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Monday, August 16, 2021

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अफगानिस्तान का इतिहास - 2, मेडियाई साम्राज्य से तालिबान तक - संजय तिवारी

Posted: 16 Aug 2021 03:20 AM PDT

 

ईसा के कोई 600 साल पहले तक अफ़गान क्षेत्र मेडियाई साम्राज्य के अंग हुआ करते थे। इस समय मेडी लोग असीरीयाई लोगों के साथ जूडिया और मध्यपूर्व पर आक्रमण में मदद करते थे। पार्स के लोग उनके अनुचर सहयोगी हुआ करते थे। पर सन् 559 ईसापूर्व में पार्स (आधुनिक ईरान का फ़ार्स प्रांत) के राजकुमार कुरोश ने मेडिया के खिलाफ विद्रोह कर दिया। कुरोश ने इस तरह हखामनी साम्राज्य की स्थापना की जो सिकन्दर के आक्रमण तक कायम रहा। उसके बाद उसने असीरिया पर भी अधिकार कर लिया। इसके बाद कुरोश का साम्राज्य बढ़ता ही गया और यह मिस्र से लेकर आधुनिक पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा तक फैल गया।

ईसापूर्व 230 में मौर्य शासन के तहत अफ़गानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। ईसा के 700 साल पहले इसके उत्तरी क्षेत्र में गांधार महाजनपद था जिसके बारे में भारतीय स्रोत महाभारत तथा अन्य ग्रंथों में वर्णन मिलता है। ईसापूर्व 500 में फ़ारस के हखामनी शासकों ने इसको जीत लिया। सिकन्दर के फारस विजय अभियान के तहते अफ़गानिस्तान भी यूनानी साम्राज्य का अंग बन गया। इसके बाद यह शकों के शासन में आए। शक स्कीथियों के भारतीय अंग थे। ईसापूर्व 230 में मौर्य शासन के तहत अफ़ग़ानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। इसके बाद पार्थियन और फ़िर सासानी शासकों ने फ़ारस में केन्द्रित अपने साम्राज्यों का हिस्सा इसे बना लिया। सासनी वंश इस्लाम के आगमन से पूर्व का आखिरी ईरानी वंश था। अरबों ने ख़ुरासान पर सन् 707 में अधिकार कर लिया। सामानी वंश, जो फ़ारसी मूल के पर सुन्नी थे, ने 987 इस्वी में अपना शासन गजनवियों को खो दिया जिसके फलस्वरूप लगभग संपूर्ण अफ़ग़ानिस्तान ग़ज़नवियों के हाथों आ गया। ग़ोर के शासकों ने गज़नी पर 1183 में अधिकार कर लिया।

आज जो अफ़गानिस्तान है उसका मानचित्र उन्नीसवीं सदी के अन्त में तय हुआ। अफ़ग़ानिस्तान शब्द कितना पुराना है इसपर तो विवाद हो सकता है पर इतना तय है कि 1700 इस्वी से पहले दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान नाम का कोई राज्य नहीं था। प्राचीन अफ़गानिस्तान पर कई फ़ारसी साम्राज्यों का अधिकार रहा। इनमें हख़ामनी साम्राज्य (ईसापूर्व 559– ईसापूर्व 330) का नाम प्रमुख है।

सिकन्दर का आक्रमण 328 ईसापूर्व में उस समय हुआ जब यहाँ प्रायः फ़ारस के हखामनी शाहों का शासन था। उसके बाद के ग्रेको-बैक्ट्रियन शासन में बौद्ध धर्म लोकप्रिय हुआ। ईरान के पार्थियन तथा भारतीय शकों के बीच बँटने के बाद अफ़ग़निस्तान के आज के भूभाग पर सासानी शासन आया। फ़ारस पर इस्लामी फ़तह का समय कई साम्राज्यों के समय रहा। पहले बग़दाद स्थित अब्बासी ख़िलाफ़त, फिर खोरासान में केन्द्रित सामानी साम्राज्य और उसके बाद ग़ज़ना के शासक। गज़ना पर ग़ोर के फारसी शासकों ने जब अधिपत्य जमा लिया तो यह गोरी साम्राज्य का अंग बन गया। मध्यकाल में कई अफ़ग़ान शासकों ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें लोदी वंश का नाम प्रमुख है। इसके अलावा भी कई मुस्लिम आक्रमणकारियोंं ने अफगान शाहों की मदद से भारत पर आक्रमण किया था जिसमें बाबर, नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली शामिल है। अफ़गानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे।

अहमद शाह अब्दाली ने पहली बार अफ़गानिस्तान पर एकाधिपत्य कायम किया। वह अफ़ग़ान (यानि पश्तून) था। 1751 तक अहमद शाह ने वे सारे क्षेत्र जीत लिए जो वर्तमान में अफगानिस्तान और पाकिस्तान है। थोड़े समय के लिए उसका ईरान के खोरासान और कोहिस्तान प्रान्तों और दिल्ली शहर पर भी अधिकार था। 1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध में उसने मराठा साम्राज्य को पराजित किया। 1772 में अहमद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र तिमूर शाह दुर्रानी गद्दी पर बैठा। उसने अफगान साम्राज्य की राजधानी कन्दहार से बदलकर काबुल कर दी। 1793 में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका बेटा ज़मान शाह गदी पर बैठा। धीरे-धीरे दुर्रानी साम्राज्य निर्बल होता गया। अन्ततः सिखों ने महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में दुर्रानी साम्राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया। सिखों के अधिकार में जो क्षेत्र आये उनमें वर्तमान पाकिस्तान (किन्तु बिना सिन्ध) शामिल था।

ब्रितानी भारत के साथ हुए कई संघर्षों के बाद अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश भारत और अफ़गानिस्तान के बीच सीमा उन्नीसवीं सदी में तय की। 1933 से लेकर 1973 तक अफ़ग़ानिस्तान पर ज़ाहिर शाह का शासन रहा जो शांतिपूर्ण रहा। इसके बाद कम्यूनिस्ट शासन और सोवियत अतिक्रमण हुए। 1979 में सोवियतों को वापस जाना पड़ा। इनकों भगाने में मुजाहिदीन का प्रमुख हाथ रहा। 1997 में तालिबान जो अडिगपंथी सुन्नी कट्टर हैं, ने सत्तासीन निर्वाचित राष्ट्रपति को बेदखल कर दिया। इनको अमेरिका का साथ मिला पर बाद में वे अमेरिका के विरोधी हो गए। 2001 में अमेरिका पर हमले के बाद यहाँ पर नैटो की सेना बनी हुई थी।

उन्नीसवीं सदी में आंग्ल-अफ़ग़ान युद्धों के कारण अफ़्ग़ानिस्तान का काफी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अधीन हो गया जिसके बाद अफगानिस्तान में यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। उधर उत्तर में रूसी साम्राज्य का विस्तार दक्षिण की तरफ होता जा रहा था। अंग्रेज़ों को डर था कि यदि वे अफ़गानिस्तान में घुस आते हैं तो उनके भारतीय अधिकार पर खतरा हो सकता है। इस लिए ब्रिटेन और रूस दोनों ने अफ़ग़ानिस्तान में दखल देना आरंभ किया। इस घटना को महाखेल का नाम दिया जाता है जिसमें दक्षिणी खोरासान (यानि अफ़गानिस्तान और पूर्वोत्तर ईरान) में दोनों देश अपने सहयोगियों के साथ अपने हित साधने में लगे थे।

1826 में दोस्त मोहम्मद काबुल की गद्दी पर बैठा। उसने अपने क़िज़िलबश कबीले के लोगों की मदद से अपनी स्थिति मजबूत की और अपने भाइयों के खतरे से अपने को ऊपर किया। उसके उपर जो सबसे बड़ी विपत्ति उस समय थी वो ये थी कि खाइबर के पूर्व में पश्तून इलाकों पर सिक्ख सेना अपना अधिकार जमा रही थी। 1834 में पूर्व शाह शुजा दुर्रानी को दोस्त ने हरा दिया। शाह शुजा की मदद का बहाना बना कर अंग्रेज़ों ने काबुल पर हमला किया। 16 हजार की सेना में केवल एक अंग्रेज़ बटालियन थी और बाकी भारतीय सेना और उनके परिवार वाले थे। पर इनमें से केवल एक अंग्रेज़ वापस लौटकर जलालाबाद पहुँच सका। बाकी भारतीय कहां गए इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नही है।

शाहशुजा के काबुल से दूर रहने के कारण सिक्ख पश्चिम की ओर और आगे बढ़ गए। रणजीत सिंह की सेना ने पेशावर पर अधिकार कर लिया। पेशावर के पश्चिम में वो इलाके थे जिसपर काबुल का सीधा नियंत्रण बनता था। अब स्थिति चिंतनीय हो गई थी। 1836 में जमरूद में दोस्त मोहम्मद की सेना ने उसके बेटे अकबर खान के नेतृत्व में सिक्खों को हरा दिया पर वे सिक्खों को पूर्णतः पीछे नहीं धकेल सके। पेशावर पर दुबारा आक्रमण करने की बजाय उसने ब्रिटिश भारत के नवनियुक्त गवर्नर लॉर्ड ऑकलैंड से सिक्खों के खिलाफ़ एक मोर्चे के लिए संपर्क किया। इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपीय हस्तक्षेप का सिलसिला शुरु हुआ।

ब्रिटेन और फ्रांस के बीच 1763 में हुए पेरिस की संधि के बाद अंग्रेज भारत में एक मात्र यूरोपीय शक्ति बच गए थे। उधर रूसी साम्राज्य कॉकेशस से दक्षिण की तरफ बढ़ रहा था। जिस बात से ब्रिटिश साम्राज्य को सबसे अधिक चिंता हो रही थी वो थी ईरानी दरबार में बढ़ता हुआ रूसी प्रभाव। 1837 में रूस ने ईरान के शाह को हेरात पर नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित किया। हेरात पर ईरानी नियंत्रण के बाद अंग्रेज़ों को रूस की साम्राज्यवादी नीति से डर सा लगने लगा। ऑकलैंड ने दोस्त मुहम्मद से रूसियों तथा ईरानियों के साथ सभी सम्पर्क तोड़ लेने को कहा। इसके बदले में ऑकलैंड ने ये वादा किया कि वे रणजीत सिंह के साथ अफ़गानों की मित्रता बहाल करेगा। पर जब ऑकलैंड ने ये लिखित रूप से देने से मना कर दिया तब दोस्त मुहम्मद ने मुँह फेर लिया और रूसियों के साथ वार्ता आरंभ कर दी।

1919 में अफ़ग़ानिस्तान ने विदेशी ताकतों से एक बार फिर स्वतंत्रता पाई। आधुनिक काल में 1933 से 1973 के बाच का काल अफ़ग़ानिस्तान का सबसे अधिक व्यवस्थित काल रहा जब ज़ाहिर शाह का शासन था, पर पहले उसके जीजा तथा बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्तापलट के कारण देश में फिर से अस्थिरता आ गई। सोवियत सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग के लिए देश में कदम रखा और मुजाहिदीन ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और बाद में अमेरिका तथा पाकिस्तान के सहयोग से सोवियतों को वापस जाना पड़ा। 11 सितम्बर 2001 के हमले में मुजाहिदीन के सहयोग होने की खबर के बाद अमेरिका ने देश के अधिकांश हिस्से पर सत्तारुढ़ मुजाहिदीन (तालिबान), जिसको कभी अमेरिका ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने में हथियारों से सहयोग दिया था, के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

फरवरी 2007 से देश में नैटो (NATO) की सेनाएं बनी थीं और देश में लोकतांत्रिक सरकार का शासन था जो आज समाप्त हो गया।

अफगानिस्तान का इतिहास -1, अवगाहन से अफगान और अफगानिस्तान - संजय तिवारी

Posted: 16 Aug 2021 03:13 AM PDT

 

एक भूभाग अवगाहन के लिए। जहां श्रुति, स्मृति, शास्त्र, उपनिषद आदि मानव संविधान का अवगाहन किया जाता हो। अध्ययन और अध्यापन किया जाता हो। मानव सभ्यता के लिए संवैधानिक अवगाहन स्थल। अफ़गानिस्तान का आधुनिक देवनागरीकरण है अफ़ग़ानिस्तान ) इस्लामी गणराज्य दक्षिण एशिया में अवस्थित देश है, जो विश्व का एक भूूूू-आवेष्ठित देश है। वैदिक सनातन साहित्य में वर्णित जम्बू द्वीप का एक प्रमुख भूभाग।

फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं। अफ़्ग़ानिस्तान का नाम अफगान और स्थान या (स्तान )जिसका मतलब भूमि होता है से लकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है अफ़गानों की भूमि। स्थान या (स्तान) भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत का शब्द है- पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाख़स्तान, हिन्दुस्तान इत्यादि जिसका अर्थ है भूमि या देश। यहां सभी मे थ का उच्चारण दोष त हुआ है। अफ़्गान का अर्थ यहां के सबसे अधिक वसित नस्ल (पश्तून) को कहते है। अफ़्गान शब्द को संस्कृत अवगान से निकला हुआ माना जाता है। ध्यान रहे की "अफ़्ग़ान" शब्द में ग़ की ध्वनी है और "ग" की नहीं। "स्तान" का अर्थ है स्थान या भूमि। अफगानिस्तान का अर्थ है अफगानों की भूमि। शब्द "स्तान" का उपयोग कुर्दिस्तान और उज़बेकिस्तान के नामों में भी किया जाता है। अफगानिस्तान नाम अफ्गान समुदाय की जगह के रूप में प्रयुक्त किया गया है, यह नाम सबसे पहले 10 वीं शताब्दी में हूदूद उल-आलम (विश्व की सीमाएं) नाम की भौगोलिक किताब में आया था इसके रचनाकार का नाम अज्ञात है। साल 2006 में पारित देश के संविधान में अफगानिस्तान के सभी नागरिकों को अफ्गान कहा गया है जो अफगानिस्तान के सभी नागरिक अफ्गान है। अप्रैल 2007 में अफगानिस्तान सार्क का आठवाँ सदस्य बना था। अफगानिस्तान के पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।यह रेशम मार्ग और मानव प्रवास का एक प्राचीन केन्द्र बिन्दु रहा है। पुरातत्वविदों को मध्य पाषाण काल ​​के मानव बस्ती के साक्ष्य मिले हैं। पश्चिमी इतिहासकारों के अनुसार इस क्षेत्र में नगरीय सभ्यता की शुरुआत 3,000 से 2,000 ई.पू. के रूप में मानी जा सकती है। हालांकि सनातन वैदिक हिन्दू साहित्य में यह आर्यावर्त और जम्बू द्वीप का प्रमुख भाग रहा है।

यह क्षेत्र एक ऐसे भू-रणनीतिक स्थान पर अवस्थित है जो मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति से जोड़ता है। इस भूमि पर कुषाण, हफ्थलिट, समानी, गजनवी, मोहमद गौरी, मुगल, दुर्रानी और अनेक दूसरे प्रमुख साम्राज्यों का उत्थान हुआ है। प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है। इनमें सिकन्दर, फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह सिख साम्राज्य इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ़गानिस्तान पर आक्रमण किया।

अफ़गानिस्तान के प्रमुख नगर हैं- राजधानी काबुल, कन्धार (गन्धार प्रदेश) भारत के प्राचीन ग्रन्थ महाभारत में इसे गन्धार प्रदेश कहा जाता था। यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं। यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है।

अफ़गानिस्तान का उत्थान स्वरूप अवश्य जानना चाहिए। अफ़ग़ानिस्तान चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ है और इसकी सबसे बड़ी सीमा पूर्व की ओर पाकिस्तान से लगी है। इसे डूरण्ड रेखा भी कहते हैं। केन्द्रीय तथा उत्तरपूर्व की दिशा में पर्वतमालाएँ हैं जो उत्तरपूर्व में ताजिकिस्तान स्थित हिन्दूकुश पर्वतों का विस्तार हैं। अक्सर तापमान का दैनिक अन्तरण अधिक होता है। 1934 में लीग आफ नेशन का सदस्य हुआ 1945 में है संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हुआ।

अफ़ग़ानिस्तान में कुल 34 प्रशासनिक विभाग हैं। वस्तुतः ये प्रांतीय इकाइयां हैं। इनके नाम हैं - बदख़्शान, बदगीश बाग़लान, बाल्क़, बमयन ,दायकुंडी फ़राह, फ़रयब, ग़ज़नी, ग़ोर, हेलमंद, हेरात, ज़ोजान, क़ाबुल, कांदहार (कांधार), क़पिसा, ख़ोस्त, कोनार, कुन्दूज, लगमान, लोगर, नांगरहर, निमरूज़ ,नूरेस्तान ओरुज़्ग़ान, पक़्तिया, पक़्तिका, पंजशिर, परवान समंगान, सरे पोल, तक़ार, वारदाक़, ज़बोल।


क्रमशः।।

संजय तिवारी 
संस्थापक - भारत संस्कृति न्यास 
वरिष्ठ पत्रकार 


राष्ट्रवादी लेखक संघ द्वारा आयोजित 'कविता-वैचारिकी' की 24 वीं शृंखला सफलतापूर्वक संपन्न।

Posted: 16 Aug 2021 02:54 AM PDT

 



कविता में वह शक्ति है जो निर्जीव वस्तुओं में भी प्राण फूँक सकती है।


राष्ट्रवादी लेखक संघ द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगाँठ के अवसर पर कविता वैचारिकी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में आजादी के संघर्ष में गीतों कविताओं के योगदान को कवि एवं साहित्यकारों द्वारा प्रखरता से रखा गया।

मुख्य अतिथि के रुप में बोलते हुए भारत लेखक संघ के अध्यक्ष डॉ. संदीप अवस्थी ने कहा कि साहित्य ने वातावरण का निर्माण किया, तो देश को आजादी मिली लेकिन आजाद भारत में राष्ट्रवादी रचनाकारों को चुन-चुन कर किनारे कर दिया गया। महान् शुंगवंश, गुप्त वंश और मौर्य वंश को परे रखकर मुगल शासन का यशोगान भारत के इतिहास में किया गया। गलत इतिहास पढ़ा कर देशवासियों का मान-मर्दन करने की कोशिश की गयी। अब समय आ गया है कि अकादमिक संस्थाओं में बैठे नकारात्मक प्रवृति के लोगों को किनारे किया जाए। आजाद, सुभाष, भगत, सावरकर, तिलक जैसे राष्ट्रीय नायकों के आदर्श को आगे रखा जाए। देशभक्ति के गीतों को नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने का प्रयास भी होना चाहिए। भूलना नहीं चाहिए कि आजादी की लड़ाई में राष्ट्रवादी काव्यधारा ने प्राण फूँकने का अप्रतिम कार्य किया है। वंदे मातरम् नारे ने युवाओं के मन को अग्निमा प्रदान की थी। भगत सिंह का प्रिय गीत 'मेरा रंग दे बसंती चोला', दिनकर की कविता 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' सहित तमाम कविताएं आजादी की लड़ाई का तराना बन गई थीं।

लंदन के प्रसिद्ध संस्कृति कर्मी नीलेश जोशी (अध्यक्ष, सनातन शक्ति) ने विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि भारत में 133 करोड़ की बड़ी संख्या है। यहाँ राष्ट्रवाद की ज्वालामुखी धधकाई जा सकती है, लेकिन अफसोस कि सनातनी आज भी सोए हुए हैं। उन्होंने सन 1928 में माधव शुक्ला द्वारा लिखित कविता 'मेरी माता के सर पर ताज रहे' का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे तमाम गीत ग्राम्य-अंचल में रचे गए, जो आजादी की लड़ाई का हिस्सा भी बने, लेकिन आजादी मिलने के बाद बड़े कद वालों का कद घटाया गया और बौने कद वालों का कद बढ़ा दिया गया। वीर सावरकर, पटेल, भगत, राजगुरु , आजाद , सुभाष, लाहिडी को भरसक भुलाने की कोशिश राजनैतिक रूप से हुई। उन्होंने कहा कि मुझे भारत की धरती पर नाज है और साथ ही बल दिया कि हम हिंदू नहीं, सनातनी हैं। हिंदू शब्द तो बाइबिल ग्रंथ से सत्ता की चाल में निकाला गया था।

अतिथि वक्ता रामायण केंद्र भोपाल के निदेशक डॉ राजेश श्रीवास्तव ने कहा कि रचनाकारों ने स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी है। हमें अपनी दिशा का निर्धारण स्वयं करना होगा। समय को देखकर दृष्टि नहीं बदलनी चाहिए बल्कि संविधान और संवैधानिक व्यवस्था का पालन करना चाहिए। आजादी बहुत बड़ी नेमत है, तभी तो तुलसी बाबा ने 'पराधीन सपनेहु सुख नाहीं' लिखा था। इसके अलावा पै धन चलि जात विदेश इहै अति ख्र्वारी (भारतेंदु), 'जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है' (मैथिली शरण गुप्त) 'मुझे तोड़ लेना वनमाली' (माखन लाल चतुर्वेदी), एक घड़ी की परवशता भी कोटि नरक से भारी है (रामनरेश त्रिपाठी), अरुण यह मधुमय देश हमारा (जयशंकर प्रसाद), विजयी विश्व तिरंगा प्यारा (श्याम लाल पार्षद), एक शीश मेरा मिला लो(सोहनलाल द्विवेदी) तथा शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले लिखकर जगदंबा प्रसाद मिश्र ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को आत्मिक बल प्रदान किया था।

सारस्वत वक्ता डॉ. राजेश्वर उनियाल ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि गोरे की जगह पर काले बैठ जाएं, यह स्वतंत्रता संग्राम का उद्देश्य नहीं था। 700 वर्षों में जो खोया उसे वापस पाने का उद्देश्य था, किंतु भारत माता के पुत्रों ने सत्ता के लिए देश को ही बांट दिया। 1946 में विभाजन के मुद्दे पर हुए मतदान में भारत के 86% लोगों ने पाकिस्तान के पक्ष में जाने के लिए मत दिया था, लेकिन जब बंटवारा हुआ तो 10% से ज्यादा लोगों को जाने ही नहीं दिया गया। देशवासियों ने आजादी का सपना देखा था, लेकिन राजनेताओं ने सत्ता को ही ध्येय मान लिया। सत्ता पाने के बाद किया यह कि भारत के छ लाख गांवों में दो लाख वैदिक परंपरा के विद्यालय थे। उनको खत्म कर दिया गया। नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करके पुस्तकालय में आग लगा दी गई जो 6 महीने तक जलती रही। तक्षशिला तो हमारे अधिकार में ही नहीं रह गया।

क्षोभ की बात यह कि आजादी से पहले साहित्यकारों पत्रकारों की जो भूमिका रही, वह आजादी के बाद बदल गयी। कविता वैचारिकी के इस कार्यक्रम में देशभर के चुने हुए चार कवियों ने राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत अपनी रचनाओं का पाठ किया और वाहवाही लूटी। कवि गुरु अमिताभ मिश्र ने देश के काम आने वाले शहीदों को अर्पित अपनी रचना में पढा कि -'प्राण देकर बचाया वतन, उन शहीदों को भूल न जाना। शीश पर जिसने बांधे कफन। उन शहीदों को भूल न जाना।।

डीआरडीओ दिल्ली में वैज्ञानिक श्रीमती आशा त्रिपाठी कानपुर के श्री आदित्य विक्रम और लखनऊ के श्री अनूप नवोदयन ने राष्ट्रवादी भावनाओं से भरी हुई रचनाएँ राष्ट्र के नाम समर्पित करते हुए सुनाईं, जो बहुत सराही गईं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कमलेश कमल ने आज के विषय की प्रासंगिकता और तदनुरूप वक्ताओं के विचारों को प्रासंगिक और सुग्राह्य बताया । उन्होंने कविता वैचारिकी के अंतर्गत कवियों की रचनाओं की प्रशंसा की और कहा कि राष्ट्रवादी लेखक संघ द्वारा इस भावधारा के रचनाकारों को प्राथमिकता देने का काम किया जाएगा।

कार्यक्रम का सफल संचालन राष्ट्रवादी लेखक संघ की प्रकाशन प्रमुख हेमा जोशी ने किया और कहा कि देश की विषम परिस्थितियाँ एक कवि के अंतर्मन को निरंतर मथती हुई बेचैन कर देती हैं और वह अपने भीतर के कवि-सृष्टा को संबोधित करते हुए कह उठता है- 'हो उठे ज्वालामुखी सा तप्त, हिमगिरि का हिमांचल। आग की लपटें बिछा दे, व्योम जग में इंदु चंचल।' कहना न होगा कि ये क्रांतिकारी और स्वातंत्र्य चेतना से संम्पन्न विद्रोही कवि ही अपनी लेखनी से माँ भारती के सेवा करने वाले सच्चे सपूत हैं। अतिथियों का स्वागत राष्ट्रवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव अनूप कुमार नवोदय ने किया। संस्थापक न्यासी आदित्य विक्रम श्रीवास्तव ने सभी अभ्यागत वक्ताओं और रचनाकारों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। ऑनलाइन आयोजित इस गोष्ठी में डॉ.अखिलेश्वर मिश्र, डॉ. धर्मेंद्र सिंह तोमर, डॉ. रघुनाथ पांडेय, धर्मेंद्र जिज्ञासु, विनीत पार्थ (पाठक मंच रा.ले.सं.), अरविंद मौर्या, सहित भारी संख्या में न्यासी और गणमान्य जन उपस्थित रहे।


राष्ट्रवादी लेखक संघ

स्वदेशी जागरण मंच जिला शिवपुरी ने मनाया स्वतंत्रता दिवस समारोह

Posted: 15 Aug 2021 09:16 AM PDT

 

स्वदेशी जागरण मंच जिला शिवपुरी द्वारा ने लाल माटी स्थित मदर टेरेसा पब्लिक स्कूल पर ध्वजारोहण कर स्वतन्त्रता दिवस का कार्यक्रम किया। कार्यक्रम के दौरान स्वदेशी जागरण मंच के प्रांतीय संघर्ष वाहिनी प्रमुख सुरेश दुबे नें बताया कि स्वदेशी उत्पाद अपनाने से ही देश को आर्थिक महाशक्ति बनाया जा सकता है स्वतंत्रता आंदोलन के समय जब विदेशी उत्पादों का बहिष्कार किया तो विदेशी आयात घट कर आधा हो गया था जिससे देश मे रोजगार का सृजन हुआ जिससे छोटे बुनकर व किसानों की आय बढ़ी। स्वदेशी जागरण मंच के विभाग संयोजक राकेश शर्मा ने कहा कि यदि स्वतन्त्रता के मूल उद्देश्य को पूरा करना है तो स्वदेशी उत्पाद को अपनाकर ही हम इसे पूरा कर सकते हैं।आजादी की लड़ाई में गांधीजी ने भी स्वदेशी उत्पादों को अपनाकर स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी थी। स्वदेशी जागरण मंच के नगर सयोजक गजेंद्र शिवहरे ने स्वदेशी जागरण मंच के उद्देश्य की व्याख्या के साथ स्वतंत्रता दिवस पर स्वदेशी नारों का जय घोष कराया। नगर सह संयोजक शत्रुघन तोमर के द्वारा आभार व्यक्त किया गया।

इस अवसर पर प्रांतीय संघर्ष वाहिनी प्रमुख सुरेश दुबे, विभाग संयोजक राकेश शर्मा, जिला संयोजक जगदीश पाराशर, जिला सह संयोजक प्रमोद मिश्रा, महेश भार्गव, नगर संयोजक गजेंद्र शिवहरे, नगर सह संयोजक शत्रुघन तोमर, नगर विचार प्रमुख नरेंद्र शर्मा, नगर सह विचार प्रमुख रवि राठौर, जॉइन स्वदेशी जिला संपर्क प्रमुख कृष्णकांत भार्गव, दुर्गेश गौड़, प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य दिवाकर शर्मा उपस्थित रहे ।

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