकर 'नेतागीरी' करते के है तीस प्रतिशत अध्यापक सप्ताह में तीन दिन जाते है जबकि पन्द्रह प्रतिशत 42.6 है जब अध्यापक अपने स्थान पर किसी दूसरे को रखकर काम करवाते है। वैसे ऐसा करवाते हैं। नहीं है कि इन बातो की जानकारी अधिकारियों को नहीं है बिल्कुल है लेकिन जैसे से नीचे तक सब 'मैनेज' है। अगर मैसेज ना होता तो हजारों तादाद में जो फर्जी अध्यापक, फर्जी प्रमाण पत्र लगाकर नौकरी कर रहे थे, वेतन प्राप्त साथ कर रहे थे वे कैसे नियुक्ति पा जाते? मतलब साफ है कि न हमको पढ़ाने के लिए स्कूल जाना है, न उनको पढ़ना है और न ही हमको पढ़ाना है। कितने है। दुख की बात है कि कक्षा पाँच के छात्रों को कक्षा दो का पहाड़ा तक नहीं आता? इतना ही नहीं चालीस प्रतिशत अध्यापकों को राष्ट्रगान नहीं आता। का जबकि 52 प्रतिशत पोस्ट ग्रेजुएट अध्यापकों को अपने राज्य के राज्यपाल और अभी तक देश में 34 साल पहले बनी शिक्षा नौति लागू थी इस बीच देश, बदल गयी, जीवन व्यवहार बदल गया और सबकी जरूरते बदल गयी लेकिन प्राथमिक और अपर प्राथमिक विद्यालयों की व्यवस्था उन्ही 'डिप्टी साहब के रहमो-करम पर चलती रही जिन्हे अध्यापकों के रिटायरमेन्ट के फड से भी पैसा चाहिए। के भारतीय शिक्षा 'वैश्वीकरण करने में सफल होगी, छात्रों को किताबी ज्ञान आ संविधान प्रदत्त 'मुफ्त बेसिक शिक्षा" भारत के निरवासियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए जितना पस िक सरकार हो सकता है। यह तो हुआ बेसिक है उसी का सही सदुपयोग हो सकता है। प्रथा जबकि दूसरे पक्ष यह है कि इन अध्यापकों के पास पढ़ाने कोरोना जिम्मेदारी है। इस समय खर्च करती है का एक पक्ष अलावा और तमाम कुछ करने की रहा है इसलिए इन अध्यापकों को 'सर्वे में लगाया गया है। इन दिनों चंकि काल विद्यालयों में पठन-पाठन का काम बन्द है इसलिए अध्यापकों से 'बेगार रही है। फि जब चुनाव का समय आयेगा। तो 'वोटर लिस्ट' सत्यापन यही अध्यापक करेंगें, नाम जोडने और नाम नाम हटाने का काम भी यही पोलियों ड्राप पिलवाने में भी सहयोग करेंगे, पहले राशन मिलता था मिड डे मील में भी यही अध्यापक बच्चों को लेकर राशन की चलाने वाले के यहाँ जाते थे और सारा दिन बच्चों के साथ धूप में ही नहीं अब तो किताब धोने थे। इतना का काम भी यही अध्यापक करने है। चुनाव के समय कई बार समाचार पत्रों में एक-दो फेटो देखने मिल जाती है जिसमें महिला अध्यापिका गोदी में अपने छः महीने को लिये और सिर पर 'बैलट बाक्स' या 'बैलट मशीन' का बोरा देखी जा सकती है। जनगणना करना तो मानों शिक्षकों का मूल कार्य जी सकता है पिछले दिनो मुझे एक समाचार पढ़नेको मिला था जिसमे लिखा था कि में शौच मुक्त भारत अभियान' के तहत कई राज्यों में शिक्षको को या में शौब करने वालों की निगरानी का काम दिया गया है। पढ़कर अजीब चूँकि तमाम सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों की आँखों का वेतन खटकता रहता है इसलिए इस तरह के आदेश जारी होते 'अध्यापकों है। तभी मैनें इन्हे 'चौदह खाने की रिन्च' कहा है। एक देशव्यापी अनुसार शिक्षक औसतन 19.1 प्रतिशत समय ही पढ़ाई में लगाते है जबकि प्रतिशत इनका समय गैर शैक्षाणिक गतिविधियों में जाता है वाघ्या में अगर विद्यालय के प्रधानाध्यापकों की बात की जाये तो इनके 57.3 प्रतिशत विभिन्न तरह के बिल तैयार करना और जमा करना, विभिन्न विभागों पत्रकार करना, रिकार्ड दुरुस्त करना, कैश त बुक आदि मेंटेन करने साथ ही स्कूलों में साफसफई की व्यवस्था करवाना, बिजली, पानी, लाइट शौचालयों की देखरेख करना तथा ग्राम प्रधान के यहाँ चक्कर लगाने मे ही अब जब नयी शिक्षा नीति को केन्द्रीय मंत्रिमडल ने मंजूरो दे दी है तो मानकर चलना चाहिए कि प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों तथा विद्यालयों 'कुछ सख्ती' के साथ यकीनन काया कल्प होगा। यहाँ यह बताते चले का के साथ ही साथ समाज से जोडेगी और एक संस्कारवान भारतीय नागरिक के आ में तैयार करेगी। शिक्षाविद तुषार रूप में चेतावनी के अनुसार नयी शिक्षा स्कूल शिक्षा को महत्व दिया है। इसे विश्व स्तर पर एक बच्चे की मानसिक के विकास क्षमताओ के लिए महत्वपूर्ण चरण मान्यता दी के रूप में मा के सयी है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आने वाला समय के लिए चुनौती भरा अध्यापकों भूले ही अब से ज्यादा चौदह नयी रहेगी खाने की रिन्च बनकर नहीं शिक्षा नीति से अध्यापको को भले तमाम दबाव डालने पढ़े लेकिन हरा के स के इतना तो कि हमारे नौनिहालों का भविष्य यकीनन उज्जवल होगा और वे किसी भी काम्पीटशन से निपटने में 'पारंगत' होगें। नयी शिक्षा नीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब पहले तीन साल आंगनबाड़ी में प्री प्री-स्कृलिगं होगी अभी तक यह काम प्राइवेट सेक्टर के स्कूल करते थे और अच्छ खासा धन अर्जिंत करते थे। आंगनबाड़ी के बाद अगले दो के बाद अगले दा साल यानि कक्षा एक और पढ़ेगे जिसमें एक्टिविटी स्कूल में आधारित पाठ्यक्रम शामिल होगा। इसके बाद कक्षा तीन से पाँच तक प्रयोगों के जरिये विज्ञन, गाणित, कला आदि विषयों की पढ़ाई की जायेगी इसमें 8 से 11 साल बच्चे शामिल होंगे इसे तक की अ प्री-प्राइमरी स्टेज कहा जायेगा इसके बाद शुरू होगा मिडिल स्टेज, इसमें कक्षा 6 से आठ तक की पढ़ाई होगी। इसमें पढ़ाई के साथ ही कौशल विकास कोर्स भी शमिल रहेगा ताकि आगे जाने वाले बच्चों को अपनी सुविधा तथा योग्यतानुसार कुछ बू आती पर-प्रान्त ? मामला पेचीदा। बन गया सुशांत ।। उड़ गयी सरकार। बू आती पर प्रांत ? एकजुट का नाटक। दिखता अलग सुर॥ मुख्य जो है मुद्दा । दिनेश भट्ट ? प्रश्न चिन्ह लग गया। मिला जो सहयोग ।। इतने दिन का वाजिब। हुआ नहीं उपयोग? दर-दर मारे फिर रहे। जांच को है आए | सवालिया निशान । मोदी जी दिलवाए। कृष्णेन्द्र राय नया करने का मौका मिल सके। (लेखक- राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं।) |
| MDM : नयी शिक्षा नीति, मिड डे मील के साथ - साथ नाश्ते का भी प्रावधान Posted: 03 Aug 2020 12:40 AM PDT MDM : नयी शिक्षा नीति, मिड डे मील के साथ - साथ नाश्ते का भी प्रावधान दिल्ली ( डीएनबी ) । राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मिड डे मील के साथ सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को नाश्ता मुहैया कराने का प्रावधान रखने का भी प्रस्ताव है । पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई इस शिक्षा नीति में कहा गया है कि सुबह के समय पोषक नाश्ता मिलना ज्ञान - संबंधी असामान्य मेहनत वाले विषयों की पढ़ाई में लाभकर हो सकता है । इसी के मद्देनजर नयी शिक्षा नीति में प्रस्ताव किया गया है कि मिड डे मील ( मध्याह्न ) भोजन के दायरे का विस्तार कर उसमें नाश्ते का प्रावट पान जोड़ा जाए । प्रस्ताव में कहा गया , ' शोध बताते हैं कि सुबह के समय पोषक नाश्ता ज्ञान - संबंधी असामान्य मेहनत वाले विषयों की पढ़ाई में लाभकारी हो सकता है । इसलिए बच्चों को मध्याह्न भोजन के अतिरिक्त साधारण लेकिन स्फूर्तिदायक नाश्ता देकर सुबह के समय का लाभ उठाया जा सकता है । जिन स्थानों पर गरम भोजन संभव नहीं है , उन स्थानों पर साध पारण लेकिन पोषक भोजन मसलन मूंगफली या चना गुड़ और स्थानीय फलों के साथ उपलब्ध कराया जा सकता है । केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने इस सप्ताह की शुरुआत में नई शिक्षा नीति -2020 की घोषणा कर देश की 34 साल पुरानी , 1986 में बनी शिक्षा नीति को बदल दिया । नई नीति का लक्ष्य भारत के स्कूलों और उच्च शिक्षा प्रणाली में इस तरह के सुधार करना है कि देश दुनिया में ज्ञान की ' सुपरपॉवर कहलाए । शिक्षा नीति के तहत 5 वीं कक्षा तक के बच्चों की पढ़ाई उनकी मातृ भाषा या क्षेत्रीय भाषा में होगी , बोर्ड परीक्षाओं के महत्व को इसमें कुछ कम किया गया है , विधि और मेडिकल कॉलेजों के अलावा अन्य सभी विषयों की उच्च शिक्षा एक एकल नियामक का प्रावधान है , साथ ही विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए समान प्रवेश परीक्षा की बात कही गई है । पुरानी नीति के 102 ( दसवीं कक्षा तक , फिर बारहवीं कक्षा तक ) के ढांचे में बदलाव करते हुए नई नीति में 5334 का ढांचा लागू किया गया है । इसके लिए आयु सीमा क्रमशरू 3-8 साल , 8-11 साल , 11-14 साल और 14-18 साल तय की गई है । एम.फिल खत्म कर दिया गया है और निजी तथा सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए समान नियम बनाए गए हैं । |
| Posted: 03 Aug 2020 12:23 AM PDT ADD SCHOOL, APPOINTMENT : बेसिक शिक्षा में एडेड स्कूलों में हुई नई नियुक्तियों की निदेशालय ने मांगी रिपोर्ट बेसिक शिक्षा विभाग से संबद्ध सभी एडेड स्कूल में पढ़ाने वाले नवनियुक्त कर्मचारियों पर भी जांच की तलवार लटक गई है। बेसिक शिक्षा निदेशालय ने सभी जिले के बीएसए से उनके जिले के सहायता प्राप्त अशासकीय विद्यालयों में काम करने वाले सभी कर्मचारियों का विवरण मांगा है। जिसके बाद विभाग ने 2015 के बाद नियुक्ति पाने वाले कर्मचारियों की सूची तैयार करना शुरू कर दिया है। जानकारी के अनुसार पूरे प्रदेश में अनामिका शुक्ला प्रकरण उजागर होने के बाद लगातार शिक्षकों और नवनियुक्त कर्मचारियों की जांच की जा रही है। बेसिक शिक्षा विभाग के सभी कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय परिषदीय विद्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों की जांच लगातार जारी है। अब विभाग ने एडिड स्कूलों में पढ़ाने वाले कर्मचारियों का विवरण भी विभाग से मांग लिया है। बेसिक शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी किए गए आदेशों में स्पष्ट किया गया है कि प्रदेश के सभी अशासकीय सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल में काम करने वाले हेडमास्टर, शिक्षक, क्लर्क व अन्य कर्मचारी जिनकी नियुक्ति 6 नवंबर 2015 के बाद हुई है उन सभी का विवरण तैयार करके निदेशालय को भेजा जाए। विभाग में सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिए हैं कि अधिकतम दो कार्य दिवस के अंदर सभी कर्मचारियों को डाटा विभाग को उपलब्ध करा दिया जाए। इसके बाद विभाग ने कर्मचारियों का डाटा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। शिक्षक संगठनों ने उठाई थी जांच की मांग कस्तूरबा और परिषदीय विद्यालयों में शिशु की जांच प्रक्रिया शुरू होने के बाद शिक्षक संगठनों में मांग उठाई थी कि एडेड स्कूलों में पढ़ाने वाले कर्मचारियों की भी जांच की जाए। शिक्षकों की मांग के बाद विभाग ने सहायता प्राप्त विद्यालयों में भी जांच की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर ली है। विभाग की माने तो सूची तैयार होने के बाद इनकी जांच की कार्यवाही शुरू की जाएगी। -डॉ लक्ष्मीकांत पांडेय, बेसिक शिक्षा अधिकारी |
| ONLINE, TRAINING : बेसिक और माध्यमिक के गुरुजी पढ़ेंगे सड़क सुरक्षा का ऑनलाइन पाठ Posted: 03 Aug 2020 12:20 AM PDT ONLINE, TRAINING : बेसिक और माध्यमिक के गुरुजी पढ़ेंगे सड़क सुरक्षा का ऑनलाइन पाठ सामाजिक ज्ञान, समझ, शिक्षा का प्रथम द्वार विद्यालय हैं। परिवहन विभाग ने भी राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के उद्देश्य से पठन-पाठन की इसी जड़ का रुख किया है। सभी 75 जिलों में दस-दस बेसिक और माध्यमिक शिक्षकों को सड़क सुरक्षा की ऑनलाइन ट्रेनिंग दी जाएगी। प्रशिक्षण आगामी दो सप्ताह में शुरू होगा। ये प्रशिक्षित शिक्षक अपने-अपने स्कूलों में बच्चों को रोड सेफ्टी का पाठ पढ़ाएंगे। सड़क सुरक्षा को लेकर चल रही उच्चस्तरीय बैठकों के बाद ऑनलाइन प्रोग्राम शुरू किए जाने पर सहमति बनी है। इसी के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होने जा रहा है। दरअसल कोरोना संक्रमण को लेकर तय की गई गाइडलाइन के चलते रोड सेफ्टी से जुड़े कई कार्यक्रमों को गति नहीं मिल पा रही थी। चार चरणों में महीने भर का प्रशिक्षण: यह ट्रेनिंग प्रोग्राम चार चरणों में चलेगा। एक बार में बीस जिलों के दस-दस शिक्षकों के बैच को ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया जाएगा। इनमें दस बेसिक के और दस माध्यमिक शिक्षा के अध्यापक होंगे। बीते हफ्ते हुई बैठकों के बाद बेसिक और माध्यमिक शिक्षकों के ऑनलाइन प्रशिक्षण का कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इसके बाद मास्टर यह शिक्षक अपने-अपने स्कूलों में बच्चों को नियमों का रोज पाठ पढ़ाएंगे, जिससे शुरुआती दौर से ही विद्यार्थी सड़क सुरक्षा नियमों के प्रति गंभीर हों। -पुष्पसेन सत्यार्थी, उप परिवहन आयुक्त (सड़क सुरक्षा) |
| Posted: 03 Aug 2020 12:17 AM PDT BED, SHIKSHA NEETI, TEACHING QUALITY, APPOINTMENT : राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से बदलेगा बीएड का पैटर्न, जानिए नई नीति में शिक्षकों की गुणवत्ता को बढ़ाने व नियुक्ति के लिए क्या होंगे प्रावधान राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलावों की बात कही गई है. इस शिक्षा नीति में दिया गया है कि अब आने वाले कुछ सालों में शिक्षा की सबसे मजबूत कड़ी अध्यापक को सबसे मजबूत बनाया जाएगा. इसके लिए बीएड प्रोग्राम में बड़े बदलाव की बात कही गई है. जानिए नई नीति में शिक्षकों की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए क्या प्रावधान किए जाएंगे. नई शिक्षा नीति के अनुसार जल्द ही शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय स्तर का मानक तैयार होगा. शिक्षकों के लिए अगले दो साल के भीतर न्यूनतम डिग्री बीएड तय होगी, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर एक से चार साल की होगी. ये एमए के बाद एक साल और इंटरमीडिएट के बाद चार साल की होगी. शिक्षा नीति में वर्ष 2022 तक नेशनल काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एनसीटीई) को टीचर्स के लिए एक समान मानक तैयार करने को कहा गया है. ये पैरामीटर नेशनल प्रोफेशनल स्टैंडर्ड फॉर टीचर्स कहलाएंगे. काउंसिल यह कार्य जनरल एजुकेशन काउंसिल के निर्देशन में पूरा करेगी. सरकार ने कहा कि साल 2030 तक सभी बहुआयामी कालेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पठन पाठन के कोर्स को संस्थानों के अनुरूप अपग्रेड करना होगा. साल 2030 तक शिक्षकों के लिए न्यूनतम डिग्री बीएड होगी, इसकी अवधि चार साल हो जाएगी. बीएड के लिए कुछ इस तरह से व्यवस्था की जाएगी. बीएड की दो साल की डिग्री उन ग्रेजुएट छात्रों को मिले जिन्होंने किसी खास सब्जेक्ट में चार साल की पढ़ाई की हो. चार साल की ग्रेजुएट की पढ़ाई के साथ एमए की भी डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों को बीएड की डिग्री एक साल में ही प्राप्त हो जाएगी, लेकिन इसके जरिये विषय विशेष के शिक्षक बन पाएंगे. बता दें कि नई शिक्षा नीति में ये कहा गया है कि बीएड प्रोग्राम में शिक्षा शास्त्र की सभी विधियों को शामिल किया जाए. इसमें साक्षरता, संख्यात्मक ज्ञान, बहुस्तरीय अध्यापन और मूल्यांकन को विशेष रूप से सिखाया जाएगा. इसके अलावा टीचिंग मेथड में टेक्नोलॉजी को खास तौर पर जोड़ा जाएगा. इस शिक्षा नीति में के. कस्तूरीरंगन कमेटी की उन सभी सिफारिशों को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूर किया है जिसमें शिक्षकों के प्रशिक्षण में व्यापक सुधार की बात कही गई थी. इसमें सभी शिक्षा कार्यक्रमों को विश्वविद्यालयों या कॉलेजों के स्तर पर शामिल करने की सिफारिश की थी. कमेटी की उन सिफारिशों को भी मान लिया गया है जिसमें स्तरहीन शिक्षक-शिक्षण संस्थानों को बंद करने की बात कही गई थी. अब सभी शिक्षण तैयारी/ शिक्षा कार्यक्रमों को बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों/ कॉलेजों में स्थानांतरित करके शिक्षक शिक्षण के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बदलाव का भी प्रस्ताव रखा है. इसके अलावा 4-वर्षीय एकीकृत चरण वाले विशिष्ट बी.एड. कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षकों को अंततः न्यूनतम डिग्री की योग्यता प्राप्त हो सकेगी. देश में एक जैसे शिक्षक और एक जैसी शिक्षा को आधार बनाकर इस समिति की सिफारिशाें को लागू किया गया है. अब विद्यालयों में स्थानीय ज्ञान और लोक विद्या जैसी जानकारियों के लिए स्थानीय पेशेवरों को अनुबंध पर लिया जा सकता है. |
| BSA, BEO, BRC : बीईओ कार्यालय / बीआरसी में न्यूनतम सुविधाएं न होने पर बीएसए से मांगा गया स्पष्टीकरण Posted: 03 Aug 2020 12:12 AM PDT BSA, BEO, BRC : बीईओ कार्यालय / बीआरसी में न्यूनतम सुविधाएं न होने पर बीएसए से मांगा गया स्पष्टीकरण अब खण्ड शिक्षा अधिकारियों के कार्यालयों में न्यूनतम सभी सुविधाएं व मानव संसाधन उपलब्ध रहेंगे। जहां भी न्यूनतम मानकों से कम लोग काम कर रहे हैं या सामान नहीं हैं। वहां तुरंत इसे पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। समग्र शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशक विजय किरन आनंद ने निर्देश जारी कर दिए हैं। जिन 208 कार्यालयों मे एक भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी व 12 ऐसे कार्यालय जहां एक भी कम्प्यूटर नहीं है, वहां के अधिकारियों से स्पष्टीकरण तलब करते हुए दण्डात्मक कार्रवाई करने की चेतावनी दी गई है। प्रदेश के 880 ब्लॉकों में प्रति ब्लॉक क खण्ड शिक्षा अधिकारी, एक सहायक लेखाकार, एक कम्प्यूटर ऑपरेटर, 3 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, तीन कम्प्यूटर और एक वाहन का मानक है लेकिन प्रदेश में एक भी ऐसा कार्यालय नहीं है जहां सारे मानक पूरे हों। 880 ब्लॉकों में 135 लेखाकार और 128 कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद रिक्त हैं। इन्हें सेवा प्रदाता कम्पनी के माध्यम से भरने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं सभी कार्यालयों में 3 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सम्बद्ध करने का नियम है। अभी केवल 317 ऐसे हैं जहां 3 कर्मचारी हैं। 168 कार्यालयों में 2 और 187 ऐसे हैं जहां एक ही कर्मचारी है। इसके अलावा 208 ऐसे कार्यालय हैं, जहां एक भी कर्मचारी नहीं है। जिन 208 कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं है वहां के अधिकारियों को 3 दिन में स्पष्टीकरण मांगा गया है। वहीं ऐसे 238 ब्लॉक हैं जहां एक भी वाहन नहीं है। इसकी रिपोर्ट भी तलब की गई है। इसके अलावा निष्ठा कार्यक्रम के तहत 2019-20 में हर कार्यालय को 3 कम्प्यूटर खरीदने थे लेकिन 200 ऐसे ब्लॉक हैं जहां 2, एक या एक भी कम्प्यूटर नहीं है। ऐसे ब्लॉकों से भी स्पष्टीकरण मांगा गया है। 7 अगस्त तक सभी खण्ड शिक्षा कार्यालयों में ये सुविधाएं उपलब्ध करानी हैं। |
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