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Thursday, January 20, 2022

दिव्य रश्मि न्यूज़ चैनल

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21 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक राशिफल

Posted: 20 Jan 2022 06:43 AM PST

21 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक पंचांग एवं राशिफल - सभी १२ राशियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन ? क्या है आप की राशी में विशेष ? जाने प्रशिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. प्रेम सागर पाण्डेय से |

21 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक पंचांग

🔅 तिथि तृतीया दिन 07:26:45

🔅 नक्षत्र मघा दिन 08:42:17

🔅 करण :

                विष्टि 08:54:42

                बव 21:09:02

🔅 पक्ष कृष्ण

🔅 योग सौभाग्य 15:03:29

🔅 वार शुक्रवार
☀ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ

🔅 सूर्योदय 06:40:22

🔅 चन्द्रोदय 20:59:00

🔅 चन्द्र राशि सिंह

🔅 सूर्यास्त 17:20:17

🔅 चन्द्रास्त 09:31:59

🔅 ऋतु शिशिर
☀ हिन्दू मास एवं वर्ष

🔅 शक सम्वत 1943 प्लव

🔅 कलि सम्वत 5123

🔅 दिन काल 10:36:53

🔅 विक्रम सम्वत 2078

🔅 मास अमांत पौष

🔅 मास पूर्णिमांत माघ
☀ शुभ और अशुभ समय

☀ शुभ समय

🔅 अभिजित 12:11:17 - 12:53:44

☀ अशुभ समय

🔅 दुष्टमुहूर्त :

09:21:26 - 10:03:54

12:53:44 - 13:36:12

🔅 कंटक 13:36:12 - 14:18:39

🔅 यमघण्ट 16:26:02 - 17:08:30

🔅 राहु काल 11:12:54 - 12:32:30

🔅 कुलिक 09:21:26 - 10:03:54

🔅 कालवेला या अर्द्धयाम 15:01:07 - 15:43:35

🔅 यमगण्ड 15:11:44 - 16:31:21

🔅 गुलिक काल 08:33:40 - 09:53:17

☀ दिशा शूल

🔅 दिशा शूल पश्चिम
☀ चन्द्रबल और ताराबल

☀ ताराबल

🔅 अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, रेवती

☀ चन्द्रबल

🔅 मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन

🌹विशेष ~ भद्रा 07:26:18 तक, संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत, चन्द्रोदय रात्रि 08:39:10 से, वक्रतुण्ड चतुर्थी, अभिजित नक्षत्र में सूर्य का प्रवेश दिन 08:52:21 से।🌹

पं.प्रेम सागर पाण्डेय्

21 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक राशिफल

मेष (Aries):जो भी करें सुनियोजित तरीके से करें। निम्न सोच के लोगों से स्वयं को दूर रखें। अप्रत्याशित घटनाक्रम बना रह सकता है। विपक्ष सक्रियता बढ़ाएगा। दिन सामान्य।

शुभ रंग = केशरी

शुभ अंक : 2

वृषभ (Tauras):उत्साह बढ़ा हुआ रहेगा। उतावलेपन में कोई कार्य न करें। अच्छे मित्र की पहचान करना सीखें। दिन शुभकारक। बौद्धिकता बढ़त पर रहेगी। एकाग्रता पर ध्यान दें।

शुभ रंग = आसमानी

शुभ अंक : 7

मिथुन (Gemini):घरेलु मामलों में जल्द प्रतिक्रिया देने से बचें। बड़ों के सम्मान और सहजता का ध्यान रखें। दूर देश जाना पड़ सकता है। दिन सामान्य फलकारक। हर हाल खुश रहें।

शुभ रंग = हरा

शुभ अंक : 3

कर्क (Cancer):महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हो सकती है। जन संचार के क्षेत्र से जुड़े लोग बेहतर करेंगे। बंधुत्व भाव बढ़ेगा। मेहनत पर भरोसा रखें। अनुशासन पर जोर दें। दिन शुभ।

शुभ रंग = फीरोजा़

शुभ अंक : 6h

सिंह (Leo):घर परिवार में शुभता का संचार रहेगा। वाणी व्यवहार पर नियंत्रण रखें। औरों से अधिक अपेक्षा न रखें। पूर्वाग्रह से बचें। दिन धन संग्रह में सहायक।

शुभ रंग = पींक

शुभ अंक : 1

कन्या (Virgo):समझ और संवेदनशीलता बढ़त पर रहेगी। निम्न स्तर के लोगों के सहयोग बड़ी सफलता अर्जित कर सकते हैं। दाम्पत्य में सहजता पर जोर दें। दिन हितकर।

शुभ रंग = हरा

शुभ अंक : 3

तुला (Libra):योजन बनाकर खर्च करें। अप्रत्याशित घटनाक्रम बजट बिगाड़ सकता है। रिश्तों में अति से बचें। निम्न श्रेणी के लोगों से दूरी रखें। दिन सामान्य फलकारक।

शुभ रंग = क्रीम

शुभ अंक : 2

वृश्चिक (Scorpio):समाज में कम महत्व के माने जाने कार्यों में बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। प्रेम संबंध बेहतर रहेंगे। करियर कारोबार में अधिकाधिक समय दें। दिन हितकर।

शुभ रंग = पीला

शुभ अंक : 9

धनु(Sagittarius):अधिकनस्थों और सहकर्मियों का सहयोग मिलेगा। कामकाज में अति उत्साह से बचें। सम्मान बढ़त पर रहेगा। गोपनीयता का ध्यान रखें। दिन शुभ फलकारक।

शुभ रंग = उजला

शुभ अंक : 4

मकर (Capricorn):धर्म- मनोरंजन में रुचि रहेगी। यात्रा पर जा सकते हैं। पुरातात्विक व ऐतिहासिक क्षेत्र से जुड़े लोग अच्छा करेंगे। पूर्व के श्रेष्ठ प्रयासों का लाभ मिलेगा। दिन भाग्यकारक।

शुभ रंग = क्रीम

शुभ अंक : 2

कुंभ (Aquarius):धीरज से काम लें। अनुशासन और निरंतरता बनाए। कोई गोपनीय बात उजागर होने की आशंका है। भेंट के लिए समय लेकर निकलें। दिन सामान्य फलकारक।

शुभ रंग = आसमानी

शुभ अंक : 7

मीन (Pisces):पारिवारिक मामलों में जल्दबाजी से बचें। किसी से कोई वादा करें तो निभाने का प्रयास करें। साझीदारी में ध्यान देने की जरूरत है। दिन स्थायित्व को बल देने वाला।

शुभ रंग = उजला

शुभ अंक : 4 
प्रेम सागर पाण्डेय् ,नक्षत्र ज्योतिष वास्तु अनुसंधान केन्द्र ,नि:शुल्क परामर्श - रविवार , दूरभाष 9122608219 / 9835654844
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होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली क्या है और यह किस सिद्धांत पर कार्य करता है ?आइए जानते हैं ।

Posted: 20 Jan 2022 06:26 AM PST

होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली क्या है और यह किस सिद्धांत पर कार्य करता है ?आइए जानते हैं ।

डॉ मुकेश कुमार
होम्योपैथी की खोज एक जर्मन चिकित्सक, डॉ. क्रिश्चन फ्रेडरिक सैमुएल हैनिमैन (1755-1843), द्वारा अठारहवीं सदी के अंत के दशकों में की गयी थी। यह "सम: समम् शमयति" या "समरूपता" दवा सिद्धांत पर आधारित एक चिकित्सीय प्रणाली है। यह दवाओं द्वारा रोगी का उपचार करने की एक ऐसी विधि है, जिसमें किसी स्वस्थ व्यक्ति में प्राकृतिक रोग का अनुरूपण करके समान लक्षण उत्पन्न किया जाता है, जिससे रोगग्रस्त व्यक्ति का उपचार किया जा सकता है। इस पद्धति में रोगियों का उपचार न केवल होलिस्टिक दृष्टिकोण के माध्यम से, बल्कि रोगी की व्यक्तिवादी विशेषताओं को समझ कर उपचार किया जाता है। "समरूपता" के सिद्धांत की इस अवधारणा को हिप्पोक्रेट्स और पेरासेलसस द्वारा भी प्रतिपादित किया गया था, लेकिन डॉ. हनिमैन ने इस तथ्य के बावजूद कि वह एक ऐसे युग में रहते थे, जहाँ आधुनिक प्रयोगशाला के तरीके लगभग अज्ञात थे, इसे वैज्ञानिक स्तर पर सिद्ध किया। होम्योपैथिक दवाओं को पशुओं, पौधों, खनिज के अवशेष और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से उर्जाकरण या अंत: शक्तिकरण नामक एक मानक विधि के माध्यम से तैयार किया जाता है, जिसमें दवाओं के अंत: नीर्हित उपचारात्मक शक्ति को अधिकतम बढ़ाने के लिए लगातार तनुकरण और ह्ल्लन शामिल किया जाता है। इस प्रकार "शक्तिकरण" के माध्यम से तैयार की गयी दवाईयां बीमारियों का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त रूप में अपनी अंत: शक्ति क्षमता प्राप्त करती है, जबकि साथ ही साथ विषाक्तता के अभाव को भी सुनिश्चित किया जाता है। आमतौर पर दवाओं के रोगनाशक गुणों का पता लगाने के लिए औषधियों को किसी स्वस्थ मनुष्य में प्रमाणित किया जाता है। यह प्रणाली जीव में एक स्व-विनियमन शक्ति की मौजूदगी में विश्वास रखती है, जो किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य, रोग और इलाज के दौरान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी भी बीमारी से उत्पन्न लक्षणों को शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में माना जाता है और ये प्रति उपचार खोजने में सहायता करते हैं। इसमें शरीर के प्रतिरक्षा-तंत्र को प्राकृतिक रूप से ठीक करने के लिए उत्तेजक करके उपचार किया जाता है। एक बीमार व्यक्ति के प्रति इस चिकित्सा में व्यक्तिपरक और होलिस्टिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है। चिकित्सक, रोगी की शारीरिक और मानसिक स्तर पर सभी अपविन्यास को समझते हुए और लक्षणों के माध्यम से रोगी की वैचारिक छवि बना कर एक प्रतीक समग्रता लाता है और रोगी के लिए सबसे उचित दवा का चयन करता है। होम्योपैथिक दवाएं लागत प्रभावी, रुचिकर हैं, इनका कोई प्रतिकूल पार्श्व प्रभाव नहीं है और इनका आसानी से सेवन किया जा सकता है। कुछ मामलों में, बोझिल और महंगे नैदानिक ​​उपचार विधियों पर निर्भर रहे बिना रोगियों के लक्षणों के आधार पर दवाओं को निर्धारित किया जाता है। होम्योपैथी, मनोदैहिक विकारों, स्व-प्रतिरक्षित बीमारियों, बुढ़ापे और बाल चिकित्सा विकारों, गर्भावस्था के दौरान होने वाली बीमारियों, दुःसाध्य त्वचा रोगों, जीवन शैली से सम्बंधित विकारों और एलर्जी, आदि के उपचार में उपयोगी रही है। होम्योपैथी की, कैंसर, एचआईवी/ एड्स जैसे लाइलाज पुराने मिआदी रोग वाले मरीजों और रुमेटी गठिया आदि जैसी विकलांग बनाने वाली बिमारियों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने में एक सकारात्मक भूमिका भी है। इसकी लोकप्रियता दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है।
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नई पेंशन योजना पेंशन के नाम पर केवल दिवास्वप्न हैं:-वरुण पाण्डेय*

Posted: 20 Jan 2022 05:13 AM PST

नई पेंशन योजना पेंशन के नाम पर केवल दिवास्वप्न हैं:-वरुण पाण्डेय*

सीतामढ़ी:- दिनांक -20.01.2022 को पुरानी पेंशन बहाली हेतु आंदोलनरत संगठन *नेशनल मूवमेंट फ़ॉर ओल्ड पेंशन स्कीम,बिहार* के *प्रदेश अध्यक्ष वरुण पाण्डेय* के द्वारा सीतामढ़ी जिला के व्यवहार न्यायालय,सीतामढ़ी, पुलिस लाइन, सीतामढ़ी, निबंधन सहयोग समितयाँ कार्यालय,सीतामढ़ी,ITI सीतामढ़ी, सिविल सर्जन कार्यालय,सीतामढ़ी आदि कार्यालय में पदस्थापित एन पी एस कर्मियों को नई पेंशन स्कीम के खामियों को बताया गया, जिसमें सीतामढ़ी जिला समन्वयक मो.अलीमुद्दीन एवं श्री राकेश कुमार,श्री अरमान अली, श्री रवि झा, सहकारिता पदाधिकारी, श्री राजेश यादव, मंत्री, बिहार पुलिस एसोसिएशन, सीतामढ़ी, श्री समीर चौधरी तथा अन्य कर्मिगण उपस्थित रहें।
*बिहार पुलिस मेंस एसोसिएशन, सीतामढ़ी शाखा के अध्यक्ष श्री चंदन तिवारी एवं मंत्री *श्री राजेश यादव* से बात किया गया तथा दोनों लोगों को एन पी. एस. के खामियों को बताया गया तो उन्होंने कहाँ की सीतामढ़ी जिले के पूरे पुलिस कर्मिगण पुरानी पेंशन के लड़ाई में चट्टानी एकता के साथ खड़े हैं तथा आने वाले दिनों में सीतामढ़ी में आंदोलन खड़ा किया जाएगा। साथ ही सभी कार्यालय के कर्मियों ने एकजुट होकर कोरोना काल के बाद मुहिम छोड़ने का निर्णय लिया हैं।
बताते चले कि नई पेंशन योजना( New Pension Scheme), जिसे वर्ष 2004 में वाजपेई सरकार द्वारा एक अध्यादेश के माध्यम से लाया गया था और वर्ष 2004 से 2013 तक यह अध्यादेश के माध्यम से ही चलता रहा, बाद में 2013 में मनमोहन सरकार द्वारा इसे पीएफआरडीए एक्ट के माध्यम से कानूनी रूप दिया गया और इसे आजीवन कर्मचारियों के गले की घंटी बना कर छोड़ दिया गया.
एनएमओपीएस(National movement for old pension Scheme) अपने स्थापना काल से ही एनपीएस का लगातार विरोध कर रहा है, चाहे 30 अप्रैल 2018 का रामलीला मैदान में एनपीएस गो बैक की रैली हो या नवंबर 2018 की रामलीला मैदान की रैली जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का समर्थन प्राप्त हुआ था;
जनवरी-फरवरी 2019 जंतर मंतर पर धरना हो या राजस्थान के प्रत्येक जिला मुख्यालय में एक दिवसीय धरना हो,
या 8 अगस्त 19 को भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर एनपीएस भारत छोड़ो का अभियान हो या जून 2020 का ट्विटर अभियान...
एनएमओपीएस द्वारा जोरदार तरीके से एनपीएस का विरोध किया जा रहा हैं।
उक्त विरोध के कारण ही केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर NPS रूल में बदलाव किया जाता रहा हैं ;चाहे वो सरकार का कॉन्ट्रिब्यूशन 14% हो या कुछ राज्यों में NPS कर्मियों के देहांत के बाद पारिवारिक पेंशन हो।
अभी सिलसिलेवार तरीके से पूरे देश में में इसका विरोध किया जा रहा है, चाहें *दिनांक-21/11/2021 का लखनऊ में पेंशन शंखनाद रैली* हो या उतराखण्ड का आंदोलन हो।
एनपीएस की सबसे महत्वपूर्ण कमी यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद सेवानिवृत्त सरकारी सेवक को कोई भी निश्चित गारंटी नहीं दी जाती.
आज कई सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों को एनपीएस में जो पेंशन दी जा रही है वह सामान्य वृद्धावस्था पेंशन से भी कम की राशि दिखती है.
पीएफआरडीए की कार्यप्रणाली बेहद संदिग्ध है और उसमें पारदर्शिता का पूरा पूरा अभाव है, सभी सरकारी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद एनपीएस के माध्यम से बैंक और बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है,
एनपीएस में सरकार का भी नुकसान ही है, पैसा कर्मचारियों का हो और उसमें सरकार का भी शेयर लगे और उस पैसे से फायदा बैंक और बाजार उठाएं.
हाल ही में कोरोना काल में सभी के NPS में राशि कम हुई है।
यह कहां की समझदारी है.... एनपीएस के माध्यम से सरकार ने सरकारी सेवकों और अपने दोनों शेयर को मिलाकर पैसे को जुए में लगा दिया,
सदियों से हमारे समाज में यह माना जाता रहा है कि जुए में कभी फायदा नहीं होता और कुछ नहीं तो कम से कम नैतिक पतन तो जरूर हो जाता है,
एनएमओपीएस की लड़ाई का सरकार पर लगातार असर भी हो रहा है और सरकार द्वारा धीरे धीरे कर्मचारी हित में काम किया भी जा रहा है, परंतु यह ऊंट के मुँह में जीरा के समान है और हम इससे कतई संतुष्ट नहीं है;
आज भी विधायक, सांसद, माननीय न्यायाधीश आदि को पुरानी पेंशन दी जा सकती है, जिन्हें की सेवानिवृत्ति के उपरांत भी कई प्रकार के विशेषाधिकार मिलते रहते हैं तो सामान्य सरकारी सेवक को सेवानिवृत्ति के बाद भगवान भरोसे छोड़ने का क्या औचित्य है.
अतः इस लड़ाई को *"अभी नहीं तो कभी नहीं"* की तर्ज पर लड़ने की आवश्यकता है क्योंकि केंद्र में भी मजबूत इच्छाशक्ति की सरकार हैं, राज्य में भी उसी गठबंधन की सरकार है इसलिए एनपीएस को वापस करने के लिये राज्य में काफी संघर्ष की आवश्यकता हैं।
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पीडित कश्मिरी हिन्दुओं की मांगें पूरी होनेतक लडते ही रहेंगे ! - श्री. सुशील पंडित, संस्थापक, ‘रूट्स इन कश्मीर’

Posted: 20 Jan 2022 05:01 AM PST

'कश्मिरी हिन्दू विस्थापन दिवस'के उपलक्ष्य में 'ऑनलाइन' विशेष संवाद !

पीडित कश्मिरी हिन्दुओं की मांगें पूरी होनेतक लडते ही रहेंगे !
- श्री. सुशील पंडित, संस्थापक, 'रूट्स इन कश्मीर'

वर्ष 1990 में कश्मीर में हिंदुओं की सामूहिक हत्याएं हुईं । सरकार उसे 'नरसंहार' के रूप में स्वीकार करें; इस नरसंहार के लिए उत्तरदायी सभी दोषियों को कठोर दंड दिया जाए; इस नरसंहार में वहां के धर्मांध मुसलमानों ने पीडित हिन्दुओं की भूमि हडप ली, उन्हें हिन्दुओं को वापस दिया जाए और विस्थापित हिन्दुओं को कश्मीर में पुनः आकर रहने के लिए विशिष्ट भूमि दी जाए, हमारी ये मांगें केंद्र सरकार के पास हैं । दुर्भाग्यवश वर्तमान केंद्र सरकार भी इस नरसंहार के लिए जो उत्तरदायी थे, उनका मन जीत लेने में व्यस्त हैं; परंतु हम कश्मीरी हिन्दू झुकेंगे नहीं और हम हमारी सभी मांगें पूरी होनेतक लडते ही रहेंगे ।, यह स्पष्ट प्रतिपादन 'रूट्स इन काश्मीर' के संस्थापक श्री. सुशील पंडित ने किया । वे 'हिन्दू जनजागृति समिति' की ओर से आयोजित '19 जनवरी : कश्मीरी हिन्दू विस्थापन दिवस - कश्मीरी हिन्दुआें को न्याय कब मिलेगा ?, इस विशेष 'ऑनलाइन' संवाद में ऐसा बोल रहे थे । हिन्दू जनजागृति समिति के देहली प्रवक्ता श्री. नरेंद्र सुर्वे ने श्री. सुशील पंडित के साथ संवाद किया । 19 जनवरी 1990 को धर्मांधों ने मस्जिदों से 'हिन्दुआें, कश्मीर से चले जाओ' के नारे देकर हिन्दुओं को कश्मीर से भगा दिया । एक रात में ही कश्मीर के हजारो हिन्दुओं की हत्याएं हुईं और लाखों हिन्दू विस्थापित होकर अपना सबकुछ खो बैठे । इस क्रूर घटना को 31 वर्ष बीतकर भी अभीतक कश्मीरी हिन्दुओं को न्याय नहीं मिला है । इस उपलक्ष्य में इस 'ऑनलाइन' विशेष संवाद का आयोजित किया गया था । श्री. सुशील पंडित ने आगे कहा कि 'कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याएं करनेवाले अभी जीवित हैं, उन पर किसी भी न्यायालय में अभियोग नहीं चल रहा है । जो भी लोग कश्मीरी हिन्दुओं के दोषी हैं, उन पर अभियोग प्रविष्ट होने चाहिए थे और उनकी संपत्ति जब्त होनी चाहिए थी; परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ, उल्टे अभी तक की केंद्र सरकारों ने उनका तुष्टीकरण कर उन्हें सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई । कश्मीरी हिन्दुओं पर हुए अत्याचारें के विषय में कुछ बोलना ही नहीं है और उन्हें न्याय देना ही नहीं है, ऐसी व्यवस्था हमने चुनी है । पंथनिरपेक्षता के नाम पर हमने पाखंडी व्यवस्था स्वीकार की है । इसमें कई राजनेता, न्यायतंत्र, प्रसारमाध्यम, बुद्धिजीवी लोग, नागरिक मंच और नौकरशाह सम्मिलित हैं । वर्ष 2017 में कश्मीरी पंडितों को न्याय दिलाने हेतु हमने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की थी; परंतु 'अब इस याचिका को बहुत विलंब हो चुका है । अब इसके साक्षी और प्रमाण कौन खोजेंगे ?', ऐसे कारण देकर सर्वोच्च न्यायालय ने यह याचिका अस्वीकार की । भले ही ऐसा हो; परंतु इसी वर्ष गांधी हत्या का न्यायालयीन अभियोग पुनः आरंभ किया गया, साथ ही दोषी आतंकियों के लिए मध्यरात्रि में भी न्यायालय में अभियोग चलाए गए हैं, यह खेदजनक है । देश का न्यायतंत्र और राजनीतिक व्यवस्थाआेने ने देश की पंथनिरपेक्षता संकट में पडने के भय से कश्मीरी हिन्दुओं को न्याय दिलाने से वंचित रखा है ।'

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सभी संकटों को दूर करती है सकट चौथ

Posted: 20 Jan 2022 04:57 AM PST

सभी संकटों को दूर करती है सकट चौथ 

(पं. आर.एस. द्विवेदी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
हिंदू धर्म में सकट चैथ का विशेष महत्व है। पंचांग के अनुसार माघ माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को सकट चैथ के रूप में मनाया जाता है। इस बार सकट चैथ 21 जनवरी 2022 को है। इसे संकटा चैथ, संकष्टी और तिलकुट चैथ आदि नामों से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और अपनी संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए कामना करती हैं। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है और तिल के लड्डू चढ़ाए जाते हैं।

सकट चैथ के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और अपनी संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए कामना करती हैं। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है और तिल के लड्डू चढ़ाए जाते हैं। सकट चैथ का व्रत संतान की दीर्घायु और खुशहाल जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। इसे संकट हरने वाली गणेश चतुर्थी भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सकट चैथ के दिन भगवान गणेश की पूजा के बाद शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत तोड़ा जाता है। इस दिन चन्द्रमा को दूध में शहद, रोली, चंदन और रोली डालकर अर्घ्घ्य देना चाहिए।
माघ मास की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है संकष्ठी चतुर्थी व्रत। इसे तिल चतुर्थी या माघी चतुर्थी भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने बेटे की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन भगवान गणेश और चंद्रमा की उपासना की जाती है। कहते हैं कि इस दिन व्रत रखने से रिद्धि-सिद्धि तो मिलती है साथ ही जीवन में आने वाले संकट भी दूर होते हैं।
इस व्रत में भगवान श्रीगणेश और माता पार्वती की पूजा की जाती है। गणेश जी की कथा सुनी जाती है और चंद्रमा को अर्ध्य दिया जाता है। इस व्रत की पूजा में तिल और गुड़ के बने हुए लड्डु, गुड़ और घी भगवान गणेश जी को अर्पित किया जाता है। इस दिन लितकूट का भोग भगवान को लगाया जाता है। कई जगह तिलकूट का पहाड़ बनाया जाता है। इसके अलावा कई जगह तिल को बकरे की आकृति में बनाया जाता है और उसे काटा जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां पार्वती स्नान करने के लिए गयी अपने पुत्र गणेश जी को पहरेदार के रुप में दरवाजे पर खड़ा कर दिया और बताया कि जब तक मैं स्नान करके वापस न आऊं तब तक किसी को अन्दर प्रवेश मत करने देना। उसी समय शिव जी पार्वती जी से मिलने आते है। गणेश जी उन्हें दरवाजे के भीतर न जाने के लिए कहते हैं। गणेश जी के द्वारा बार-बार शिव जी को मना करने पर शिव जी को क्रोध आ जाता है और अपना त्रिशूल गणेश जी पर चला देते हैं। इससे गणेश जी की गर्दन कट कर दूर जा गिरती है। तेज आवाजें सुनकर स्नान निपटाकर माता पार्वती बाहर आकर देखती हैं तो अपने पुत्र की गर्दन कटी देखकर विलाप करने लगती है। शिव जी से गणेश जी को पुनः जीवित करने का आग्रह करती है। शिव जी गणेश भगवान के सिर की जगह हाथी के बच्चे का सिर लगाकर जीवित कर देते है। मां पार्वती जी के जीवन में पुनः खुशी आ जाती है। तभी से महिलायें अपने बच्चों के कल्याण के लिए सकट व्रत रखती हैं। सकट चैथ यानी संकष्ट चतुर्थी से संबंधित कई कथाएं प्रचलित हैं, जिसमें गणेश जी का अपने माता-पिता की परिक्रमा करने वाली कथा, नदी किनारे भगवान शिव और माता पार्वती की चैपड़ खेलने वाली कथा, कुम्हार का एक महिला के बच्चे को मिट्टी के बर्तनों के साथ आग में जलाने वाली कथा प्रमुख रूप से शामिल है। आज आपको सकट चैथ पर तिलकुट से संबंधित गणेश जी की एक कथा के बारे में बताते हैं।
एक समय की बात है। एक नगर में एक साहूकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। वे दोनों पूजा पाठ, दान आदि नहीं करते थे। एक दिन साहूकारनी अपने पड़ोसन के घर गई। वहां वह पूजा कर रही थी। उस दिन सकट चैथ थी। साहूकारनी ने पड़ोसन ने सकट चैथ के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि आज वह सकट चैथ का व्रत है। इस वजह से गणेश जी की पूजा कर रही है। साहूकारनी ने उससे सकट चैथ व्रत के लाभ के बारे में जानना चाहा। तो पड़ोसन ने कहा कि गणेश जी की कृपा से व्यक्ति को पुत्र, धन-धान्य, सुहाग, सबकुछ प्राप्त होता है। इस पर साहूकारनी ने कहा कि वह मां बनती है तो सवा सेर तिलकुट करेगी और सकट चैथ व्रत रखेगी। गणेश जी ने उसकी मनोकामना पूर्ण कर दी। वह गर्भवती हो गई। अब साहूकारनी की लालसा बढ़ गई। उसने कहा कि उसे बेटा हुआ तो ढाई सेर तिलकुट करेगी। गणेश जी की कृपा से उसे पुत्र हुआ। तब उसने कहा कि यदि उसके बेटे का विवाह हो जाता है, तो वह सवा पांच सेर तिलकुट करेगी।
गणेश जी के आशीर्वाद से उसके लड़के का विवाह भी तय हो गया, लेकिन साहूकारनी ने कभी भी न सकट व्रत रखा और न ही तिलकुट किया। साहूकारनी के इस आचरण पर गणेश जी ने उसे सबक सिखाने की सोची। जब उसके लड़के का विवाह हो रहा था, तब गणेश जी ने अपनी माया से उसे पीपल के पेड़ पर बैठा दिया। अब सभी लोग वर को खोजने लगे। वर न मिलने से विवाह नहीं हुआ। एक दिन साहूकारनी की होने वाली बहू सहेलियों संग दूर्वा लाने जंगल गई थी। उसी समय पीपल के पेड़ पर बैठे साहूकारनी के बेटे ने आवाज लगाई 'ओ मेरी अर्धब्याही'। यह सुनकर सभी युवतियां डर गईं और भागकर घर आ गईं। उस युवती ने सारी घटना मां को बताई। तब वे सब उसे पेड़ के पास पहुंचे। युवती की मां ने देखा कि उस पर तो उसका होने वाला दामाद बैठा है। उसने यहां बैठने का कारण पूछा, तो उसने अपनी मां की गलती बताई। उसने तिलकुट करने और सकट व्रत रखने का वचन दिया था लेकिन उसे पूरा नहीं किया। सकट देव नाराज हैं। उन्होंने ही इस स्थान पर उसे बैठा दिया है। यह बात सुनकर उस युवती की मां साहूकारनी के पास गई और उसे सारी बात बताई। तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। तब उसने कहा कि हे सकट महाराज! उसका बेटा घर आ जाएगा तो ढाई मन का तिलकुट करेगी। गणेश जी ने उसे फिर एक मौका दिया। लड़का घर आ गया और उसका विवाह पूर्ण हुआ। उसके बाद साहूकारनी ने ढाई मन का तिलकुट किया और सकट व्रत रखा। उसने कहा कि हे सकट देव! आपकी महिमा समझ गई हूं, आपकी घ्कृपा से ही उसकी संतान सुरक्षित है। अब मैं सदैव तिलकुट करूंगी और सकट चैथ का व्रत रहूंगी। इसके बाद से उस नगर में सकट चैथ का व्रत और तिलकुट धूमधाम से होने लगा। (हिफी)
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सुदृढ़ हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी

Posted: 20 Jan 2022 04:53 AM PST

सुदृढ़ हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी

(डॉ दिलीप अग्निहोत्री-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। इसके अंतर्गत कतिपय ऐसी समस्याएं होती है जिनका समाधान त्वरित रूप में संभव नहीं होता। इसके लिए दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता होती है। देश में जनसंख्या के अनुरूप चिकित्सकों की संख्या ऐसी ही समस्या रही है। इसके लिए आजादी के बाद ही विशेष कार्ययोजना की आवश्यकता थी। इसके साथ ही सभी चिकित्सा पद्धतियों के समुचित विकास व समन्वय भी आवश्यक था। वर्तमान केंद्र सरकार ने इस कमी को दूर करने पर ध्यान दिया। इसके लिए अभियान चलाया जा रहा है। अनेक राज्यों ने केंद्र के साथ बेहतर समन्वय किया। उन्होंने विगत कुछ वर्षों में बेहतर कार्य किया है। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस सरकारों पर स्वास्थ्य क्षेत्र की अनदेखी का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि देश में चिकित्सकों की कमी से सभी परिचित थे। लेकिन इस समस्या पर पूर्ववर्ती सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। जबकि भविष्य उन समाजों का होगा जो स्वास्थ्य सेवा में निवेश करते हैं। प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों में चार हजार करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुये ग्यारह नए मेडिकल कॉलेजों का वर्चुअल लोकर्पण किया था। कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य क्षेत्र के महत्व की फिर से पुष्टि की है। वर्तमान भारत सरकार इस क्षेत्र में कई सुधार लाई है। महामारी से सीखते हुए हम अपने सभी देशवासियों को समावेशी, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए काम किया जा रहा है।

आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना के रूप में गरीबों के पास उच्च गुणवत्ता और सस्ती स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध है। देश में घुटना प्रत्यारोपण और स्टेंट की लागत पहले के मुकाबले एक तिहाई हो गई है। मेडिकल शिक्षा के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने अनेक कदम उठाये हैं। सात वर्ष पहले तीन सौ छियान्नबे मेडिकल कॉलेज थे। पिछले सात वर्षों में ही यह संख्या बढ़कर करीब छह सौ मेडिकल कॉलेज हो गई है। यह चैवन प्रतिशत की वृद्धि है। सात वर्ष फ्लड लगभग बयासी हजार मेडिकल अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट सीटें थीं। पिछले सात सालों में यह संख्या बढ़कर करीब एक लाख अड़तालीस हजार सीटों पर पहुंच गई है। यह करीब अस्सी प्रतिशत की बढ़ोत्तरी है। सात वर्ष पहले देश में सिर्फ सात एम्स थे। विगत सात वर्ष में के बाद स्वीकृत एम्स की संख्या बाइस हो गई है। चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए विभिन्न सुधार किए गए हैं। भारत को गुणवत्ता और सस्ती स्वास्थ्य सेवा की दिशा में बढ़ रहा है। भारत को मेडिकल टूरिज्म का हब बनाया जाएगा। इसके दृष्टिगत भारत में बड़ी संभावना है। तमिलनाडु में ग्यारह नए मेडिकल कॉलेज स्थापित होने से एमबीबीएस की साढ़े चैदह सौ सीटें बढ़ जाएंगी। नए मेडिकल कॉलेज लगभग चार हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से स्थापित किए जा रहे हैं। जिसमें से आधे से अधिक केंद्र सरकार और बाकी तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रदान किए गए हैं। जिन जिलों में नए मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जा रहे हैं उनमें विरुधुनगर, नमक्कल, नीलगिरी, तिरुपुर, तिरुवल्लूर, नागपट्टिनम, डिंडीगुल, कल्लाकुरिची, अरियालुर रामनाथपुरम और कृष्णागिरी जिले शामिल हैं। पिछली तीस जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में एक साथ नौ जिलों में नए मेडिकल कॉलेजों का लोकार्पण किया था। इस कार्यक्रम का आयोजन सिद्धार्थ नगर में किया गया था। यह उत्तर प्रदेश के लिए राज्य के लिए ऐतिहासिक अवसर था। जिसमें एक साथ नौ जिलों में मेडिकल कॉलेजों का संचालन शुरू हुआ। चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार व बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में मेडिकल कॉलेज निर्माण की योजना संचालित है। इस योजना को कोरोना कालखंड में भी तेजी से क्रियान्वित किया गया। इस कारण नौ जनपदों में मेडिकल कॉलेजों के निर्माण संभव हुआ। देवरिया, एटा, फतेहपुर, हरदोई, प्रतापगढ़, सिद्धार्थ नगर, गाजीपुर, मिर्जापुर और जौनपुर में मेडिकल कॉलेज शुरू किए गए। इनके साथ ही उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेज की संख्या अड़तालीस हो गई है। तेरह अन्य मेडिकल कॉलेजों का निर्माण कार्य भी तेज गति से चल रहा है। पांच वर्ष पहले तक उत्तर प्रदेश में मात्र बारह मेडिकल कालेज थे। विगत पांच वर्षों के दौरान इनकी संख्या चार गुना बढ़ गई है। हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में विकास कार्य जारी है। इन संस्थानों में साढ़े चार सौ से अधिक संकाय सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। प्रत्येक मेडिकल कालेज में सौ सौ सीटें एमबीबीएस की होंगी। इस तरह एमबीबीएस की कुल नौ सौ सीटें बढ़ जाएंगी।अभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की करीब तीन हजार सीटें हैं। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल पैसठ हजार से अधिक डॉक्टर पंजीकृत हैं,जिनमें से बावन हजार से अधिक राज्य में प्रैक्टिस करते हैं। राज्य की आबादी और डॉक्टरों की इस संख्या के अनुसार प्रत्येक डॉक्टर पर करीब अड़तीस सौ मरीजों को देखने की जिम्मेदारी है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक डॉक्टर के जिम्मे एक हजार मरीज होने चाहिए। वर्तमान में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मात्र तेरह हजार डॉक्टर कार्यरत हैं। जबकि राज्य की बढ़ती आबादी और मरीजों के आंकड़ों के लिहाज से यह संख्या लगभग पैंतालीस हजार होनी चाहिए। सरकार ने प्रदेश के सुल्तानपुर सोनभद्र,चंदौली बुलंदशहर, पीलीभीत औरैया,बिजनौर कानपुर देहात, कुशीनगर, गोंडा, कौशाम्बी, ललितपुर और लखीमपुर खीरी में मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए हैं। प्रत्येक मेडिकल कालेज के निर्माण पर करीब सवा तीन सौ करोड़ रुपये खर्च होने हैं। धरातल पर देखें तो इनमें से कुछ जिलों में मेडिकल कॉलेज के लिए नींव पड़ गई, तो कहीं कार्यालय ही स्थापित हो पाए हैं। वहीं कुछ जमीन चिन्हित ही कर पाए हैं। अधिकतर मेडिकल कॉलेजों को पूरा करने के लिए अठारह माह का लक्ष्य दिया गया है। (हिफी)
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अपर्णा का भाजपा में जाने का संदेश

Posted: 20 Jan 2022 04:50 AM PST

अपर्णा का भाजपा में जाने का संदेश

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
राजनेता सिर्फ जनता को ही बेवकूफ नहीं बनाते, बल्कि आपस में भी यही खेल खेलते हैं। बात चाहे उत्तराखंड के हरक सिंह रावत की करें अथवा भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य की। मजे की बात तो यह है कि सपा के साथ लोगों के जुटने के बाद सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने लोगों से अपील भी की थी कि अखिलेश के हाथ मजबूत करें लेकिन अपनी छोटी बहू अपर्णा यादव को भाजपा का पटका ओढ़ने को भेज दिया। मुलायम सिंह यादव का अपने परिवार पर भरपूर नियंत्रण है और अनुकूल परिस्थितियों को देखकर उन्होंने शिवपाल यादव और अखिलेश यादव को एक मंच पर खड़ा कर दिया। इसलिए अपर्णा यादव का भाजपा में जाना सोची समझी रणनीति है। प्रदेश की सत्ता चाहे सपा और उससे गठबंधन करने वाले राजनीतिक दलों के पास रहे अथवा भाजपा ही दोबारा सरकार बनाए, मुलायम सिंह के परिवार को सत्ता का संरक्षण प्राप्त होता रहेगा। भाजपा और दूसरे दलों को छोड़कर सपा में शामिल हुए नेता और सपा से गठबंधन करके चुनाव लड़ रहे छोटे-छोटे दलों को भी अखिलेश यादव से यह सवाल पूछना चाहिए कि अपर्णा यादव भाजपा में क्यों शामिल हुईं। विजय राजे सिंधिया और माधव राव सिंधिया की राजनीति का उदाहरण देना भी यहां ठीक नहीं है। पहली बात तो यह कि विजय राजे पहले कांग्रेस की ही नेता हुआ करती थीं। माधवराव सिंधिया कांग्रेस की नीतियों में निष्ठा रखते थे। दोनों ने मरते दम तक अपनी अपनी निष्ठा का पालन किया लेकिन अपर्णा यादव तो 2017 में ही सपा के चुनाव चिन्ह पर लखनऊ में विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं। इसलिए अपर्णा यादव की भाजपा की नीतियों के प्रति कोई निष्ठा है, यह बात गले से नहीं उतरती और न यह बात ही हजम होती है कि अपर्णा यादव ने मुलायम सिंह यादव की बात काटकर भाजपा ज्वाइन की है। अपर्णा यादव को लेकर अखिलेश यादव से पहले भी सवाल उठाए गये थे, तब उन्होंने कहा था कि अपर्णा की बात अपर्णा ही जानें। इस जवाब के बाद बसपा प्रमुख मायावती की बात याद आती है जो उन्होंने 2019 में सपा से नाता तोड़ते समय कही थी। बसपा प्रमुख ने कहा था कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए सपा यदि अपना प्रमुख वोटबैंक ही मजबूत नहीं रख पायी तो उसके साथ गठबंधन करने से क्या फायदा? इसलिए अपर्णा यादव का भाजपा में जाना एक महत्वपूर्ण संदेश जनता के लिए भी है और उन नेताओं के लिए भी जो अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले रोज नये कारनामे देखने को मिल रहे हैं । गत 19 जनवरी को भी यूपी की सियासत में बड़ी हलचल हुई है। मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव भाजपा में शामिल हो गईं। भाजपा में अपर्णा यादव की एंट्री से न केवल भाजपा ने सपा में सेंधमारी की है, बल्कि मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू ने सपा मुखिया अखिलेश यादव को बड़ा झटका दिया है। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 से पहले बीजेपी में शामिल होने के बाद अपर्णा यादव ने कहा कि मैं भाजपा की बहुत आभारी हूं। मेरे लिए देश हमेशा सबसे पहले आता है। मैं पीएम मोदी के काम की प्रशंसा करती हूं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह की मौजूदगी में बीजेपी में शामिल हो गईं। मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव लखनऊ कैंट विधानसभा से सपा पार्टी के टिकट पर 2017 में चुनाव हार चुकी हैं। भाजपा का दामन थामने के बाद अपर्णा यादव ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री मोदी जी का और राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का धन्यवाद करती हूं। उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और अनिल बलूनी जी का धन्यवाद करती हूं। मैं प्रधानमंत्री जी से पहले से ही प्रभावित रहती थी, मेरे लिए सर्वप्रथम राष्ट्र है। अब मैं राष्ट्र की आराधना के लिए निकली हूं। आपका सहयोग अनिवार्य है। यही कहूंगी कि जो भी कर सकूंगी अपनी क्षमता से करूंगी।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 की तिथियां जारी होते ही नेताओं का पाला बदलना शुरू हो गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्म सिंह सैनी जैसे वरिष्ठ नेता समाजवादी पार्टी का दामन थाम चुके हैं। इसके अलावा भाजपा के कई विधायक भी सपा में शामिल हो चुके हैं। अन्य छोटे दलों के प्रभावी नेताओं का भी पाला बदलने का सिलसिला जारी है। सियासी उथल-पुथल का दौर भी शुरू हो गया है। इसी क्रम में हरदोई सदर से समाजवादी पार्टी के विधायक नितिन अग्रवाल ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को अपना इस्तीफा भेज दिया है। नितिन अग्रवाल ने 18 जनवरी को ही विधानसभा उपाध्घ्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इस बाबत उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को अपना त्यागपत्र सौंप दिया। नितिन अग्रवाल भी भाजपा का ही दामन थामेंगे क्योंकि विधानसभा में उपाध्यक्ष की कुर्सी भाजपा की मेहरबानी से ही मिली थी। उनके पिता नरेश अग्रवाल पहले ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं।

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए सात चरणों में मतदान 10 फरवरी से शुरू होगा। उत्तर प्रदेश में अन्य चरणों में मतदान 14, 20, 23, 27 फरवरी, 3 और 7 मार्च को होगा। वहीं यूपी चुनाव के नतीजे 10 मार्च को आएंगे। ध्यान रहे कि 2017 के चुनाव में बीजेपी ने यहां की 403 में से 325 सीटों पर जीत दर्ज की थी। सपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। सपा ने 47 और कांग्रेस ने 7 सीटें ही जीती थीं। मायावती की बसपा 19 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। वहीं 4 सीटों पर अन्य का कब्जा हुआ था।

इस बार भी चुनाव आयोग ने दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें चुनावों में हिस्सा ले रहीं सभी राजनीतिक पार्टियों को क्रिमिनल केस वाले नेताओं को टिकट देने को लेकर सार्वजनिक तौर पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है। यह बताने को कहा गया है कि आखिर आपराधिक मुकदमें वाले लोगों को क्यों टिकट दिया जा रहा है? साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि साफ छवि वाले लोगों को उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया जा सकता है? ऐसे में संबंधित राजनीतिक दलों की ओर से दिलचस्प खुलासे किए गए हैं। भाजपा ने अभी तक 109 उम्मीदवार घोषित किए हैं, जिनमें से 37 पर क्रिमिनल केस है। वहीं, सपा ने अभी तक 20 ऐसे नेताओं को टिकट दिया है, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। समाजवादी पार्टी के एक उम्मीदवार पर तो 38 मामले दर्ज हैं। चुनाव आयोग के नए दिशा-निर्देश के बाद भाजपा की ओर से दिलचस्प खुलासे किए गए हैं. दरअसल, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पर 4 आपराधिक मामले दर्ज हैं। मौर्य सिराथू से भाजपा उम्मीदवार घोषित किए गए हैं। केशव प्रसाद मौर्य को टिकट क्यों दिया गया, इसको लेकर बीजेपी ने दलील भी दी है। भाजपा का कहना है कि केशव प्रसाद मौर्य न केवल अपने विधानसभा क्षेत्र में, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में काफी लोकप्रिय हैं। भाजपा का कहना है कि पार्टी की स्थानीय इकाई ने मेरिट के आधार पर उनका नाम आगे बढ़ाया। बीजेपी के चुनाव आयोग संपर्क विभाग के अनुसार, केशव प्रसाद मौर्य को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में फंसाया गया है, ऐसे में अन्य प्रत्याशियों के मुकाबले उनको प्राथमिकता दी गई। इसी प्रकार के जवाब अन्य राजनीतिक दलों की तरफ से भी आपराधिक मामलों के दर्ज होने के बावजूद टिकट देने पर दिया गया है। ऐसे नेता भी कभी कभी पार्टी छोड़कर चले जाते हैं। (हिफी)
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गद्दार तो गद्दार ही होता है

Posted: 20 Jan 2022 04:48 AM PST

गद्दार तो गद्दार ही होता है

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
धोखा देने वाले पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता। इतिहास में विभीषण और सुग्रीव प्रताणित होते हुए भी सम्मान नहीं प्रप्त कर सके। राजनीति में भी यही सिद्धांत लागू होता है। उत्तराखंड में 2016 में जब हरीश रावत की सरकार थी, तब हरक सिंह रावत समेत कुछ नेताओं ने कांग्रेस सरकार को गिराने का प्रयास किया था। सुप्रीम कोर्ट हस्तछेप न करता तो हरीश रावत दुबारा सीएम की कुर्सी पर बैठ ही नहीं पाते। यह संदर्भ इसलिए याद दिलाना पड़ रहा है क्योंकि हरक सिंह रावत को भाजपा ने निष्कासित कर दिया है और कांग्रेस के हरीश रावत उनको पार्टी में शामिल नहीं करना चाहते। हरक सिंह रावत सौ सौ बार माफी मांगने को तैयार हैं। जाहिर है गद्दारी का दाग एकबार लग जाए तो आसानी से धुलता नहीं है। कांग्रेस में कुछ नेता ऐसे हैं जो हरक सिंह रावत को पार्टी में शामिल कर लेंगे क्योंकि राज्य में जाति धर्म की राजनीति भी उफान पर है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से खुलकर माफी मांगने वाले हरक सिंह रावत की कांग्रेस में वापसी का पेचीदा रास्ता अब कुछ खुलता दिख रहा है हालांकि हरीश रावत उनकी गद्दारी को भुला नहीं पा रहे हैं। उत्तराखंड की बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हरक सिंह को भाजपा ने निकाल बाहर किया है। अब उनके कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों के बीच सूत्रों के हवाले से खबर है कि वापसी पर हरक सिंह रावत को कांग्रेस टिकट नहीं देगी। पार्टी ने हरक सिंह की वापसी के लिए इस तरह की शर्त रखते हुए यह भी इशारा दिया है कि उनकी बहू अनुकृति को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़वाया जाएगा। इस शर्त को लेकर हरक सिंह और कांग्रेस नेताओं के बीच बातचीत चल रही है, जिसे लेकर कोई फैसला शीघ्र संभव है। कांग्रेस में वापसी के लिए वरिष्ठ नेता हरीश रावत और कई अन्य नेताओं का विरोध झेल रहे हरक सिंह के सामने पार्टी ने शर्त रखने का रास्ता चुना है। सूत्रों के हवाले से खबर यह है कि कांग्रेस ने हरक सिंह से कह दिया है कि परिवार में सिर्फ एक को चुनाव का टिकट मिलेगा। पार्टी इस पक्ष में भी है कि हरक के बजाय अनुकृति गोसाईं को चुनाव मैदान में उतारा जाए। कहा जा रहा था कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी हरक को लेकर फैसला करेगी। हरक सिंह और उनकी बहू 19 जनवरी को दिल्ली स्थित आवास में ही थे। जाहिर है कि 2016 में पार्टी छोड़कर जाने के परिणाम के तौर पर पार्टी हरक का कद घटाने की रणनीति अपना रही है।

उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मियां शुरू हो चुकी हैं और चुनाव आयोग 14 फरवरी को राज्य भर में वोटिंग की तारीख तय कर चुका है। राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी अपने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी करने के अंतिम चरणों में हैं, तो इस वक्त पार्टियां खास तौर से जातिगत और सामुदायिक समीकरणों को साधने की कोशिश भी कर रही हैं। उत्तराखंड की कुल आबादी 1 करोड़ से कुछ ज्यादा है और महत्वपूर्ण बात यह है कि देवभूमि कहा जाने वाला प्रदेश जाति के आधार पर सवर्णों का प्रदेश भी कहा जा सकता है। यानी यहां जाति के अलावा समुदायों को भी खुश करना होता है। उत्तराखंड देश में इकलौता राज्य है जहां सवर्णों की आबादी करीब 62 फीसदी है। इसे समझने के लिए पहले राज्य की आबादी के आंकड़ों को समझना जरूरी है। राज्य की कुल आबादी में से करीब 83 फीसदी हिंदू हैं और करीब 14 फीसदी मुस्लिम। यानी हिंदुओं की संख्या 83.6 लाख से ज्यादा है और मुस्लिमों की 14 लाख से ज्यादा और 2.34 प्रतिशत सिखों की आबादी करीब ढाई लाख की है। इस आंकड़े के हिसाब से तकरीबन 50 लाख वोटर सवर्ण हैं। कहा जा सकता है कि सत्ता की चाबी इन्हीं के हाथ में है और ये पार्टियों के बीच किस तरह बंटते हैं, इसी से सरकार का भविष्य तय होता है। उत्तराखंड की आबादी के ग्राफ में 62 फीसदी सवर्ण वोटर्स हैं जबकि 19 फीसदी दलित, जिन्हें औपचारिक तौर पर एससी श्रेणी में शुमार किया जाता है। करीब 5 फीसदी अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग के वोटर हैं और 62 फीसदी वोटर्स साफ तौर पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच बंटे हुए हैं। मुस्लिम और दलित आबादी भी दोनों पार्टियों के बीच बंटती रही है। इस बार जातियों को साधने के गणित अहम होने वाले हैं। कांग्रेस ने दलितों के वोट साधने के लिए बीजेपी सरकार छोड़कर आए यशपाल आर्य को चेहरा बनाने का दांव खेला है, तो उनके मुकाबले में बीजेपी अब भी ऐसे दलित चेहरे की तलाश में है। इसके अलावा, मुस्लिमों की आबादी के वोट भी एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हरक सिंह रावत कांग्रेस में इसीलिए घुसना चाहते हैं क्योंकि इस बार कांग्रेस की संभावना दिख रही है। हरक सिंह रावत ने कहा मैं अपने बड़े भाई से सौ बार माफी मांगता हूं, उत्तराखंड के हित के लिए सौ बार क्या एक लाख बार भी माफी मांगनी पड़े, तो मांग लूंगा।' भाजपा से निष्कासित हरक सिंह रावत ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बयान पर कहा कि 2016 में जो कुछ हुआ, वह पुरानी बात है, तब उनसे और हरीश रावत दोनों से कुछ गलतियां हुई थीं, जिनके कारण जो हुआ, सो हुआ। हरक सिंह ने दावा किया कि कांग्रेस के भीतर तमाम बड़े नेताओं के साथ उनकी बातचीत हो चुकी है और सभी का सकारात्मक रवैया रहा है।

'मैंने कांग्रेस में आने का इतना बड़ा निर्णय लिया है, इससे बड़ी माफी क्या हो सकती है? तब दोनों की गलती थी और अब सबसे ही बात होगी। हरक सिंह ने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल से बातचीत हुई है, वह आलाकमान से आगे बात करके बताएंगे। जैसी भी स्थिति बनेगी, उसके हिसाब से ही आगे के फैसले होंगे। हरक सिंह ने कहा, 2016 की बात बहुत पुरानी हो गई. उस समय परिस्थितियां अलग थीं, जो बात हो गई हो गई। हरीश भाई भी मानते हैं कि परिस्थितियां ही निर्णय का आधार बन जाती हैं। कुछ गलतियां मुझसे हुईं, कुछ हरीश भाई से हुईं। जो बातचीत हरीश भाई से हुई थी, उस पर वो इम्पलीमेंट नहीं कर पाए थे। यह भी सही है कि मैंने तब जिन विकास के कामों के लिए बात की, उन्होंने उस वक्त वो सब किए। इस प्रकार हरक सिंह अपने को पाक साफ साबित करने का प्रयास भी कर रहे हैं।

फिलहाल, गत 19 जनवरी को उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के सिलसिले में दो बड़ी खबरें मिलीं। एक तो कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के चुनाव लड़ने पर सस्पेंस खत्म करते हुए कहा जा रहा है कि वह इस बार एक सीट से चुनाव लड़ेंगे। उधर, राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट गुरुवार यानी 20 जनवरी को जारी कर सकती है। इसे लेकर केंद्रीय स्तर के नेताओं के साथ मंथन चल रहा है। इस संदर्भ में 18जनवरी से ही उत्तराखंड भाजपा के कई नेता दिल्ली में डेरा डाले हुए थे। भाजपा के केंद्रीय नेताओं के साथ प्रदेश के नेताओं की दो अहम बैठकें हुईं हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक समेत राज्य के कई भाजपा नेता दिल्ली में केंद्रीय नेताओं के साथ टिकट के दावेदारों को लेकर अहम चर्चा कर चुके हैं। प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक ने कहा था कि प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और पार्टी के केंद्रीय नेता जल्द ही नामों पर मुहर लगा सकते हैं। भाजपा कह चुकी है कि कुल 70 सीटों पर नामों को लेकर चर्चा हो चुकी है और लगभग सब कुछ फाइनल है। राज्य के संगठन द्वारा इन सभी दावेदारों का ब्योरा दिल्ली भेजा जा चुका है। इसके बावजूद माना जा रहा है कि कुछ ही सीटों पर नामों का ऐलान पहली लिस्ट में होगा। पहली लिस्ट में कुछ सिटिंग विधायकों के नामों का ऐलान किया जा सकता है। उसके बाद कांग्रेस के उम्मीदवारों की घोषणा का इंतजार कर पार्टी अगली लिस्ट को लेकर रणनीति तय करने के मूड में है। (हिफी)
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बहुत कम समय देकर रूस कर सकता है यूक्रेन पर हमला: ब्लिंकन

Posted: 20 Jan 2022 04:45 AM PST

बहुत कम समय देकर रूस कर सकता है यूक्रेन पर हमला: ब्लिंकन

कीव। यूक्रेन पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि रूस जिस तरह से तैयारी कर रहा है उससे लगता है कि वह घोषणा के बाद बहुत कम समय में युद्ध छेड़ देगा। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूस को चेतावनी दी है कि अगर उसने यूक्रेन पर हमला किया तो इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। बाइडन ने कहा कि अमेरिका ने यूक्रेन को अपनी रक्षा करने के लिए 600 मिलियन डॉलर से अधिक के अत्याधुनिक हथियार भेजे हैं। रूस ने अगर यूक्रेन पर हमला किया तो उसकी सेना को भारी जानमाल का नुकसान उठाना होगा।

समर्थन का पैगाम लेकर कीव पहुंचे ब्लिंकन ने बढ़ रहे तनाव पर राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से वार्ता की है। इसी सिलसिले में जिनेवा में ब्लिंकन की रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से महत्वपूर्ण वार्ता होगी। इस बीच ब्रिटेन ने युद्ध छिड़ने पर इस्तेमाल के लिए हजारों एंटी टैंक मिसाइलें यूक्रेन भेजी हैं। जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सारे दुराग्रह त्यागकर यूरोपीय यूनियन (ईयू), से रूस के साथ बात करने की आवश्यता जताई है। कहा है कि बातचीत के जरिये यूक्रेन मसले का समाधान निकलना चाहिए।

मैक्रों का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह ईयू के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति हैं और फ्रांस को हाल ही में छह महीने के लिए ईयू की अध्यक्षता मिली है। कीव स्थित अमेरिकी दूतावास में राजनयिकों को संबोधित करते हुए ब्लिंकन ने कहा, यूक्रेन सीमा पर रूसी सैनिकों की तैनाती न भड़काने के लिए है और न अन्य किसी कारण से।
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ब्रिटेन में धीमी हुई तीसरी लहर की रफ्तार! वर्क फ्राम होम खत्म, मास्क से भी हटी पाबंदी

Posted: 20 Jan 2022 04:42 AM PST

ब्रिटेन में धीमी हुई तीसरी लहर की रफ्तार! वर्क फ्राम होम खत्म, मास्क से भी हटी पाबंदी

लंदन। दुनिया के कई देशों में कोरोना वायरस और उसके वैरिएंट ओमिक्रोन ने लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हुई हैं। इसी बीच, ब्रिटेन में कई पाबंदियों को हटाने का एलान किया गया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने मास्क की अनिवार्यता को खत्म करने की घोषणा की है। इसके अलावा ब्रिटेन में वर्क फ्राम होम खत्म कर दिया गया है। ब्रिटिश पीएम ने कहा, हमारे वैज्ञानिकों का मानना है कि देश में ओमिक्रोन अपने पीक पर पहुंच चुका है और अब इसकी रफ्तार थमती दिख रही है। इसीलिए, अब से सरकार लोगों को घर से काम करने के लिए नहीं कह रही है।
ब्रिटिश पीएम ने आगे कहा कि ब्रिटेन दुनिया का पहला देश था जिसने सबसे पहले वैक्सीनेशन की शुरुआत की थी। ब्रिटेन टीकाकरण को यूरोप में शुरू करने वाले सबसे तेज देशों में से एक है। ऐसा इसलिए क्योंकि हमने यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी (ईएमए) के बाहर अपनी खुद की वैक्सीन खरीद को आगे बढ़ाने का फैसला किया था।श् पीएम जानसन ने ये भी कहा कि ओमिक्रोन की लहर से उबरने वाला ब्रिटेन पहले देश है, क्योंकि हमने यूरोप में सबसे तेज बूस्टर डोज अभियान पर जोर दिया था।
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सिंधियों की आवाज दबाने की पाक की एक और साजिश

Posted: 20 Jan 2022 04:39 AM PST

सिंधियों की आवाज दबाने की पाक की एक और साजिश

इस्लामाबाद। सिंधियों की आवाज दबाने की पाक की एक और हरकत सामने आई है। पाकिस्तान में देश विरोधी नारे लगाने के लिए 50 से अधिक सिंधी राष्ट्रवादियों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने कहा कि राष्ट्रवादी नेता जीएम सैयद की 118 वीं जयंती की पूर्व संध्या पर जमशोरो जिले के सन्न शहर में पाकिस्तान विरोधी नारे लगाने के लिए 50 से अधिक सिंधी राष्ट्रवादियों पर मामला दर्ज किया गया है, जिसमें राजद्रोह के आरोपी सारंग जोयो भी शामिल हैं। सारंग जोयो को 2020 में जबरन गायब कर दिया गया था। एचआरसीपी ने इस कदम की निंदा की और उनके खिलाफ आरोपों को तुरंत हटाने की मांग की। मानवाधिकार आयोग ने एक ट्वीट में कहा कि जीएम सैयद की जयंती मनाने के लिए जमशोरो के सन्न में जमा हुए 50 से अधिक सिंधी राष्ट्रवादियों के खिलाफ दर्ज मामले एक ऐसे राज्य का संकेत है जो किसी भी तरह की असहमति को सहन नहीं कर सकता है। एक बार फिर, राज्य विरोधी कार्ड खेला गया है। देशद्रोह के आरोप लगाने वालों में सारंग जोयो भी शामिल हैं, जिन्हें 2020 में जबरन गायब कर दिया गया था। एचआरसीपी इस कदम की निंदा करता है और आरोपों को तुरंत हटाने की मांग करता है।
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कमला हैरिस के काम से खुश हैं: बाइडेन

Posted: 20 Jan 2022 04:35 AM PST

कमला हैरिस के काम से खुश हैं: बाइडेन

वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि अगर 2024 के चुनाव में वो दोबारा मैदान में उतरते हैं तो मौजूदा उपराष्ट्रपति कमला हैरिस फिर से उनकी साथी होंगी। उन्होंने बिना हिचकिचाहट के कहा कि कमला बेहद अच्छा काम कर रही हैं और वो आगे भी मेरा साथ देने वाली बनेंगी। बता दें कि बाइडन और कमला हैरिस के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के कार्यकाल को एक वर्ष पूरा हो चुका है। इस अवसर पर हुई प्रेस कांफ्रेंस के दौरान बाइडन ने बड़ी बेबाकी से अपनी बातें रखीं।
इस दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या वो हैरिस के काम से और वोट के अधिकार को लेकर किए गए काम से खुश हैं और क्घ्या वो दोबारा उनके साथ चुनावी मैदान में दिखाई देंगी। तो बाइडन ने कहा कि हां, क्यों नहीं। मैं उनके काम से बेहद खुश हूं। बाइडन ने ये भी कहा कि उन्होंने कमला को नंबर दो की भूमिका में रखा है और अपना काम वो बेहद जिम्मेदारी के साथ कर रही हैं।
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लुप्त होती लोकगीतों की परम्परा

Posted: 20 Jan 2022 04:07 AM PST

लुप्त होती लोकगीतों की परम्परा

समाज के लिए अपनी संस्कृति,अपना रीति-रिवाज और अपनी लोकमान्यताएं सदा से चैतन्य दायिनी रहीं हैं।आज के बदलते परिवेश में जहां आधुनिकता का बोलबाला है वहीं परम्परा से चले आ रहे विवाह गीत, जन्मोत्सव के गीत आदि लुप्तप्राय होते जा रहे हैं।उन गीतों की जो मधुरिमा होती थी,उनसे जन मानस आप्यायित हो जाता था। राजा जनक और दशरथ से तुलना तथा राम और सीता से तुलना कर उन गीतों को सोद्देश्य गाया जाता रहा है।एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए अपनी आर्ष परम्पराओं को नकार देना आत्मघाती हो जाता है।
बचपन से देखता रहा हूं कि हमारे समाज में गीतों का संकलन दादी, चाची, माताएं और बहनें करती रहीं हैं। आज के इस दौर में वह परम्परा लगभग समाप्त सी हो गई है।
फिल्मी गानों की पैरोडी कचोटती है।ऐसे गीत समाज को पतनोन्मुखी बना रहे हैं। मुझे कभी कभी अपने लोकगीतों की एक दो पंक्तियां याद आ जातीं है जब ध्वनि विस्तारक यंत्र से भोंड़े और अर्थहीन गानों को सुनता हूं। हमारे संस्कारित गीत कुछ और ही हुआ करते थे "पुनि जेवनार भए बहुभांति।पठवय जनक बोलाय बराती।"इसी तरह उबटन गीत में नारायण तेल की उपस्थिति मंगल कामनाओं से भरी होती थीं।"आठ ही काठ केरा मलिया रे मलिया ताहि मलिया।ये नारायण तेल ताहि मलिया।"इस प्रकार के गीतों की संख्या हजारों में कहीं गुम हो गईं हैं।आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं कहीं इनकी झलक दिखाई पड़ती है परन्तु शहरों में जहां एक दिवसीय विवाहोत्सव की परम्परा चली पड़ी है वहां इन गीतों का श्रवण भला कैसे हो सकता है?
फिलहाल मुझे एक विवाहोत्सव में सम्मिलित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। ललनाओं के श्रीमुख से सुनने वाले गीतों से हास्य तो पैदा हो रहा था पर मन अतीत की ओर लौट रहा था।"रसगुल्ला बनल बा, तोहर मुंहवां के नाप के।खा चांप के।
पैसा लागत नइखे बाप के।खा चांप के!"
जन्मोत्सव के गीतों में नंदबाबा,मैया यशोदा और कृष्ण कन्हैया की झलक वाले गीत कहां गुम हो गये?
हमें अपनी धरोहर को संजोने की आवश्यकता है।यही हमारी पहचान रही है।
कविवर मैथिली शरण गुप्त जी ने ठीक ही लिखा है-
हम कौन थे क्या हो गए हैं
और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर
ये समस्याएं सभी।रजनीकांत।
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य श्री इंद्रेष कुमार श्री मद्भागवत गीता आपके द्वार अभियान के प्रधान संरक्षक बने।

Posted: 20 Jan 2022 04:00 AM PST

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य श्री इंद्रेष कुमार श्री मद्भागवत गीता आपके द्वार अभियान के प्रधान संरक्षक बने।

श्री मद्भागवत पंथ, जाति, भाषा से ऊपर उठकर प्राणीमात्र  के कल्याण का मार्ग है.. इन्द्रेष कुमार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर॰एस॰एस॰) के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, वरिष्ठ प्रचारक तथा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्षक श्री इंद्रेष कुमार को श्रीमöगवद्गीता आपके द्वार अभियान का प्रधान संरक्षक बनाया गया है। इस आषय की घोषणा करते हुए श्रीमöगवद्गीता आपके द्वार अभियान के संस्थापक तथा पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने बताया की आर॰एस॰एस॰ के पूर्णकालिक वरिष्ठ प्रचारक श्री इंद्रेष कुमार भाई साहब से अभियान का प्रधान संरक्षक बनने हेतु ई-मेल के माध्यम से पत्र भेजकर आग्रह किया गया था, जिसपर आज दूरभाष पर हुई वार्ता एवं वाॅट्स्ऐप संदेष के माध्यम से प्रधान संरक्षक बनने हेतु अपनी अनुमति प्रदान की गई है।
आर॰एस॰एस॰ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं वरिष्ठ प्रचारक श्री इंदे्रष कुमार ने अभियान का प्रधान संरक्षक बनने के बाद अपने संदेष में कहा है कि अभियान के कार्यकर्Ÿााओं द्वारा बिहार समेत देष के लोगों के बीच निःषुल्क श्रीमöगवद्गीता सप्रेम भंेट करने का कार्य सनातन धर्म की मजबूती के लिए अदिूतीय एवं ऐतिहासिक कदम है। श्री कुमार ने कहा की अभियान के कार्यकर्Ÿाा समर्पण भाव से, निष्काम भाव से, निःस्वार्थ भाव से तन मन धन लगा कर इस काम को करें। मैं यह प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि 5158-59 वर्ष पूर्व जीवन मूल्य आधारित, यानी धर्म आधारित राज्य और समाज स्थापित करने में श्रीमöगवद्गीता ने भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा की 75 सौ वर्ष पूर्व भी भारतीय स्वतंत्रा संग्राम में श्रीमöगवद्गीता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीमöगवद्गीता पंथ, जाति, भाषा भूगोल से ऊपर उठकर प्राणी मात्र के कल्याण का मार्ग है। श्री कुमार ने अभियान की सफलता की शुभकामना की।

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करें फिर गुलशन को गुलजार

Posted: 20 Jan 2022 12:57 AM PST

करें फिर गुलशन को गुलजार

जीवन में आती रहे बहार 
खिल उठे सपनों का संसार 
झूमे नाचे ओ मेरे यार 
करें फिर गुलशन को गुलजार 
करें फिर गुलशन........

कदम कदम पर प्यार के मोती
 चले बांटते राहों में 
प्रेम की गंगा बहाते सारे 
शहरों और गांवों में
फूलों की खुशबू से कर ले 
दिलों का चमन बहार 
मन की सब दूरियां मिटायें 
करें फिर गुलशन को गुलजार
करें फिर गुलशन........

मुश्किलों में भी मिले हम 
खिलते फूल चमन के 
तूफानों में भी पले हम 
गाए गीत वतन के
जगमग दीप बने दिवाली 
होली सा रंगों का त्योहार 
इक दूजे के गले मिले हम 
करें फिर गुलशन को गुलजार
करें फिर गुलशन........

अपनापन अनमोल बांट दे 
सबको दिल का प्यार 
हंसता खिलता महक उठे 
अपना जीवन संसार 
मुस्कानों के मोती सबके 
चेहरों का बने श्रंगार 
मन मयूरा झूम के नाचे 
करें फिर गुलशन को गुलजार
करें फिर गुलशन........

सद्भावों की लहर चले 
फागुन सी मस्त बहार 
ठंडी ठंडी पुरवाई हो 
बरसे अमृत रसधार
मस्त पवन का झोंका आए 
उमंग भरी बयार
हिल मिलकर सब साथ रहे 
करें फिर गुलशन को गुलजार
करें फिर गुलशन........

रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
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स्वामी विवेकानंद की यात्रा

Posted: 19 Jan 2022 11:43 PM PST

स्वामी विवेकानंद की यात्रा


संकलन अश्विनीकुमार तिवारी
स्वामी विवेकानंद की यात्रा की बात आते ही फ़ौरन उनकी अमेरिका यात्रा और शिकागो के भाषण की याद तो आती है, मगर भारत में वो जिन मंदिरों में भ्रमण करते रहे, उनके बारे में चर्चा थोड़ी कम होती है। जम्मू-कश्मीर का क्षीर भवानी मंदिर वैसे मंदिरों में से है, जहाँ उनके जाने का जिक्र आता है। जम्मू कश्मीर के इतिहास के लिए जानी जाने वाली प्रसिद्ध, कल्हण की राजतरंगिनी में भी इस मंदिर की चर्चा है और काफी बाद में किसी अबुल फज़ल नाम के लिखने वाले ने भी तुलमुल में स्थित इस मंदिर का जिक्र किया है। इस मंदिर की कहानी भी रोचक है।
ऐसा माना जाता है कि रावण की तपस्या के कारण देवी के वरदान से उनकी स्थापना लंका में हुई थी। बाद में रावण के उत्पातों से देवी दुखी हुईं और उन्होंने हनुमान से कहा कि उन्हें लंका से ले जाकर जम्मू-कश्मीर में स्थापित कर दें। देवी के हमेशा एक से अधिक नाम प्रचलित होते हैं। वैसे ही, लंका में जहाँ इन्हें "श्यामा" नाम से जाना जाता है, वहीँ जम्मू-कश्मीर आकर देवी राज्ञी कभी कभार त्रिपुरसुन्दरी के नाम से भी जानी जाती हैं। अक्सर जैसा शाक्त परम्पराओं में होता है, उससे थोड़ा अलग, यहाँ स्थापित देवी का वैष्णव रूप होता है।
यहाँ स्थित झील के बारे में ऐसा माना जाता है कि उसका रंग बदलता रहता है। कुछ ब्रिटिश पर्यवेक्षकों ने कभी इसका रंग बैंगनी सी आभा वाला बताया है। स्थानीय लोग मानते हैं कि 1989 में जम्मू-कश्मीर में हुए हिन्दुओं के नरसंहार के वक्त इसका पानी मटमैला सा हो गया था। अभी मंदिर का भवन दिखता है वो जम्मू-कश्मीर के इलाके के महाराजा प्रताप सिंह ने 1912-20 के बीच बनवाया था। ऐसा माना जाता है कि उस समय भी यहाँ कुछ और कलाकृतियों-मूर्तियों वाले पत्थर मिले थे, लेकिन उसके पहले कोई बड़ा मंदिर था, ऐसा नहीं लगता।
परंपरागत रूप से ज्येष्ठ अष्टमी को यहाँ श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ होती है। इस वर्ष संभवतः ऐसा नहीं होगा। फिर भी कई काले कानूनों और आक्रमणकारियों से ये क्षेत्र अब पहले से ज्यादा सुरक्षित है ये संतोष तो रहता है!
✍🏻आनन्द कुमार
यहुदियों ने सारी दुनिया में अपने नरसंहार के स्मारक बनवाए, आने वाली पीढ़ियों को उनका इतिहास बताया उस उत्पीड़न के सीख के तौर पर यहुदी राष्ट्र की नींव रखी।
यहां कोई पूछे 30 साल पहले 19 जनवरी के दिन 1990 को क्या हुआ था। किसी को याद ही नहीं, ऐसा भूले जैसे ये कभी हुआ ही नहीं और सेक्युलर वोटबैंक बनाए रखने के लिए जरूरी है कि किसी को पता भी न चले, क्यों हुआ, कैसे हुआ, किसने किया।
✍🏻अविनाश
माँ सरस्वती का निवास: शारदा देश कश्मीर और 'सर्वज्ञ पीठ' की धरोहर
कश्मीर में जिस मंदिर के द्वार कभी आदि शंकर के लिए खुले थे आज उसके भग्नावशेष ही बचे हैं।
हम प्रतिवर्ष वसंत पंचमी और नवरात्र में माँ सरस्वती की वंदना शंकराचार्य द्वारा रची गई स्तुति से करते हैं लेकिन उस सर्वज्ञ पीठ को भूल गए हैं जिसपर कभी आदि शंकर विराजे थे।
देश की चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित करने तथा आचार्य गौड़पाद में महाविष्णु के दर्शन करने के पश्चात आदि शंकर को माँ सरस्वती की कृपा प्राप्त हुई थी।
विद्यारण्य कृत 'शंकर दिग्विजय' ग्रंथ में वर्णित कथा के अनुसार शंकर अपने शिष्यों के साथ गंगा किनारे बैठे थे तभी किसी ने समाचार दिया कि विश्व में जम्बूद्वीप, जम्बूद्वीप में भारत और भारत में काश्मीर सबसे प्रसिद्ध स्थान है जहाँ शारदा देवी का वास है।
उस क्षेत्र में माँ शारदा को समर्पित एक मंदिर है जिसके चार द्वार हैं।
मंदिर के भीतर 'सर्वज्ञ पीठ' है। उस पीठ पर वही आसीन हो सकता है जो 'सर्वज्ञ' अर्थात सबसे बड़ा ज्ञानी हो।
उस समय माँ शारदा के उस मंदिर के चार द्वार थे जो चारों दिशाओं में खुलते थे।
पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा से आए विद्वानों के लिए तीन द्वार खुल चुके थे किंतु दक्षिण दिशा की ओर से कोई विद्वान आया नहीं था इसलिए वह द्वार बंद था। आदि शंकर ने जब यह सुना तो वे शारदा मंदिर के सर्वज्ञ पीठ के दक्षिणी द्वार के लिए निकल पड़े।
शंकर जब काश्मीर पहुँचे तब वहाँ उन्हें अनेक विद्वानों ने घेर लिया।
उन विद्वानों में न्याय दर्शन, सांख्य दर्शन, बौद्ध एवं जैनी मतावलंबी समेत कई विषयों के ज्ञाता थे।
शंकर ने सभी को अपनी तर्कशक्ति और मेधा से परास्त किया तत्पश्चात मंदिर का दक्षिणी द्वार खुला और आदि शंकर पद्मपाद का हाथ पकड़े हुए सर्वज्ञ पीठ की ओर बढ़ चले। तभी माँ सरस्वती ने शंकर की परीक्षा लेने के लिए उनसे कहा, "तुम अपवित्र हो।
एक सन्यासी होकर भी काम विद्या सीखने के लिए तुमने एक स्त्री संग संभोग किया था। इसलिए तुम सर्वज्ञ पीठ पर नहीं बैठ सकते।"
तब शंकर से कहा, "माँ मैंने जन्म से लेकर आजतक इस शरीर द्वारा कोई पाप नहीं किया।
दूसरे शरीर द्वारा किए गए कर्मों का प्रभाव मेरे इस शरीर नहीं पड़ता।"
यह सुनकर माँ शारदा शांत हो गईं और आदि शंकर सर्वज्ञ पीठ पर विराजमान हुए।
माँ सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर शंकर की कीर्ति चहुँओर फैली और वे शंकराचार्य कहलाए।
आदि शंकराचार्य ने माँ सरस्वती की वंदना में स्तुति की रचना की जो आज प्रत्येक छात्र की वाणी को अलंकृत करती है- "नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुर वासिनी, त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे।"
कश्मीर में जिस मंदिर के द्वार कभी आदि शंकर के लिए खुले थे आज उसके भग्नावशेष ही बचे हैं।
हम प्रतिवर्ष वसंत पंचमी और नवरात्र में माँ सरस्वती की वंदना शंकराचार्य द्वारा रची गई स्तुति से करते हैं लेकिन उस सर्वज्ञ पीठ को भूल गए हैं जिसपर कभी आदि शंकर विराजे थे।
शारदा पीठ देवी के 18 महाशक्ति पीठों में से एक है। आज वह शारदा पीठ पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में है और वहाँ जाने की अनुमति किसी को नहीं है।
कश्मीर के रहने वाले एक मुसलमान डॉ अयाज़ रसूल नाज़की अपने रिश्तेदारों से मिलने पाक अधिकृत कश्मीर स्थित मुज़फ्फ़राबाद कई बार गए।
अंतिम बार जब वे 2007 में गए थे तब उन्होंने शारदा पीठ जाने की ठानी।
डॉ नाज़की की माँ के पूर्वज हिन्दू थे इसलिए वे अपनी जड़ों को खोजने शारदा पीठ गए थे।
गत 60 वर्षों में वे पहले और अंतिम भारतीय कश्मीरी थे जो शारदा पीठ गए थे।
एक समय ऐसा भी था जब बैसाखी पर कश्मीरी पंडित और पूरे भारत से लोग तीर्थाटन करने शारदा पीठ जाते थे।
आज वह शारदा पीठ उस क्षेत्र में है जिसे पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है।
आज़ाद कश्मीर मीरपुर मुज़फ्फ़राबाद का क्षेत्र है जो जम्मू कश्मीर राज्य का अंग है।
मुज़फ्फ़राबाद झेलम और किशनगंगा नदियों के संगम पर बसा छोटा सा नगर है। किशनगंगा के तट पर ही शारदा तहसील में शारदा गाँव स्थित है। वहाँ आज शारदा विश्वविद्यालय के अवशेष ही दिखाई पड़ते हैं। कनिष्क के राज में यह समूचे सेंट्रल एशिया का सबसे बड़ा ज्ञान का केंद्र था।
वस्तुतः कश्मीर की ख्याति ही 'शारदा प्रदेश' के नाम से थी। आर्थर लेवलिन बैशम ने अपनी पुस्तक 'वंडर दैट वाज़ इण्डिया' में लिखा है कि बच्चे अपने उपनयन संस्कार के समय 'कश्मीर गच्छामि' कहते थे जिसका अर्थ था कि अब वे उच्च शिक्षा हेतु कश्मीर जाने वाले हैं।
कश्मीर के शंकराचार्य के समकक्ष आदर प्राप्त आचार्य अभिनवगुप्त ने लिखा है कि कश्मीर में स्थान-स्थान पर ऋषियों की कुटियाँ थीं और पग-पग पर भगवान शिव का वास था।
शारदा पीठ का उल्लेख सर्वप्रथम नीलमत पुराण में मिलता है। इसके अतिरिक्त कल्हण ने राजतरंगिणी में लिखा है कि सम्राट ललितादित्य के समय में शारदा विश्वविद्यालय में बंगाल के गौड़ समुदाय के लोग शारदा पीठ आते थे।
संस्कृत समूचे कश्मीर की भाषा थी और शारदा विश्वविद्यालय में 14 विषयों की पढ़ाई होती थी। शारदा विश्वविद्यालय में ही देवनागरी से भिन्न शारदा लिपि का जन्म हुआ था।
डॉ अयाज़ रसूल नाज़की ने Cultural Heritage of Kashmiri Pandits नामक पुस्तक में प्रकाशित अपने लेख में 'सारिका' या 'शारदा' की लोक प्रचलित कहानी लिखी है।
हुआ यह कि एक बार कश्मीर में रहने वालों की वाणी चली गई। कोई न कुछ बोल सकता था न व्यक्त कर सकता था।
आवाज़ चली जाने से लोग दु:खी और परेशान थे।
तब सबने मिलकर हरि पर्वत पहाड़ी पर जाने का निश्चय किया।
वहाँ पहुँच कर सबने भगवान से प्रार्थना की।
तभी एक बड़ी सी मैना आई और उस चिड़िया ने अपनी चोंच से पत्थरों पर खोए हुए अक्षरों को लिखना प्रारंभ किया।
सबने मिलकर उन अक्षरों को बोलकर पढ़ा, और इस प्रकार सबकी वाणी लौट आई।
संभव है कि वाग्देवी सरस्वती ने कश्मीरी लिपि शारदा को इसी प्रकार प्रकट किया हो लेकिन शेष भारत ने शारदा देश, लिपि, आदि शंकर की सर्वज्ञ पीठ और देवी की शक्ति पीठ को भी लगभग भुला दिया है।
✍🏻यशार्क पांडेय
भारत की ज्ञान-परंपरा में आचार्य अभिनवगुप्त एवं कश्मीर की स्थिति को एक 'संगम-तीर्थ' के रुपक से बताया जा सकता है। जैसे कश्मीर (शारदा देश) संपूर्ण भारत का 'सर्वज्ञ पीठ' है, वैसे ही आचार्य अभिनव गुप्त संपूर्ण भारतवर्ष की सभी ज्ञान-विधाओं एवं साधनों की परंपराओं के सर्वोपरि समादृत आचार्य हैं। कश्मीर केवल शैवदर्शन की ही नहीं, अपितु बौद्ध, मीमांसक, नैयायिक, सिद्ध, तांत्रिक, सूफी आदि परंपराओं का भी संगम रहा है। आचार्य अभिनवगुप्त भी अद्वैत आगम एवं प्रत्यभिज्ञा –दर्शन के प्रतिनिधि आचार्य तो हैं ही, साथ ही उनमें एक से अधिक ज्ञान-विधाओं का भी समाहार है। भारतीय ज्ञान दर्शन में यदि कहीं कोई ग्रंथि है, कोई पूर्व पक्ष और सिद्धांत पक्ष का निष्कर्ष विहीन वाद चला आ रहा है और यदि किसी ऐसे विषय पर आचार्य अभिनवगुप्त ने अपना मत प्रस्तुत किया हो तो वह 'वाद' स्वीकार करने योग्य निर्णय को प्राप्त कर लेता है। उदाहरण के लिए साहित्य में उनकी भरतमुनिकृत रस-सूत्र की व्याख्या देखी जा सकती है जिसे 'अभिव्यक्तिवाद' के नाम से जाना जाता है। भारतीय ज्ञान एवं साधना की अनेक धाराएं अभिनवगुप्तपादाचार्य के विराट् व्यक्तित्व में आ मिलती है और एक सशक्त धारा के रुप में आगे चल पड़ती है।
आचार्य अभिनवगुप्त के पूर्वज अत्रिगुप्त (8वीं शताब्दी) कन्नौज प्रांत के निवासी थे। यह समय राजा यशोवर्मन का था। अभिनवगुप्त कई शास्त्रों के विद्वान थे और शैवशासन पर उनका विशेष अधिकार था। कश्मीर नरेश ललितादित्य ने 740 ई. जब कान्यकुब्ज प्रदेश को जीतकर काश्मीर के अंतर्गत मिला लिया तो उन्होंने अत्रिगुप्त से कश्मीर में चलकर निवास की प्रार्थना की। वितस्ता (झेलम) के तट पर भगवान शितांशुमौलि (शिव) के मंदिर के सम्मुख एक विशाल भवन अत्रिगुप्त के लिये निर्मित कराया गया। इसी यशस्वी कुल में अभिनवगुप्त का जन्म लगभग 200 वर्ष बाद (950 ई.) हुआ। उनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त तथा माता का नाम विमला था।
भगवान् पतञ्जलि की तरह आचार्य अभिनवगुप्त भी शेषावतार कहे जाते हैं। शेषनाग ज्ञान-संस्कृति के रक्षक हैं। अभिनवगुप्त के टीकाकार आचार्य जयरथ ने उन्हें 'योगिनीभू' कहा है। इस रुप में तो वे स्वयं ही शिव के अवतार के रुप में प्रतिष्ठित हैं। आचार्य अभिनवगुप्त के ज्ञान की प्रामाणिकता इस संदर्भ में है कि उन्होंने अपने काल के मूर्धन्य आचार्यों-गुरूओं से ज्ञान की कई विधाओं में शिक्षा-दीक्षा ली थी। उनके पितृवर श्री नरसिंहगुप्त उनके व्याकरण के गुरू थे। इसी प्रकार लक्ष्मणगुप्त प्रत्यभिज्ञाशास्त्र के तथा शंभुनाथ (जालंधर पीठ) उनके कौल-संप्रदाय –साधना के गुरू थे। उन्होंने अपने ग्रंथों में अपने नौ गुरूओं का सादर उल्लेख किया है। भारतवर्ष के किसी एक आचार्य में विविध ज्ञान विधाओं का समाहार मिलना दुर्लभ है। यही स्थिति शारदा क्षेत्र काश्मीर की भी है। इस अकेले क्षेत्र से जितने आचार्य हुए हैं उतने देश के किसी अन्य क्षेत्र से नहीं हुए| जैसी गौरवशाली आचार्य अभिनवगुप्त की गुरु परम्परा रही है वैसी ही उनकी शिष्य परंपरा भी है| उनके प्रमुख शिष्यों में क्षेमराज , क्षेमेन्द्र एवं मधुराजयोगी हैं| यही परंपरा सुभटदत्त (12वीं शताब्ती) जयरथ, शोभाकर-गुप्त महेश्वरानन्द (12वीं शताब्दी), भास्कर कंठ (18वीं शताब्दी) प्रभृति आचार्यों से होती हुई स्वामी लक्ष्मण जू तक आती है |
दुर्भाग्यवश यह विशद एवं अमूल्य ज्ञान राशि इतिहास के घटनाक्रमों में धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई | यह केवल कश्मीर के घटनाक्रमों के कारण नहीं हुआ | चौदहवीं शताब्दी के अद्वैत वेदान्त के आचार्य सायण -माधव (माधवाचार्य) ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'सर्वदर्शन सङ्ग्रह' में सोलह दार्शनिक परम्पराओं का विनिवेचन शांकर-वेदांत की दृष्टि से किया है| आधुनिक विश्वविद्यालयी पद्धति केवल षड्दर्शन तक ही भारतीय दर्शन का विस्तार मानती है और इन्हे ही आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन के द्वन्द्व-युद्ध के रूप में प्रस्तुत करती है|आगमोक्त दार्शनिक परम्पराएँ जिनमें शैव, शाक्त, पंचरात्र आदि हैं, वे कही विस्मृत होते चले गए| आज कश्मीर में कुछ एक कश्मीरी पंडित परिवारों को छोड़ दें, तो अभिनवगुप्त के नाम से भी लोग अपरिचित हैं| भारत को छोड़ पूरे विश्व में अभिनवगुप्त और काश्मीर दर्शन का अध्यापन आधुनिक काल में होता रहा है लेकिन कश्मीर विश्वविद्यालय में, उनके अपने वास-स्थान में उनकी अपनी उपलब्धियों को संजोनेवाला कोई नहीं है। काश्मीरी आचार्यों के अवदान के बिना भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन अपूर्ण और भ्रामक सिद्ध होगा। ऐसे कश्मीर और उनकी ज्ञान परंपरा के प्रति अज्ञान और उदासीनता कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।
आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने अस्सी वर्षों के सुदीर्घ जीवन को केवल तीन महत् लक्ष्यों के लिए समर्पित कर दिया-शिवभक्ति, ग्रंथ निर्माण एवं अध्यापन। उनके द्वारा रचित 42 ग्रंथ बताए जाते हैं, इनमें से केवल 20-22 ही उपलब्ध हो पाए हैं। शताधिक ऐसे आगम ग्रंथ हैं, जिनका उल्लेख-उद्धरण उनके ग्रंथों में तो है, लेकिन अब वे लुप्तप्राय हैं। अभिनवगुप्त के ग्रंथों की पांडुलिपियां दक्षिण में प्राप्त होती रही हैं, विशेषकर केरल राज्य में। उनके ग्रंथ संपूर्ण प्राचीन भारतवर्ष में आदर के साथ पढ़ाये जाते रहे थे।
80 वर्ष की अवस्था में जब उन्होंने महाप्रयाण किया तब उनके 10 हजार शिष्य काश्मीर में थे। श्रीनगर से गुलमर्ग जाने वाले मार्ग पर स्थित भैरव गुफा में अकेले प्रवेश कर उन्होंने सशरीर महाप्रयाण किया। वह गुफा भी आज उपेक्षित है और इसका अस्तित्व संरक्षित नहीं है। जिस महादेवगिरि के शिखरों पर अवतरित होकर स्वयं भगवान शिव ने आगमों का उपदेश किया, वे धवल शिखर संपूर्ण देश से आज भी अपनी प्रत्यभिज्ञा की आशा रखते हैं। प्रत्यभिज्ञा का अर्थ है, स्वयं को विस्मृति के आवरणों से मुक्त कर स्वरूप को जानना, शिवोहं की प्रतीति। त्रिक अथवा प्रत्यभिज्ञा जैसे दर्शन की पुण्यभूमि है काश्मीर और प्रकारान्तर से 'प्रत्यभिज्ञा' हमारे देश का सबसे प्रासांगिक जीवन–दर्शन होना चाहिए। हमें अपनी शक्तियों की प्रत्यभिज्ञा होनी ही चाहिए।
✍🏻कौशलेश राय
कश्मीर का समुद्र से उद्भव-इसका वर्णन तथा कालमान का ठीक अनुमान नीलमत पुराण में है। जलोद्भव दैत्य की कहानी १९९१ में दुहराई गई।
नीलमत पुराण-
यैषा देवी उमा सैव कश्मीरा नृपसत्तम।
आसीत् सरः पूर्नजलं सुरम्यं सुमनोहरम्॥३१॥
कल्पारम्भप्रभृति यत्पुरा मन्वन्तराणि षट्।
अस्मिन् मन्वन्तरे जातं विषयं सुमनोहरम्॥३२॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु यदासीद्विमलं सरः।
कथं वैवस्वते जातं तन्मण्डलमिति प्रभो॥४६॥
मन्वन्तरेषु पूर्वेषु नासीदेतत् पुरं किल।
कश्मीराख्यं बभूवास्मिन् कथं वैवस्वतेऽन्तरे॥५०॥
अयने द्वे तथैवाब्दं नृपैव वर्षसंख्यया।
द्वात्रिंशच्च सहस्राणि तथा लक्षचतुष्टयम्॥५२
प्रोक्तं कलियुगं राजन् द्वापरं द्विगुणं स्मृतम्।
त्रिगुणं तु तथा त्रेता कृतं ज्ञेयं चतुर्गुणम्॥५३॥
चतुर्युगैकसप्तत्या मन्वन्तरमिहोच्यते।
तस्मिन्मन्वन्तरेऽतीते प्रजाः स्थावरजङ्गमाः॥५४॥
इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमे॥६२॥
नौबन्धनमितिख्यातं पुण्यं पापभयापहम्॥
कृततुल्ये तदा काले व्यतीते तु मनुस्तदा॥६३॥
विदधाति प्रजासर्गं यथापूर्वमरिन्दम।
नौदेहेन सतीदेवी भूमिर्भवति पार्थिव॥६४॥
तस्यां तु भूमौ भवति सरस्तु विमलोदकम्।
षड्योजनायतं रम्यं तदर्धेन च विस्तृतम्॥६५॥
सतीदेश इति ख्यातं देवाक्रीडं मनोहरम्।
आकाशमिव गम्भीरं जलजैश्च विवर्जितम्॥६६॥
शीतलामलपानीयं सर्वभूमि मनोहरम्।
अस्मिन्वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल॥६७॥
अबुल फजल सतीसर को उमासर कहता है-काश्मीर पेश अज अम्रत सती नाम अस्त सती नाम ईजा अस्त व सर नाम ए हौज कता।
पारसी इतिहासकार ववैउद्दीन-आदम शरन दीप (लंका) से काश्मीर में आये। सेथ (वसिष्ठ) के वंश में काश्मीर का राज्य ११०० वर्ष रहा। हजरत सुलेव्मान ने काश्मीर को आबाद किया। अपने भतीजे इसौन को काश्मीर का राजा बनाया। हिन्दुओं ने राजा हरीनन्द के नेतृत्व में विजय प्राप्त की। उसका वंश जलप्लावन तक राज्य करता रहा। उसके बास तुर्किस्तान की एक जाति काश्मीर में आयी।
मुहम्मद आजम दिदामारी के वाकयाते कश्मीर में उल्लेख है-काश्मीर प्रदेश जल से भरा था। दैत्य जलदेव वहां रहता था। वह मनुष्यों को खाता था। आस पास जो कुछ मिलता था, खा जाता था। विस्तृत वर्णन जलोद्भव के प्रसंग में है।
राजतरङ्गिणी, तरङ्ग १-
दृग्गोचरं पूर्वसूरिग्रन्था राजकथाऽऽश्रयाः।
ममत्वेकादश गता मतं नीलमुनेरपि॥१४॥
(नीलमुनि का नीलमत पुराण)
द्वापञ्चाशतमाम्नाय भ्रंशाद्यान् नाऽस्मरन् नृपान्।
तेभ्यो नीलमताद् दृष्टं गोनन्दादि चतुष्टयम्॥१६॥
पुरा सतीसरः कल्पारम्भात् प्रभृति भूरभूत्।
कुक्षौ हिमाद्रेरर्णोभिः पूर्णा मन्वन्तराणि षट्॥२५॥ज्योतिष के अनुसार इस मन्वन्तर में प्रायः २८ युग बीत चुके हैं। आदि सन्धि के सत्य युग को मिला कर १७२८००० + ४३२०००० x २८ = १२.२६ करोड़ वर्ष बीत चुके हैं। आधुनिक अनुमान के अनुसार प्रायः २० करोड़ वर्ष पूर्व हिमालय के स्थान पर समुद्र था तथा उसके जीवों के अवशेष अभी भी हिमालय की चोटियों पर मिलते हैं। एशिया भूखण्ड पर दक्षिण से भारतीय भूखण्ड के धक्के से वह जमीन उठ गयी तथा हिमालय बना। इसकी आयु प्रायः ५ करोड़ वर्ष कही जाती है। पुराना पर्वत शिवालिक था जो हिमालय के दक्षिण मुख्यतः पश्चिमी भाग में है। शिव की पत्नी के नाम पर हिमालय के स्थान पर स्थित समुद्र को सती समुद्र कहते थे। सती देवी को ग्रीक में टेथीज कहते थे। अतः इसे आधुनिक भूगर्भ विज्ञान में टेथीज समुद्र कहते हैं। नील मुनि का स्थान नीलम है जहां पाकिस्तान चीन की सहायता से बान्ध बना रहा है। जलोद्भव दैत्य का स्थान डल झील है।
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पाप और sin नितान्त भिन्न हैं

Posted: 19 Jan 2022 11:33 PM PST

पाप और sin नितान्त भिन्न हैं

प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज
सत्व, रज और तम ये तीन गुण सम्पूर्ण प्रकृति में व्याप्त हैं। रजोगुण की क्रियाशीलता प्रायः पाप की ओर ले जाती है। विभिन्न व्यक्तियों में ये तीन गुण विभिन्न अनुपातों में होते हैं। रजोगुण की तीव्रता से सक्रियता भी होती है और ज्ञान का नियंत्रण नहीं रहे तो यह सक्रियता पाप की ओर भी आकर्षित करती है। प्रत्येक जीवात्मा अनादिवासना से संचालित है और सबमें उनके अपने-अपने पूर्व कर्मों के परिणामस्वरूप ये तीन गुण भिन्न-भिन्न अनुपात में रहते हैं।
वस्तुतः कोई भी व्यक्ति अर्थात् कोई भी जीवात्मा कहाँ जन्म लेता है, उसकी आयु कितनी रहती है और उसके भोग क्या-क्या रहते हैं, यह पूर्व के कर्माशय पर निर्भर होता है। कर्माशय का अर्थ है कर्म-संस्कार। धर्म और अधर्म रूप कर्माशय ही कर्म संस्कार होता है। चित्त मंे कोई भाव जगने पर उस भाव की एक छाप चित्त में रह जाती है, उसे ही संस्कार कहते हैं। ये संस्कार ज्ञानमूलक या प्रज्ञामूलक भी होते हैं और अज्ञानमूलक भी। संस्कारों के समुच्चय का ही नाम कर्माशय है। कर्माशय से ही जन्म, आयु और भोग ये तीन विपाक या फल होते हैं। कर्माशय बीज है, वासना क्षेत्र है और सुख-दुख इस क्षेत्र में बीज से उपजने वाले फल हैं। जन्म ही वृक्ष है। कौन जीव कहाँ जन्म लेता है, यह कर्माशय से निर्धारित होता है और फिर उसके अनुसार ही आयु और भोग प्राप्त होते हैं। योगशास्त्र में इसका विस्तार से विवेचन है कि क्या एक कर्माशय एक ही जन्म का कारण होता है या अनेक जन्मों का। विवेचना का सार यह है कि एक कर्माशय एक ही जन्म का कारण बनता है। परंतु कुछ कर्माशय ऐसे होते हैं जो इस नियम के अपवाद होते हैं। वे अन्य जन्म तक जाकर फल को निष्पन्न करते हैं। एक जन्म में जो कर्माशय संचित होता है, वह उसी जन्म में कुछ नष्ट भी हो सकता है। अतिप्रबल या प्रधान कर्माशय यदि किसी जन्म में फल दे रहे हैं तो अप्रधान कर्माशय उससे दबे रहते हैं और वे किसी अगले जन्म में जाकर फलित होते हैं। इसको उदाहरण देकर इस प्रकार समझाया गया है कि किसी व्यक्ति ने थोड़ा धर्माचरण किया परंतु बाद में विषयलोभ से अनेक पापकर्म किये। उन पापकर्मों का कर्माशय प्रधान हो गया। अतः अगला जन्म उसका पशुयोनि में होगा। वहाँ वह उन पापकर्मों का फल भोगेगा। परंतु जो पुण्य कर्म किये हैं, जो धर्माचरण किया है वह संचित रहेगा और वह बाद में मानवजन्म लेने पर प्रकाशित होगा।
इस प्रकार जन्म, आयु और भोग पुण्य के कारण सुखफल देने वाले और अपुण्य या पाप के कारण दुखफल देने वाले हैं।
इस सनातन दृष्टि को ध्यान में रखकर ही हमारे यहाँ प्रायश्चित का विधान ऋषियों और ज्ञानियों ने किया है। क्योंकि आत्मा तो कभी पाप या पुण्य में लिपटती नहीं। जो भी संस्कार होते हैं वे मन, बुद्धि और चित्त में ही होते हैं। अतः पाप दूषित मन, विकृति या विचलित बुद्धि और मलिन चित्त का कार्य है। इसलिये इस दूषण या मल को हटाने पर मन, बुद्धि और चित्त निर्मल हो जाते हैं। यही प्रायश्चित का प्रयोजन है। अतः पाप और पुण्य जीवात्मा के मन, बुद्धि और चित्त को प्रभावित करने वाले गुण हैं।
वर्तमान में प्रभावी अन्य मजहब या रिलीजन में गुनाह या 'सिन' की जो मान्यता है, वह भारतीय पाप के बोध से पूर्णतः भिन्न है। वहाँ 'सिन' या गुनाह या फितना वह है जो पंथ प्रवर्तक के आदेशों से हटकर काम किया जाये। वहाँ उद्देश्य पांथिक नियंत्रण है। (आइडियालॉजी आधारित पार्टी नामक पंथ भी इन्हीं मजहबों या रिलीजन की नकल में परिकल्पित है। वहाँ भी उद्देश्य पांथिक नियंत्रण है)।
इसीलिये मजहब और इस प्रकार के 'मोनोथीइस्ट' यानी एकपंथवादी रिलीजन सदा एकदेववादी होते हैं। (भारत में नितांत मूर्ख लोग इसे ही अद्वैतवादी कहते देखे जाते हैं जो उपहास और तिरस्कार के योग्य स्थिति है)। अतः वहाँ 'सिन' और गुनाह का सारा ही प्रतिपादन पांथिक नियंत्रण के लिये होता है। भारतीय ज्ञान परंपरा अर्थात सनातन धर्म में पुण्य और पाप जीवात्मा के मन, बुद्धि और चित्त के उत्कर्ष या अपकर्ष के आधारभूत कारण के रूप में ही वर्णित है। अतः पाप का प्रायश्चित मन, बुद्धि और चित्त के निर्मल होने तथा तेजोमय होने के लिये आवश्यक है।प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज
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महर्षि पाणिनि -विश्व बिख्यात भाषा वैज्ञानिक

Posted: 19 Jan 2022 11:30 PM PST

महर्षि पाणिनि -विश्व बिख्यात भाषा वैज्ञानिक

जिन्होंने सभी भाषाओं को एक सूत्र में बांधा और जीवन के हर क्षेत्र की शिक्षा के लिए अष्टाध्याई ऐसे ग्रंथ का निर्माण किया , वैसे भाषा को अनुशासित करने हेतु किए जाने वाले प्रयास के मुख्य आचार्य महर्षि पाणिनि माने जाते हैं ।भाषा को अनुशासित करने वाले शास्त्र का नाम व्याकरण है । यानी जिस तंत्र से साधु शब्द का ज्ञान होता है उसे व्याकरण कहते हैं और यही शब्दानुशासन है । परंतु भिन्न-भिन्न आचार्यों ने व्याकरण की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी हैं । पाणिनि जिनके रोम- रोम से व्याकरण झरता था ,के जन्म स्थान एवं स्थिति काल पर भिन्न-भिन्न आचार्यों के भिन्न -भिन्न मत हैं ।The history of Indian literature (London ) 1914 के अनुसार पाणिनि के जन्म एवं उनकी स्थिति का काल ईसा के 700 वर्ष पूर्व का रहा है ।उनका जन्म गांधार के लाशातुला में हुआ था । उनकी माता का नाम दक्षि एवं पिता का नाम प्रज्ञ था । इन्होने महर्षि वर्ष के आश्रम में रह कर अध्ययन किया था ।
The history of Indian literature London 1914 पेज216.
श्री युधिष्ठिर मिमांसक के अनुसार उनका काल लगभग 2800वि॰ पूर्व रहा है ।-
संस्कृत ब्याकरणशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग ,(प्र॰ सं॰),पृ॰48,51-5
डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल ने 520 से 460 वर्ष पूर्व इनकी उपस्थिति मानी है । उनके अनुसार पाणिनि महानन्द राजा के समकालीन थे । इनका निवास अविभाजित भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में पंजाब के गांधार जनपद में लाशातुला जो आज पेशावर के नाम से प्रसिद्ध है ,था।
इण्डिया ऐज नोन टु पाणिनि (द्वि॰ सं॰)-आठवाँ अध्याय
गणतंत्र महोदधि के अनुसार इनका निवास गांधार जनपद में लाशातुर था ।
शालतुरो नाम ग्रामः, सोऽभिजनोऽस्यास्तीतिशालतुरीयः,तत्र भवान् पाणिनि -
गणतंत्र महोदधि
परन्तु श्री युधिष्ठिर मिमांसक के अनुसार शालातुर इनके पूर्वज रहते थे ।इनका निवास वाहीक देश या उसके समीप कहीं था -
संस्कृत ब्याकरणशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग ,(प्र॰ सं॰),पृ-134
कथा सरित सागर के अनुसार ये महर्षि वर्ष के आश्रम में रहकर पढ़े थे ,फिर भी इनकी मेधा प्रखर नहीं हो सकी थी ।
अथ कालेन वर्षस्य शिष्यवर्गा महानभुत्।
तत्रैकः पाणिनिर्नाम जड़बुद्धितरोऽभवत् ॥
कथा स॰ सा॰,लम्बक 1,ताङ्ग -4,श्लोक-10
शालतुरो नाम ग्रामः, सोऽभिजनोऽस्यास्तीतिशालतुरीयः,तत्र भवान् पाणिनि -
गणतंत्र महोदधि
परन्तु श्री युधिष्ठिर मिमांसक के अनुसार शालातुर इनके पूर्वज रहते थे ।इनका निवास वाहीक देश या उसके समीप कहीं था ।
संस्कृत ब्याकरणशास्त्र का इतिहास-प्रथम भाग ,(प्र॰ सं॰),पृ-134
कथा सरित सागर के अनुसार महर्षि वर्ष के आश्रम में रहकर भी इनकी मेधा प्रखर नहीं हो सकी थी ।
अथ कालेन वर्षस्य शिष्यवर्गा महानभुत्।
तत्रैकः पाणिनिर्नाम जड़बुद्धितरोऽभवत् ॥
- कथा स॰ सा॰,लम्बक 1,ताङ्ग -4,श्लोक-10
पंचतंत्र के अनुसार इनकी मृत्यु सिंह के आघात से त्रयोदशी को हुई थी ।इसीलिए त्रयोदशी को ब्याकरण का अध्यन बैयाकरण निषिद्ध मानते हैं।
सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहत् प्राणान् प्रियान पाणिने-मित्र संप्रप्ति,पंचतंत्र।
यूँ तो पाणिनि के 5 ग्रंथों का रचना - इतिहास मिलता है ,परंतु मुख्य अष्टाध्याई ही है । इसके अतिरिक्त-
1-धातु पाठ,
2-गण पाठ,
3-उणादि सूत्र
4-लिंगानुशासन
5-शिक्षा शास्त्र
6-जामवंती विजय- राजशेखर द्वारा रचित जह्णण की सूक्ति मुक्तावली मैं इसका विवरण मिलता है । नाम लिंगानुशासन की टीका में भी इसका वर्णन है ।
नमः पाणिनये तस्मै यस्मादाविर भूदिह ।
आदौ व्याकरणं काब्यमनु जाम्बन्ति जयम।॥
7- पाताल विजय -पाताल विजय भी अपर्याप्त रचना है जिसका बर्णन नामिसाधु ने रूद्रट कृत काव्यालंकार की भूमिका में किया है ।परंतु इनकी उपलब्धता नहीं है ।
1-धातु पाठ,2-गण पाठ,3-उणादि सूत्र4-लिंगानुशासन अष्टाध्यायी-सूत्र पाठ के परिशिष्ट में मिलते हैं परन्तु शेष तीन ग्रंथ अप्राप्य हैं ।
पाणिनि ने व्याकरण शास्त्र को ही क्यों अपनाया- इसके पीछे भी एक रहस्य है ।संस्कृत वांग्मय में व्याकरण का स्थान सर्वोपरि माना गया है ।
व्याकरण की परिभाषा में पाणिनि कहते हैं -
व्याक्रियन्ते =व्युतपाद्यन्ते शब्दा अनेनेति -शब्दज्ञान जनकम् व्याकरणम् ॥
संस्कृत वांग्मय में व्याकरण का स्थान बहुत ही ऊंचा है । इसकी गणना वेद के षडङ्गों में सर्वोपरि माना गया
है । शिक्षा, कल्प, व्याकरण ,निरुक्त ,छंद और ज्यौतिष सभी वेद के अंग हैं जिसमे व्याकरण को मुख्य रूप से प्रधान अंग माना गया है । यानी संस्कृति संस्कार और संसार के ज्ञान समुच्चय वेद के खड़ंग में व्याकरण का स्थान पहला है -
मुखं व्याकरणं तस्य ज्यौतिषं नेत्रमुच्यते ।
निरुक्तं श्रोत्रमुदिष्टं छन्दसां विचितिः पदे ॥
शिक्षा प्राणं तु वेदस्य हस्तौ कल्पान प्रचक्षते ॥
महाभास्य-अ॰-1,पा॰-1,आ॰-1
व्याकरण शिक्षा (ज्ञान ) के अभाव में (उच्चारन के ज्ञान नहीं होने से)अपने लोग -कुत्ता,सपूर्ण -खंड और एकवार- विष्ठा हो जाता है -
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् ।
स्वजनःश्वजनो माभूत् सकलः शकलःसकृत्छकृत् ॥
महर्षि पाणिनि के पूर्व ही व्याकरण सुब्यवस्थित हो चुका था -
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन वहुधा श्रुतम् ।
वहु व्याहरतानेन न किञ्चिदपभासितम् ॥
वाल्मीकीय रामायण-किष्किंधा॰-3/29
ॠक् तंत्र के अनुसार व्याकरण शास्त्र के आदि प्रबक्ता ब्रह्मा हैं ।ब्रह्मा ने बृहस्पति को और बृहस्पति ने इन्द्र को शब्दोपदेश दिया -
ब्रह्मा बृहस्पतये प्रोवाच ,वृहस्पतिरिन्द्राय,इन्द्रो भारद्वाजाय,भारद्वाज ॠषेभ्यः,ॠषयो ब्राह्मणेभ्यः-
ॠक् तंत्र-1/4
तैतिरीय संहिता में भी इन्द्र को आदि संस्कर्ता माना गया है ।
वोपदेव ने भी आठ शाब्दिकों का उल्लेख करते समय सबसे पहले इन्द्र का ही नाम लिया है -
इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नाऽऽपिशला शाकटायनः।
-कविकल्पद्रुम ।
श्री युधिष्ठिर मिमांसक ने इन्द्र का काल वि॰ पूर्व 8500 वर्ष माना है ,यद्यपि संप्रति यह प्राप्य नहीं है ।,फिर भी कई ग्रंथों ने ऐन्द्र व्याकरण को काफी सम्पन्न होने की पुष्टी की है । इन्होने पाणिनि के पूर्व अस्सी व्याकरणाचार्यों का उल्लेख किया है ।स्वयं पाणिनि ने भी अपनी अष्टाध्यायी में दस शाब्दिकों का उल्लेख किया है -
1-आपिशलि-6/1/92
2-काश्यप-1/2/25
3-गर्ग्य-8/2/20
4-गालव-7/1/74
5-चाक्रवर्मण-6/1/130
6-भारद्वाज-7/2/61
7-शाकटायन-3/4/111
8-शाकल्य-1/1/16
9-सेनक-5/4/112
10-स्फोटायन-6/1/123
परन्तु पाणिनि से पूर्व के व्याकरण का प्रमाण उपलब्ध नहीं होने से पाणिनि व्याकरण के आदि आचार्य माने जाते हैं ।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी की रचना में व्यष्टि से समष्टि तक की प्रत्येक पहलुओं पा विचार किया है ।पाणिनि ने पंजाब के मध्य भाग में खड़े होकर अपनी दृष्टि दसों दिशाओं में दौड़ाई ।पूरब की कुल्लू-कांगड़ा की पहाड़ी(त्रिगर्त) , पश्चिम में गांधार की राजधानी तक्षशिला और पुष्कलावलि तक फैले कबीलों का साम्राज्त,उत्तर में दरद(वर्तमान का गिलगिल)तथा दक्षिण में सिंधु नद -सभी स्थानों की बोली ,भाषा ,संस्कृति,रीति- रिवाज , कुलाचार ,कृषि एवं त्योहारादि का अध्ययन वहाँ के ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,सैनिक ,व्यापारी ,किसान ,रंगरेज,बढ़ई ,रसोइए ,मोची ,ग्वाले ,चरवाहे ,गड़ेड़िए ,बुनकर , कुम्हार ,माली आदि से मिलकर एवं उनके साथ कुछ दिन रहकर उनके पेशे से सम्बन्धित शब्दों का गंभीरता से किया
था ।इसीलिए तत्कालीन भारतीय समाज का सम्पूर्ण चित्र भूगोल ,अर्थशास्त्र ,शिक्षा शास्त्र,राजनीति शास्त्र दर्शन शास्त्र खान -पान के वर्णन होने से यह ग्रंथ अष्टाध्यायी ,अति महत्वपूर्ण हो गया ।
इसमें 3996 सूत्र हैं जो समाज के हर पहलुओं को छूते हैं ।
यह अष्टाध्यायी नामक ग्रंथ सभी भाषाओं के व्याकरण का जन्मदाता है तो है ।इसमैं शब्दों की व्युत्पति ,शब्द बनाने की प्रक्रिया ,धातु पाठ ,छन्द शास्त्र आदि तो बताई ही गई है ,इनके अतिरिक्त वैदिक एवं लौकिक दोनो भाषाओं के परिवारों ,रिस्तों की एक बड़ी सूचि बनाई है ।दस हजार वाले गावों की सूची का वर्णन भी इसकी विशेषता है ।इसमें विभिन्न पकवानों ,विभिन्न प्रकार की कृषि ,विभिन्न प्रकार की सुरा का वर्णन मिलता है ।
25 मन का बोझा आचित तथा एवं 25 मन भोजन का प्रबन्ध करने वाले रसोइया को आचितक कहते थे । उस समय होने वाले छः प्रकार के धानों का वर्णन है -ब्रीहि,महा ब्रीहि,शालि,हायन,षष्ठिका (साठी) और निवार । इसी तरह सुरा - मैरेय,कापिशायन ,अवधतिका ,कषाय ,कालिका का वर्णन मिलता है । इस तरह महर्षि पाणिनि विश्व के प्रथम भाषा वैज्ञानिक हैं ।
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मैंने तेरे लिये कई गीत लिखे

Posted: 19 Jan 2022 11:25 PM PST

मैंने तेरे लिये कई गीत लिखे

मैंने तेरे लिये कई गीत लिखे,
लिखे कई गजल,अफसाने,
कुछ अनकही रह गयी,
कुछ रह गये अधुरे अंजाने।
    मैंने तेरे लिये...।

कुछ लिखी कविता तुम पर मैंने,
लिखें हैं कई तराने,
कुछ सुनाया तुमको मैंने,
कुछ रह गये अनसुने,बेगाने। 
     मैंने तेरे लिये...।

कितना प्यार किया मैंने तुमसे,
ये मेरी गीत,गजल से पूछो,
करेंगे मेरे प्यार की ये  बातें,
प्यार भरे मेरे ये गाने।
     मैंने तेरे लिये...।

तेरे प्यार में क्या-क्या नहीं कहलाया,
कहलाया आशिक,दिवाने,
कुछ ने तो लोफर कह डाले,
कुछ अवारा,मस्ताने।
     मैंने तेरे लिये...।
      
जब-जब प्यार की बात चलेगी,
बयाँ करेगी मेरी प्रेम कहानी,
जिनको प्यार की समझ नहीं है,
वो 'अकेला' के प्यार को क्या जाने।
     मैंने तेरे लिये...।
        -----0-----
       अरविन्द अकेला
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