क्रांतिदूत - 🌐

Breaking

Home Top Ad

Post Top Ad

Monday, August 3, 2020

क्रांतिदूत

क्रांतिदूत


मेक्समूलर और मैकाले का षडयंत्र बनाम आदिवासी दिवस - दिवाकर शर्मा

Posted: 03 Aug 2020 01:21 AM PDT



भारत पर अपना औपनिवेशिक प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद ब्रिटिश हूक्मरानों को यह समझ में आ गया कि इस राष्ट्र की शाश्वतता, इसकी संजीवनी शक्ति इसकी संस्कृति में है और इसकी संस्कृति का संवाहक है यहां का विपुल साहित्य और शिक्षण पद्धति । यह जान लेने के बाद उन्होंनें भारतवासियों की राष्ट्रीय चेतना को नष्ट-भ्रष्ट कर इसे सदा-सदा के लिए अपने साम्राज्य के अधीन उपनिवेश बनाये रखने की अपनी दूरगामी कूट्नीतिक योजना के तहत भारतीय संस्कृति पर हमला करने हेतु सर्वप्रथम भारतीय साहित्य को निशाना बनाया और अंग्रेजी-शिक्षण पद्धति को उसका माध्यम । इसी योजना के तहत ईस्ट इंडिया कम्पनी ने ऋग्वेद को छपवाने के लिए मेक्समूलर को नौ लाख रुपये नगद दिए | इतना ही नहीं तो सैकड़ों वैदिक पंडितों को मासिक वेतन देकर इस कार्य हेतु नियत किया गया | मेक्समूलर ने इसकी भूमिका में लिखा कि इसको लिखने में २५ वर्ष लगे और फिर छपवाने में २० वर्ष | इस प्रकार ४५ वर्ष तक वे केवल एक ही पुस्तक में लगे रहे | 

उसके बाद ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने एक सदी (१८४६-१९४७) तक लगातार फ्रेडरिक मैक्समूलर को वेदों के महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया ! उनकी योजना सफल हुई और उन्नीसवी सदी के सरल ह्रदय हिन्दुओं ने उसे ही सच मान लिया जो कि मेक्समूलर ने कहा और लिखा ! मेक्समूलर ने कहा वेद केवल तीन हजार साल पहले लिखे गए, हमने मान लिया | 

अब सवाल यह उठता है कि मैक्समूलर वास्तव में वेदों और हिन्दू धर्म शास्त्रों का प्रशंसक होने के कारण वेदों, उपनिषदों, दर्शनों आदि के उदात्त, प्रेरणादायक और आध्यात्मिक चिंतन को अंग्रेजी माध्यम से विश्वभर में फैलाना चाहता था या वह १८५७ के स्वतंत्रता समर के बाद घबराये अंग्रेजों की योजनानुसार किसी रणनीति पर काम कर रहा था ? 

सोचने वाली बात है कि आखिर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेजी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के ज्ञान में अधकचरे, चौबीस वर्षीय, अनुभवहीन गैर-ब्रिटिश, जर्मन युवक मैक्समूलर को ही वेदभाष्य के लिए क्यों चुना ? 

अगर ध्यान से उस समय की घटनाओं को एक सूत्र में पिरोयें तो बहुत कुछ समझ में आ जाएगा | वस्तुतः मेक्समूलर को बढ़ावा देना मैकाले की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा था | क्योंकि २ फरवरी १८३५ को ब्रिटिश संसद में उसने कहा ही था - 

मैंने सारे भारत का भ्रमण किया है और मैंने एक भी व्यक्ति को चोर और भिखारी नहीं पाया है ! मैंने इस देश में इतनी सम्पदा देखी है तथा इतने उच्चनैतिक आदर्श देखें हैं और इतने उच्च योग्यता वाले लोग देखें हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी इसे जीत पाऐंगे जब तक कि इसके मूल आधार को ही नष्ट न कर दें जो कि इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है और इसीलिए मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हम उसकी प्राचीन और पुरानी शिक्षा पद्धति और उनकी इस संस्कृति को बदल दें क्यों यदि भारतीय यह सोचने लगें कि जो कुछ विदेशी और अंग्रेजी है, वह उनकी अपनी संस्कृति से अच्छा और उत्तम है तो वे अपना स्वाभिमान एवं भारतीय संस्कृति को खो देंगे और वे वैसे ही हो जायेंगे जैसा कि हम चाहते हैं, पूरी तरह एक पराधीन राष्ट्र !'' 

उसके बाद आई मैकाले की वह शिक्षा नीति, जिससे आत्ममुग्ध हो उसने १२ अक्टूबर १८३६ को, अपने पिता को लिखे एक पत्र में अपने हाथों से अपनी पीठ थपथपाई - 

हमारी शिक्षा पद्धति का हिन्दुओं पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ रहा है ! कोई भी हिन्दू जिसने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर ली है, वह निष्ठापूर्वक हिन्दू धर्म से जुड़ा हुआ नहीं रहता है ! कुछ एक, औपचारिक रूप में, नाम मात्र के लिए हिन्दू धर्म से जुड़े दिखाई देते हैं, लेकिन अनेक स्वयं को 'निराकार पूजक' कहते हैं तथा कुछ ईसाई मत अपना लेते हैं ! यह मेरा पूरा विश्वास है यदि हमारी शिक्षा की योजनाएँ चलती रहीं तो तीस साल बाद बंगाल के सम्भ्रान्त परिवारों में एक भी मूर्तिपूजक नहीं रहेगा और ऐसा किसी प्रकार के प्रचार एवं धर्मान्तरण किए बगैर हो सकेगा ! किसी धार्मिक आजादी में न्यूनतम हस्तक्षेप न करते हुए ऐसा हो सकेगा ! ऐसा स्वाभाविक ज्ञान देने की प्रक्रिया द्वारा हो जाएगा ! मैं हृदय से उस योजना के परिणामों से प्रसन्न हूँ ! 

उस समय के एक ईसाई पादरी ने भी लिखा कि प्रत्येक ईसाई मिशनरी यह निश्चित तौर पर जानते हैं कि भारत में मिशन स्कूलों का एक निश्चित उद्‌देश्य क्या है ! वे जानते हैं कि भारत में मिशन स्कूलों का कार्य लड़के और लड़कियों को जीजस क्राइस्ट की ओर ले जाने का है ! 

इसी निश्चित उद्देश्य के प्रति मैक्समूलर को सचेष्ट करने हेतु दिसम्बर १८५५ में मैकॉले ने उसे मिलने को बुलाया | इस भेंट का सम्पूर्ण वृतांत अपनी माँ को लिखे पत्र में मैक्समूलर ने स्वयं वर्णन किया है - 

इस बार मैं लंदन में मैकाले से मिला और उसके साथ मेरी भारत भेजे जाने वाले नौजवानों को क्या सिखाकर भेजा जाए, इस विषय पर लम्बी बातचीत हुई । निश्चित ही उसके विचार एकदम स्पष्ट हैं और वह असाधारण रूप से वाक्‌पटु व्यक्ति है | मैं ऑक्सफोर्ड वापिस लौटा, दुःखी होकर, किन्तु शायद, अधिक समझदार मनुष्य बनकर'' 

मूलर के जीवनी लेखक नीरद चौधरी का मत है कि 'इस भेंट के बाद उसने एक बहुरुपिया जैसा खेल खेला जिससे कि ब्रिटिशों के राजनैतिक उद्‌देश्यों की भी पूर्ति होती रहे और भारतीयों को भी शब्द जाल में बहकाए रखा जाये? मैक्समूलर ने हृदय की भावनाओं को १५ दिसम्बर १८६६ को अपनी पत्नी को लिखे पत्र में इस प्रकार व्यक्त किये, जो उसके निधन के बाद, १९०२ में उसकी पत्नी जोर्जिना मैक्समूलर ने उसकी जीवनी में प्रकाशित किये – 

मुझे आशा है कि मैं इस काम को पूरा कर दूंगा और यद्यपि मैं उसे देखने के लिए जीवित न रहूँगा तो भी मेरा ऋग्वेद का यह संस्करण और वेद का अनुवाद भारत के भाग्य और लाखों भारतीयों की आत्माओं के विकास पर प्रभाव डालने वाला होगा ! यह वेद उनके धर्म का मूल है और मूल को उन्हें दिखा देना उनको मूल सहित उखाड़ फैंकने का सबसे उत्तम तरीका है ! 

हे प्रभू, मैक्समूलर स्वयं स्वीकार रहा है और स्पष्ट कह रहा है कि उसके द्वारा वेद और हिन्दू धर्म शास्त्रों के भाष्यादि का उद्‌देश्य हिन्दू धर्म को जड़ से उखाड़ फैंकने का हैं ! यदि श्रीमती जोर्जिना उसे अप्रकाशित पत्रों को प्रकाशित न करती तो विश्व उस छद्‌मवेशी व्यक्ति के असली चेहरे को आज तक भी नहीं जान पाता ! इसी योजना के तहत उसने वेदों को केवल तीन हजार वर्ष पूर्व का घोषित किया और यहीं से शुरू हुई अंग्रेजों की कुटिल नीति | पाश्चात्य इतिहासकारों ने प्रचारित करना शुरू किया कि चूंकि मोहन जोदड़ो के पुरातत्व अवशेष पांच हजार साल पुराने हैं, अतः निश्चित ही वे वेद पूर्व सभ्यता के लोग रहे होंगे, जिन्हें बाहर से आये आर्य लोगों ने नष्ट कर दिया या पराजित कर जंगलों में भगा दिया और उनके शहरों पर स्वयं कब्जा कर लिया | उद्देश्य साफ़ था, यह दर्शाना कि जैसे हम बाहर से आये हैं, भारत वासी भी बाहरी ही हैं | यहाँ के मूल निवासी तो जंगलों में रहने वाले ही हैं, जिन्हें आक्रमणकारी आर्यों ने खदेड़ कर वनवासी बना दिया | उसी मानसिकता के साथ वनवासी समाज को नाम दिया गया – आदिवासी | अर्थात वे ही भारत के मूल निवासी हैं, शेष लोग तो आक्रमणकारी आर्यों की संतान हैं, जो बाहर से आये हुए विदेशी हैं | जैसे हम विदेशी, बैसे ही वनों में रहने वाले आदिवासियों के अतिरिक्त हर भारत वासी भी विदेशी | यह देश नहीं धर्मशाला है, लोग आते गए, बसते गए | 

किन्तु ज्यूं ज्यूं मोहन जोदड़ो पर शोध आगे बढ़ा, इस मिथ्या धारणा की हवा निकलना शुरू हो गया | मोहन जोदड़ो से प्राप्त शिव फलक में स्पष्ट रूप से सिन्धु घाटी की लिपि में ही वेदों के नामों का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त हुआ और पश्चिमी विद्वानों की धारणाओं की मिटटी पलीत हो गई | अर्थात यह सिद्ध हो गया कि वेद पांच हजार साल से भी अधिक प्राचीन हैं | और साथ ही यह भी कि आर्य और मोहनजोदड़ो सभ्यता अलग अलग नहीं हैं, जिस प्रकार आज हमारे यहाँ अनेक भाषायें हैं, उस समय भी थीं | कुछ संस्कृत बोलते थे, कुछ सिन्धु घाटी सभ्यता की द्रविड़ पूर्व (प्रोटो द्रविड़ीयन) भाषा | 

आर्य सभ्यता और द्रविड़यन सभ्यता साथ साथ चलीं, जैसे आज हैं | आर्य अगर कहीं बाहर से आये होते, तो जहाँ से आये हैं, वहां कुछ तो उनका प्रमाण उपलब्ध होता | लेकिन दुर्भाग्य से मैकाले की शिक्षा पद्धति से निकले काले अंग्रेजों ने तो वही मानना शुरू कर दिया, जो उनके मानसिक स्वामी ने बताया, भले ही वह कितना ही अप्रामाणिक और झूठ ही क्यों न हो | 

अब बात ९ अगस्त आदिवासी दिवस की | सचाई यह है कि 1492 में कोलम्बस के अमरीका पहुंचने के बाद वहां के मूल निवासी "रेड इंडियन" पर गोरी चमड़ी वालों ने अकथनीय अत्याचार किए । उन्हें गुलाम बनाया, वे खरीदे बेचे गए । लेकिन इस सबके बावजूद कुछ संगठनों द्वारा 1992 में कोलम्बस के अमरीका में आने के 500 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में वहाँ एक बड़ा जश्न मनाने की तैयारी की गई । यह अमेरिका के मूलनिवासियों के जले पर नमक छिड़कने जैसा था, अतः स्वाभाविक ही इस आयोजन का विरोध किया गया। उसके बाद 1994 से 9 अगस्त को आदिवासी दिवस अथवा "ट्राइबल डे" अथवा मूलनिवासी दिवस मनाने की शुरूआत हुई। इसका लक्ष्य था ऐसे प्रदेश या देश के मूलनिवासियों को उनके अधिकार दिलाना जिन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे की नागरिकता प्राप्त हो।सरल शब्दों में आक्रांताओं द्वारा उनपर किए गए अत्याचारों के कारण उनकी दयनीय स्थिति में सुधार लाने के कदम उठाना। 

जरा विचार कीजिए कि भारत में तो ऐसी स्थिति कुछ है नहीं, फिर यहाँ ९ अगस्त जैसा दिवस मनाने का क्या औचित्य है ? लेकिन भारत को टुकडे टुकडे देखने की इच्छा रखने वाले लोग कहाँ मानने वाले हैं | मैकाले के ये मानस पुत्र अलगाववाद को हवा देने में जुटे हुए हैं, उससे सावधान रहने की जरूरत है |

आदिवासी दिवस के बहाने अलगाववाद की राजनीति - डॉ, नीलम महेंद्र

Posted: 02 Aug 2020 03:27 AM PDT



वैश्विक परिदृश्य में कुछ घटनाक्रम ऐसे होते हैं जो अलग अलग स्थान और अलग अलग समय पर घटित होते हैं लेकिन कालांतर में अगर उन तथ्यों की कड़ियाँ जोड़कर उन्हें समझने की कोशिश की जाए तो गहरे षड्यंत्र सामने आते हैं। इन तथ्यों से इतना तो कहा ही जा सकता है कि सामान्य से लगने वाले ये घटनाक्रम असाधारण नतीजे देने वाले होते हैं। क्योंकि इस प्रक्रिया में संबंधित समूह स्थान या जाति के इतिहास से छेड़ छाड़ करके उस समूह स्थान या जाति का भविष्य बदलने की चेष्टा की जाती है। आइए पहले ऐसे ही कुछ घटनाक्रमों पर नज़र डालते हैं। 

घटनाक्रम 1. 

2018, स्थान राखीगढ़ी, लगभग 6500 साल पुराने एक कंकाल के डी.एन.ए के अध्य्यन से यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गई कि आर्य बाहर से नहीं आए थे।बल्कि वे भारतीय उपमहाद्वीप के स्थानीय अथवा मूलनिवासी थे। यहीं उन्होंने धीरे धीरे प्रगति की, जीवन को उन्नत बनाया और फिर इधर उधर फैलते गए। इस शोध को देश विदेश के 30 वैज्ञानिकों की टीम ने अंजाम दिया था जिसका दावा है कि अफगानिस्तान से लेकर बंगाल और कश्मीर से लेकर अंडमान तक के लोगों के जीन एक ही वंश के थे। 

घटनाक्रम 2. 

19 वीं शताब्दी 1850 में आर्य आक्रमण सिद्धांत दिया गया जिसमें कहा गया कि आर्य भारत में बाहर से आए थे (कहाँ से आए इसका कोई स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं है। कोई मध्य एशिया, कोई साइबेरिया,कोई मंगोलिया तो कोई ट्रांस कोकेशिया कहता है) और इन्होंने भारत पर आक्रमण करके यहाँ के मूलनिवासियों ( जनजातियों ) को अपना दास बनाया था। यानी आज भारत में रहने वाले लोग यहाँ के मूलनिवासी नहीं हैं केवल यहाँ की जनजातियाँ यहाँ की मूलनिवासी हैं। 

घटनाक्रम 3. 

15 वीं शताब्दी 1492 में कोलम्बस भारत की खोज में निकला और अमेरिका पहुंच कर उसी को भारत समझ बैठा। वहां उसे अमेरिका के स्थानीय निवासी मिले जिनका रंग लाल था। चूंकि वो उस धरती को भारत समझ रहा था उसने उन्हें "रेड इंडियन" नाम दिया। असल में यही रेड इंडियन अमेरिका के मूल निवासी हैं। लूट के इरादे से आए कोलम्बस ने उनपर खूब अत्याचार किए।धीरे धीरे यूरोप के अन्य देशों को भी अमेरिका के बारे में पता चला और कालांतर में स्पेन,फ्रांस और ब्रिटेन ने भी अमेरिका पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन ने तो वहाँ अपनी 13 कॉलोनियाँ स्थापित कर ली थीं। 1776 से लेकर 1783 तक अमेरिका के मूलनिवासियों ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़ी जिसके बाद ये 13 कॉलोनियाँ आज का संयुक्त राज्य अमेरिका बना। 

घटनाक्रम 4 

कुछ संगठनों द्वारा 1992 में कोलम्बस के अमरीका में आने के 500 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में वहाँ एक बड़ा जश्न मनाने की तैयारी की जा रही थी। लेकिन अमेरिका के मूलनिवासियों द्वारा कोलम्बस के उनपर किए गए अत्याचारों के कारण इस आयोजन का विरोध किया गया। 

इसी के चलते 1994 में 9 अगस्त को आदिवासी दिवस अथवा "ट्राइबल डे" अथवा मूलनिवासी दिवस मनाने की शुरूआत हुई। इसका लक्ष्य था ऐसे प्रदेश या देश के मूलनिवासियों को उनके अधिकार दिलाना जिन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे की नागरिकता प्राप्त हो।सरल शब्दों में आक्रांताओं द्वारा उनपर किए गए अत्याचारों के कारण उनकी दयनीय स्थिति में सुधार लाने के कदम उठाना। 

घटनाक्रम 5. 

भारत के आदिवासी इलाकों में आदिवासियों का उनके सामाजिक उत्थान और कल्याण के नाम पर धर्मांतरण की घटनाओं का इजाफा होना। कुछ तथ्य, 1951 में अरुणाचल प्रदेश में एक भी ईसाई नहीं था,2011 की जनगणना के मुताबिक अब अरुणाचल प्रदेश में 30% से ज्यादा ईसाई हैं। मेघालय में 75% मिज़ोरम में 87%नागालैंड में 90% सिक्किम में 9.9% , त्रिपुरा में 4.3% और केरल में 18.38% ईसाई आबादी है जो धीरे धीरे बढ़ रही है। 

ये घटनाएं विश्व के इतिहास की सामान्य घटनाएं प्रतीत हो सकती हैं लेकिन अगर इनके परिणामों पर दृष्टि डालें तो लगता है कि यह सामान्य नहीं हो सकती। 

क्योंकि आज जब भारत के झारखंड ओडिशा पश्चिम बंगाल छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश जैसे आदिवासी बहुल प्रदेशों में कुछ संगठनों द्वारा जोर शोर से आदिवासी दिवस को मनाने की परंपरा शुरू कर दी गई है तो यह विषय गम्भीर हो जाता है। खास तौर पर तब जब ऐसे आयोजनों के बहाने इस देश की जनजातियों से उनके अधिकार दिलाने की बड़ी बड़ी बातें की जाती हों और एक सुनियोजित तरीके से उनके अंतर्मन में सरकार के प्रति असंतोष का बीज बोने का षड्यंत्र रचा जाता हो। क्योंकि ऐसे तथ्य सामने आए हैं जब इन जनजातियों की समस्याओं के नाम पर एक ऐसे आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाती है जिसके परिणामस्वरूप यह "असंतोष" केवल किसी जनजाति का सरकार के प्रति विद्रोह तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि कहीं कहीं यह सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेता है तो कहीं यह असंतोष धर्मांतरण और अलगाववाद का कारण बन जाता है। कहा जा सकता है कि आदिवासी अथवा जनजातियों को उनके अधिकार दिलाने की मुहिम दिखने वाला "आदिवासी दिवस" नाम का यह आयोजन ऊपर से जितना सामान्य और साधारण दिखाई देता है वो उससे कहीं अधिक उलझा हुआ है। क्योंकि भारत का इस विषय में यह मानना है कि भारत में रहने वाले सभी लोग भारत के मूलनिवासी हैं और इनमें से कुछ समुदायों को "अनुसूचित" या चिन्हित किया गया है जिन्हें सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक और राजनैतिक समानता दिलाने के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसके अतिरिक्त मूलनिवासियों के जिन अधिकारों की बात की जा रही है, वो अधिकार भारत का संविधान भारत के हर नागरिक को प्रदान करता है इसलिए भारत के संदर्भ में किसी आदिवासी दिवस का कोई औचित्य नहीं है। इसके बावजूद भारत में इस दिवस को विशेष महत्व देने का प्रयास किया जा रहा है। 

इसी क्रम में कुछ संगठन प्रधानमंत्री से इस दिन पर अवकाश की घोषणा करने की अपील भी कर रहे हैं। इस प्रकार के कृत्य निःसंदेह उनके उद्देश्य के प्रति संदेह उत्पन्न करते हैं। क्योंकि भारत जैसे देश में आदि काल से ही जनजाति और गैर जनजाति समाज स्नेह पूर्वक सामाजिक संरचना में एक दूसरे के पूरक बनकर मिलजुल कर रहते थे इसके अनेक ऐतिहासिक और पौराणिक प्रमाण उपलब्ध हैं। रामायण में केवट की प्रभु राम के प्रति भक्ति और प्रभु राम का केवट पर स्नेह। वनवास के दौरान निषादराज के यहाँ प्रभु श्री राम का रात्रि विश्राम और उन्हें अपना मित्र बना लेना, यहाँ तक कि अपने राज्याभिषेक और अपने अश्वमेध यज्ञ में उन्हें अतिथि रूप में आमंत्रित करना। शबरी के हाथों उसके झूठे बेर खाना। ये तीनों केवट, निषाद और शबरी जो कि आदिवासी थे उनको एक राजवंशी द्वारा यथोचित मान सम्मान आदर और प्रेम देना भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है? इसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश की 54 जनजातियों में से एक मिजोमिश्मी जनजाति खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रूक्मिणी का वंशज मानती है। इसी प्रकार नागालैंड के शहर डीमापुर को कभी हिडिंबापुर के नाम से जाना जाता था।यहाँ रहने वाली डिमाशा जनजाति खुद को भीम की पत्नी हिडिम्बा का वंशज मानती है। ये सभी तथ्य इस बात का प्रमाण हैं कि भारत की जनजातियाँ भारतीय समाज का सम्मानित हिस्सा थीं। लेकिन कालांतर में आक्रमणकारियों के अत्याचारों से इस सुव्यवस्थित भारतीय समाज में सामाजिक भेदभाव की नींव पड़ी।इसलिए आज आवश्यकता है कि जनजातियों के बहाने भारत की संप्रभुता के खिलाफ चलने वाले षड्यंत्र को समझ कर उसे विफल करने के लिए सरकार की और से ठोस कदम उठाये जाएँ । 

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Post Bottom Ad

Pages