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Monday, November 29, 2021

दिव्य रश्मि न्यूज़ चैनल

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देशरत्न डॉ.राजेन्द्र प्रसाद

Posted: 29 Nov 2021 04:45 AM PST

देशरत्न डॉ.राजेन्द्र प्रसाद

   विभूति सादगी के


किया सुशोभित देशऱत्न
प्रथम राष्ट्रपति के ऊँचे पद
मुस्कान भरी मुखमंडल पर
अंकुरित  न  हो  सके  'मद
वो  सरल सादगी  के मूरत
भारत  माँ  के  प्यारे  फूल
तिलक लगाए जमीं के धूल
सेवाभाव  की  महक खुब!
फिजाऔ में  है  फैल  रही
सूरज चाँद  सितारे  हवाएँ
समर्पण  की है गवाह बनी
स्वतंत्र भारत के ध्वज हाथ
लिये जन मन संग फहरायी
दिखा दिया सादगी की शान
दुनिया वालों कर ले पहचान
शोभा  पा  रही  राष्ट्रीय चमन
देशरत्न  तुझे शत-शत नमन।
 अश्रुपूरित  हुई  भींगी  नयन
 प्रेरणास्पद रहेगी सदा जीवन।
         डॉ.इन्दु कुमारी
                मधेपुरा बिहार
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जम्बूद्वीप और भारतवर्ष

Posted: 28 Nov 2021 10:55 PM PST

जम्बूद्वीप और भारतवर्ष

सत्येन्द्र कुमार पाठक पुरणों एवं संहिताओं में जम्बूद्वीप का वर्णन किया गया है ।जम्बूद्वीप के मध्य भाग में 84 हजार योजन ऊँचाई और शिखर की चौड़ाई 32 हजार योजन तथा 16 हजार योजन विस्तारित युक्त मेरुपर्वत के दक्षिण में हिमवान , हेमकूट , निषध पर्वत , उत्तर में नीलश्वेत श्रृंगवान गिरि है । मेरु के दक्षिण में भारतवर्ष , उत्तर में किंपुरुष वर्ष , हरिवर्ष रम्यक वर्ष ,दक्षिण में हिरण्यवर्ष ,उत्तरकुरु वर्ष के मध्य में इला वर्ष है । मेरु पर्वत के चारो ओर वर्ष और पूर्व में मंदराचल , दक्षिण में गंधमादन पश्चिम में विपुल एवं उत्तर में सुपार्श्व पर्वत है । जम्बूद्वीप में भारत ,केतुमाल ,भद्राश्व ,और कुरु वर्ष है । केतुमाल वर्ष में वराह , भद्राश्व वर्ष में हयग्रीव ,भारतवर्ष में कच्छप और उत्तर कुरु में मत्स्य भगवान विष्णु का अवतार की उपासना करते है ।भारतवर्ष में महेंद्र , मलय ,सहय , शुक्तिमान ,ऋक्ष , विंध्य और पारियात्र कुल पर्वत है । भारतवर्ष के राजा भरत की संतान रहते है । भारतवर्ष में इंद्र द्वीप ,कसेतु द्वीप ,ताम्र द्वीप ,गभस्ति द्वीप ,नागद्वीप ,सौम्य द्वीप ,गंधर्व द्वीप ,वरुण द्वीप है । जम्बूद्वप के देशों में हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष का स्‍थान को चीन , नेपाल और तिब्बत शामिल है । 1934 में हुई उत्खनन में चीन के समुद्र के किनारे बसे प्राचीन शहर च्वानजो में 1000 वर्ष से प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्जन से अधिक खंडहर मिले हैं। चीन , नेपाल , तिब्बत , भूटान , भारत का अरुणाचल , सिक्कम , लद्दाख , लेह और वर्मा का क्षेत्र प्राचीन काल में हरिवर्ष कहलाता था । हजार वर्ष पूर्व सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फूच्यान प्रांत में मंदिर थे । त्रिविष्टप ( तिब्बत ) में देवलोक और गंधर्वलोक था। 500 से 700 ई . पू . चीन को महाचीन एवं प्राग्यज्योतिष कहा जाता था । आर्य काल में संपूर्ण क्षेत्र हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष नाम से प्रसिद्ध था। महाभारत के सभापर्व में भारतवर्ष के प्राग्यज्योतिष पुर प्रांत का उल्लेख है। इतिहासकार के अनुसार प्राग्यज्योतिष को असम को कहा जाता था। प्राग्ज्योतिषपुर का असुर राजा नरका सुर था । रामायण बालकांड (30/6) में प्राग्यज्योतिष की स्थापना का उल्लेख है। विष्णु पुराण में प्राग्ज्योतिषपुर को कामरूप , किंपुरुष है। रामायण काल से महाभारत कालपर्यंत असम से चीन के सिचुआन प्रांत तक के क्षेत्र को प्राग्यज्योतिष था। जिसे कामरूप कहा गया था । चीनी यात्री ह्वेनसांग और अलबरूनी के समय तक कभी कामरूप को महाचीन कहा जाता था। अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य ने 'चीन' शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए किया है। कामरूप या प्राग्यज्योतिष प्रांत प्राचीनकाल में असम से बर्मा, सिंगापुर, कम्बोडिया, चीन, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा में 5123 वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण प्रवास किये थे । महाभारत 68, 15 के अनुसार कृष्ण काल में प्राग्ज्योतिषपुर का राजा शिशुपाल ने द्वारिका को जलाया था । चीनी यात्री ह्वेनसांग (629 ई.) के अनुसार कामरूप पर कुल-वंश के 1,000 राजाओं का 25,000 वर्ष तक का शासन किया। महाचीन चीन और प्राग्यज्योतिषपुर कामरूप है । यह कामरूप भी अब कई देशों में विभक्त हो गया। मंगोल, तातार और चीनी लोग चंद्रवंशी हैं। कर्नल टॉड की पुस्तक राजस्थान का इतिहास। एवं पंडित यदुनंदन शर्मा की पुस्तक वैदिक संपति और हिंदी शब्द कोष के अनुसार तातार के लोग अपने को अय का वंशज कहते हैं ।राजा पुरुरवा की पत्नी उर्वशी का पुत्र आयु था। पुरुरवा कुल में कुरु और कुरु से कौरव हुए है । आयु के वंश में सम्राट यदु और उनका पौत्र हय था। चीनी लोग हय को हयु को पूर्वज मानते हैं। चीन वालों के पास 'यू' की उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि एक तारे (तातार) का समागम यू की माता के साथ होने से यू हुआ। सोम एवं वृहस्पति और तारा पुत्र बुध और इला के समागम है। चीन ग्रंथों के अनुसार तातारों का अय, यू और आयु का आदिपुरुष चंद्रमा था ।
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सोशल मीडिया के समय में पत्रकारिता की चुनौतियां-

Posted: 28 Nov 2021 10:54 PM PST

सोशल मीडिया के समय में पत्रकारिता की चुनौतियां- 

मनुज बली नहीं होत है समय होत बलवान- यह कहावत आज के कुछ स्वनामधन्य तथाकथित मूर्धन्य पत्रकारों पर बड़ी खूबसूरती से लागू होता है। राजदीप, पुण्य प्रसून वाजपेयी, बरखा दत्त, प्रोनोय रॉय, अजीत अंजुम, निधि, सागरिका घोष, रविश कुमार जैसे जाने कितने तिनके जो सत्ता की चादर लपेट कर बलिष्ठ काष्ठ का अनुभव कराते थे अचानक ही परिदृश्य से विलीन हो गए। ये वो पत्रकार थे जिनके इशारे पर भारतीय मंत्रिपरिषद में मंत्री चुने जाते थे, शर्त बस इतनी थी कि सरकार के विरुद्ध जाने वाली हर खबर दबा दी जाए या ऐसे प्रस्तुत की जाए मानो ये कोई बड़ी बात नहीं, हर देश में ऐसा होता है। देश की संसद में सन 2012 में तत्कालीन रक्षामंत्री का दिया भाषण जहां उन्होंने कहा था कि देश के पास गोली ख़रीदने के भी पैसे नहीं है कुछ ऐसे प्रस्तुत किया गया मानो हमे कौन सा किसी से लड़ने जाना है जो गोली बारूद खरीदने के आइए कष्ट उठाएं। राफेल का तो चिंतन भी कष्टसाध्य था। जब 2008 में चीन ने हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर 28 KM अंदर तक घुसपैठ की तो तब के प्रधाममंत्री मनमोहन सिंह ने विचार दिया कि सीमा पर ऐसे छोटे मोटे अतिक्रमणों को हमेह अनदेखा करना चाहिए अन्यथा हम चीन को नाराज़ कर सकते हैं। पुनः इन स्वनामधन्य पत्रकारों ने इसे मुद्दा नहों बनाया और अपने प्रश्न पूछने के अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया। यही नहीं जब 15 मई 2014 को लोकसभा के परिणाम घोषित हो गए और यह सुस्पष्ट था कि वर्तमान सरकार ने बहुमत खो दिया है तब भी 25 मई को स्वर्ण आयात निर्यात कानूनों को बदल गया जिसने नीरव मोदी और मेहुल चौकसी कांड को जन्म दिया। ज्ञात हो कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 26 मई को देश को सत्ता संभाली थी। अफसोस है कि ये तथाकथित पत्रकार इस मुद्दे को उठाना ही भूल गए। देश की संसद के ऊपर सन 2004 से 2014 तक  NAC नामक एक संस्था बनाकर देश के प्रधान मंत्री के पद को गौण कर दिया गया पर इनकी कलम सत्ता की चाकरी में ही व्यस्त रही। किसी ने नहीं पूछा कि सोनिया गांधी किस हैसियत से संसद से उपर हो गयी। देश मे आने वाले विदेशी मेहमानों के सामने मैन मोहन सिंह को दोयम दर्जे का स्थान मिलता रहा और सोनिया प्रमुखता पाती रहीं पर ये बोलने के अधिकारों के तथाकथित संरक्षक अपनी जुबान या कलम नहीं हिला पाए। एक पत्रकार तो इतने आगे बढ़ गए कि उन्होंने बाकायदा केजरीवाल को ट्यूशन दी कि सेट कैसा होना चाहिए और उन्हें क्या बोलना चाहिए। केजरीवाल तो खैर काबिज हो गए पर इन महोदय का तंबू उखड़ गया। नतीजन आज नेटीजन इन्हें "बहुत क्रांतिकारी" कह कर इनका उपहास करते हैं और इनके पास दांते निपोरने के अलावा कोई और कार्य नहीं है। एक सज्जन तो अपनी जमी जमाई दुकान छोड़कर राजनीति में घुस गए पर वहां से भी कुत्ते की तरह दुत्कारे गए और आजकल विभिन्न चैनलों पर सरकार के विरोध में अपना झंडा बुलंद किये रहते हैं। आखिर इन 7 वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि ये इस स्थिति में पहुंच गए। इसके दो प्रमुख कारण हैं - प्रथम सत्ता ने इनके साथ मलाई बांटना बैंड कर दिया है अन्य प्रमुख कारण इन लोगों का हिन्दू विरोधी और मुस्लिम समर्थक होना रहा है। अपने इस चिंतन जिसे ये सेकुलरिज्म का नाम देते हैं में ये इतने घुस गए कि ये हिन्दू विरोधी होते होते भारत विरोधी बन गए। पाकिस्तान इन सभी का प्रिय देश बन गया और इस्लामी आतंकवादी इन्हें हमेशा किसी गरीब हेडमास्टर का बेटा मिला। ऐसा भी नहीं है कि ये इस बात को जानते या समझते नहीं पर अपनी आदत में सुधार करना इन्हें गंवारा नहीं है अन्यथा अमेरिका जैसे आबादी के हिसाब से छोटे से देश मे 6.5 लाख मौतों की खबर न दिखाकर ये भारत में हुई मौतों को श्मसान से लाइव टेलीकास्ट करते रहे ताकि वर्तमान सरकार की बदनामी हो। मनुष्य को अक्सर ये भ्रम हो जाता है कि वो बडा ताकतवर है इस कारण से एक पत्रकार अमेरिका तक मे हाथापाई पर उतर जाता है और भारत मे एक चोर की पिटाई को हिन्दू मुस्लिम विद्वेष से जोड़ देता है। अगर आप भारत के समाचारों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि हर समाचार को ये पत्रकार भारत की निवर्तमान सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं।
यहां उद्देश्य वर्तमान सरकार का बचाव नहीं अपितु पत्रकारिता के उच्च मानदंडों का रक्षण है जहाँ ऐसा न प्रतीत हो कि संवाददाता अपने पूर्वाग्रहों के वशीभूत होकर रिपोर्टिंग कर रहा है। सरकार की आलोचना हर पत्रकार का  कर्तव्य है पर यह आलोचना व्यक्तिपरक न होकर वस्तुपरक होनी चाहिए। एक मूर्धन्य पत्रकार ने सबके सामने माना कि उसने सन 2002 में हुई गुजरात हिंसा के लिए व्यर्थ हो नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया। पर इतना मात्र कह देने से ही तो इति नहीं हो जाती। जानबूझकर की गई गलती को क्षमा नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया के आविर्भाव के साथ ही समाचारों में परोसा गया हर झूठ पकड़ा जाने लगा है। अब आप गलत समाचार परोसकर भाग नहीं सकते। अब हर जागरूक नागरिक के पास अब आवाज़ है और वो खुद एक पत्रकार है। 
अगर पत्रकारिता को अपनी साथ बचानी है तो उसे सत्य के साथ चाहे वो कितना भी अप्रिय क्यों न हो, खड़ा होना ही पड़ेगा। आखिरकार पत्रकारिता को प्रजातंत्र का प्रहरी यूँ ही तो नहीं कहा गया है।
-मनोज कुमार मिश्र
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हिंदू जीवन पद्धति तथा पर्यावरण

Posted: 28 Nov 2021 08:47 PM PST

हिंदू जीवन पद्धति तथा पर्यावरण

हिंदू जीवन पद्धति तथा पर्यावरण पर चर्चा करने से पूर्व हमें जानना होगा कि हम कौन हैं? आदिकाल से सुनते आए हैं कि हम सनातनी हैं यानी हमारा धर्म और संस्कृति सनातन है। सनातन अर्थात कभी नष्ट न होने वाला। हम हिंदू हैं, हम हिंदुस्तान के रहने वाले हैं। प्रश्न आता है हिंदू कौन है? क्या भारत में रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिंदू है? हिंदू धर्म व संस्कृति क्या है? हिंदू की जीवन पद्धति क्या है? और हिंदू का पर्यावरण से क्या संबंध है? यह सब समझने के लिए पहले हिंदू के सम्बन्ध में यह समझें--

हिंदू मात्र धर्म नहीं है, भारतीय की पहचान यही है,
उदारमना सारी दुनिया में, मानवता की शान यही है।
सब धर्मों का आदर करना, हिंदू का अभिमान यही है,
वसुधैव कुटुंब है अपना, हिंदुत्व की जान यही है।


भूख गरीबी अत्याचार, सूखा भूकंप बाढ़ अपार,
हिंदू कभी न माने हार, हिंदू का जीवन आधार।
करे समर्पण हिंदू सब कुछ, सदा सनातन के चरणों में,
पाया तो प्रभु की कृपा है, खोया तो अपनी गलती है।
वेद ऋचाएं आज भी जग में, ज्ञान का सबको मार्ग दिखाती,
क्या है सृष्टि और ब्रह्मांड में, युगो युगो से यह बतलाती।
गीता का संदेश जहां को, सदा सदा से बतलाता है,
कर्म है करना फल नहीं इच्छा, हिंदू को बस यही भाता है।


हर रज कण में वास है ईश्वर, चर अचर सम्मान उसे है,
नदी तालाब वृक्षों से जीवन, प्रकृति का ज्ञान जिसे है।
पूर्व जन्म में विश्वास करें, और गायों का भी मान करें,
नदियों को माता सा पूजें, हिंदू पर अभिमान मुझे है।


सृष्टि के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के बृहस्पति अग्यम में आया है -


हिमालयं समारभ्, यावद् इन्दूसरोवरं।
तं देवनिर्मितं देशं, हिंदुस्थानं प्रचक्षते।।


अर्थात हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं। और शैव ग्रंथों में कहा गया है कि हिंदू कौन है?


हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।


अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिंदू कहते हैं।
हिंदू की व्याख्या करते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं


"यदि कोई हिंदू आध्यात्मिक नहीं है तो मैं उसे हिंदू नहीं मानता।"


अर्थात हिंदू होने के लिए धर्म अध्यात्म ही आधार है। पुनः प्रश्न आता है कि आखिर धर्म क्या है? हम कहते हैं कि हमारा धर्म सनातन है। हमारी संस्कृति सनातन है। हम हिंदू हैं जिसका उल्लेख ऋग्वेद से लेकर सभी ग्रंथों में पाया जाता है। सनातन धर्म व संस्कृति को मानने वालों को हिंदू कहा गया है। और धर्म--


सत्य अहिंसा पवित्रता दान व संयम
गुणों का नाम धर्म है।
सभ्यता का अंतरिक्ष
सामाजिक संगठन की आत्मा धर्म है। परमात्मा को खोजता जो
जीवन जिसको धारण करता धर्म है। नियमों का पालन धर्म है।
प्रकृति का संरक्षण धर्म है।
मानवता स्वमेव धर्म है।


धर्म शब्द ही जीवन का आधार है। व्यक्तिगत- सामाजिक, लौकिक- परालौकिक, दैहिक- बौद्धिक, मानसिक- शारीरिक- आत्मिक यानी सभी क्षेत्रों को सुखी बनाने के लिए जो नियम बनाए जाते हैं उन्हें ही धर्म कहते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने उपरोक्त धर्म को ही हिंदू जीवन पद्धति में ढालते हुए भू गगन वायु अग्नि नीर पंच तत्वों को सनातन संस्कृति से जोड़कर हिंदू जीवन पद्धति का अंग बनाया।
जब हम हिंदू जीवन पद्धति की बात करते हैं तो पाते हैं हिंदू का मतलब है जो वसुधैव कुटुंब को मानने वाला हो तथा मानवता का पोषक हो। यह विचार ही हिंदुत्व है, यही हमारी जीवन पद्धति है। हमने आकाश को पिता और धरती को माता कहकर सम्मान दिया है। सूर्य चंद्रमा जल वायु वृक्ष पर्वत सभी को पूजनीय व वंदनीय माना गया है।
आदिकाल से हमने प्रकृति के संरक्षण व संवर्धन की बात की है। सनातन धर्म में भू गगन वायु अग्नि व नीर पंच तत्वों को ही भगवान माना है। भू+ गगन+ वायु+ अग्नि+ नीर= भगवान। सृष्टि के प्रत्येक राज कण में भगवान का वास माना गया। और केवल माना ही नहीं अपितु उसके पालन-पोषण संवर्धन व संरक्षण को भी हिंदू धर्म से जोडा। हमारे ऋषि-मुनियों ने गहन अध्ययन किया और हिंदू जीवन पद्धति को धर्म अध्यात्म से जोड़ते हुए सृष्टि के प्रत्येक रज कण के महत्व को जीवन पद्धति बना दिया।
प्रश्न फिर भी है कि हिंदू धर्म व जीवन पद्धति क्या है?
शास्त्रों में कहा गया है "जो धारण करने योग्य हो, वह धर्म है।" धारण करने योग्य क्या है? सर्वप्रथम प्रकृति, मानवता, अतिथि देवो भव: की परंपरा, वसुधैव कुटुंब की कल्पना, सर्वे संतु निरामया की अवधारणा, पशु पक्षियों के प्रति दया भाव ही धारणीय है।
हिंदू जीवन पद्धति में वह सब समाहित किया गया जो श्रेष्ठ है। चूल्हे पर रोटी बनाते समय पहला टुकड़ा अग्नि को, पहली रोटी गाय को, अंतिम रोटी कुत्ते को, तुलसी पीपल बरगद आंवला शमी आदि सभी वृक्षों की पूजा, भूखे को भोजन, गरीबों को दान, पशुओं को चारा, परिंदों को दाना, चींटी को आटा, नदी तालाब, ताल तलैया के आसपास साफ-सफाई व पूजा हमारी जीवन पद्धति है।
अब बात आती है पर्यावरण की, पर्यावरण क्या है?
पर्यावरण का अर्थ परि + आवरण, अर्थात चारों ओर से घिरा हुआ। नदी तालाब पहाड़ मैदान खेत खलियान पेड़-पौधे जीव जंतु सभी हमारे पर्यावरण के घटक हैं। हमारे चारों ओर सौंदर्य फैला है। मन को प्रसन्न करने वाले पेड़ पौधे, रंग-बिरंगे पुष्प, स्वच्छ वायु, निर्मल शीतल जल लहलाती फसलें, गीत गाते परिंदे, रंग बिरंगी तितलियां- कीट पतंगे यह सभी प्रकृति के अद्भुत श्रंगार हैं। लेकिन हम सब यह तब ही देख पाएंगे जब हमारी आत्मा निर्मल होगी, हम प्रकृति मय होंगे।
प्रकृति और मानव के बीच होने वाला यह अटूट संबंध ही पर्यावरण का निर्माण करता है।
प्रकृति मानव और पर्यावरण के साथ समन्वय का पाठ गुरु दत्तात्रेय जी ने प्रकृति संरक्षण के रूप में पढ़ाते हुए इसे पर्यावरण बताया।
हिंदू जीवन पद्धति प्रकृति और पर्यावरण की पोषक है। पर्यावरण का तात्पर्य मात्र वृक्ष या प्रकृति का संरक्षण ही नहीं अपितु वाणी तथा सामाजिक प्रदूषण से बचाओ भी पर्यावरण संरक्षण है। वाणी प्रदूषण, असभ्य संवाद, अमर्यादित आचरण हमारे पारिवारिक व सामाजिक पर्यावरण को दूषित करते हैं। इसलिए प्रदूषण से बचाने के लिए विनम्र होने, मधुर शब्दावली का प्रयोग करने तथा सद्आचरण शास्त्रों में बताई गई। और इसी बात हिंदुत्व जीवन पद्धति तथा पर्यावरण का आधार बनाया गया।
जिस दिन भारतवासी हिंदू जीवन पद्धति का अनुसरण करेंगे, उसी दिन से पर्यावरण की समस्या का समाधान हो जाएगा।


डॉ अ कीर्ति वर्धन
विद्या लक्ष्मी निकेतन53- महालक्ष्मी एनक्लेव जानसठ रोड मुजफ्फरनगर 251001
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भाजपा अपने विकास कार्यों के बलबूते 2022 में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाएगी- योगी आदित्यनाथ

Posted: 28 Nov 2021 08:45 PM PST

भाजपा अपने विकास कार्यों के बलबूते 2022 में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाएगी- योगी आदित्यनाथ

• 200 करोड़ की 412 परियोजनाओं का किया लोकार्पण मुख्यमंत्री ने
भाटपार रानी (देवरिया) से संवाददाता वेद प्रकाश तिवारी की खास रिपोर्ट 
भाटपार रानी तहसील क्षेत्र के बहियारी बघेल इंटर कॉलेज के मैदान में विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज 200 करोड़ की 412 परियोजनाओं का लोकार्पण किया। सर्वप्रथम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रघुराज सिंह इंटरमीडिएट कॉलेज के संस्थापक पूर्व विधायक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय रघुराज सिंह प्रतिमा का अनावरण किया तथा उक्त विद्यालय के प्रबंधक, शिक्षक, छात्र-छात्राओं एवं अभिभावकों को धन्यवाद दिया । मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास का रथ रुकने वाला नहीं है । देश में एवं प्रदेश में भाजपा की सरकार होने का लाभ सबको मिल रहा है । यह डबल इंजन की सरकार विकास के पहिया को तेज गति से चला रही है। उत्तर प्रदेश का देवरिया जिला कभी चीनी का कटोरा कहा जाता था लेकिन 2017 के पूर्व की सरकारों ने एक - एक कर सभी चीनी मिलों को बंद करा दिया । देवरिया जिला के हजारों लोग बेरोजगार हो गए लेकिन बहुत जल्द इन चीनी मिलो को प्रारंभ कराने का कार्य भाजपा सरकार कराएगी। छात्रों के पठन-पाठन हेतु स्नातकोत्तर स्तर के छात्रों को बहुत जल्द टेबलेट एवं स्मार्टफोन उत्तर प्रदेश सरकार लगभग एक करोड़ छात्रों को मिलेगा। भाटपार रानी विधानसभा क्षेत्र के लोगों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपील किया कि 2017 में यहां की जनता से जो चूक हुई थी उसको 2022 में जनता पूरा करेगी और इस विधानसभा क्षेत्र में भी भाजपा का परचम लहराएंगी । उन्होंने समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी एक परिवार की पार्टी है । जिस पार्टी में मामा, चाचा, भतीजा बुआ, बहन तक ही यह पार्टी सीमित हो जाती है । लेकिन भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पार्टी है जो समाज के हर तबके को, हर वर्ग को साथ लेकर चलने का कार्य करती है । भाजपा का एक ही नारा है सबका साथ और सबका विकास। आज देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश पूरी तरह से सुरक्षित है । आज भारत का डंका पूरे विश्व बिरादरी में शान से बज रहा है । वैश्विक महामारी कोरोना कॉल में विकट परिस्थितियों में भी देश को संभालने का कार्य देश के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी ने बखूबी किया । आज केवल उत्तर प्रदेश में लगभग 16 करोड लोगों को कोरोना वैक्सीन मुफ्त में लगवाने का कार्य भाजपा सरकार ने किया है। जिस समय कोरोना महामारी चरम स्तर पर थी उस समय सपा, बसपा और कांग्रेस के लोग होम आइसोलेशन में थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी का चाहे वह सांसद हो चाहे विधायक हो चाहे वह कार्यकर्ता हो सबने मिलकर उस परिस्थिति का सामना किया लोगों से संपर्क बनाए रहा । जिसकी देन है कि आज हम सभी इस विशाल जनसभा में उपस्थित हैं । उक्त कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ,उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री जयप्रकाश निषाद , सांसद रमापति त्रिपाठी, सांसद रविंद्र कुशवाहा , जिला पंचायत अध्यक्ष देवरिया, पंडित गिरीश चंद तिवारी, विधायक काली प्रसाद, भाटपार रानी विधानसभा के भाजपा के पूर्व प्रत्याशी जयनाथ कुशवाहा, मदन मोहन मालवीय शिक्षा संस्थान के प्रबंधक राघवेंद्र वीर विक्रम सिंह, पूर्वांचल विकास बोर्ड के सदस्य राजकुमार साहू, विधायक सत्यप्रकाश मणि त्रिपाठी, उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री अनूप गुप्ता, भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष अंतर्यामी सिंह, उत्तर प्रदेश सरकार के दर्जा प्राप्त मंत्र मंत्री नीरज शाही आदि लोगों ने भी सभा को संबोधित किया।
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तलाशती खुद का वुजूद,

Posted: 28 Nov 2021 08:41 PM PST

तलाशती खुद का वुजूद,

तलाशती खुद का वुजूद, खुद को ही तलाश कर,
सृजन कर रही सृष्टि का, खुद को ही तराश कर।
मां बहन बेटी है नारी, प्रेयसी भी वह स्वयं ही बनी,
शक्ति का महापुंज बनी, खुद को ही प्रकाश कर।

तोड़ती वर्जनाओं को वह, स्वयं को संभालती,
गली बड़ी बेड़ियों को तोड, नई राह तलाशती।
मर्यादाओं का पालन, संस्कार संस्कृति की पोषक,
धरा गगन पाताल तक, अस्तित्व को निखारती।


अ कीर्ति वर्द्धन
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दया धर्म का मूल है

Posted: 28 Nov 2021 08:39 PM PST

 

दया धर्म का मूल है

दया भाव जीवो पर रखे दया धर्म का मूल है 
दीन दुखी निर्धन सताना मानव भारी भूल है

दया करें उन लाचारों पर रोगी और बीमारों पर 
जहां बरसा कहर टूटकर हालातों के मारो पर 

आओ जरा संभाले उनको पीड़ा से निकालें उनको 
जिनका सबकुछ लुट चुका बांध सब्र का टूट चुका  

जनसेवा को हाथ बढ़ाना मानवता का उसूल है 
संकट समय साथ निभाना दया धर्म का मूल है

अपनापन अनमोल सलोना स्नेह सुधारस धारा 
प्यार के मोती लुटा जग में बांटें मधुर प्रेम प्यारा

जहां दया और मानवता सुख की गंगा बहती है 
आठों पहर अमृत बरसे सदा भवानी रहती है

जीव जगत से प्रेम निभाए संकट मिटे समूल है 
बेजुबान सब दया के पात्र दया धर्म का मूल है

रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
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शिक्षा की वैदिक दृष्टि

Posted: 28 Nov 2021 08:37 PM PST

शिक्षा की वैदिक दृष्टि

लेखक : - प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
(लेखक वरिष्ठ विचारक हैं)
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के अंतर्गत तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें आठवें और नवम अध्याय को तैत्तिरीय उपनिषद कहा जाता है। इसमें से सातवें अध्याय को उपनिषद में शिक्षा वल्ली के रूप में स्मरण किया जाता है। इस शिक्षा वल्ली का प्रथम अनुवाक मंगलाचरण की तरह है। इसके उपरांत द्वितीय अनुवाक में ऋषि कहते हैं कि हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे। तीसरे अनुवाक में वे इसका प्रयोजन बताते हैं कि इससे गुरु और शिष्य दोनों का ब्रह्मवर्चस और ब्रह्म तेज बढ़ेगा, यशस्वी होंगे और शिक्षा के द्वारा लोकों के विषय में, ब्रह्मांड की ज्योतियों के विषय में, सभी प्रकार की विद्याओं के विषय में, विश्व की समस्त प्रकार की प्रजाओं के विषय में तथा शरीर और उसके स्थूल,सूक्ष्म तथा कारण इन सभी रूपों के विषय में और इस प्रकार लोक, प्रजा, ज्योति, विद्या और जीवात्मा के समस्त स्तरों और रहस्यों के विषय में वर्णन करेंगे।
आगे इसी अध्याय में नौवे अनुवाक में बताते हैं कि स्वाध्याय और प्रवचन के मुख्य फल हैं – ऋत अर्थात कॉस्मिक यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था के नियमों का ज्ञान, सत्य का ज्ञान और सत्य पालन की सामथ्र्य, तप की शक्ति, आंतरिक शांति की सामथ्र्य, इंद्रिय निग्रह की सामथ्र्य, वेदों के पठन पाठन की सामथ्र्य, योग्य संतान प्रजनन की सामथ्र्य, कुटुंब की वृद्धि (प्रजाति) की सामथ्र्य, मनुष्यों के लिए आवश्यक समस्त व्यवहार की सामथ्र्य, यज्ञ की सामथ्र्य और अतिथियों की यथायोग्य सेवा की सामथ्र्य।
समस्त ज्ञान प्रदान कर आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन देते हैं –
"सदा सत्यनिष्ठ रहना, इसमें प्रमाद नहीं करना। धर्ममय ही आचरण करना, इसमें प्रमाद नहीं करना। शुभ कर्मों में कभी प्रमाद मत करना। देव कार्य और पूर्वजों की परंपरा को आगे ले जाने के कार्य में कभी चूक नहीं करना तथा संतति परंपरा गतिमय रखना। ऐश्वर्य की साधना में कभी प्रमाद मत करना और स्वाध्याय तथा ज्ञान विस्तार में कभी चूक नहीं करना। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य मानना (विद्या, आयु, तप और आचरण में श्रेष्ठ व्यक्ति जब घर पर बिना आमंत्रण आ जाएँ, तो वे ही अतिथि कहलाते हैं। आजकल के गेस्ट या मेहमान को अतिथि नहीं कहते।)। जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही आचरण करना। हमारे भी जो सुचरित हैं, अच्छे आचरण हैं, उनका ही अनुसरण करना, अन्य आचरणों का नहीं। जो श्रेष्ठ विद्वान आयें, उन्हे आसन देना, विश्राम देना और श्रद्धापूर्वक दान देना। विवेकपूर्वक संकोच सहित अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देना चाहिए। जब जहां कोई दुविधा या शंका हो, तो उत्तम विचार वाले सदाचारी से परामर्श कर कर्तव्य का निश्चय करना। यही आदेश है। यही उपदेश है।"
शिक्षा वल्ली के बाद आगे ब्रह्मानन्द वल्ली है और भृगु वल्ली है। शिक्षा वल्ली में वर्णित पुरुषार्थों को सम्पन्न कर चुके व्यक्ति में ही ब्रह्मानन्द की साधना और ज्ञान की सामथ्र्य आती है, अन्य में नहीं। वस्तुत: ब्रह्मानन्द का संबंध परा विद्या से है। तृतीय मुंडक में द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया वाला प्रख्यात मंत्र है जो आत्मा और परमात्मा संबंधी प्रभावशाली विवेचना है। इसलिए योग विद्या ही परा विद्या का मूल आधार है जिसके अनंत भेद या रूप संभव हैं। अत्यंत प्राचीन काल से भारत में यह ज्ञान था कि ज्ञान अनंत है। ब्रह्मानन्द वल्ली के आरंभ में ही उपनिषद मंत्र है – सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। ब्रह्म सत्य हैं, ज्ञान हैं, अनंत हैं। इसीलिए यहाँ विद्या के अनंत रूप सहज विद्यमान हैं। आयुर्वेद से लेकर योग तक प्रत्येक ज्ञान शाखा में ज्ञान के अनंत रूप वर्णित हैं।
इसीलिए विविध पंथ यहाँ सहज स्वीकृत हैं परंतु उन सबका एक सामान्य आधार है, जो सार्वभौम है, यह भी प्रारम्भ से ज्ञात है। ये सार्वभौम नियम या आधुनिक यूरोपीय पदावली में कहें तो सार्वभौम मूल्य हैं। ये ही सामान्य धर्म या सार्वभौम धर्म और मानव धर्म कहे गए हैं। अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी तत्व के प्रति द्रोह और द्वेष का सर्वथा अभाव, सत्य, संयम, अन्य के वस्तुओं के प्रति गिद्धदृष्टि नहीं रखना, मर्यादित भोग और उसके लिए मर्यादित संग्रह – ये पाँच सार्वभौम यम या मूल्य हैं। इनके सर्वमान्य आधार के साथ व्यक्ति, समूह, समाज और राष्ट्रों की अपनी विशेषताओं का सतत् संवर्धन ही अपरा विद्या का विस्तार है और जिन उपकरणों से अर्थात मन और बुद्धि की जिस सामथ्र्य से यह सब ज्ञान होता है, उस आत्मसत्ता के मूल स्वरूप का ज्ञान परा विद्या है।
जब किसी समाज में आत्मसत्ता के स्वरूप का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ लोग होंगे और वे सम्मानित होंगे, तब वहाँ सभी मानस संरचनाएं, ( मेंटल या इंटेलेक्चुअल कान्स्टृक्ट) मर्यादित मान्य होंगी क्योंकि यह ज्ञात होगा कि वे परमार्थ रूप में अंतिम सत्य नहीं हैं, वे सब सापेक्ष सत्य हैं और परिवर्तनशील सत्य हैं। इसीलिए व्यक्ति, कुल, गोत्र, वर्ण, क्षेत्र, आदि सब से परे जो मूल तत्व है, उसके ज्ञान की साधना को परा विद्या कहा गया और उसके ज्ञाता ही सर्वमान्य रहे। इस प्रकार प्रारम्भ से ही भारत में परा और अपरा दोनों विद्याओं की साधना परंपरा प्रवाहित है और शिक्षा वही है जो इन दोनों का ज्ञान दे।
इसमें से परा का मूल ज्ञान सबको आवश्यक है, अत: योग और ध्यान की किसी न किसी पद्धति के द्वारा आत्मस्वरूप का ज्ञान सबके लिए सर्वोपरि मान्य रहा। जबकि अपने संस्कारों और सामथ्र्य तथा प्रतिभा के अनुरूप अपरा विद्या के किस एक या कतिपय अनुशासनों में दक्षता को स्वधर्म माना गया। अत: सामान्य धर्म और स्वधर्म, दोनों का ज्ञान प्रत्येक विद्यार्थी को कराना शिक्षा का भारतीय लक्ष्य है।
यहाँ कुछ और आधारभूत तथ्य स्मरण कर लेना चाहिए। समस्त शिक्षा वृद्ध संवाद है अर्थात ज्ञान की किसी न किसी शाखा या अनुशासन में उत्कर्ष प्राप्त अपने पूर्वज लोगों के द्वारा जो ज्ञान प्रदान किया गया, प्रस्तुत किया गया, उसे नयी पीढ़ी को देना ही शिक्षा का मूल आधार है। वही शिक्षा है। इस प्रकार किसी भी समाज की सम्यक शिक्षा वह है जो सर्वप्रथम अपने ही समाज और राष्ट्र में हुए ज्ञानियों के द्वारा प्रस्तुत, निरूपित और व्याख्यायित ज्ञान के स्वरूप को ठीक-ठीक नयी पीढ़ी को प्रदान करे। अर्थात् अपने वृद्धों से संवाद करें। परंतु वर्तमान में 1947 ईसवी के बाद से जो लोग शासन में रहे, उन्होंने शिक्षा के नाम पर यूरोप और बाद में संयुक्त राज्य अमेंरिका के जो कुछ अनुशासनों में वृद्धि प्राप्त या उत्कर्ष प्राप्त ज्ञानी लोग हैं, उनसे ही भारत के विद्यार्थियों का संवाद बलपूर्वक कराया।
उदाहरण के लिए इतिहास में, राजनीति शास्त्र में, अर्थशास्त्र में, समाजशास्त्र में, मानस शास्त्र यानी मनोविज्ञान में और शब्दशास्त्र, भाषा शास्त्र आदि में यूरोप के सयाने लोग, वृदध लोग क्या क्या कहते रहे हैं और क्या कह रहे हैं, उसे ही भारत के विश्वविद्यालयों में मूल रूप से पढ़ाया जाता है और मात्र शोभा या अलंकार की भांति एकाध भारतीय विद्वानों के भी अंश उस विषय में प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ है कि भारत के सभी विद्यार्थियों को शासन के द्वारा यूरोप के और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के वृद्धों से संवाद करने को विवश किया जाता है। यह तो शिक्षा के प्रयोजन से रहित शिक्षा हुई। शिक्षा का मूल प्रयोजन है सर्वप्रथम अपने समाज और राष्ट्र के वृद्धों से विद्यार्थियों का संवाद कराना। उनके ज्ञान को उन्हें प्रदान करना। इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद, योगशास्त्र सहित समस्त भारतीय दर्शन शास्त्र, व्याकरण, भाषा शास्त्र आदि सभी रूपों में सबसे पहले अपने देश के ज्ञानियों को जानना आवश्यक है। फिर यूरो-अमेरिकी विद्वानों को भी अवश्य वे जानें।
अपरा विद्या के प्रत्येक अनुशासन में सर्वप्रथम विद्यार्थियों को अपने ही राष्ट्र और अपने ही समाज के वृद्धों के द्वारा जाने गए और प्रस्तुत किए गए ज्ञान को जानना चाहिए तथा सर्वप्रथम अपने ही वृद्धों से संवाद करना चाहिए। इसके बाद जैसा हमारे वृद्धों ने निर्देश दिया है, सारे संसार के भी वृद्धों से ज्ञान प्राप्त करना सहज स्वाभाविक है। अपनों से संवाद न करके केवल बाहरी वृद्धों के ज्ञान को जानना तो शिक्षा के प्रयोजन को नष्ट करना है। अत: भारतीय शिक्षा वही है जो सर्वप्रथम इतिहास में, अर्थशास्त्र में, राजनीति शास्त्र में, मानस शास्त्र में, मनोविज्ञान सहित प्रत्येक मानविकी अनुशासन में भारत का ज्ञान नयी पीढ़ी को प्रदान करे। भारत के शास्त्र ज्ञान को, भारत के महान ज्ञानियों के ज्ञान को अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाएं। यही भारतीय शिक्षा का मूल लक्ष्य है।
भारत में ज्ञान की अनंत शाखाएं हैं और उनका अत्यधिक विस्तार है। अत: जिसमें अपने संस्कार और प्रतिभा और रुचि के कारण विशेष गति हो, उस अनुशासन में विशेष ज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए और यूरोप या संयुक्त राज्य अमेंरिका सहित विश्व के अन्य देशों के भी वृद्धों का ज्ञान यदि संबंधित विषय में प्राप्त हो सके तो और अच्छा है। परंतु शिक्षा के मूल में अपने राष्ट्र और अपने समाज के वृद्धों के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही आधार बनना चाहिए। यही भारतीय शिक्षा का लक्ष्य है।
वैसे भी समस्त विश्व में शिक्षा का मूल लक्ष्य और प्रयोजन यही है। आखिर यूरोप में और संयुक्त राज्य अमेंरिका में भी प्रत्येक विद्यार्थी को सर्वप्रथम अपने ही ज्ञानवृद्धिप्राप्त सयानों का ज्ञान ही प्रदान किया जाता है। भारत में इतने महान ज्ञानी हुए हैं, इतिहास संबंधी, राजनीति शास्त्र संबंधी, वित्तशास्त्र संबंधी अथवा मानसशास्त्र संबंधी या धर्मशास्त्र संबंधी उन महान भारतीय ज्ञानियों के ज्ञान को तो यूरोप के किसी भी देश में प्रारंभ में विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया जाता। यहां तक कि बाद में भी कुछ यदि पढ़ाया जाता है तो उनकी अपनी व्याख्याओं के साथ पढ़ाया जाता है, उनके अपने दृष्टिकोण से पढ़ाया जाता है। भारतीय ऋषियों के दृष्टिकोण को यथावत किसी भी यूरोपीय देश में अथवा संयुक्त राज्य अमेंरिका में किसी भी अनुशासन में नहीं पढ़ाया जाता। जिन क्षेत्रों में भारतीय ऋषि और भारतीय गुरुजन सर्वश्रेष्ठ मान्य है, उन क्षेत्रों में भी पहले हमारा ज्ञान वहाँ विद्यार्थियों को नहीं दिया जाता। क्योंकि सर्वत्र शिक्षा का मूल प्रयोजन अपने ही पूर्वजों के ज्ञान को नई पीढ़ी को प्रदान करना है। भारत में भी शिक्षा के इसी सार्वभौम प्रयोजन के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जानी आवश्यक है।
हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही तय कर सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तत्वावधान में भारत के श्रेष्ठ विद्वानों का एक वृहद निकाय व्यापक विचार-विमर्श करें और वेदों उपनिषदों पुराणों महाकाव्यों आदि के परंपरागत विद्वानों तथा अन्य सभी ज्ञान धाराओं के मुखिया लोगों और ज्ञानी लोगों और भारतीय कला रूपों तथा शिल्प परंपराओं के ज्ञानी और हुनरमंद व्यक्तियों तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधियों का एक समवाय हो और उसमें शिक्षा के नए स्वरूपों के विषय में सर्व अनुमति के आधार पर एक प्रामाणिक स्वरुप विकसित किया जाए।
हमारी ज्ञान परंपराएं विराट और विविध हैं। उनके प्रतिनिधियों के संवाद से राष्ट्रीय शिक्षा के लक्ष्य का निर्धारण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इस विषय में राजनेताओं और प्रशासकों को स्वयं अपने स्तर पर निर्णय लेने का हठ नहीं करना चाहिए क्योंकि वे इन विषयों के अधिकारी विद्वान नहीं हैं। राजनीति शास्त्र या विधिशास्त्र अथवा प्रशासनिक शास्त्र में उनका कोई योगदान अवश्य हो सकता है परंतु ज्ञान के अन्य विराट क्षेत्रों में राजपुरुषों और प्रशासकों का कोई निर्णायक योगदान नहीं हो सकता। भारतीय शिक्षा सदा ही परंपरा से शिक्षक केंद्रित यानी आचार्य केंद्रित रही है और उसे पुन: आचार्य केंद्रित ही किए जाने की आवश्यकता है।
शिक्षा को शिक्षक के स्थान पर प्रशासक और मंत्रालय के सचिव तथा मुखिया लोग तय करें, यह तो अंग्रेजी काल से चला था और यह परंपरा भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने वाली प्रमाणित हुयी है। भारतीय शिक्षा के स्वरूप और लक्ष्यों का निर्धारण भारत के ज्ञानियों के द्वारा ही हो, ऐसी व्यवस्था करना शासन का कर्तव्य है। ऐसी समृद्ध शिक्षा परंपरा का पुन: उत्कर्ष ही भारतीय शिक्षा के लक्ष्य होने चाहिए।✍🏻भारतीय धरोहर
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