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Tuesday, August 17, 2021

परिकल्पना समय

परिकल्पना समय


इहे सवनवा में....

Posted: 16 Aug 2021 04:05 AM PDT

 


ज्येष्ठ-आषाढ़ के तपिस दिवस और उमस भरी रात्रि की बेचैनी के उपरांत श्रावणी शीतल फुहार से सम्पूर्ण वातावरण ही जलयुक्त कीचड़ की सोंधी सड़ाइन महक से परिपूर्ण हो उठता है। फिर यह सड़ाइन सोंधी महक पवन की गति को थामें सम्पूर्ण वातावरण में ही सावन के आगमन की सूचना को प्रसारित करने के लिए चंचल बालिका सदृश भागम-भाग करने लगती है। एक ओर रिमझिम फुहारों के बीच आकाश में एक छोर से दूसरे छोर तक ताने सतरंगी रामधनुख (इंद्रघनुष) का दिव्य दर्शन होता है, तो और दूसरी ओर धरती पर विविध सप्तरंगी मानवीय संस्कृतियों का अनोखा प्रदर्शन। धरती भी पिय के आगमन का संकेत पाकर हरीतिमा युक्त गर्वित परिधान धारण कर लहर-लहर कर पवन हिंडोला पर पेंग मारने लगती है। 

जहाँ-तहाँ धवल रजत वर्णी गर्वित जलकुण्ड व जलधाराएँ तथा पवन-वेग के हिंडोले पर इतराते कदम्ब, गुलर, अनार आदि के फूल-फल धरती के हरित-पट पर विविध स्वरूपीय रंग-बिरंगे बूटों को आभासित करते हैं। प्रफुल्लित श्रृंगारित धरती की पिय-मिलन की आतुरता मोर, दादुर, कोयल की सम्मिलित सरगम में चतुर्दिक अभिव्यक्त होने लगती है। ऐसे में आसमान में उमड़ते घने कजरारे मेघ भी अपने मल्हार राग से सभी जीव-जन्तु व पादप-पुंज को हर्षित कर झुमाने लगते हैं। काले-अंधियारे दिन में रह-रह कर चमक-दमक कर बिजली उस आगत प्रियतम के स्वागत में हर्षित अपनी चंचलता को प्रदर्शित करने लगती हैं और अनंत के कजरारे घन धरती की नव हरित परिधान को अपने प्रभाव से श्यामल-मलिन और आर्द्र कर गर्व महसूस करते हैं। पर ऐसे में बेचारी रूपसी धरित्री को तो अपनी जग हंसाई की चिंता तो बढ़ ही जाती है। 

सावन में गोरी, जल अम्बर से गोरी, भीगे बदन, तन लिपटे वसन, माने न लाख जतन गोरी। बेदर्दी तू बालम, मानें न बतिया, जग में होई हँसाई मोरी। इन्द्रपुरी की रमणीयता से प्रतिस्पर्धा करती श्रावणी प्रकृति के इस अद्भुत सौन्दर्य का आभास पाते ही इन्द्रलोक निवासी अशरीर 'मदन' को भी अपने आप पर नियन्त्रण नहीं रह जाता है I फिर तो वे भी अति द्रुतगति से अपनी पत्नी 'रति' को अपने साथ लिये धरती पर आ धमकते हैं। शायद आगमन में विलम्बता का आभास उन्हें हो जाता है। अतः व्यर्थ में बिन समय गँवाए 'मदन' मधुमक्खियों के शहद की कोमल रसीली रज्जु से बंधित, मिठास से परिपूर्ण इक्षुः दण्ड से निर्मित अपने बंकिम काम-धनुष पर अशोक के महकते श्वेत पुष्पों के साथ, नीलवर्णी पंकज, नवमल्लिका (चमेली) और रसाल पुष्पों से निर्मित काम-बाणों को चतुर्दिक त्वरित गति से छोड़ने लगते हैं। जिससे स्थूल से लेकर सुक्ष्मजीवी प्राणी दर प्राणी के हृदय विदीर्ण होने लगते हैं और वे अपने विदीर्ण हृदय पर अपने संगी-स्नेही के प्रेमालेप को लगा कर कुछ मानसिक आश्वस्त होना चाहते हैं, पर 'मदन' के वे कोमल पर हृदय विदारक काम-बाण सावन की फुहार रस में डूबे होने के कारण प्राणिमात्र को भेदते ही उनमें काम-तृष्णा जनित भयानक ज्वर उत्पन्न होने लगता है, जिससे वे तड़प-तड़प कर अपने संगी-स्नेही के मधुर प्रेमालिंगन के पाश में बद्ध कर कुछ मानसिक और आत्मीय शीतलता को पाना चाहते हैं।

'मदन' के ऐसे तीखे प्रेमासक्ति काम-बाण से भला कौन बच सकता है? हाँ स्मरण आया! वह हैं कालजयी 'महाकालेश्वर'I समाधि में लीन 'भोले कालेश्वर' को समाधि से च्युत करने के लिए आम्र वृक्ष की ओट से 'मदन' ने उन पर पुष्पों द्वारा निर्मित काम-बाण चलाया था, जो भोले शंकर के हृदय में लगा, जिसकी व्यथा से उनकी समाधि टूट गई।  क्रोधातुर भोले शिव ने अपने त्रिनेत्र की कोमल अग्नि श्रृंखला से 'मदन' को जला कर भस्म कर दिया था।  यह तो उनकी पत्नी 'रति' की पतिव्रता उपासना का ही फल है कि 'मदन' अशरीर रहते हुए भी प्रभावशाली हैं ।  

त्रिलोक विख्यात शिव भक्त लंकेश 'दशशीश' ने अपने आराध्यदेव शिव जी की स्तुति करते हुए कहा है, - 'ललाटचत्वरज्वलद धनंजयस्फुलिंगभानिपीतपंचसायकं नमन्निलिम्प नायकं I सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि संपदे शिरो जटालमस्तु नः II' – 'शिवतांडवस्तोत्रम' श्रावणी वेगवती पवन के हिंडोले पर सवार 'मदन' को देख कर उसके सहायक पेड़ों की हरित शाखाएँ-प्रशाखाएँ एवं उसके कोमल पल्लव व पुष्प आदि सब के सब प्रफुल्लित नाचने और इठलाने लगते हैं। पर यह 'श्रावण' तो 'मदन' के गर्व के विनाशक भोले बाबा 'शिव' का माह माना जाता है, जिन्हें 'त्रिलोक' के समस्त सकरात्मक ऊर्जाओं का भी स्वामी माना जाता है। 

अतः प्रातःकालीन शैशव सूर्य की अमल स्वर्णिम आभा में स्नात सम्पूर्ण प्रकृति ही 'जय शिव शंकर'-'हर हर महादेव'-'जय भोले नाथ', 'बोल बम'आदि की 'शंकरमय' पावन धुनी से शिव का विशाल 'शिवाला' ही प्रतीत होती है। खेतों की हरीतिमा के मध्य कुछ गिले और कीचड़युक्त पगडंडियों पर गेरुए वेशधारी शंकर-भक्तों की पंक्ति आगे बढ़ती ही जाती है और उनके पीछे बहुत देर तक उनके 'कांवड़' की रुन-झुन की मधुर ध्वनि वातावारण में मधुरतम कर्णप्रिय संगीत को गूंजित करती रहती है। सचमुच श्रावण मास में मन भी तो शिव का 'शिवाला' ही बन जाता है। 

'मेरे प्रभु का यह धरती है शिवाला, मेरे मन को भी तू बना दे अपना शिवाला I हे औघड़ दानी, हे महाकालेश्वर, तू ही जग के हर्ता, तूही है मेरे डमरूवाला II' जहाँ-तहाँ जलकुण्डों में कुछ सप्ताह पूर्व तक के एकत्रित वर्षाकालीन मटमैले जल अब स्थिर होकर अपनी स्वच्छता युक्त पारदर्शी स्वरूप को धारण करने लगे हैं I अब तो उनमें थाल सदृश कमल के बड़े हरित पत्रक अपने ऊपर जल बिन्दु को मोती के समान भी चमकाने लगे हैं I फिर ये जलज उन जलकुण्डों में अपने श्वेत, पीताभ, लालिमायुक्त मधुर शिशु पुष्प कलियों को भी धारण कर लिये हैं I ऐसे में ही कहीं दूर सावन की इस मधुर फुहार में भींगता किसी चन्द्रवंशी गोप अपने पशुओं को चराते खेत के किसी ऊँचे मेड़ पर खड़े होकर अपनी बाँसुरी पर राग मल्हार छेड़ता हुआ, किसी प्रकृति-प्रेमी कवि की कल्पना प्रतीत होता है। गाँव के पास ही कीचड़ युक्त मटमैले जलकुण्डों में छोटे-छोटे नंगे-अधनंगे बच्चें भागते-गिरते उसमें स्नात किसी चित्रकार के चित्रपट के विचित्र अंग बनते जा रहे हैं। 

गाँव के ही छोटे-छोटे बाग़-बगीचों में आम, कदम्ब, महुआ या पीपल की शाखाओं से लटकते अगिनत झूलों पर गाँव की नववधुओं सहित ननद-भौजाइयों के शरीर से चिपके उनके आर्द्र पीताभ व हरित वसन, हाथों में मेहँदी और हरी चूड़ियाँ, कानों में झुमके, माथे पर मांग-टीका और उनके गौर तथा श्यामल चहरे से ढुलकते श्रावणी जल बूंद आदि उनके पारंपरिक श्रृंगार को और भी मनमोहक बनाती हैं I उन झूलों पर झूलती वाक् तथा आंगिक छेड़-छाड़ करती ग्रामीण बलाएँ और सुन्दरियाँ अपने सांसारिक संघर्षमय जीवन में भी हँसी-ख़ुशी के आवश्यक अमूल्य श्रावणी मधुररस को प्रकृति से जबरन छीन लेने का प्रयास करती हैं – 'ओ ननद मोरी, .... सुन, ओ ननद मोरी। लिखद पाती एक आपन भइया के नाम। ओ ननद मोरी ... इ सवनवा के बदरा बनल जी के जंजाल, ओ ननद मोरी, ....... सुन ननद मोरी। लिखद एक पाती आपन भइया के नाम।' नवविवाहिता पहला सावन अपने मायके में ही अपनी सहेलियों के साथ ही मानना श्रेयकर मानती रही हैं I 

एक तो ससुराल पक्ष की बंदिशों के पिंजरे से पूर्णतः आजाद परिंदों की तरह ही मायके की स्वछन्दता में रहना और दूसरा अपने वैवाहिक जीवन संगी के साथ अपने लावण्यमय जीवन में आगत कुछ विशेष परिवर्तनों को उन्मुक्त भाव से अपनी सहेलियों के साथ ही साझा करने का विशेष मौका और आनंद जो उन्हें मिल जाते हैं I यहाँ पर भी उन्हें अपनी सहेलियों के मधुर छेड़-छाड़ का हार्दिक आनंद का अवसर प्राप्त होता है I फिर तरह-तरह के खट्टे-मीठे फलों और पकवानों का भी उन्मुक्त आनंद उन्हें अपने मायके में प्राप्त होते हैं I सर्वत्र दुलार ही दुलार, कोई बंदिश नहीं, भला किसका मन न चाहेगा? 

फिर संध्या काल से ही देर रात तक गाँव-गाँव में कजरी के मधुर ढोल-थाप पर पुराने पेड़ों और कच्चे मकानों की धरानियों पर झुला लगा कर झूलती सुहागिन स्त्रियों की युगलबंदी के सम्मिलित मधुर स्वर दूर से मन को आंदोलित करने के लिए पर्याप्त होती हैं – 'इ सावन मनभावन न भावे, पियु बिनु इ अंगनवा में, कइसे रहल जाई पियु बिनु, ए ननदी इ सवनवा में, हो सवनवा में।' जो बहन-बेटियाँ किसी करणवश मायके न लौट पायीं, तो उनके मायके से सावन तीज के अवसर पर पाहुर के रूप में 'खुरमा-ठेकुवा', 'गाजा- खाजा', 'कोथली-घेवर', गुलगुले-मट्ठियाँ आदि उनके ससुराल अवश्य ही पहुँच जाते हैं I फिर तो नवविवाहिता उन्हीं 'पाहुर' से अपने पति की लम्बी उम्र के लिए 'मधुश्रावणी' व्रत का भी पालन करती हैं I और श्रावणी दिन के उजाले में दूर खेतों में घुटने भर पानी में धान की रोपाई करती हुई रोपनियों के कुछ पारम्परिक और कुछ वर्तमान की स्थिति को अपने में लपेटे सम्मिलित लयात्मक गीत भी कोई कम रोचक नहीं होते हैं। राह चलते राहगीरों के पैरों को जकड़ लेते हैं। उन्हें उठने ही नहीं देते हैं – 'बैरन रेलिया पीया के लिए जाय रे, बैरन रेलिया I X - 'पीया हो, अबकी न जाइब नैहरवा, इ सवनवा में, संग करब हम रोपाई, खेतवा के धानवा, इ सवनवा में।' ऐसे ही पारम्परिक सामूहिक गीत सम्पूर्ण ग्रामीण श्रावणी प्रकृति और परिवेश को ही सरगम के सुर-लय से आबद्ध कर कला-सांस्कृतिक के संगम के इन्द्रधनुषी रंगीन मंचीय स्वरुप प्रदान करते प्रतीत होते हैं। पर वास्तव में ये सब तो श्रावणी पारम्परिक स्थितियाँ हैं। 

हलाकि मानवीय अप्राकृतिक क्रिया-कलापों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव प्रकृति पर अब खूब दिखने लगा है, जिसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में दिखाई दे रहा है। अभी सावन का महीना प्रारम्भ ही हुआ है और कई क्षेत्र के लोग तथा पशु-पक्षी पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि कई क्षेत्र अतिवृष्टि के कारण जलप्लावन से अस्त-व्यस्त हो रहे हैं। समस्त प्राणी ही अपने प्राणों के रक्षार्थ त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे हैं। इन प्राकृतिक जानलेवा विपदा में 'मदन' के काम-बाणों से कितने लोग और कितने प्राणी विदीर्ण हो सकते हैं? प्राकृतिक विपदाओं ने 'मदन' के काम-बाणों को भी भोथरा दिया है I कृत्रिमता के आधार पर वर्ष भर लगभग एक-से ही प्रतीत होने वाले शहरी वातावरण की तो बात ही छोड़ दीजिए। आज ग्रामीण परिवेश में भी अब कितनों के पास पशु-सम्पदा है, जिसे कोई गोप चराने के लिए दूर खेतों या 'मधुवनों' में ले जाएगा? गोप बेचारे तो अब रोजी-रोटी की तलाश में मुम्बई, कोलकता, दिल्ली, सूरत आदि जैसे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और फिर शहरों में वे ठिका-मजदूर बनते जा रहे हैं। पेट की ज्वाला के समक्ष श्रावणी मधुमास का भला क्या चल पायेगा? रोपनियों के गीतों की जगह खेतों में अब काले विषैले धुँआ छोड़ते असुरी ट्रैक्टर शक्तियों की 'ठक-ठक-ठक' की आवाज ही मोर, दादुर, पपीहों के साज बन रहे हैं। सावन में भी गाँव के पेड़ों पर नववधुओं के झूलने के लिए अब कितने झूले लगते हैं? उन पर झूलने वाली नववधुएँ भी तो ससुराल आते ही मुँह दिखावन के बाद पिया संग शहर गमन कर रही हैं। 

ननद बेचारी जो ससुराल गईं कि उन्हें नैहर बुलाने वाले भाई-भइया तो खुद ही प्रवासी बने हुए हैं और नई गृह-स्वामिनी की इच्छा से और अनावश्यक अतिरिक्त खर्च के डर से अपने मुख को मोड़े हुए हैं। फिर ननद-भौजाई के मध्य आत्मीयता भी कहाँ रह गई है? अगर ननद बड़ी है, तो उसे अपने सांसारिक जीवन की स्वतंत्रता में बाधक मान कर उससे दूरी कायम रखना ही नितांत आवश्यक है। और अगर ननद छोटी है, तो फिर वह तो घर की नौकरानी 'लौड़ी' मात्र ही है। स्नेह और आत्मीयता तो बस किसी और को ही सुनाने मात्र की कथा रह गई है I बहनें – बेटियाँ तो उस स्नेह और आत्मीयता के लिए निरंतर तरसते ही रहते हैं- हे भउजी भईया से कहिह, हमर भईया से कहिह, इ सवनवा में नइहरवा हमके बुलइहें, हे भउजी ।। लेकिन कुछ रीति-रिवाज या परम्परा की ही बातें हो जाए, तो आज भी बचपन में छिप-छिप कर सुने स्त्रियों के वे सम्मिलित श्रावणी गीत कम से कम श्रावण माह में तो अवश्य ही मनस-पटल में स्मरण हो ही जाते हैं और कानों में गूँज उठते हैं I मन-मयूर को उसी बचपन की अबोधता के वातावरण में जबरन खिंच ले जाते हैं I पर आज उसी को हम अपने बंद कमरे में टेलीविजन के सम्मुख या फिर स्नानघर में अपनी कमर तक गमछे को लपेटे पानी के फुहार के नीचे बैठ गुनगुना कर इस सावन मनभावन की उपस्थिति को आत्मसात् कर लेने का प्रयास मात्र ही कर पाते हैं - 'इहे सवनवा में हो, इहे सवनवा में, पहिला पहिल सुहागिन झुला लागल हे सखी अबकी मोरे नैहरवा में, नन्हीं नन्हीं बरसा के बुन्दवा छेदेला करेजवा हे सखी इहे सवनवा में।' 
-श्रीराम पुकार शर्मा, 
24, बन बिहारी बोस रोड, हावड़ा – 711101 (पश्चिम बंगाल) 
सम्पर्क सूत्र – 9062366788.

साहस और शौर्य की प्रतीक हैं 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका वीरांगना अवंतीबाई लोधी

Posted: 16 Aug 2021 03:22 AM PDT

-ब्रह्मानंद राजपूत                                                (190वीं जन्म-जयंती 16 अगस्त 2021 पर विशेष आलेख) 



आज भी भारत की पवित्र भूमि ऐसे वीर-वीरांगनाओं की कहानियों से भरी पड़ी है जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश के आजाद होने तक भिन्न- भिन्न रूप में अपना अहम योगदान दिया। लेकिन भारतीय इतिहासकारों ने हमेशा से उन्हें नजरअंदाज किया है। देश में सरकारों या प्रमुख सामाजिक संगठनों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए लोगों के जो कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं वो सिर्फ और सिर्फ कुछ प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के होते हैं। लेकिन बहुत से ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं जिनके अहम योगदान को न तो सरकारें याद करती हैं न ही समाज याद करता है। लेकिन उनका योगदान भी देश के अग्रणी श्रेणी में गिने जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से कम नहीं है। जितना योगदान स्वतंत्रता संग्राम में देश के अग्रणी श्रेणी में गिने जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का था, उतना ही उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान है जिनको हमेशा से इतिहासकारों ने अपनी कलम से वंचित और अछूत रखा है। भारत की पूर्वाग्रही लेखनी ने देश के बहुत से त्यागी, बलिदानियों, शहीदों और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर-वीरांगनाओं को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की पुस्तकों में उचित सम्मानपूर्ण स्थान नहीं दिया है। परन्तु आज भी इन वीर-वीरांगनाओं की शोर्यपूर्ण गाथाएं भारत की पवित्र भूमि पर गूंजती हैं और उनका शोर्यपूर्ण जीवन प्रत्येक भारतीय के जीवन को मार्गदर्शित करता है। ऐसी ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक वीरांगना हैं रानी अवंतीबाई लोधी जिनके योगदान को हमेशा से इतिहासकारों ने कोई अहम स्थान न देकर नाइंसाफी की है। 

आज देश में बहुत से लोग हैं जो इनके बारे में जानते भी नहीं है। लेकिन इनका योगदान भी 1857 के स्वाधीनता संग्राम की अग्रणी नेता वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी से कम नहीं हैं। लेकिन इतिहासकारों की पिछड़ा और दलित विरोधी मानसिकता ने हमेशा से इनके बलिदान और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को नजरअंदाज किया है। परन्तु वीरांगना अवंतीबाई लोधी आज भी लोककाव्यों की नायिका के रूप में हमें राष्ट्र के निर्माण, शौर्य, बलिदान व देशभक्ति की प्रेरणा प्रदान कर रही हैं। लेकिन हमारे देश की सरकारों ने चाहे केंद्र की जितनी सरकारे रही हैं या राज्यों की जितनी सरकारें रही हैं उनके द्वारा हमेशा से वीरांगना अवंतीबाई लोधी की उपेक्षा होती रही है। वीरांगना अवंतीबाई जितने सम्मान की हकदार थीं वास्तव में उनको उतना सम्मान नहीं मिला। वीरांगना अवंतीबाई लोधी का अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष एवं बलिदान से सम्बन्धित ऐतिहासिक जानकारी समकालीन सरकारी पत्राचार, कागजातों व जिला गजेटियरों में बिखरी पड़ी है। इन ऐतिहासिक समकालीन सरकारी पत्राचार, कागजातों व जिला गजेटियरों का संकलन और ऐतिहासिक विवेचन समय की माँग है। देश की केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को इस ऐतिहासिक जानकारी और सामग्री का संकलन करना चाहिए और उसकी व्याख्या आज के इतिहासकारों से करानी चाहिए। 

वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी का जन्म पिछड़े वर्ग के लोधी राजपूत समुदाय में 16 अगस्त 1831 को ग्राम मनकेहणी, जिला सिवनी के जमींदार राव जुझार सिंह के यहां हुआ था। वीरांगना अवंतीबाई लोधी की शिक्षा दीक्षा मनकेहणी ग्राम में ही हुई। अपने बचपन में ही इस कन्या ने तलवारबाजी और घुड़सवारी करना सीख लिया था। लोग इस बाल कन्या की तलवारबाजी और घुड़सवारी को देखकर आश्चर्यचकित होते थे। वीरांगना अवंतीबाई बाल्यकाल से ही बड़ी वीर और साहसी थी। जैसे-जैसे वीरांगना अवंतीबाई बड़ी होती गयीं वैसे-वैसे उनकी वीरता के किस्से आसपास के क्षेत्र में फैलने लगे। पिता जुझार सिंह ने अपनी कन्या अवंतीबाई लोधी का सजातीय लोधी राजपूतों की रामगढ़ रियासत, जिला मण्डला के राजकुमार से करने का निश्चय किया। जुझार सिंह की इस साहसी बेटी का रिश्ता रामगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह ने अपने पुत्र राजकुमार राजकुमार विक्रमादित्य सिंह के लिए स्वीकार कर लिया। इसके बाद जुझार सिंह की यह साहसी कन्या रामगढ़ रियासत की कुलवधू बनी। 

सन् 1850 में रामगढ़ रियासत के राजा और वीरांगना अवंतीबाई लोधी के ससुर लक्ष्मण सिंह की मृत्यु हो गई और राजकुमार विक्रमादित्य सिंह का रामगढ़ रियासत के राजा के रूप में राजतिलक किया गया। लेकिन कुछ सालों बाद राजा विक्रमादित्य सिंह अस्वस्थ्य रहने लगे। उनके दोनों पुत्र अमान सिंह और शेर सिंह अभी छोटे थे, अतः राज्य का सारा भार रानी अवंतीबाई लोधी के कन्धों पर आ गया। वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने वीरांगना झाँसी की रानी की तरह ही अपने पति विक्रमादित्य के अस्वस्थ होने पर ऐसी दशा में राज्य कार्य संभाल कर अपनी सुयोग्यता का परिचय दिया और अंग्रेजों की चूलें हिला कर रख दीं। इस समय लॉर्ड डलहौजी भारत में ब्रिटिश राज का गवर्नर जनरल था, लॉर्ड डलहौजी का प्रशासन चलाने का तरीका साम्राज्यवाद से प्रेरित था। उसके काल मे राज्य विस्तार का काम अपने चरम पर था। भारत में लॉर्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी नीतियों और उसकी राज्य हड़प नीति की वजह से देश की रियासतों में हल्ला मचा हुआ था। 

लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत जिस रियासत का कोई स्वाभाविक बालिग उत्तराधिकारी नहीं होता था ब्रिटिश सरकार उसे अपने अधीन कर रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में उसका विलय कर लेती थी। इसके अलावा इस हड़प नीति के अंतर्गत डलहौजी ने यह निर्णय लिया कि जिन भारतीय शासकों ने कंपनी के साथ मित्रता की है अथवा जिन शासकों के राज्य ब्रिटिश सरकार के अधीन है और उन शासकों के यदि कोई पुत्र नहीं है तो वह बिना अंग्रेजी हुकूमत कि आज्ञा के किसी को गोद नहीं ले सकता। अपनी राज्य हड़प नीति के तहत डलहौजी कानपुर, झाँसी, नागपुर, सतारा, जैतपुर, सम्बलपुर, उदयपुर, करौली इत्यादि रियासतों को हड़प चुका था। रामगढ़ की इस राजनैतिक स्थिति का पता जब अंग्रेजी सरकार को लगा तो उन्होंने रामगढ़ रियासत को 'कोर्ट ऑफ वार्डस' के अधीन कर लिया और शासन प्रबन्ध के लिए एक तहसीलदार को नियुक्त कर दिया। 

रामगढ़ के राज परिवार को पेन्शन दे दी गई। इस घटना से रानी वीरांगना अवंतीबाई लोधी काफी दुखी हुई, परन्तु वह अपमान का घूँट पीकर रह गई। रानी उचित अवसर की तलाश करने लगी। मई 1857 में अस्वस्थता के कारण राजा विक्रमादित्य सिंह का स्वर्गवास हो गया। सन 1857 में जब देश में स्वतंत्रता संग्राम छिड़ा तो क्रान्तिकारियों का सन्देश रामगढ़ भी पहुंचा। रानी तो अंग्रेजों से पहले से ही जली भुनी बैठी थीं क्योंकि उनका राज्य भी झाँसी और अन्य राज्यों की तरह कोर्ट कर लिया गया था और अंग्रेज रेजिमेंट उनके समस्त कार्यों पर निगाह रखे हुई थी। रानी ने अपनी ओर से क्रान्ति का सन्देश देने के लिए अपने आसपास के सभी राजाओं और प्रमुख जमींदारों को चिट्ठी के साथ कांच की चूड़ियां भिजवाईं उस चिट्ठी में लिखा था- ''देश की रक्षा करने के लिए या तो कमर कसो या चूड़ी पहनकर घर में बैठो तुम्हें धर्म ईमान की सौगंध जो इस कागज का सही पता बैरी को दो।'' सभी देश भक्त राजाओं और जमींदारों ने रानी के साहस और शौर्य की बड़ी सराहना की और उनकी योजनानुसार अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। जगह-जगह गुप्त सभाएं कर देश में सर्वत्र क्रान्ति की ज्वाला फैला दी। इस बीच कुछ विश्वासघाती लोगों की वजह से रानी के प्रमुख सहयोगी नेताओं को अंग्रेजों द्वारा मत्यु-दंड दे दिया गया। रानी इससे काफी दुखी हुईं। रानी ने अंग्रेजी शासन के विरुध्द विद्रोह कर दिया और रानी ने अपने राज्य से कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधिकारियों को भगा दिया और राज्य एवं क्रान्ति की बागडोर अपने हाथों में ले ली। ऐसे में वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी मध्य भारत की क्रान्ति की प्रमुख नेता के रूप में उभरी। 

रानी के विद्रोह की खबर जबलपुर के कमिश्नर को दी गई तो वह आगबबूला हो उठा। उसने रानी को आदेश दिया कि वह मण्डला के डिप्टी कलेक्टर से भेट कर ले। अंग्रेज पदाधिकारियो से मिलने की बजाय रानी ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। उसने रामगढ़ के किले की मरम्मत करा कर उसे और मजबूत एवं सुदृढ़ बनवाया। मध्य भारत के विद्रोही नेता रानी के नेतृत्व में एकजुट होने लगे। अंग्रेज रानी और मध्य भारत के इस विद्रोह से चिंतित हो उठे। वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने अपने साथियों के सहयोग से हमला बोल कर घुघरी, रामनगर, बिछिया इत्यादि क्षेत्रों से अंग्रेजी राज का सफाया कर दिया। इसके पश्चात् रानी ने मण्डला पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। इस युध्द में वारांगना अवंतीबाई लोधी की मजबूत क्रान्तिकारी सेना और अंग्रेजी सेना में जोरदार मुठभेड़ें हुई। इस युध्द में रानी और मण्डला के डिप्टी कमिशनर वाडिंगटन के बीच सीधा युध्द हुआ जिसमे वाडिंगटन का घोडा बुरी तरह घायल हो गया उसका घोडा गिरने ही वाला था तब तक वाडिंगटन घोड़े से कूद गया और वीरांगना अपने घोड़े को तेज भगाते हुए उस पर टूट पड़ी। बीच में तलवार लेकर एक सिपाही उसे बचाने के लिए आ कूदा। उसने रानी के वार को रोक लिया अन्यथा वाडिंगटन वहीं समाप्त हो गया होता। 

मण्डला का डिप्टी कमिशनर वाडिंगटन भयभीत होकर भाग चुका था और मैदान रानी अवंतीबाई लोधी के नाम रहा। इसके बाद मण्डला भी वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी के अधिकार में आ गया और रानी ने कई महीनों तक मंडला पर शासन किया। मण्डला का डिप्टी कमिशनर वाडिंगटन लम्बे समय से रानी से अपने अपमान का बदला लेने को आतुर था और वह हर हाल में अपनी पराजय का बदला चुकाना चाहता था। इसके बाद वाडिंगटन ने अपनी सेना को पुनर्गठित कर रामगढ़ के किले पर हमला बोल दिया। जिसमे रीवा नरेश की सेना भी अंग्रेजों का साथ दे रही थी। रानी अवंतीबाई की सेना अंग्रेजों की सेना के मुकाबले कमजोर थी, लेकिन फिर भी वीर सैनिकों ने साहसी वीरांगना अवंतीबाई लोधी के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना का जमकर मुकाबला किया। लेकिन ब्रिटिश सेना संख्या बल एवं युद्ध सामग्री की तुलना में रानी की सेना से कई गुना बलशाली थी अतः स्थिति को भांपते हुए रानी ने किले के बाहर निकल कर देवहारगढ़ की पहाडियों की तरफ प्रस्थान किया। रानी के रामगढ़ छोड़ देने के बाद अंगे्रजी सेना ने रामगढ़ के किले बुरी तरह ध्वस्त कर दिया और खूब लूटपाट की। इसके बाद अंग्रेजी सेना रानी का पता लगाती हुई देवहार गढ़ की पहाडियों के निकट पहुंची, यहाँ पर रानी ने अपने सैनिकों के साथ पहले से ही मोर्चा जमा रखा था। अंग्रेजो ने रानी के पास आत्मसमर्पण का सन्देश भिजवाया, लेकिन रानी ने सन्देश को अस्वीकार करते हुए सन्देश भिजवाया कि लड़ते-लड़ते बेशक मरना पड़े लेकिन अंग्रेजों के भार से दबूंगी नहीं। इसके बाद वडिंगटन ने चारों तरफ से रानी की सेना पर धावा बोला। 

कई दिनों तक रानी की सेना और अंग्रेजी सेना में युध्द चलता रहा जिसमे रीवा नरेश की सेना अंग्रेजों का पहले से ही साथ दे रही थी। रानी की सेना बेशक थोड़ी सी थी लेकिन युध्द में अंग्रेजी सेना की चूलें हिला के रख दी थी। इस युध्द में रानी की सेना के कई सैनिक हतायत हुए और रानी को खुद बाएं हाथ में गोली लगी, और बन्दूक छूटकर गिर गयी। अपने आप को चारों ओर से घिरता देख वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने रानी दुर्गावती का अनुकरण करते हुए अपने अंगरक्षक से तलवार छीनकर स्वयं तलवार भोंक कर देश के लिए बलिदान दे दिया। उन्होंने अपने सीने में तलवार भोंकते वक्त कहा कि ''हमारी दुर्गावती ने जीते जी वैरी के हाथ से अंग न छुए जाने का प्रण लिया था। इसे न भूलना।'' उनकी यह बात भी भविष्य के लिए अनुकरणीय बन गयी। वीरांगना अवंतीबाई का अनुकरण करते हुए उनकी दासी ने भी तलवार भोंक कर 20 मार्च 1858 को वीरांगना अवंतीबाई लोधी के साथ अपना बलिदान दे दिया और भारत के इतिहास में इस वीरांगना अवंतीबाई ने सुनहरे अक्षरों में अपना नाम लिख दिया। जब रानी वीरांगना अवंतीबाई अपनी मृत्युशैया पर थीं तो इस वीरांगना ने अंग्रेज अफसर को अपना बयान देते हुए कहा कि ''ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को मैंने ही विद्रोह के लिए उकसाया, भड़काया था उनकी प्रजा बिलकुल निर्दोष है।'' ऐसा कर वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने हजारों लोगों को फांसी और अंग्रेजों के अमानवीय व्यवहार से बचा लिया। मरते-मरते ऐसा कर वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने अपनी वीरता की एक और मिसाल पेश की। 

निःसंदेह वीरांगना अवंतीबाई का व्यक्तिगत जीवन जितना पवित्र, संघर्षशील तथा निष्कलंक था, उनकी मृत्यु (बलिदान) भी उतनी ही वीरोचित थी। धन्य है वह वीरांगना जिसने एक अद्वितीय उदहारण प्रस्तुत कर 1857 के भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में 20 मार्च 1858 को अपने प्राणों की आहुति दे दी। ऐसी वीरांगना का देश की सभी नारियों और पुरुषों को अनुकरण करना चाहिए और उनसे सीख लेकर नारियों को विपरीत परिस्थितियों में जज्बे के साथ खड़ा रहना चाहिए और जरूरत पड़े तो अपनी आत्मरक्षा अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए वीरांगना का रूप भी धारण करना चाहिए। 16 अगस्त 2021 को ऐसी आर्य वीरांगना के 190वीं जन्म-जयंती पर उनको शत्-शत् नमन् और भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

किस्सा किस्सा लखनउवा अब स्टोरीटेल पर

Posted: 16 Aug 2021 03:54 AM PDT

 -संतोष कुमार


· कहानियां और जिक्र नवाबों के नहीं, बल्कि लखनऊ और वहां के स्थानीय लोगों के हैं।
 · ऑडियोबुक के लेखक और कथाकार हिमांशु बाजपेयी- एक प्रसिद्ध दास्तानगो हैं, उन्होंने प्रसिद्ध नेटफ्लिक्स श्रृंखला सेक्रेड गेम्स में दास्तानगोई का एक कैमियो प्रदर्शन किया था। 

नई दिल्ली : लखनऊ के नवाबों के किस्से तमाम प्रचालित हैं, लेकिन अवाम के किस्से किताबों में बहुत कम ही मिलते हैं। जो उपलब्ध हैं, वह भी बिखरे हुए। लेखक और कथाकार हिमांशु बाजपेयी की ऑडियोबुक किस्सा किस्सा लखनउवा पहली बार उन तमाम बिखरे किस्सों को एक जगह बेहद खूबसूरत भाषा में सामने ला रही है, जैसे एक सधा हुआ दास्तानगो सामने बैठा दास्तान सुना रहा हो। खास बातें नवाबों के नहीं, लखनऊ के और वहाँ की अवाम के किस्से हैं। 

यह किताब हिमांशु की एक कोशिश है, लोगों को अदब और तहजीब की एक महान विरासत जैसे शहर की मौलिकता के क़रीब ले जाने की। इस किताब की भाषा जैसे हिन्दुस्तानी ज़बान में लखनवियत की चाशनी है। हिमांशु पेशे से पत्रकार थे, जिन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया घरानों के साथ काम किया है। उन्होंने अपना दास्तानगोई प्रशिक्षण 2013 में अपने मित्र स्वर्गीय अंकित चड्ढा-एक प्रसिद्ध दास्तानगो और कथाकार के अनुनय-विनय के बाद शुरू किया। हिमांशु ऑडियोबुक के लेखक और कथाकार दोनों हैं। उन्होंने प्रसिद्ध नेटफ्लिक्स सीरीज़ सेक्रेड गेम्स में दास्तानगोई में एक कैमियो किया था। 

पुराने लखनऊ के रहने वाले हिमांशु नई शैली के साथ पुरानी घटनाओं के कहानीकार हैं। उन्होंने पुराने लखनऊ के राजा बाजार इलाके में अपने स्कूल में पढ़ने और पढ़ने में रुचि विकसित की। राजा बाजार एक ऐसा क्षेत्र है जहां लोग उर्दू बोलते हैं,तो उर्दू के साथ खास संबंध और उस क्षेत्र के होने के कारण उन्होंने यह भाषा बोली जो उन्होंने सीखी थी। स्टोरीटेल हिंदी पेज पर फेसबुक लाइव पर बोलते हुए उन्होंने कहा, योगेश प्रवीण ने अपने लेखन और भाषा के माध्यम से उन पर बहुत प्रभाव डाला। पद्मश्री योगेश प्रवीण का हाल ही में निधन हो गया था वे लखनऊ के इतिहास पर किये गये उनके विशेष काम किये लिए याद किये जाते हैं। 

किस्सागोई की कला के बारे में अपने परिचय पर, उन्होंने कहा कि वह बचपन से ही इस तरह की कला के बारे में अपने पढ़ने की रूचि के कारण जानते थे; लेकिन बाद में जब उन्हें पता चला कि यह शैली आज भी मौजूद है और प्रदर्शित होती है। उन्होंने अपनी कहानियाँ क्यों और कैसे लिखना शुरू किया, इस पर उन्होंने कहा, उन्होंने पहले उसी पर कॉलम लिखे थे; राजकमल प्रकाशन के सत्यानंद निरुपम ने उनसे संपर्क किया और उन्हें कहानियों के रूप में लिखने के लिए कहा। 

उन्होंने कहा कि वह एक ऐसे व्यक्ति और एक आदर्श उदाहरण हैं, जिसकी न कोई जान पहचान थी और न ही कोई संपर्क और बिना कोई पैसा दिए अपनी पुस्तक को हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशक राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया और अब इसकी ऑडियो बुक एक प्रतिष्ठित मंच - स्टोरीटेल पर उपलब्ध है। पुस्तक का वर्णन करने के अपने अनुभव पर, उन्होंने स्टोरीटेल के पब्लिशिंग मेनेजर गिरिराज किराडू को धन्यवाद किया ।

हिमांशु ने कहा, वह चाहते थे कि कथाकार कोई ऐसा व्यक्ति हो जो कहानियों से जुड़ा हुआ हो, और इसलिए उन्होंने खुद इस पुस्तक को अपनी आवाज दी। लखनऊ पर और उसके बारे में बहुत सारी महान पुस्तकें लिखी गई हैं; क़िस्सा क़िस्सा लखनुउवा की ऑडियोबुक को सुनना निश्चित रूप से श्रोताओं को ऐसी किताबों की ओर आकर्षित करेगा। सैंपल एपिसोड सुनने लिए इस लिंक पर क्लिक करें:
https://www.storytel.com/in/en/authors/247610-Himanshu-Bajpayee 
टाईटल : किस्सा किस्सा लखनउवा 
लेखक और कथाकार : हिमांशु बाजपेयी 
 भाषा : हिंदी 
केटेगरी : ऐतिहासिक लघु कथाएँ

फिल्म असुरन, कर्णन और अब सरपट्टा... तमिल इंडस्ट्री जिंदाबाद

Posted: 16 Aug 2021 03:41 AM PDT

 (फिल्म समीक्षा)



-रवि सम्बरवाल 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र

"फिल्म लगान में दलित लड़के को एक कचरे की तरह अधनंगा सा दिखाना और फिल्म सरपट्टा में दलित समुदाय सरपट्टा के कोच रंगान को कुर्सी पर बैठे मूछों पर ताव देते और साथ में उनके पैरों में पंडित को बैठे दिखाना अपने आप में एक बड़ी क्रांति है।" तमिल फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड से काफी आगे निकल चुकी है। तमिल फिल्मों में कंटेंट से लेकर सिनेमैटोग्राफी व म्यूजिक तक सब मजेदार होते हैं। नेपोकिड्स की भरमार भी नहीं होती जिसकी सबसे अच्छी बात यह है कि साफ टैलेंट देखने को मिलता है। ऐसी ही एक तमिल फिल्म है सरपट्टा जिसमें 1970 के दशक के मद्रास को दिखाया गया है। इसके प्रोड्यूसर आंबेडकरवादी पा रंजीत हैं जो इससे पहले मद्रास, काला, कबाली और परीयेरुम पेरुमल जैसी फिल्में बना चुके हैं। 

उनकी खासियत ये है कि वो बहुत कुछ कम दिखाते हुए भी सब कुछ कह जाते हैं। बात करें फिल्म सरपट्टा की कहानी की तो यह एक स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म है जोकि सामाजिक राजनैतिक पहलुओं को साथ में रखकर बुनी गई है। फिल्म में दो बॉक्सिंग समुदायों को दिखाया गया है जोकि अपने अपने समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।  निश्चित ही सरपट्टा परंबराई एक दलित समुदाय का समूह है जबकि इदियप्पा सवर्ण समाज का समूह है। दोनों समूह अपनी अपनी शान के लिए बॉक्सिंग खेलते हैं। कुछ समय से इदियप्पा समूह का ही बॉक्सिंग पर दबदबा था जबकि उसके कुछ साल पहले सरपट्टा के कोच रंगान और उसके साथी बॉक्सिंग के बाहुबली हुआ करते थे (जैसा कि कोच रंगान एक सीन में बताते हैं)। उसके एक दोस्त की बॉक्सिंग मैच की बहस के चलते हत्या भी कर दी गई थी लेकिन अब उसका लड़का छुप छुपा के बॉक्सिंग देखने आ जाता है जोकि किसी अनाज की मंडी जैसी जगह पर मजदूरी करने का काम कर रहा होता है। 

इसका नाम कबालिन है और यह बॉक्सिंग करने के लिए इतना उतावला है कि मैच देखते देखते भी उसके हाथ पांव चलने लगते हैं लेकिन उसकी मां को जब यह पता चलता है कि कबालिन बॉक्सिंग मैच देखने गया था तो उसकी मां उसे झाड़ू से पीटती है और खूब डांटती है। इसके पीछे का कारण यह है कि बॉक्सिंग ने ही उसके पति को छीन लिया और अब वह अपने बेटे को नहीं खोना चाहती थी। लेकिन एक दिन कबालिन सरपट्टा ग्रुप के एक बॉक्सर को मुकाबले के लिए चुनौती दे डालता है और रिंग में बुरी तरह उसे हरा भी देता है जिसे देखकर कोच रंगान समेत सभी हैरान रह जाते हैं। जिस तरह से उसके हाथ और पांव मूव कर रहे थे उसे देखकर लगता नहीं था कि इससे पहले कबालिन ने कभी बॉक्सिंग नहीं की। अब कोच रंगान को नया बॉक्सर कबालिन के रूप में मिल चुका था। उसका पहला मुकाबला डांसिंग बॉक्सर के नाम से प्रसिद्ध बॉक्सर से होता है जो एक खतरनाक बॉक्सर होता है। कबालिन उसे दूसरे राउंड में ही बुरी तरह पटकी दे देता है व उसे हरा देता है। अब इदियप्पा ग्रुप अपनी हार पाकर बुरी तरह बौखला जाता है व इसी ग्रुप का सबसे शक्तिशाली बॉक्सर वेंबुली कबालिन से कहता है कि अगला मैच हम दोनों के बीच ही होगा जिसकी बात पहले भी हो चुकी थी। 

अब दोनों अगले मैच की तैयारी करने लगते हैं।  कोच रंगान अपने बेटे को चुनने की बजाय कबालिन को मैच के लिए चुनता है जिसकी वजह से उसका बेटा बॉक्सिंग होने से एक दिन पहले कबालिन पर हमला कर देता है क्योंकि सरपट्टा के लिए वह खुद बॉक्सिंग करना चाहता था लेकिन इसके लिए खुद कोच रंगान राजी नहीं था क्योंकि वह जानता था कि उसका बेटा मैच हार जाएगा। मैच में कबालिन और वेंबुली दोनों भिड़ते हैं। मैच रोमांच से भर उठता है लेकिन जैसे ही कबालिन मैच जीतने को होता है व वेंबुली बुरी तरह हारता दिखता है तभी इदियप्पा ग्रुप के लोग तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं और लकड़ी की कुर्सियां रिंग में खड़े कबालिन पर फेंकने लगते है। अफरा तफरी का माहौल देख इदियप्पा ग्रुप कबालिन को जान से मारने की कोशिश करता है। आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से चाकू के साथ उसके कपड़े फाड़ उसे नंगा कर देते हैं। 

भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल में लगे आपातकाल का जिक्र करते हुए कहानी को यहां बिल्कुल अलग मोड़ दिया गया है। तभी मैच के बीच में ही कोच रंगान को डीएमके पार्टी की गतिविधियों में शामिल होने के चलते जेल में डाल दिया जाता है। खेल अब खेल नहीं रहा था बल्कि बदला बन गया था। कुछ समय बाद कोच रंगान जेल से छूटता है उसके स्वागत में सभी चाहने वाले जेल के बाहर इकट्ठे होते हैं कोच कबालिन को देखकर हैरान हो जाता है क्योंकि अब वह किसी भी नजरिए से बॉक्सर नहीं लग रहा था उसका पेट बाहर निकल आया था और अनफिट दिखाई दे रहा था। कुछ समय बाद उसके अंदर का बॉक्सर फिर से जिंदा हो जाता है और वह अपने आपको कड़ी मेहनत कर बॉक्सिंग के लिए तैयार कर लेता है। अब उसका मुकाबला फिर से वेंबुली से ही होना था।  दोनों कठोर मेहनत करते हैं। मैच में पहुंचने से पहले कबालिन पर हमला करवाया जाता है ताकि वह मैच में पहुंचे ही ना. लेकिन उन सबसे भिड़कर कबालिन मैच में पहुंचता है और लड़ता है। 

कड़ी मशक्कत के बाद वह वेंबुली को पटकनी दे देता है। कबालिन वेंबुली को ऐसा पंच मारता है कि वह दोबारा खड़ा नहीं हो पाता और कबालिन जीत जाता है। इदियप्पा समूह कोच रंगान को पहले ही चुनौती दे चुका था कि यदि वेंबुली कबालिन को हरा देता है तो सरपट्टा समूह कभी बॉक्सिंग नहीं खेलेगा और रंगान उनकी यह शर्त मान चुका था लेकिन सरपट्टा समुदाय की यह जीत बॉक्सिंग में डटे रहने के लिए भी जरूरी थी।  कोच रंगान खुशी के मारे रिंग में चढ़ जाता है और कबालिन को गले से लगा लेता है। पूरी फिल्म में नायक सिर्फ एक नहीं है. कई चेहरे अपने आप में नायक हैं।  इसमें कबालिन की मां का संघर्ष है। कोच रंगान का बॉक्सिंग रिंग में सरपट्टा को जिंदा रखने का संघर्ष है और कबालिन का अपने समुदाय के लिए जीतने का संघर्ष है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कर्णन फिल्म के बराबर की है। ऐसा लगता है कि पा रंजीत गांव में कैमरा सेटअप कर आए हैं और सब कुछ सच्ची घटी घटनाएं हों।  सभी कलाकारों ने जबरदस्त काम किया है। कबालिन के रूप में अभिनेता आर्य ने अभिनय किया है और कोच रंगान के रूप में पसुपथी हैं। बॉक्सिंग मैच के बैकग्राउंड में म्यूजिक ऑडियंस को बंधे रहने पर मजबूर कर दे। 

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