दिव्य रश्मि न्यूज़ चैनल |
- आदर्श
- मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का किया उद्घाटन
- मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न योजनाओं का किया लोकार्पण, कार्यारंभ एवं शिलान्यास
- प्राकृतिक खेती की अवधारणा
- बदलाव
- 15 दिसम्बर 2021, बुधवार का दैनिक पंचांग एवं राशिफल - सभी १२ राशियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन ? क्या है आप की राशी में विशेष ?
- विटामिन सी का भण्डार है हरी मिर्च
- गन्ने से मिलती कुदरती मिठास
- कमाने से ज्यादा गंवा देते राहुल
- प्रकृति सुरक्षा बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
- काशी का सांस्कृतिक सन्देश
- नीरव मोदी के प्रत्यर्पण पर सुनवाई
- करांची में ओमिक्रान का मिला मरीज
- दुबई में अब नहीं होता कागज का प्रयोग
- जलवायु परिवर्तन पर अकेला पड़ा अमेरिका
- स्वाधीनता संग्राम का गुमनाम सेनानी तेलंगा खड़िया-अशोक “प्रवृद्ध”
- अपना-अपना होता है
- अतृप्त पूर्वजोंद्वारा कष्टसे मुक्ति देनेवाले भगवान दत्तात्रेय
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- ज्ञान , भक्ति और कर्म का द्योतक गीता
- ज्ञान कुंज एकेडमी में आयोजित हुआ अमृत महोत्सव
- हिन्द, हिन्दू, हिन्दी और हिन्दुत्व
- गीता सुगीता
- अभी ठहरो सनम मेरे जरा सी शाम होने दे पर खूब बरसीं तालियां
| Posted: 14 Dec 2021 07:59 AM PST
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| मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का किया उद्घाटन Posted: 14 Dec 2021 07:53 AM PST मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का किया उद्घाटनपटना, 14 दिसम्बर 2021:- मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने आज विकास भवन में स्वास्थ्य विभाग के कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का उद्घाटन किया। उद्घाटन के पश्चात् मुख्यमंत्री ने कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का निरीक्षण भी किया। निरीक्षण के दौरान स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि स्वास्थ्य विभाग का यह देश में पहला कमांड एंड कंट्रोल सेंटर है। इसके माध्यम से सभी स्वास्थ्य केंद्रों की मॉनिटरिंग, मेडिकल उपकरणों सहित डाटा की निगरानी एवं उनके विश्लेषण किये जायेंगे। पायलट प्रोजेक्ट के रुप में मुजफ्फरपुर एवं नालंदा में इसकी शुरुआत की गई है। मुख्यमंत्री ने कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से जिला अस्पताल मुजफ्फरपुर के ओ0पी0डी0 में डॉक्टर और मरीज से वार्ता कर वहां इलाज और सुविधाओं के संबंध में जानकारी ली। साथ ही नालंदा अस्पताल के ओ0पी0डी0 का भी निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2006 से स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई काम किए गए हैं। पहले लैंडलाइन टेलीफोन के माध्यम से मुख्यमंत्री सचिवालय एवं स्वास्थ्य विभाग के द्वारा अस्पतालों में चिकित्सकों से बातकर जानकारी ली जाती थी। खुशी की बात है कि आज कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की शुरुआत की गई है। अब नई तकनीक के माध्यम से स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों को और प्रभावी ढंग से क्रियान्वित एवं नियंत्रित किया जा सकेगा। इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री श्री मंगल पाण्डे, भवन निर्माण मंत्री श्री अशोक चैधरी, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री दीपक कुमार, स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री प्रत्यय अमृत, मुख्यमंत्री के सचिव श्री अनुपम कुमार, बिल एंड गेट्स मिलिंडा फाउंडेशन के कंट्री हेड श्री हरि मेनन, अपर कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति श्री अनिमेश कुमार पराशर सहित अन्य स्वास्थ्य विभाग के अधिकारीगण एवं कर्मी मौजूद थे। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न योजनाओं का किया लोकार्पण, कार्यारंभ एवं शिलान्यास Posted: 14 Dec 2021 07:49 AM PST मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न योजनाओं का किया लोकार्पण, कार्यारंभ एवं शिलान्यास
पटना, 14 दिसम्बर 2021:- मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान के परिसर में टेलीमेडिसिन स्टूडियो (ई-संजीवनी) का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री ने टेलीमेडिसिन स्टूडियो (ई-संजीवनी) का निरीक्षण किया। इसके पश्चात् मुख्यमंत्री ने परिसर में निर्माणाधीन स्वास्थ्य भवन का भी निरीक्षण किया। इसके पष्चात् राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान के 'सभागार' में मुख्यमंत्री ने 1919 करोड़ 95 लाख रुपए की लागत से 772 विभिन्न योजनाओं का रिमोट के माध्यम से शिलान्यास, कार्यारम्भ, उद्घाटन एवं लोकार्पण किया। मुख्यमंत्री ने जमुई में लगभग 500 करोड़ रुपए की लागत से बननेवाले मेडिकल कॉलेज और हॉस्पीटल का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शिलान्यास किया। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आज के इस कार्यक्रम में यहां उपस्थित लोगों तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े सभी लोगों का मैं अभिनंदन करता हूं। मुझे खुशी है कि आज कई योजनाओं का शिलान्यास, कार्यारम्भ, उद्घाटन एवं लोकार्पण किया गया है। इसके संबंध में विस्तृत जानकारी आपलोगों को दी गई है। उन्होंने कहा कि जब से हमलोगों को काम करने का मौका मिला है, तब से सभी क्षेत्रों में विकास का काम किया जा रहा है। शुरुआत में हमने समाचार माध्यमों से कहा था कि स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी चीजों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा तो लोगों में इसके प्रति जागरुता आएगी। उस समय आज की तरह आधुनिक तकनीक नहीं थी लेकिन उस समय समाचार पत्रों के माध्यम से स्वास्थ्य के क्षेत्र में किये जा रहे कामों की चर्चा होती थी, जिससे लोगों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी मिलती थी और उससे फायदा होता था। वर्ष 2005 में सरकार में आने के बाद सर्वे कराया, जिसकी रिपोर्ट फरवरी 2006 में आयी। सर्वे से पता चला कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर एक माह में 39 लोग इलाज के लिए लोग आते थे। स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कदम उठाए गए और अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर लोग 10 हजार लोग इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। सातांे दिन, 24 घंटे, लोगों का ट्रीटमेंट शुरु किया गया था। लैंडलाइन टेलीफोन के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग और मुख्यमंत्री सचिवालय से जानकारी ली जाती थी। उन्होंने कहा कि लैंडलाइन टेलीफोन को अब भी फंक्षनल रखें। लोक निजी साझेदारी के तहत एक्सरे, साफ सफाई, मेंटेनेंस की सुविधाएं मुहैया करायी गई थीं। सभी अस्पतालों में हॉस्पीटल मैनेजर रखा गया। हमलोगों ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक मुफ्त दवा की व्यवस्था करायी। तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत जी से पटना के गार्डिनर अस्पताल में कार्यक्रम आयोजित कर मुफ्त दवा उपलब्ध कराने की शुरुआत करायी गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र छह बेडों का था, जिसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में परिणत कर 30 बेडों की व्यवस्था की जा रही है। बिहार में पहले छह सरकारी मेडिकल कॉलेज थे, जबकि 2 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज थे। अब राज्य में 11 सरकारी मेडिकल कॉलेज और 6 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज यानि कुल 16 मेडिकल कॉलेज हैं। हमलोगों ने आई0जी0आई0एम0एस0 में भी काफी काम कराया। अब इसे 2500 बेडों वाला अस्पताल बनाया जा रहा है। पहले कोई यहां इलाज के लिए नहीं आना चाहता था लेकिन यहां की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था एवं सुविधा के लिए काफी लोग आते हैं और उनका बेहतर इलाज हो रहा है। पटना में एम्स का निर्माण कराया गया। दरभंगा में भी एम्स का निर्माण कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य उपकेंद्र में इलाज के लिए आनेवाले लोगों को बेहतर इलाज के लिए विशेषज्ञों के माध्यम से टेलीमेडिसिन द्वारा परामर्श देने का काम प्रारंभ किया गया है। सिटी स्कैन, रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी, डायलिसिस सहित मरीजों को हर प्रकार की सुविधाएं सभी जिला अस्पतालों में उपलब्ध करायी जा रही है। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण अस्पताल राजवंशी नगर में हड्डी संबंधित बीमारी के उपचार के लिए इसे सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया गया। राजेंद्र नगर में आंख की चिकित्सा को बेहतर बनाने के लिए राजेंद्र अस्पताल को सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया गया। गार्डिनर रोड वाले अस्पताल को भी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया जा रहा है। पटना के इन तीन सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में अलग डायरेक्टर होंगे, यह स्वायत अस्पताल होगा, जो यह स्वास्थ्य विभाग से डायरेक्ट रुप से जुड़ा होगा। सात निश्चय-1 के तहत सभी जिलों में जी0एन0एम0 संस्थान, पारा मेडिकल संस्थान, सभी अनुमंडलों में ए0एन0एम0 संस्थान स्थापित किए जा रहे हैं। सात निश्चय-2 के अंतर्गत टेलीमेडिसिन की शुरुआत की गई है। बाल हृदय योजना की शुरुआत फरवरी माह में शुरु की गई है। अब तक 264 बच्चों का इस योजना के तहत इलाज कराया जा चुका है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुजफ्फरपुर में एक प्राइवेट अस्पताल में हाल ही में आंखों के इलाज के दौरान मरीजों के आंखों की रौशनी चली गई। यह बेहद दुखद है। प्राइवेट अस्पतालों को ठीक से काम करना होगा। हमलोग इस घटना की जांच करवा रहे हैं जो भी दोषी पाए जाएंगे उस पर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की आंखें चली गईं है राज्य सरकार की तरफ से पीड़ितों को सहायता दी जाएगी। पटना के एम्स में इलाज कराने आनेवाले मरीजों के परिजनों के लिए एम्स के पास ही राज्य सरकार की तरफ से रोगी परिचारी गृह का निर्माण कराया जायेगा। एम्स के एक्सपेंशन के लिए भी हमलोग जमीन उपलब्ध कराएंगे। शिशु रोग अतिविशिष्ट अस्पताल का निर्माण कराया जाएगा। आयुष प्रक्षेत्र में भी बेहतर काम किया जा रहा है। अब नई तकनीक के माध्यम से स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों को और प्रभावी ढंग से क्रियान्वित एवं नियंत्रित किया जाएगा। उन्होंने चिकित्सकों से निवेदन करते हुए कहा कि बिहार में रहिए, बिहार की सेवा कीजिए। हमलोग इलाज के साथ-साथ चिकित्सकीय शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सक, अधिकारी, कर्मियों ने कोरोना काल में काफी बेहतर काम किया है। कोरोना से मृत्यु होने पर उनके परिजनों को 4 लाख रुपए की सहायता दी जा रही है। मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष के तहत कई प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए सहायता की जाती है। इसके तहत कुछ और बीमारियों को शामिल करने के लिए समीक्षा की जाएगी। हमलोग हर प्रकार से लोगों की मदद करते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि तीसरे फेज की बात की जा रही है। कई विकसित देशों में कोरोना के नए वेरियंट ओमीक्राॅन के केस बढ़ रहे हैं। अपने देश में और राज्य में भी इसको लेकर सतर्कता बरती जा रही है। हमलोग सभी प्रकार के इंतजाम किए हैं। इसको लेकर सरकार पूरी तरह से सतर्क है। कोरोना जांच प्रतिदिन लगभग 2 लाख किए जा रहे हैं। देश में 10 लाख की आबादी पर जितनी औसत जांच की जा रही है, उससे बिहार में की जा रही जाॅच अधिक है। आज सुबह तक 9 करोड़ 1 लाख 56 हजार 334 कोरोना टीका के डोज दिए जा चुके हैं। हमलोग पिछड़े राज्य होते हुए भी विकास के कई काम कर रहे हैं। हमलोगों की आबादी अधिक है और क्षेत्रफल कम है इसलिए हमलोग पिछड़े राज्य हैं। पटना में कोरोना के केस बढ़ रहे हैं इसको लेकर हमलोग सतर्क हैं। उन्होंने कहा कि हमलोग सबके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए निरंतर काम करते रहेंगे ताकि सभी लोग सुरक्षित रहें। कार्यक्रम को स्वास्थ्य मंत्री श्री मंगल पाण्डे, भवन निर्माण मंत्री श्री अशोक चैधरी, स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री प्रत्यय अमृत ने संबोधित किया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री का स्वागत स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री प्रत्यय अमृत ने पौधा भेंटकर किया। मुख्यमंत्री ने 9 स्वास्थ्यकर्मियों (चिकित्सक, ए0एन0एम0, लैब टेक्नीशियन एवं कोल्ड चेन टेक्नीशियन) को सांकेतिक रुप से नियुक्ति पत्र प्रदान किया। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बेहतर कार्य किए जाने वाले जिलों को भी सम्मानित किया। इसमें प्रथम डोज के लिए पूर्णिया, सहरसा, गया, पटना एवं सीवान को, जबकि दूसरे डोज के लिए सहरसा, गोपालगंज, सीवान, पूर्वी चंपारण एवं पश्चिमी चंपारण को सम्मानित किया गया। कोरोना काल में बेहतर कार्य करने के लिए मुख्यमंत्री ने विशेष सचिव सह कार्यपालक निदेशक राज्य आयुष समिति श्री अरविंदर सिंह, अपर कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति श्री अनिमेश कुमार पराशर, ओ0एस0डी0 स्वास्थ्य विभाग श्रीमती रेणु देवी, असिस्टेंट डायरेक्टर राज्य स्वास्थ्य समिति श्री मनीष रंजन, स्टेट प्रोग्राम मैनेजर, राज्य स्वास्थ्य समिति श्री विवेक कुमार सिंह, पी0एम0यू0 हेल्थ डिपोर्टमेंट सुश्री धन्या शशि, पी0एम0यू0 हेल्थ डिपोर्टमेंट सुश्री सना जैन को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया। मुख्यमंत्री ने बिहार राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी के 'डिजिटल बल्ड डोनर' कार्ड को रक्तदाता मुंगेर के पत्रकार श्री त्रिपुरारी कुमार मिश्रा, सीतामढ़ी की चिकित्सक डॉ0 प्रतिमा आनंद को वितरित किया। कार्यक्रम के दौरान कॉफी टेबल बुक 'मीमांशा-2021' का मुख्यमंत्री ने विमोचन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री दीपक कुमार, मुख्य सचिव श्री त्रिपुरारी शरण, मुख्यमंत्री के सचिव श्री अनुपम कुमार, बिल एंड गेट्स मिलिंडा फाउंडेशन के कंट्री हेड श्री हरि मेनन, अपर सचिव स्वास्थ्य श्री कौशल किशोर, अपर कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति श्री केष्वेंद्र कुमार, अपर कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति श्री अनिमेश कुमार पराशर सहित स्वास्थ्य विभाग के अन्य अधिकारीगण उपस्थित थे, जबकि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से विज्ञान एवं प्रावैधिकी मंत्री श्री सुमित कुमार सिंह, सांसद श्री चिराग पासवान, विधायक श्री दामोदर रावत, विधायक सुश्री श्रेयसी सिंह, अन्य सांसदगण, विधायकगण, विधान पार्षदगण, अन्य जनप्रतिनिधिगण एवं गणमान्य व्यक्ति जुड़े हुए थे। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 05:51 AM PST प्राकृतिक खेती की अवधारणा- पदम श्री डॉ0 भारत भूषण त्यागी प्राकृतिक खेती की मौलिक अवधारणा भारतीय संस्कृति से प्रेरित है। संस्कृति का तात्पर्य मानव में संस्कार पूर्वक स्वीकृतियों के होने से है अर्थात मानव के द्वारा प्रकृति की हर वास्तविकता को जैसा है वैसा ही समझा और स्वीकारा जाये। यही प्राकृतिक खेती का मूल मंत्र है। प्राकृतिक खेती प्रत्येक मानव के जीने की आवश्यकता है। व्यवस्था के रूप में मानव और प्रकृति में गहरा संबंध है जिसे समझना और पूरकतापूर्वक निर्वाह होना ही प्राकृतिक खेती है। आज प्राकृतिक खेती की आवश्यकता इसलिए भी महत्वपूर्ण और अनिवार्य है कि प्रचलित आधुनिक खेती के कारण स्वास्थ्य, पर्यावरण, आर्थिक असंतुलन व कृषि के प्रति बढ़ती उदासीनता जैसी चुनौतियां तेजी से उभर रही हैं। वर्तमान भारत सरकार ने जिस प्रकार आत्मनिर्भर भारत, कृषक सशक्तिकरण एवं किसानों की आमदनी दोगुना करने की दिशा में आवाहन किया है उसके लिए सही समझ के साथ प्राकृतिक खेती एक सार्थक विकल्प है। यह कोई आदर्शवाद नहीं बल्कि प्रकृति के साथ जीने की वास्तविकता है। खेती में हरित क्रांति से पहले जो समस्याएं थीं आज वो उससे भी ज्यादा विकराल रूप में है इसलिए समीक्षा पूर्वक समस्या के कारण को ठीक-ठाक पहचाना जाए। एक कृषक होने के नाते सन 1987 में अपनी खेती का आर्थिक विश्लेषण किया, समस्या यह थी कि खेती का उत्पादन तो बढ़ रहा है लेकिन किसान की आमदनी नहीं बढ़ रही है। एक वर्ष की जांच में पाया कि खेती की सभी लागत, जुताई, सिंचाई, खाद, बीज, दवाई पर बाजार का कब्जा है। उत्पादन की बिक्री और कीमत पर भी बाजार का अधिकार है। प्रोसेसिंग व मूल्य संवर्धन भी बाजार के अधिकार में है। किसान की न कोई परिभाषा है न उसके पास कोई अधिकार है । आय बढ़ाने का कोई अवसर भी किसान के पास नहीं है। इस हरित क्रांति को खेती का बाजारीकरण भी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज इस आर्थिक असंतुलन को दूर करने के साथ-साथ स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की दृष्टि से भारत सरकार प्राकृतिक खेती को अपनाये जाने की ओर प्रयासरत है। यह सराहनीय एवं सम्मानजनक पहल है। इसके लिए सतर्कता की विशेष आवश्यकता है। सफलता के लिए सोच में परिवर्तन होना प्राथमिकता है। केवल नाम और तरीके बदलने से कुछ होगा नहीं। प्राकृतिक खेती के लिए प्राकृतिक उत्पादन व्यवस्था केंद्रित सोच की आवश्यकता है। जिससे गाय के साथ-साथ अन्य सभी प्राकृतिक वस्तुओं की सांझा भूमिका है। कोई एक वस्तु विशेष नहीं है। प्रकृति का मूल सूत्र ही सह-अस्तित्व है। इसलिए देश में कृषि अनुसंधान, शिक्षा, शोध, तकनीकी, विज्ञान, नीति प्रौद्योगिकी आदि प्राकृतिक व्यवस्था केंद्रित हो। परिस्थितियों, घटनाओं, समस्याओं व लाभ केंद्रित विचार धाराओं के कारण ही कृषि तंत्र अधूरा है प्राकृतिक खेती में प्रयोग रूप में यह देखा गया है कि प्राकृतिक उत्पादन व्यवस्था का स्वरूप पूरकता, विविधता, एवं नैसर्गिक संतुलन पूर्वक धरती की सतह पर निश्चित घनत्व में क्रियाशील है। जिससे एक ही खेत में अनेक फसलें साथ-साथ लगाये जाने से जो उत्पादन प्राप्त होता है वह मात्रा, गुणवत्ता एवं विविधता में एकल फसल प्रणाली से बहुत ज्यादा है। साथ ही भूमि की उर्वरता भी तेजी से बढ़ती है। विविध फसलों के अवशेष भूमि को मिलने से जीवाश्म कार्बन एवं पर्याप्त जीवाणु तंत्र समृद्ध रहता है। ताप- दाब - नमी का संतुलन बने रहने से कीड़े बीमारियों का नियंत्रण होना देखा गया है। बाहरी लागतों की निर्भरता नहीं के बराबर होती है। उत्पादन वृद्धि से आय वृद्धि हेतु प्राकृतिक खेती का व्यावसायिक प्रबंधन होना आवश्यक है अर्थात खेती में उत्पादन के साथ-साथ गुणवत्ता प्रमाणीकरण, प्रसंस्करण एवं बिक्री हेतु समन्वित कार्य योजना पूर्वक प्राकृतिक खेती की जाए। प्राकृतिक खेती को सही समझ एवं श्रम नियोजन पूर्वक व्यावसायिक कार्य योजना के रूप में कृषक उत्पादन संगठन प्रारूप में चलाया जाना ग्रामीण स्तर पर आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए प्रभावी आधार हैं व खेती के लिए समाधानात्मक विकल्प है। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 05:42 AM PST
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| Posted: 14 Dec 2021 05:40 AM PST
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| विटामिन सी का भण्डार है हरी मिर्च Posted: 14 Dec 2021 05:20 AM PST विटामिन सी का भण्डार है हरी मिर्चहरी मिर्च खाते ही लोग सी-सी करने लगते है खाने में अगर तीखापन न हो तो भोजन में स्वाद ही नहीं आता। अमूमन भोजन का जायका बढ़ाने के लिए लोग हरी मिर्च का प्रयोग करते हैं। लेकिन क्या आप इस बात से वाकिफ हैं कि हरी मिर्च जहां एक ओर भोजन को चटपटा व मसालेदार बनाती है, वहीं दूसरी ओर इसके सेवन से आपकी सेहत को कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। हरी मिर्च के सेवन से शरीर को भरपूर विटामिन सी मिलता है। हरी मिर्च देखने में भले ही छोटी सी हो, लेकिन कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। जैसे इसमें विटामिन ए, सी व बी 6 पाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसके सेवन से व्यक्ति को आयरन, मैग्नीशियम, फाइबर, सोडियम व पोटेशियम आदि प्राप्त होते हैं। अगर आप प्रतिदिन हरी मिर्च का सेवन किसी न किसी रूप में करते हैं तो इससे आपके शरीर में अन्य पोषक तत्वों को अवशोषित होने में मदद मिलती है। दरअसल, हरी मिर्च में विटामिन सी पाया जाता है और इस विटामिन का एक गुण यह भी होता है कि यह दूसरे विटामिन्स के अवशोषण में मददगार साबित होता है। वैसे विटामिन सी के अतिरिक्त इसमें विटामिन ए भी पाया जाता है जो आंखों व त्वचा के लिए काफी अच्छा माना जाता है। अगर आप तनाव व स्ट्रेस को अपने जीवन से दूर रखना चाहते हैं तो हरी मिर्च को अपनी डाइट में शामिल अवश्य करें। जब आप हरी मिर्च का सेवन करते हैं तो इससे मस्तिष्क में एंडोर्फिन रिलीज होता है। यह एंडोर्फिन व्यक्ति के मूड को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इस प्रकार अगर हरी मिर्च को मूड बूस्टर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हरी मिर्च इम्युन सिस्टम को बूस्टअप करने में अहम भूमिका निभाती है। इसके अतिरिक्त इसमें कुछ एंटी.बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं जो शरीर को बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करते हैं। जो लोग मधुमेह पीड़ित हैं, उन्हें खासतौर पर हरी मिर्च का सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित रहता है। मधुमेह रोगियों के लिए इसका सेवन किसी वरदान से कम नहीं है। अक्सर देखने में आता है कि जब व्यक्ति चटपटा या मसालेदार भोजन करता है तो इससे व्यक्ति का पाचन तंत्र विपरीत तरह से प्रभावित होता है। लेकिन हरी मिर्च का सेवन करने से ऐसा नहीं होता। हरी मिर्च को भोजन में शामिल करने से खाना स्वादिष्ट तो बनता है ही, साथ ही यह पाचन क्रिया को भी बेहतर तरह से काम करने में मदद करता है। ऐसा इसमें मौजूद फाइबर व अन्य पोषक तत्वों के कारण होता है। (हिफी) हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 05:17 AM PST गन्ने से मिलती कुदरती मिठास(पं. आर.एस. द्विवेदी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा) मधुमेह की बीमारी अब आम हो गयी है लेकिन गन्ना रामबाण है। गन्ना चूसो,हमारे शरीर के लिए लाभदायक परंपरागत खाद्य वस्तुएं भी धीरे-धीरे लौट रही हैं। शहरी बच्चों व नौजवानों की जिंदगी से गुड़ का स्वाद गायब है मगर गुड़ का मीठा मौसम हर बरस आता है और सेहतयुक्त स्वाद रचता है। गुड़ बनाने वाले, हमेशा की तरह गन्नों के खेतों के आसपास धूनी जमाकर गुड़ बनाते हैं, गुड़ खाने के शौकीन गरम गरम गुड़ खाते भी हैं। पड़ोस में लगे गन्ने चूसते हैं और कुदरती मिठास जीवन व शरीर में भर लेते हैं। शहरी बच्चों को तो अब गन्ने भी कहां नसीब, मिल भी जाएं तो खाने से डरेंगे उनके दांत जो इतने सुकोमल हैं, हालांकि गन्ना खाने से दांत मजबूत होते हैं। इस मामले में ग्रामीण क्षेत्र के लोग गन्ने, रस और गुड़ का स्वाद लेने में आगे हैं। गन्नें से गुड़ बनाने ाले बताते हैं कि आग की भट्टियों पर चार कड़ाहे रखे जाते हैं। पहले वाले में गन्ने का रस डालकर उबालते हैं। उबलते हुए रस में से मैल निकालते रहते हैं। रस पूरा निकल जाए इसके लिए मैल के साथ निकले रस को पोटलियों में टांग देते हैं ताकि रस पूरा निकल आए। साफ हुए रस को अगली कड़ाही में पहुंचाते रहते हैं जहां वह और साफ होता रहता है तीसरी कड़ाही में और अधिक साफ होते गाढ़ा होने लगता है। चैथी कड़ाही में पहुंच कर रस का रूप बदल चुका होता है और स्वादिष्ट गन्ध वाले पेस्ट के रूप में दिखता है। गुड़ बनाने वाले इस रसीले पेस्ट को सीमेंटिड जगह पर फैलाते हैं, ठंडा होते होते लकड़ी के पलटे से घुमाते रहते हैं। हल्का सा जमने लगे तो लकड़ी की खुरपियों से उठाकर पानी लगे हाथों से गोल छोटी या कपड़े में लपेट कर बड़ी पाथियां बना लेते हैं। गुड़ बनाने का यह तो परंपरागत तरीका है। कुछ लोगों ने कुछ तो नया जोड़ा होगा। एक दिन में दस बारह कुंतल गुड़ बना देने वाले माहिर बताते हैं कि गुड़ में खूबसूरती लाने के लिए मीठा सोडा डाला जाता है। खाने वाले शौकीन लोग नारियल, बादाम, काजू , सौंफ छोटी इलायची या अन्य मेवे डलवाते हैं। बुर्जुग सही कहते हैं कि खाना खाने के बाद गुड़ के टुकड़े को मुंह में डालकर टाफी की तरह घुमा घुमा कर खाने से हमारी फूडपाइप में लगे खाने के रेशे साफ हो जाते हैं। पेट में पंहुचकर यही गुड़ खाना पचाने में सहायक बनता है। रात को भिगोए काले चने या कच्चे चने गुड़ के साथ यूंही खाएं तो हॉर्स पावर्स जैसी ताकत हासिल की जा सकती है। गुड़ को भुनी हुई गेहूं के साथ मिलाकर लड्डू बनाकर या चलाई के लड्डू, गजक, रेवड़ी या अन्य कई स्वादिष्ट चीजें बनाकर खाई जाती हैं। सर्दी के मौसम में गुड़ की चाय सेहत के लिए काफी मुफीद समझी जाती है। बिस्किट, सब्जियों, चटनियों व डिशेज में गुड़ का प्रयोग उन्हें खासियत प्रदान करता है। गुड़ आयरन व ग्लूकोज युक्त होता है। गन्ने की बात भी कर ली जाए कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, वसा व जल से युक्त गन्ने में विटामिन ए सक्रांमक रोगों से रक्षा व विटामिन बी पाचन शक्ति मजबूत करते हुए भूख व स्फूर्ति बढ़ाता है। गन्ने के रस से दिमाग की कार्य क्षमता, स्मरण शक्ति बढ़ती है। पीलिया, खांसी में मूली के रस के साथ, कब्ज व गैस में लाभकारी है। माना जाता है गन्ने के रस के नियमित सेवन से पथरी छोटे छोटे टुकड़े हो मूत्र के माध्यम से बह जाती है। ताजे धनिया के हरे पत्ते, पुदीना व नींबू का रस गन्ने के रस में मिलाकर पीना सबसे लाभकारी बताया जाता है। गन्ने के रस का सेवन मोटे व्यक्तियों, दमा व सांस की बीमारियों से पीड़ितों को कम मात्रा में मेडिकल परामर्श से करना चाहिए। रस के अधिक सेवन से दस्त लग सकते हैं। रस हमेशा स्वच्छ व ताजा गन्ने का ही प्रयोग करना चाहिए। बदलते जमाने के साथ गुड़ को भी हमने गुड गोबर कर दिया है। इसमें अब पहले जैसी बात कहां। दिलचस्प यह है कि अब तो गुड़ की मिठास बदलने व बढ़ाने के लिए इसमें चीनी भी मिला दी जाती है। वजह साफ है चीनी सस्ती है और गुड़ महंगा बिकता है। गन्ने चूसने व गरम गरम गुड़ चखने का लुत्फ सचमुच निराला है, आपके पड़ोस में गर्म गुड़ तो संभवत न मिले गन्ने का रस तो पिया ही जा सकता है। (हिफी) हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| कमाने से ज्यादा गंवा देते राहुल Posted: 14 Dec 2021 05:13 AM PST कमाने से ज्यादा गंवा देते राहुल(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा) इसको कांग्रेस का तो दुर्भाग्य कहेंगे ही, साथ ही यह देश के लोकतंत्र के लिए भी अच्छी बात नहीं है। सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए लेकिन सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस संसद में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं प्राप्त कर पायी। इसका एक कारण उसका कमजोर नेतृत्व है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और संभवतः आगे भी वहीं बनें, राहुल गांधी जितना कमाते हैं, उससे ज्यादा गंवा देते हैं। अभी गत दिनों 12 दिसम्बर 21 को राजस्थान में महंगाई विरोधी रैली की। मुद्दा भी मजबूत था और समय भी। कांग्रेस की यह रैली ऐसे समय हुई जब यूपीए मे कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठाए जा रहे हैं। महंगाई से आमजनता परेशान है। कांग्रेस की इस रैली से जनता नोटिस ले सकती थी लेकिन जनता के सामने राहुल ने हिन्दू और हिन्दुत्ववादी का विवादास्पद मुद्दा दे दिया। वे हिन्दुत्ववादियों की आलोचना करने लगे। हालांकि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने छद्म हिन्दुत्ववादी कहकर राहुल की भूल सुधारने का प्रयास किया है लेकिन भाजपा उनकी लिपि पर रबर चलाने का मौका नहीं देगी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जयपुर में 'महंगाई हटाओ रैली' में केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश में हिंदुत्ववादियों का राज है हिंदुओं का नहीं। उन्होंने कहा कि हिंदुत्ववादियों को बेदखल कर देश में हिंदुओं का राज लाना होगा। कहा कि वह हिंदू हैं लेकिन हिंदुत्ववादी नहीं। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष कहा कि प्रधानमंत्री मोदी व उनके तीन चार हिंदुत्ववादियों ने सात साल में ही देश को बर्बाद कर दिया। उन्होंने कहा कि एक हिंदुत्ववादी प्रधानमंत्री ने किसानों की पीठ में छुरा घोंपा व फिर माफी मांगी। राहुल ने कहा कि आज देश की राजनीति में दो शब्दों हिंदू व हिंदुत्ववादी की टक्कर है। उन्होंने कहा कि हिंदू सत्याग्रही होता है तो हिंदुत्ववादी सत्ताग्रही होते हैं। हिंदू और हिंदुत्ववाद को दो अलग अलग शब्द बताते हुए राहुल ने कहा कि जिस तरह से दो जीवों की एक आत्मा नहीं हो सकती, वैसे ही दो शब्दों का एक मतलब नहीं हो सकता क्योंकि हर शब्द का अलग मतलब होता है। रैली में बड़ी संख्या में उमड़ी भीड़ से कांग्रेस नेता उत्साहित नजर आए। राजस्थान के साथ साथ पड़ोसी राज्यों हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, दिल्ली आदि से लोग तथा देश भर से कांग्रेस के नेता इसमें शामिल हुए। उन्होंने कहा कि वह आज मौजूद लोगों को हिंदू व हिंदुत्ववादी शब्द के बीच फर्क बताना चाहते हैं। उन्होंने कहा, 'महात्मा गांधी हिंदू थे, गोडसे हिंदुत्ववादी। फर्क क्या होता है? फर्क मैं आपको बताता हूं। चाहे कुछ भी हो जाए हिंदू सत्य को ढूंढता है। मर जाए, कट जाए, पिस जाए, हिंदू सच को ढूंढता है। उसका रास्ता सत्याग्रह है। पूरी जिंदगी वह सच को ढूंढने में निकाल देता है।' कांग्रेस नेता ने कहा कि महात्मा गांधी ने पूरी जिंदगी सच को ढूंढने में बिता दी और अंत में एक हिंदुत्ववादी ने उनकी छाती में तीन गोलियां मारीं। हिंदुत्ववादी अपनी पूरी जिंदगी सत्ता को खोजने में लगा देता है। उसे सिर्फ सत्ता चाहिए और उसके लिए वह कुछ भी कर देगा। उसका रास्ता सत्याग्रह नहीं उसका रास्ता सत्ताग्राह है। राहुल ने कहा, 'यह देश हिंदुओं का देश है, हिंदुत्ववादियों का नहीं है और आज अगर इस देश में महंगाई है, दर्द है तो यह काम हिंदुत्ववादियों ने किया है। हिंदुत्ववादियों को किसी भी हालत में सत्ता चाहिए। इनका सच्चाई से कोई लेना देना नहीं। देश में 2014 से हिंदुत्ववादियों का राज है हिंदुओं का नहीं और हमें हिंदुत्ववादियों को बाहर निकालना है और एक बार फिर हिंदुओं का राज लाना है।' राहुल गांधी ने अपने भाषण महंगाई, जीएसटी, बेरोजगारी, और कृषि कानूनों समेत अन्य मुद्दों पर भी केन्द्र सरकार को घेरते हुये कहा कि यह देश गरीबों का किसानों का है। किसान और छोटे व्यापारी रोजगार पैदा करते हैं। उन्होंने केन्द्र सरकार पर आरोप लगाया कि इन्हें खत्म कर दिया गया है। राहुल ने कहा कि अभी देश में हिन्दुत्वादियों का राज है, हिंदुओं का नहीं। उन्होंने गीता का उदाहरण देते हुये कहा कि गीता में लिखा है सत्य की लड़ाई लड़ो। इसलिये डरें नहीं। यह देश आपका है। इससे पहले प्रियंका गांधी ने राम राम संबोधन से भाषण की शुरुआत करते हुये उत्तर प्रदेश सरकार पर हमला बोला। प्रियंका ने लखीमपुर घटना को लेकर केंद्रीय मंत्री और केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुये कहा कि आप जागरूक बनें, बीजेपी की सरकार को जवाबदेह बनाएं। प्रियंका ने आरोप लगाया कि केन्द्र के पास 160 करोड़ रुपये के विमान खरीदने के लिए पैसे हैं, लेकिन किसानों के लिए नहीं है। कांग्रेस सरकारों ने जो बनाया उसे बेचा जा रहा है। महंगाई के खिलाफ कांग्रेस की राष्ट्रीय रैली कहने को केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ थी लेकिन इसके दो बड़े मकसद माने जा रहे हैं। पहला कांग्रेस को विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत के रूप में दिखाना और दूसरा राहुल गांधी को विपक्ष के सबसे बड़े नेता के रूप में प्रजेंट करना। कांग्रेस की रैली के लिए जयपुर से लेकर दिल्ली तक राहुल गांधी के जगह-जगह पोस्टर और कट आउट लगाए गए थे। कांग्रेस 'ब्रांड राहुल' को एक बार फिर स्थापित करना चाहती है। कांग्रेस में राहुल गांधी की पहली लॉन्चिंग भी 2013 में जयपुर से ही हुई थी, तब कांग्रेस के चिंतन शिविर में पहली बार राहुल गांधी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुना गया था। कांग्रेस की यह रैली ऐसे वक्त में हुई है जब यूपीए में कांग्रेस के नेतृत्व और सबसे बडे दल की हैसियत को चुनौती मिल रही है। वो भी यूपीए के घटक दलों से और क्षेत्रीय पार्टियों से। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यूपीए में कांग्रेस के नेतृत्व को चुनौती दे रही है। ऐसे में जयपुर की इस महंगाई विरोधी रैली से कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश करेगी कि यूपीए की असली ताकत और नेतृत्व की क्षमता अभी भी कांग्रेस के पास है। इसके साथ ही यह दिखाने की कोशिश करेगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने में राहुल गांधी और कांग्रेस सक्षम है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल पिछले कई दिनों से खड़ा हो रहा है कि जब रैली का आयोजन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से किया जा रहा है तो फिर जयपुर को क्यों चुना गया? जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव है खास तौर पर पंजाब और उत्तर प्रदेश को रैली के लिए क्यों नहीं चुना गया? जानकारों का मानना है कि कांग्रेस में कई राज्यों में हालात विकट हैं। दिल्ली में रैली के आयोजन में भीड़ और संसाधन जुटाना आसान नहीं था। यूपी में कांग्रेस बड़ी ताकत नहीं है। पंजाब में जिस तरह से मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के बीच टकराव चल रहा है उसे देखते हुए कांग्रेस को राजस्थान सबसे मुफीद नजर आया। उसकी वजह यह है कि राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रहे संघर्ष पर कैबिनेट विस्तार के बाद विराम लगा है। बड़ी रैली के आयोजन के लिए जिस तरह के संसाधन और भीड़ लानी है उसके लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राजस्थान की सरकार को ज्यादा ठीक समझा गया। इसीलिए रैली का दायित्व राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंपा गया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए भी यह रैली साख और प्रतिष्ठा का सवाल बन गयी थी। इसी वजह से रैली को भव्य बनाने के लिए पूरी ताकत झौंकी जा रही है। मंत्रियों को जिलों में भेजा गया है। भीड़ लाने का दायित्व सौंपा गया है। किस तरह से भीड़ और संसाधन जुटाने हैं सब कुछ जिम्मेदारी मंत्रियों की तय की गई है। हर मंत्री और विधायक को भीड़ लाने का टारगेट दिया गया। इतना सब होते हुए भी राहुल ने एक विवादास्पद मुद्दा भाजपा को सौंप दिया है। (हिफी) हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| प्रकृति सुरक्षा बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा Posted: 14 Dec 2021 05:06 AM PST प्रकृति सुरक्षा बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा(मनीषा स्वामी कपूर-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा) यह सवाल निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और गंभीर भी। प्रकृति को नाराज करके हमने कई विपत्तियां मोल ले ली है। उत्तराखण्ड में यह विषय सुप्रीम कोर्ट के सामने आया लेकिन दूसरी तरफ मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का था। प्रकृति हमारे लिए महत्वपूर्ण है लेकिन उससे ज्यादा राष्ट्र महत्व रखता है। अगर राष्ट्र ही नहीं होगा तो प्रकृति की रक्षा हम कैसे कर पाएंगे। ब्रिटिश हुकूमत से ही उदाहरण मिल जाते हैं। हमारी प्राकृतिक संपदा का उन्हांेने भरपूर दोहन किया है। इसलिए प्रकृति की रक्षा के लिए भी हमें राष्ट्र की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। नरेन्द्र मोदी सरकार की चारधाम परियोजना को लेकर पर्यावरण प्रेमियों की दलील को महत्व देते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्र सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए आलवेदर चारधाम परियोजना की चैड़ाई बढ़ाने को मंजूरी दे दी है। प्रकृति को कुछ लोग अन्य प्रकार से भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। उत्तराखण्ड में खनन माफियाओं पर अंकुश लगाना जरूरी है। नरेंद्र मोदी सरकार की चार धाम परियोजना को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने ऑल वेदर राजमार्ग परियोजना में सड़क की चैड़ाई बढ़ाने की इजाजत दे दी है और इसके साथ ही डबल लेन हाइवे बनाने का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत न्यायिक समीक्षा में सेना के सुरक्षा संसाधनों को तय नहीं कर सकती। हाइवे के लिए सड़क की चैड़ाई बढ़ाने में रक्षा मंत्रालय की कोई दुर्भावना नहीं है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के दिनों में सीमाओं पर सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौतियां सामने आई हैं। यह अदालत सशस्त्र बलों की ढांचागत जरूरतों का दूसरा अनुमान नहीं लगा सकती है। पर्यावरण के हित में सभी उपचारात्मक उपाय सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एके सीकरी के नेतृत्व में एक निरीक्षण समिति भी गठित की गई है। इसमें राष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान संस्थान और पर्यावरण मंत्रालय के प्रतिनिधि भी होंगे।समिति का उद्देश्य नई सिफारिशों के साथ आना नहीं है बल्कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति की मौजूदा सिफारिशों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करना है।समिति हर 4 महीने में परियोजना की प्रगति पर सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करेगी। अब सड़क की चैड़ाई 10 मीटर करने की इजाजत दे दी गई है। यह सच है कि राजमार्ग जो सशस्त्र बलों के लिए रणनीतिक सड़कें हैं, उनकी तुलना ऐसी अन्य पहाड़ी सड़कों से नहीं की जा सकती है।हमने पाया कि रक्षा मंत्रालय द्वारा दायर एमए में कोई दुर्भावना नहीं है। आलबेदर रोड सशस्त्र बलों की परिचालन आवश्यकता को डिजाइन करने के लिए अधिकृत है। सुरक्षा समिति की बैठक में उठाई गई सुरक्षा चिंताओं से रक्षा मंत्रालय की प्रामाणिकता स्पष्ट है।सशस्त्र बलों को मीडिया को दिए गए बयान के लिए पत्थर में लिखे गए बयान के रूप में नहीं लिया जा सकता है। न्यायिक समीक्षा के अभ्यास में यह अदालत सेना की आवश्यकताओं का दूसरा अनुमान नहीं लगा सकती है। गौरतलब है कि 11 नवंबर को चारधाम परियोजना में सड़क की चैड़ाई बढ़ाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। याचिकाकर्ता की ओर से कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा, हिमालय के पर्यावरण की स्थिति खतरे में है।अभी तक आधी परियोजना पूरी हुई है। ऋषिकेश से माना इलाके में विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई पहाड़ों को विस्फोट से तोड़ने के कार्यों से भू स्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़ और बादल फटने की भी घटनाएं बढ़ी हैं। इस बाबत गठित उच्चाधिकार समिति यानी एचपीसी की भी रिपोर्ट्स ने कई गंभीर मुद्दों की ओर इशारा किया है।हिमालय के उच्च इलाकों में पचास किलोमीटर के दायरे में कई हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट चल रहे हैं।चारधाम क्षेत्र में भी विकास के नाम पर अंधाधुंध निर्माण जारी है, फौरन इनको रोकने की जरूरत है। उन्होंने कहा जहां सूरज की रोशनी नहीं आती वहां वनस्पति भी नहीं होती।इस उपाय से हरियाली बढ़ेगी। इन उपायों का आने वाली पीढ़ियों पर असर पड़ेगा क्योंकि पर्यावरण, गंगा यमुना जैसी नदियों के प्रवाह और संरक्षण पर असर पड़ेगा।भगवान चार धाम में नहीं बल्कि प्रकृति में है। उत्तराखंड में खनन का मुद्दा भी बड़ा होता जा रहा है और विपक्षी पार्टियां इसे लेकर राज्य सरकार पर हमलावर दिख रही हैं। ताजा मामला जनपद उत्तरकाशी के भागीरथी (गंगा) नदी पर खनन करने वाले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के नियमों की धज्जियां उड़ाए जाने के आरोपों से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि यहां जिस तरह खनन किया जा रहा है, उससे यह मुद्दा विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा होता जा रहा है। कांग्रेस जहां पहले ही भाजपा पर खनन संबंधी भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगा चुकी है, तो अब आम आदमी पार्टी ने भी भाजपा सरकार पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। जनपद उत्तरकाशी में डुंडा व चिन्यालीसौड़ प्रखंड में भागीरथी नदी में खनन माफिया बेलगाम हो गए है। पूरी नदी में कई जगह जेसीबी मशीन उतारकर जमकर खनन किया जा रहा है। जनपद मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर डुंडा तहसील क्षेत्र के कच्चडू देवता मंदिर के पास एक खनन कारोबारी ने तो बिना अनुमति और एनजीटी के नियमों को ताक पर रखकर भागीरथी नदी पर सड़क ही बना डाली। बोल्डर व मिट्टी भरकर नदी का प्रवाह भी रोक दिया। खास तौर से गंगोत्री विधानसभा में अवैध खनन पर निशाना साधते हुए आम आदमी पार्टी की नेत्री पुष्पा चैहान ने कहा, आप लगातार प्रदेश पर ऐसे नीति बनाने की बात कर रही है, जिससे सीधे सूबे की जनता को लाभ हो। वहीं, गंगा विचारमंच के प्रदेश संयोजक लोकेंद्र बिष्ट ने भी अवैध खनन को लेकर चिंता जताई। मुद्दा जनपद में गरमाया, तो जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने आनन फानन में अधिकारियों को निर्देश दिए। इसलिए पर्यावरण प्रेमियों को और सरकार को इन खनन माफियाओं के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। (हिफी) हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 05:01 AM PST काशी का सांस्कृतिक सन्देश(डॉ. दिलीप अग्निहोत्री-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा) भगवान शिव जी की नगरी के रूप में काशी आदिकाल से विश्व में प्रतिष्ठित रही है। विश्वगुरु भारत की यह सांस्कृतिक राजधानी हुआ करती थी। अनेक देशों के लोग यहां ज्ञानार्जन हेतु पहुंचते थे। भगवान शिव की कथा में काशी और गंगा जी का प्रसंग रहता है। हजार वर्ष पहले गंगा जी के तट पर दिव्य श्री काशी विश्वनाथ धाम मंदिर का निर्माण किया गया था। यह भारतीय संस्कृति का महान केंद्र था। इसलिए विदेशी आक्रान्ताओं का कहर भी काशी पर रहा। नरेंद्र मोदी ने काशी को क्वेटो की भांति विश्व स्तरीय सुविधाओं से सम्पन्न बनाने का संकल्प लिया था, जिससे दुनिया के प्रमुख तीर्थ व पर्यटन स्थल के रूप में इसकी पहचान कायम हो सके। यह मात्र धर्मिक आस्था का विषय नहीं है। पर्यटन विकास से अर्थव्यवस्था को लाभ होता है। बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में रोजगार का सृजन होता है। लेकिन भारत में तीर्थ स्थलों के विकास का ऐसा विजन कभी नहीं रहा। इस विषय को साम्प्रदायिक मान लिया गया। नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस धारणा को बदल दिया। इनके कार्यकाल में तीर्थ स्थलों का अभूतपूर्व विकास किया जा रहा। भव्य दिव्य प्रयागराज कुंभ के आयोजन का भी यही सन्देश था। अयोध्या जी में श्री राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रगति पर है। इसके साथ ही हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इसी क्रम में श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का लोकार्पण शामिल है। कुछ वर्ष पहले तक इस स्वरूप की कल्पना करना भी संभव नहीं थी। काशी विश्वनाथ को यथास्थिति में ही स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। नरेंद्र मोदी और योगी आदित्य नाथ ने विकल्प की तलाश की। इस पूरे स्थल को भव्य दिव्य बना दिया गया। पहले यहां मंदिर क्षेत्र केवल तीन हजार वर्ग फीट में था। वह अब करीब पांच लाख वर्ग फीट का हो गया है। नरेंद्र मोदी ने कहा कि विश्वनाथ धाम का यह पूरा नया परिसर एक भव्य भवन मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत की सनातन संस्कृति का प्रतीक है। यह हमारी आध्यात्मिक आत्मा का प्रतीक है। यह भारत की प्राचीनता और परम्पराओं का प्रतीक है। यह भारत की ऊर्जा व गतिशीलता का प्रतीक है। यहां केवल आस्था के ही दर्शन नहीं होंगे बल्कि यहां अपने अतीत के गौरव की अनुभूति भी होगी। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को गंगा नदी के तट से जोड़ने का अद्भुत कार्य वर्तमान सरकार द्वारा किया गया। इस परियोजना की आधारशिला करीब तीन वर्ष पहले नरेंद्र मोदी ने रखी थी। परियोजना के पहले चरण में तेईस भवनों का उद्घाटन किया गया। ये भवन श्री काशी विश्वनाथ मंदिर आने वाले तीर्थ यात्रियों को कई तरह की सुविधाएं प्रदान करेंगे जिनमें यात्री सुविधा केंद्र, पर्यटक सुविधा केंद्र, वैदिक केंद्र, मुमुक्षु भवन, भोगशाला, सिटी म्यूजियम, दर्शक दीर्घा, फूड कोर्ट आदि शामिल है। इस परियोजना के अंतर्गत श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास तीन सौ से अधिक संपत्तियों की खरीद और अधिग्रहण किया गया। चैदह सौ लोगों का सद्भावना के साथ पुनर्वास किया गया। कोविड महामारी के बावजूद इस परियोजना का निर्माण कार्य निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही पूरा कर लिया गया है। भगवान भोलेनाथ सभी का कल्याण करते है। इसमें समरसता का भाव है। नरेंद्र मोदी ने श्रीकाशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण कार्य में योगदान करने वाले श्रमिकों के ऊपर पुष्प वर्षा की,उनके साथ भोजन किया। उनका यह कार्य समरसता की भावना के अनुरूप था। नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय एकता व स्वाभिमान का सन्देश भी दिया। भारत ने विदेशी आक्रांताओं द्वारा किये गए विध्वंसों के बाबजूद अपनी संस्कृति को जीवंत बनाये रखा है। क्योंकि यहां औरंगजेब व सालार मसूद जैसे आक्रान्ताओं को जवाब देने के लिए शिवा जी व महाराज सुहेल देव भी जन्म लेते रहे है। महाराणा प्रताप रानी लक्ष्मी बाई जैसी अनगिनत महान विभूतियां हुई। आजादी के अमृत महोत्सव में राष्ट्रीय स्वाभिमान के अनेक प्रसंग उजागर हो रहे है। इन सभी महान लोगों ने भारतीय संस्कृति के स्वाभिमान के पुनर्निर्माण का संदेश दिया। नरेंद्र मोदी ने कहा कि जब कभी औरंगजेब आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं। जब कोई सालार मसूद इधर बढ़ता है तो राजा सुहेलदेव जैसे वीर योद्धा उसे हमारी एकता की ताकत का अहसास करा देते हैं। मुगल आक्रांतों द्वारा तोड़े गये काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए महाराष्ट्र की अहिल्या बाई होल्कर और मंदिर की भव्यता बढ़ाने वाले पंजाब के महाराज रणजीत सिंह का नाम लेकर उन्होंने राष्ट्रीय एकता का भी संदेश दिया था। नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ को काशी के विश्वनाथ से जोड़ते हुए द्वादश ज्योतिर्लिंग की भी चर्चा की। अरुणाचल के परशुराम कुंड का उल्लेख किया। नरेंद्र मोदी ने पौराणिक ग्रंथों के उद्धरणों का उल्लेख किया। कहा कि यहां केवल डमरु वाले की ही सरकार चलती है। उसकी इच्छा के बिना यहां कुछ भी नहीं हो पाता है। प्रधानमंत्री ने कहा, विश्वनाथ धाम का ये पूरा नया परिसर एक भव्य भवन भर नहीं है, ये प्रतीक है, हमारे भारत की सनातन संस्कृति का! ये प्रतीक है, हमारी आध्यात्मिक आत्मा का! ये प्रतीक है, भारत की प्राचीनता का, परम्पराओं का! भारत की ऊर्जा का, गतिशीलता का। पीएम ने कहा, आपको यहाँ अपने अतीत के गौरव का अहसास भी होगा। कैसे प्राचीनता और नवीनता एक साथ सजीव हो रही हैं, कैसे पुरातन की प्रेरणाएं भविष्य को दिशा दे रही हैं, इसके साक्षात दर्शन विश्वनाथ धाम परिसर में हम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, जब मैं बनारस आया था, तो मुझे अपने से ज्यादा बनारस के लोगों पर भरोसा था। कुछ लोग ऐसे थे जो बनारस के लोगों पर संदेह करते थे कि कैसे होगा, होगा ही नहीं. मुझे आश्चर्य होता कि बनारस के बारे में ऐसी धारणा बना ली गई थी। ये जड़ता बनारस की नहीं थी। उन्होंने समय पर काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट पूरा होने पर राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना की और मंदिर के पुनर्मिर्माण कार्य में लगे सभी श्रमिकों का आभार जताया। पीएम ने कहा, मैं आज अपने हर उस श्रमिक भाई-बहन का भी आभार व्यक्त करना चाहता हूं जिसका पसीना इस भव्य परिसर के निर्माण में बहा है। कोरोना के विपरीत काल में भी, उन्होंने यहां पर काम रुकने नहीं दिया। इससे पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा अनुष्ठान के बाद प्रधानमंत्री ने काशी विश्वनाथ धाम परिसर के दर्जनों सफाई कर्मचारियों पर पुष्पवर्षा की और घूम-घूमकर सफाई कर्मचारियों के पास पहुंचे। इसके बाद पीएम मोदी ने सफाई कर्मचारियों के साथ फोटो भी खिंचवाई। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के बाद पीएम ने सोमवार रात को शहर में हो रहे प्रमुख विकास कार्यों का जायजा लिया। साथ ही आधी रात को बनारस रेलवे स्टेशन का भी निरीक्षण किया. इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रधानमंत्री के साथ मौजूद रहे। पीएम मोदी ने इससे जुड़ी तस्वीरों को अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया है। पीएम मोदी आधी रात को बनारस रेलवे स्टेशन पहुंचे। इस दौरान सीएम योगी भी उनके साथ रहे। पीएम ने ट्वीट में कहा, अगला पड़ाव... बनारस स्टेशन। हम रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने के साथ स्वच्छ, आधुनिक और यात्री अनुकूल रेलवे स्टेशनों की दिशा में काम रहे हैं। प्रधानमंत्री ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर का दौरा किया। साथ ही काशी में चल रहे अहम विकास कार्यों का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि हमारा प्रयास है कि इस पवित्र शहर के लिए सर्वोत्तम संभव बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए। (हिफी) हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| नीरव मोदी के प्रत्यर्पण पर सुनवाई Posted: 14 Dec 2021 04:58 AM PST नीरव मोदी के प्रत्यर्पण पर सुनवाईलंदन। पंजाब नेशनल बैंक के मास्टरमाइंड और भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के भारत प्रत्यर्पण की अपील पर इंग्लैंड के हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। नीरव मोदी ने मानसिक स्वास्थ्य और मानवाधिकार आधारों पर राहत के लिए अपील कर रखी है। इस साल अगस्त की शुरुआत में नीरव मोदी को इस आधार पर इंग्लैंड से भारत प्रत्यर्पण के खिलाफ अपील करने की अनुमति दी गई थी कि भारत लौटने से उसका मानसिक स्वास्थ्य खराब होगा और वह आत्महत्या कर सकता है। नीरव मोदी के वकील लंबे समय से तर्क दे रहे हैं कि उनके मुवक्किल गंभीर अवसाद से पीड़ित हैं। अगर उन्हें मुंबई की आर्थर रोड जेल में कैद किया जाता है, तो उन्हें पर्याप्त चिकित्सा देखभाल नहीं मिलेगी। नीरव मोदी के वकीलों ने कहा कि मार्च 2019 में लंदन में उनकी गिरफ्तारी और कोविड -19 महामारी के दौरान जेलों पर लगाए गए सख्त प्रतिबंधों के बाद दक्षिण लंदन के वैंड्सवर्थ जेल में उनकी मानसिक स्थिति और बिगड़ गई थी। उन्होंने कई चिकित्सा विशेषज्ञों को भी इस बात का सबूत देने के लिए पेश किया था कि नीरव मोदी को आत्महत्या करने का भारी खतरा है। नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी पर पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारियों के साथ मिलकर 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला करने का आरोप है। यह धोखाधड़ी गारंटी पत्र के जरिए की गई। उस पर भारत में बैंक घोटाला और मनी लॉन्ड्रिंग के तहत दो प्रमुख मामले सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने दर्ज किए हैं। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| करांची में ओमिक्रान का मिला मरीज Posted: 14 Dec 2021 04:55 AM PST करांची में ओमिक्रान का मिला मरीजइस्लामाबाद। पाकिस्तान में भी कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन ने एंट्री मार दी है। कराची में एक मरीज ओमिक्रॉन से संक्रमित पाया गया है। आगा खान विश्वविद्यालय अस्पताल ने बताया कि जीन सिक्वेंसिंग के माध्यम से एक मरीज में नए कोरोना वायरस वेरिएंट का पता चला है। यह जानकारी स्थानीय मीडिया के जरिए सामने आई हैं। ओमिक्रॉन का केस मिलने के बाद पाकिस्तान की इमरान खान सरकार अब टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर जोर दे रही है। साथ ही लोगों को जितना हो सके घरों में ही रहने को कहा जा रहा है। इसके बाद नेशनल कमांड एंड ऑपरेशन सेंटर (एनसीओसी) ने एक ट्वीट कर कहा, 'इस्लामाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ इस बात की पुष्टि करने में सक्षम है कि कराची से हाल ही में संदिग्ध सैंपल वास्तव में सार्स-कोव2 का 'ओमिक्रॉन वेरिएंट' है। यह पहले मामले की पुष्टि हुई है, लेकिन मामलों की पहचान करने के लिए सैंपलों की लगातार निगरानी की जा रही है।' इससे पहले पाकिस्तान में प्रांतीय सिंध स्वास्थ्य विभाग और आगा खान विश्वविद्यालय अस्पताल के अधिकारियों ने कराची में कोविड-19 के ओमिक्रॉन वेरिएंट के 'अत्यधिक संदिग्ध' मामले का पता लगाने की घोषणा की थी। सिंध प्रांत की स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अजरा फजल पुचुहो ने कहा था कि मरीज की आयु 57 वर्ष है, लेकिन स्थानीय समाचार चैनलों ने बताया कि इलाज के लिए एक निजी अस्पताल गयी महिला की आयु करीब 65 वर्ष है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया था कि मरीज में संक्रमण के कोई लक्षण नहीं हैं और उसे घर पर आइसोलेशन में रहने को कहा गया है। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| दुबई में अब नहीं होता कागज का प्रयोग Posted: 14 Dec 2021 04:29 AM PST दुबई में अब नहीं होता कागज का प्रयोगदुबई। संयुक्त अरब अमीरात के युवराज और दुबई के क्राउन प्रिंस शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने घोषणा की कि दुबई सरकार शत प्रतिशत कागज रहित होने वाली दुनिया की पहली सरकार बन गई है। इससे 1.3 अरब दिरहम (35 करोड़ डॉलर) और एक करोड़ 40 लाख श्रम घंटों की बचत हुई है। दुबई में अब कागज का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद हो गया है। ऐसे कई पश्चिमी देश हैं जो इस लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा। ये देश अपनी तकनीक और सेवाओं को आधुनिक बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन साइबर सुरक्षा के प्रति बढ़ते खतरों के चलते इनके लिए यह राह आसान नहीं है। दुबई सरकार में सभी आंतरिक, बाहरी लेनदेन और प्रक्रियाएं अब शत प्रतिशत डिजिटल हैं। एक व्यापक डिजिटल सरकारी सेवा मंच इसका प्रबंधन करता है। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| जलवायु परिवर्तन पर अकेला पड़ा अमेरिका Posted: 14 Dec 2021 04:28 AM PST जलवायु परिवर्तन पर अकेला पड़ा अमेरिकान्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र संघ में जलवायु परिवर्तन को लेकर एक प्रस्ताव को लेकर भारत-रूस और चीन एक साथ अमेरिका के खिलाफ हो गए हैं। इससे अमेरिका अलग-थलग पड़ गया। रूस ने जलवायु परिवर्तन को अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के लिए खतरा बताने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अपनी तरह के पहले प्रस्ताव के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल किया। आयरलैंड और नाइजर के नेतृत्व में पेश किए गए प्रस्ताव ने 'जलवायु परिवर्तन के सुरक्षा प्रभावों संबंधी जानकारी शामिल करने' का आह्वान किया था, ताकि परिषद 'संघर्ष या जोखिम बढ़ाने वाले कारकों के मूल कारणों पर पर्याप्त ध्यान दे सके।' वहीं, भारत-चीन भी इसके विरोध में खड़ा हुआ। इस प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र महासचिव से जलवायु संबंधी सुरक्षा जोखिमों को संघर्ष निवारण रणनीतियों का 'एक केंद्रीय घटक' बनाने के लिए भी कहा गया है। परिषद के पूर्व प्रस्तावों में विभिन्न अफ्रीकी देशों और इराक जैसे विशिष्ट स्थानों में जलवायु परिवर्तन के अस्थिर करने वाले प्रभावों का उल्लेख किया गया है, लेकिन 13 दिसम्बर का प्रस्ताव पहला ऐसा प्रस्ताव है, जिसमें जलवायु संबंधी सुरक्षा खतरों को स्वयं एक मुद्दा बनाया गया है। भारत ने यूएनएससी के एक मसौदा प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया है। इस प्रस्ताव के जरिए जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी कदमों को 'सुरक्षित' करने और ग्लासगो में कड़ी मेहनत से किए गए सहमति समझौतों को कमजोर करने की कोशिश की गई है। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| स्वाधीनता संग्राम का गुमनाम सेनानी तेलंगा खड़िया-अशोक “प्रवृद्ध” Posted: 14 Dec 2021 03:32 AM PST स्वाधीनता संग्राम का गुमनाम सेनानी तेलंगा खड़िया-अशोक "प्रवृद्ध"भारतीय सभ्यता- संस्कृति, स्वाभिमान और स्वायत्तता अर्थात स्वाधीनता के लिए अनेक वीर बलिदानियों ने अपने प्राणपण अर्पित कर दिए, लेकिन विभाजित भारत के सत्ताधीशों और सत्तापालित इतिहासकारों द्वारा ऐसे स्वातंत्र्यचेता राष्ट्रभक्त वीर बलिदानियों को इतिहास में समुचित स्थान नहीं दिए जाने के कारण वे आज भी उपेक्षित, गुमनाम हैं। ऐसे ही वीर बलिदानियों में प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के पूर्व ही झारखण्ड के बड़े इलाके में स्वतंत्रता के प्रति अलख जगाने वाले तेलंगा खड़िया भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे गुमनाम सपूत हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण जिन्दगी आंग्ल शासकों एवं देशीय जयचंदों के साथ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। तेलंगा खड़िया छोटानागपुर के ऐसे वीर सपूत थे, जिन्होंने ब्रिटिश अर्थात अंग्रेजी शासन को नकार दिया था। उन्होंने ब्रिटिश शासन को ललकार कर हुंकार भरते हुए कहा था - जमीन हमारी, जंगल हमारे, मेहनत हमारी, फसलें हमारी, तो फिर हमसे लगान और मालगुजारी वसूलने वाले जमींदार और अंग्रेज कौन होते हैं ? अंग्रेजों के पास अगर गोली-बारूद हैं, तो हमारे पास भी तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, फरसे हैं। बस फिर क्या था, स्वाधीनता सेनानियों की तेज हुंकार से आसमान तक कांप उठा। उन्होंने सभी धर्म, जाति, वर्ग से अपील की कि देश की स्वतन्त्रता के लिए अंग्रेजों को मार बाहर भगाओ। वह जमीदारों, साहूकारों को अत्याचार करने से मना करते थे। अंग्रेजों से संग्राम के लिए तेलंगा ने जोड़ी (जुड़ी) पंचैत संगठन की स्थापना की। यह एक ऐसा संगठन था, जिसमें स्वाधीनता सेनानियों अर्थात अंग्रेजी शासन के विरोधियों,विद्रोहियों को समस्त प्रकार की युद्ध विद्याओं सहित रणनीति बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था। रणनीतिक दस्ता युद्ध की योजनाएं बनाता और लड़ाके जंगलों, घाटियों में छिपकर सामयिक अनुकूलानुसार गुरिल्ला युद्ध करते। 1857 के पूर्व ही नया भू कर कानून के खिलाफ तेलंगा खड़िया ने आंदोलन शुरू कर दिया था, जिसके संगठित विरोध के आगे अंग्रेज जमींदार गठजोड़ के छक्के छूट गए थे, और इससे खफा होकर इस गठजोड़द्वय के द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। परन्तु खेद की बात है कि ऐसे वीर स्वाधीनता सेनानी का इतिहास में कोई जिक्र नहीं है। हाँ, खड़िया लोकगीतों व स्थानीय कथाओं में तेलंगा आज भी अवश्य जीवित व अमर हैं। खड़िया लोकगीतों के अनुसार मुरूनगुर इलाके में सन 1840-60 के आस-पास तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में जमींदारों, महाजनों तथा अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक जबरदस्त आंदोलन हुआ था । यह आंदोलन मूल रूप से जमीन वापसी और जमीन पर झारखंडी समुदाय के परंपरागत हक की बहाली के लिए था। तेलंगा के अभ्युदय के बाद कर्ज से दबे और जमींदार-पुलिस की मार से उत्पीड़ित समुदाय में नयी चेतना आयी। शोषण के विरूद्ध लोग संगठित होने लगे। तेलंगा के सांगठनिक कौशल व साहसी नेतृत्व ने लोगों में अंग्रेजी राज के विरुद्ध विद्रोह की आग भर दी। देखते-ही-देखते समूचे इलाके में तेलंगा का संगठन जोड़ी पंचैत खड़ा हो गया और जोड़ी पंचैत के लड़ाकू सदस्यों ने सुनियोजित तरीके से अंग्रेजों पर हल्ला बोलना शुरू कर दिया । तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फ़रवरी सन 1806 ई० को झारखंड प्रदेश के गुमला जिले के सर्वाधिक प्राचीन ग्राम सिसई प्रखंड के मुरूनगुर वर्तमान मुरगू ग्राम में एक साधारण किसान के परिवार में हुआ था। तेलंगा के पिता का नाम ठुईया खड़िया तथा माँ का नाम पेती (पेतो) खड़िया था और इनकी पत्नी का नाम रत्नी खड़िया था। ये खड़ियाओं के प्राचीन गढ़ अर्थात खड़ियागढ़ के नाम से स्मरण किये जाने वाले मुरूनगुर के प्रथम रैयत सिरु खड़िया और उनकी धर्मपत्नी बुची खड़िया के वंशज थे, हालांकि अज्ञानता वश लोग तेलंगा खड़िया के दादा का नाम सिरू खड़िया तथा दादी का नाम बुच्ची खड़िया बतलाया करते हैं । अथवा यह भी हो सकता है, जैसा कि अनेक जनजातीय व अन्य भारतीय समुदायों में पूर्वजों के नाम पर संतानों के नाम रखे जाने की परिपाटी प्रचलित है, के अनुसार खड़ियाओं के पूर्वज सिरु - बुच्ची के नाम पर तेलंगा के दादा - दादी का नाम संयोगवशात सिरु व बुच्ची खड़िया रखे गये हों और उनके मध्य विवाह सम्बन्ध कायम हो गये हों । खैर कुछ भी हो तेलंगा खड़िया मुरगू ग्राम के जमींदार तथा पाहन परिवार के थे। पैतृक परम्परानुसार तेलंगा के पिता छोटानागपुर के राजवंश नागवंशी महाराजाओं के भंडारी थे । उनके दादा सिरू खड़िया अत्यंत सामाजिक, धार्मिक, सरल तथा साहित्यिक विचार के व्यक्ति थे। वीर साहसी और अधिक बोलने वाले को खड़िया भाषा में तेऽबलंगा कहते हैं। इसीलिए बाल्यकाल में ही बाघ से लड़ जाने वाले तथा मुंह पर सत्य बात कहने वाले ठुईया खड़िया के वीर व साहसी पुत्र को तेऽबलंगा के नाम से जाना जाने लगा, बाद में यही तेऽबलंगा तेलंगा के नाम से प्रसिद्ध हुआ और क्षेत्र के आदिवासी व गैर आदिवासी सदान समाज के लोगों को संगठित कर देश को स्वाधीन करने के लिए जगह-जगह जन अभियान चलाकर अंगेजों का जीना मुहाल कर दिया । उनका शरीर हट्ठा-कट्ठा, रंग सांवला तथा उनकी ऊंचाई पांच फीट 8 इंच थी। 40 वर्ष की आयु में तेलंगा के माता-पिता ने उनका विवाह उनकी पसंद की रतनी नामक एक खड़िया युवती से कर दी । जिससे तेलंगा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई । उसका नाम बलंगा खड़िया था । बलंगा भी बड़ा होकर अपने पिता का अनुगामी सिद्ध हुआ और पिता से कंधा से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के दांत खट्टे करने में साथ निभाने लगा। तेलंगा की पत्नी रत्नी खड़िया ने भी हर मोर्चे पर अपने पति का साथ दिया। तेलंगा की अनुपस्थिति में रत्नी ने कई स्थानों पर अकेले ही नेतृत्व संभालते हुए अंग्रेजों से लोहा लिया। 23 अप्रैल 1880 को अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह के द्वारा गोली मारकर तेलंगा खड़िया की हत्या कर दिए जाने के बाद भी रत्नी खड़िया ने अपने पुत्र बलंगा व उसके सहयोगियों के माध्यम से पति के अधूरे कार्यां को पूरा किया। वह अपनी सादगी, ईमानदारी और सत्यवादिता से लोगों में जीवन का संचार करती रहीं। तेलंगा खड़िया सहृदय समाजसेवी थे, और जाति-धर्म से ऊपर उठकर काम किया करते थे। उनका अपने पिता ठुईया खड़िया के साथ नागवंशी राजाओं की राजधानी रातुगढ़ भी आना -जाना लगा रहता था और वे क्षेत्र व देश के राजनीतिक - सामाजिक गतिविधियों से भी अवगत होते रहते थे। वे समाज के सभी समुदाय के लोगों के साथ समान व्यवहार किया करते थे। तेलंगा को अपने सनातन सरना धर्म पर अटूट विश्वास था। एक सुयोग्य सैनिक, सफल कृषक, सुरीला बांसुरीवादक होने के साथ-साथ तेलंगा अस्त्र-शस्त्र चलाना भी भली- भांति जानते थे तथा लोगों को इन विद्याओं की शिक्षा भी देते थे। तेलंगा समाज के सभी अंगों के लोगों को संगठित कर भारत को स्वतंत्र करने के लिए जगह-जगह बैठक किया करते थे। देश के अन्य क्षेत्रों की भांति ही छोटानागपुर के इस क्षेत्र पर भी उस समय अंग्रेजों ने अपना शिकंजा कश कहर बरपाना शुरू कर दिया था। तेलंगा के जन्म के पूर्व 1793 से ही लागू 1793 परमानेंट सेटेलमेंट एक्ट ने क्षेत्र में बसे आदिवासियों -गैरआदिवासियों का जीना हराम कर दिया। अंग्रेज लोगों को मानसिक शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर टैक्स वसूल किया करते थे। इस दौरान छोटानागपुर के लोगों में एकता का सर्वथा अभाव था और वे आसानी से अंग्रेजों के फूट डालों शासन करो की नीति का शिकार हो जाया करते थे। अंग्रेजों के इस अत्याचार व शोषण को देख तेलंगा से रहा नहीं गया और उन्होंने अग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन का शंखनाद कर दिया । तेलंगा खड़िया ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित व गोलबंद किया और जंग के मैदान में दुश्मनों के गोलियों का मुकाबला तीर-धनुष से करने के लिए तैयार किया । देखते ही देखते नया भू कर अधिनियम के विरोध में तेलंगा के नेतृत्व में संगठित विद्रोह फूट पड़ा और हर गांव में जोड़ी अर्थात जुड़ी पंचैत बनने लगे। अखाड़े में युवा युद्ध का अभ्यास करने लगे। हर जोड़ी पंचैत एक दूसरे से रणनीतिक तौर पर आपस में जुड़े हुए थे और उनमें परस्पर संवाद और तालमेल बेहद सुलझा हुआ था। जमींदारों के लठैतों और अंग्रेजी सेना के आने के पहले ही उन्हें उसकी सूचना मिल जाती थी। विद्रोही सेना पहले से ही तैयार रहती और दुश्मनों के आने पर उन पर अकस्मात टूट पड़ती थी और उनकी जमकर धुनाई करती। तेलंगा ने छोटे स्तर पर ही सही, मगर अंग्रेजों के समानांतर सत्ता का विकल्प खोल दिया था। तेलंगा ने अपने संग्राम की शुरूआत अपने जन्म स्थल मुरूनगुर वर्तमान मूरगू गांव से की, जहां उन्होंने मालगुजारी वसूली करने आये सिपाहियों और दलालों पर आक्रमण कर उन्हें गांव से खदेड़ डाला। यह तेलंगा का अंग्रेजों पर पहला सीधा आक्रमण था। कोड़े और बंदूक की मार से पिटे- सहमे रहने वाले ग्रामीणों से ऐसी हिम्मत की अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन जब बार-बार उनके कारिंदों और सिपाहियों पर हमले होने लगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ी तो उन्हें तेलंगा के जुड़ी पंचैत की शक्ति और व्यापकता का अहसास हुआ । दरअसल उस समय अधिकतर गांव जमींदारी और अंग्रेजी शोषण से पीडि़त थे। इसलिए उनकी लड़ाई को ग्रामीणों का भारी समर्थन मिल रहा था। गुरिल्ला युद्ध में दुश्मनों को पछाड़ने के बाद विद्रोही जंगलों में भूमिगत हो जाते। इस संग्राम की व्यापकता की भनक लगने के पूर्व ही तेलंगा जमींदारों और अंग्रेजी शासन के लिए एक भय खौफ बन चुके थे। इसलिए अंग्रेज सरकार ने तेलंगा को पकड़ने का फरमान जारी कर दिया और उन्हें पकड़ने के लिए इनाम का जाल बिछाया गया। कई लोग इनाम के इस लालच में आ गए और गुप्त सूचना पर तेलंगा को बसिया प्रखंड के कुम्हारी गांव में बैठक करते हुए बंदी बना लिया गया। खड़िया लोकगीत के अनुसार तेलंगा को गिरफ्तार कर जोड़ा भर बेड़ियों में बांध कर लोहरदगा लाया गया। जहां उन पर मुकदमा चलाया गया और चौदह वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई। तेलंगा खड़िया को गिरफ्तार कर कोलकाता के सेंट्रल जेल में रखा गया। उन्हें वर्षों तक अमानवीय यातनाएं दी गयीं। चौदह वर्ष पश्चात जेल से छूटने के बाद तेलंगा के विद्रोही तेवर और भी तल्ख हो गये और उन्होंने फिर से लोगों को संगठित करना शुरू किया। जंगल की जमीन से अंग्रेजों को हटाने के लिए युवा वर्ग को पुनः गदका, तीर और तलवार चलाने की शिक्षा दी जाने लगी । तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में खड़िया विद्रोह 1880 में इस क्षेत्र में प्रयाप्त विस्तार को प्राप्त हुआ। यह आंदोलन अपनी धरती की रक्षा के लिए शुरू हुआ। तेलंगा व उनके सहयोगियों की दहाड़ से जमींदारों के बंगले कांप उठे। जोड़ी पंचैत फिर से जिन्दा हो उठा और युद्ध प्रशिक्षणों का दौर पुनः प्रारंभ हो गया। सिसई , बसिया से कोलेबिरा, बानो, सिमडेगा तक विद्रोह की लपटें शीघ्र ही फैल गईं। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, हर कोई अंग्रेजों -जमींदारों के विरूद्ध उस लड़ाई में भाग ले रहा था। तेलंगा जमींदारों और ब्रिटिश सरकार के लिए एक घायल शेर की भांति चुनौती बन चुका था। उससे बचने के लिए उनके पास एकमात्र विकल्प अर्थात रास्ता तेलंगा को येन- केन- प्रकारेण मार डालने के रूप में ही बची थी । 23 अप्रैल 1880 को तेलंगा समेत उनके कई प्रमुख शिष्यों को अंग्रेजी सेना ने सिसई के समीप एक बगीचे में, जब वे जुड़ी पंचैत के प्रतीक सफ़ेद रंग के झंडे को नमन व प्रार्थना कर रहे थे, घेर लिया। प्रार्थना समाप्त करने पर अपने को दुश्मनों से घिरता देख तेलंगा गरज उठे - हिम्मत है तो सामने आकर लड़ो। खड़िया गीतों के अनुसार तेलंगा की उस दहाड़ से समूचा इलाका थर्रा गया था। युद्ध कौशल से प्रशिक्षित जुड़ी पंचैत के सदस्यों से सीधी टक्कर लेने की हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। अंग्रेजों के दलाल सिसई प्रखंड के बरगाँव गाँव निवासी जमींदार बोधन सिंह ने झाडि़यों में छिपकर तेलंगा की पीठ पर गोली चला दी। गोली लगने पर वे गिर पड़े, परंतु बेहोश तेलंगा के पास आने की भी हिम्मत दुश्मनों में नहीं थी। मौके का फायदा उठाकर उनके शिष्यों ने तेलंगा को ले जंगल में गायब हो गए और उनके पार्थिव शरीर को गुमला प्रखंड के सोसो गाँव के नीमडीह नामक स्थान में दफना दिया । तेलंगा फिर कभी नजर नहीं आए। खडि़या लोकगीतों में आज भी तेलंगा जीवित हैं। तेलंगा खड़िया के स्मरण में प्रतिवर्ष 9 फरवरी को मुरगू गांव में विशाल जयंती सह जतरा का आयोजन किया जाता है। इसका आयोजन मयूरी युवा क्लब मुरगू के तत्वावधान में किया जाता है। स्वातंत्र्यचेता वीर बलिदानी तेलंगा खड़िया को स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में सादर नमन। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 03:30 AM PST अपना-अपना होता हैराम नगर में प्रमोद नाम का एक नवयुवक अपनी बहन के ससुराल घर के आसपास डेरा लेकर रहता था। उसी शहर में वह प्राइवेट नौकरी कर अपना परिवार चला रहा था। एक दिन प्रमोद की बड़ी बहन कौशल्या देवी अपने भाई से बोली कि तुम्हारे नजर में राम प्रवेश के लायक कोई सुन्दर लड़की हो तो हमें बताना। प्रमोद ने अपने दूर के रिश्ते में एक भाई की एकलौती बेटी प्रीति से यह सोचकर शादी करवा दी कि जब मैं अपनी बहन के घर जाऊँगा तो यह मेरी सेवा-सत्कार करेगी एवं अच्छी चाय से स्वागत करेगी। एक बार की बात है कि प्रीति के चाचा प्रवीण प्रीति के ससुराल आये। प्रीति ने अपने चाचा का खूब आदर- सत्कार किया। उसी समय प्रमोद भी अपनी बहन के घर पहुँचा। प्रीति ने प्रवीण के साथ-साथ प्रमोद को भी फुल क्रीम दूध की बनी बेहतरीन चाय पिलायी। चाय पीते हुये प्रमोद वाह,वाह कर बैठा । वाह,वाह सुनकर चौंकते हुये प्रवीण प्रमोद से पूछ बैठा "आखिर वाह,वाह,वाह करने के पीछे क्या बजह है भैया। प्रमोद ने मुस्कुराते हुये कहा कि जिन्दगी में पहली बार मैं प्रीति के हाथों का बना हुआ इतना बेहतरीन व लाजवाब चाय पी रहा हूँ ।आज के पहले तक तो इसके हाथ का वाहियात व पनजोझर चाय पीते-पीते मैं बोर हो चुका था। तभी पास में हीं खड़े प्रीति के देवर रामकरण ने कहा मामा जी 'अपना खुन अपना होता है'। अब प्रवीण को सारा माजरा समझते देर नहीं लगती है। ----000--- अरविन्द अकेला हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| अतृप्त पूर्वजोंद्वारा कष्टसे मुक्ति देनेवाले भगवान दत्तात्रेय Posted: 14 Dec 2021 03:24 AM PST अतृप्त पूर्वजोंद्वारा कष्टसे मुक्ति देनेवाले भगवान दत्तात्रेयभगवान दत्तात्रेय की जयंती इस वर्ष मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी अर्थात १८ दिसंबर काे है । इस निमित्त भगवान दत्तात्रेय के बारे में संक्षेप में शास्त्रीय जानकारी जान लेते हैं...... दत्तात्रेय देवता में ब्रह्मा , विष्णु एवं महेश, इन त्रिदेवों के तत्त्व हैं । उनके हाथ में ब्रह्मदेव के कमंडल एवं जपमाला हैं, विष्णु के शंख एवं चक्र हैं तथा शिवजी के त्रिशूल एवं डमरू हैं । इन में से प्रत्येक वस्तु का विशिष्ट भावार्थ है, उदा. कमंडल त्याग का प्रतीक है । दत्तात्रेय देवता के कंधेपर एक झोली भी होती है । उसका भावार्थ इस प्रकार है । झोली, मधुमक्खी का प्रतीक है । जिस प्रकार मधुमक्खी विभिन्न स्थानोंपर जाकर शहद जमा करती है, उसी प्रकार दत्तात्रेय दर-दर घूमकर झोली में भिक्षा जमा करते हैं । दर-दर जाकर भिक्षा मांगने से अहं शीघ्रता से कम होता है । इसलिए झोली, अहं नष्ट होने का प्रतीक है । दत्त एवं उनके परिवार का क्या अर्थ है ? दत्तात्रेय देवता की विशेषता है कि, वे कभी भी अकेले नहीं दिखाई देते, सहपरिवार होते हैं । परिवार का आध्यात्मिक अर्थ इस प्रकार है । अ. दत्तात्रेय देवता के पीछे जो गाय है, वह पृथ्वी एवं कामधेनु का प्रतीक है । आ. चार कुत्ते, चार वेदों के प्रतीक हैं । गाय एवं कुत्ते, एक प्रकार से दत्तात्रेय देवता के अस्त्र भी हैं । गाय अपने सींग मारकर एवं कुत्ते काटकर शत्रु से रक्षण करते हैं । इ. औदुंबर यानी गूलर का वृक्ष दत्तात्रेय का पूजनीय रूप है; क्योंकि उसमें दत्त तत्त्व अधिक होता है । दत्तात्रेय देवताद्वारा किए गुणगुरूओं का स्मरण करना : जगत् की प्रत्येक विषय-वस्तु ही गुरु है; क्योंकि अनिष्ट विषय-वस्तु से कौन से दुर्गुण छोडने चाहिए तथा उचित विषय-वस्तु से कौन से सद्गुण लेने चाहिए, यह सीख सकते है । इसलिए दत्तात्रेय देवताने २४ गुरु एवं अनेक उपगुरु किए । हम भी इसका स्मरण रख विविध गुणगुरु बनाकर, अपने दुर्गुणों का भागाकार एवं सद्गुणों का गुणाकार करनेपर ईश्वरप्राप्ति शीघ्र होने में सहायता होगी । अतृप्त पूर्वजों के कारण होनेवाले कष्ट से रक्षा हेतु उपासना करें ! भगवान दत्तात्रेय गुरुतत्त्वका कार्य करते हैं, इसलिए जबतक सभी लोग मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेते, तबतक दत्त देवताका कार्य चलता ही रहेगा । भगवान दत्तात्रेयने प्रमुखरूपसे कुल सोलह अवतार धारण किए । प.पू. वासुदेवानंद सरस्वतीकृत 'श्री दत्तात्रेय षोडशावताराः ।' में इन अवतारों की कथाएं हैं । मूर्तिविज्ञान प्रत्येक देवता एक तत्त्व है । यह देवता-तत्त्व प्रत्येक युगमें होता है एवं कालानुरूप सगुण रूपमें प्रगट होता है, उदा. भगवान श्रीविष्णुद्वारा कार्यानुमेय धारण किए हुए नौ अवतार । मानव, कालानुसार देवताको विविध रूपोंमें पूजने लगता है । वर्ष १००० के आसपास दत्तकी मूर्ति त्रिमुखी हो गई; इससे पूर्व वह एकमुखी थी । दत्तकी त्रिमुखी मूर्तिमें प्रत्येक हाथमें धारण की गई वस्तु किस देवताका प्रतीक है, यह आगेकी सारणी में दिया है । हाथमें धारण की गई वस्तुएं किस देवताका प्रतीक ? १. कमंडलु एवं जपमाला ब्रह्मदेव २. शंख एवं चक्र श्रीविष्णु ३. त्रिशूल एवं डमरू शंकर वर्तमान काल में पूर्व की भांति कोई श्राद्ध-पक्ष इत्यादि नहीं करता और न ही साधना करता है । इसलिए अधिकतर सभी को पितृदोष (पूर्वजों की अतृप्ति के कारण कष्ट) होता है । आगे पितृदोष की संभावना है या वर्तमान में हो रहा कष्ट पितृदोष के कारण है, यह केवल उन्नत पुरुष ही बता सकते हैं । किसी उन्नत पुरुष से भेंट संभव न हो, तो यहां पितृदोष के कुछ लक्षण दिए हैं – विवाह न होना, पति-पत्नी में अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भधारण होने पर गर्भपात हो जाना, संतान का समय से पूर्व जन्म होना, मंदबुद्धि अथवा विकलांग संतान होना, संतान की बचपन में ही मृत्यु हो जाना आदि । व्यसन, दरिद्रता, शारीरिक रोग, ऐसे लक्षण भी हो सकते हैं । दत्त के नामजप से पितृदोष से रक्षा कैसे होती है ? अ. सुरक्षा-कवच निर्माण होना दत्त के नामजप से निर्मित शक्ति से नामजप करनेवाले के सर्व ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है । आ. पूर्वजों को गति प्राप्त होना अधिकांश लोग साधना नहीं करते । अतएव वे माया में अत्यधिक लिप्त होते हैं । इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों की लिंगदेह अतृप्त रहती है । ऐसे अतृप्त लिंगदेह मत्र्यलोक में (मृत्युलोक में) अटक जाते हैं । (मृत्युलोक भूलोक एवं भुवर्लोक के मध्य है ।) दत्त के नामजप के कारण मृत्युलोक में अटके पूर्वजों को गति मिलती है और वे अपने कर्म के अनुसार आगे के लोक में जाते हैं । इससे स्वाभाविक रूप से उनसे व्यक्ति को होनेवाले कष्ट की तीव्रता घट जाती है । दत्तात्रेय के नामजपद्वारा पूर्वजों के कष्टोंसे रक्षण कैसे होता है ? अतृप्त पूर्वजों से होनेवाले कष्ट पर उपाय १. किसी भी प्रकार का कष्ट न हो रहा हो, तो भी आगे चलकर कष्ट न हो इसलिए, साथ ही यदि थोडा सा भी कष्ट हो तो 'श्री गुरुदेव दत्त ।' नामजप १ से २ घंटे करें । शेष समय प्रारब्ध के कारण कष्ट न हो इस हेतु एवं आध्यात्मिक उन्नति हो इसलिए सामान्य मनुष्य अथवा प्राथमिक अवस्था का साधक कुलदेवता का अधिकाधिक नामजप करे । २. मध्यम कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ 'श्री गुरुदेव दत्त ।' नामजप प्रतिदिन २ से ४ घंटे करें । गुरुवार को दत्तमंदिर जाकर सात परिक्रमाएं करें एवं बैठकर एक-दो माला जप वर्षभर करें । तत्पश्चात तीन माला नामजप जारी रखें । ३. तीव्र कष्ट हो तो कुलदेवता के नामजप के साथ ही 'श्री गुरुदेव दत्त ।' नामजप प्रतिदिन ४ से ६ घंटे करें । किसी ज्योतिर्लिंग में जाकर नारायणबलि, नागबलि, त्रिपिंडी श्राद्ध, कालसर्पशांति आदि विधियां करें । साथ ही किसी दत्तक्षेत्र में रहकर साधना करें अथवा संतसेवा कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करें । जब कोई व्यक्ति 'श्री गुरुदेव दत्त ।' यह नामजप करता है, उस समय उसके किस अतृप्त पितर को इस नामजप से सर्वाधिक लाभ होता है ? कोई व्यक्ति जब 'श्री गुरुदेव दत्त ।' यह नामजप करता है, उस समय जिस पितर में, अगले लोकों में जाने की तीव्र इच्छा होती है, उस पितर को इस नामजप से सर्वाधिक लाभ होता है । 'यदि ऐसा है, तो अधिकतर पूर्वज नामजप करनेवाले उत्तराधिकारी को ही लक्ष्य क्यों बनाते हैं', यह प्रश्न किसी के भी मन में आ सकता है । इसका कारण इस प्रकार है – 'मेरी आध्यात्मिक प्रगति हो', यह इच्छा करनेवाले पितर साधना करनेवाले वंशज से सहायता लेते हैं, तो जिन पितरों की इच्छा भौतिक विषयों से (खाना-पीना आदि से) संबंधित होती है, वे पितर उसी प्रकार की वासनावाले अपने वंशज से सहायता लेते हैं । संदर्भ : सनातन का ग्रंथ 'भगवान दत्तात्रेय' हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 03:19 AM PST दत्त जयंती'मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी इस तिथि अर्थात18 दिसंबर को भगवान दत्तात्रेय जी की जयंती है । दत्तजयंती के निमित्त हम भगवान दत्तात्रेय के विषय में शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करेंगे । १. दत्तात्रेय के नाम एवं उनका अर्थ अ. दत्त : दत्त अर्थात 'मैं आत्मा हूं',इसकी अनुभूति देनेवाला ! आ. अवधूत : जो अहं को धो डालता है, वह अवधूत ! इ. दिगंबर : दिक् अर्थात दिशा ! दिशा ही जिनका 'अंबर' है, अर्थात जिनका वस्त्र है! जो स्वयं सर्वव्यापी हैं, अर्थात जो सारी दिशाओं में व्याप्त हैं, वही दिगंबर है ! २. भगवान दत्तात्रेय के जन्म का इतिहास अ. ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशद्वारा महापतिव्रता माता अनसूया की परीक्षा लेने का निर्णय लेना तथा आश्रम में जाकर उनके पति की अनुपस्थिती में उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन परोसने के लिए कहना :अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया महापतिव्रता थीं ।वे धर्म के अनुसार आचरण, अर्थात किसी भी कठिन प्रसंग में भगवानजी को अपेक्षित, ऐसा ही वर्तन (आचरण) करती थीं । उनका आचरण धर्म के विरुद्ध कदापि नहीं होता था ।एक समय की बात है, ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने एक बार माता अनसूया की परीक्षा लेने का निर्णय लिया । वे अतिथि का रूप लेकर माता अनसूया के पास भोजन करने के लिए आ गए । उस समय उसके पति अत्रिऋषि तप करने के लिए बाहर गए थे । तब अनसूया ने उनसे कहा, ''मेरे पतिदेव को आने दें, तब आपको भोजन परोसती हूं ।'' परंतु तीनों ने कहा, ''उनके आनेतक हमारा रुकना संभव नहीं है । हमें तुरंत भोजन परोसा जाए । हमने ऐसा सुना है कि आपके घर आया अतिथि कदापि भूखा नहीं लौटता है, किंतु हमारी एक बात माननी पडेगी और वह है कि, 'शरीरपर किसी भी प्रकार का वस्त्रपरिधान किए बिना हमें भोजन परोसें ।'' आ. माता अनसूयाद्वारा पति का स्मरण करना एवं ऐसा भाव रखना, 'तीनों देवता मेरे ही बालक हैं'; तथा उनका बालकों में रूपांतर होना : माता अनसूया अपने पति को परमेश्वर का प्रतीक मानती थीं। उन्होंने विचार किया, 'मैं मन से निर्मल हूं। मेरे मन में अनिष्ट विचार नहीं हैं ।' उन्होंने कुछ क्षण अपने पति का स्मरण किया ।तदुपरांत उन्होंने, 'ये अतिथि मेरे ही बालक हैं',ऐसा भाव रखा । इससे उन अतिथियों का बालकों में रूपांतर हो गया । इ. तीनों देवताओंद्वारा प्रकट होकर वर मांगने के लिए कहना तथा अनसूयाद्वारा बालकों का पालन करने की इच्छा प्रकट करना । वर प्राप्त होनेपर ब्रह्मदेव से चंद्र,विष्णु से दत्त एवं शिव से दुर्वासा, ये तीन बालक प्राप्त होना : इसके उपरांत अत्रिऋषि, अर्थात अनसूया के पति आश्रम में आ गए । तभी उन्हें आश्रम में तीन तेजस्वी बालकों के दर्शन हुए । माताने ऋषि को पूरी घटना बताई । ऋषिने पहचान लिया कि 'ये तीन बालक कौन हैं ?'अगले क्षण ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश प्रकट हुए एवंउन्होंने मनचाहा वर मांगने के लिए कहा ।उसपर दोनों पति-पत्नी ने कहा, ''इन बालकों को हमारे पास ही रहने दें'' उनके अनुसार वर प्रदान कर देवता अपने-अपने लोकों में लौट गए । ब्रह्मदेव से चंद्र, विष्णु से दत्त एवं शिव से दुर्वासा आदि तीन बालक माता अनसूया को प्राप्त हुए । उनमें से चंद्र एवं दुर्वासा तप करने के लिए निकल गए । केवल भगवान दत्तात्रेय विष्णु कार्य के लिए पृथ्वीपर रहे । इस प्रकार भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ । ३. भगवान दत्तात्रेय का कार्य भगवान दत्तात्रेय स्वयं विष्णु के अवतार हैं । उनका कार्य है पालन करना, लोगों में भक्ति की लगन उत्पन्न करना तथा आदर्श तथा आनंदमयी जीवन व्यतीत कैसे करना है, यह सिखाना । ४. भगवान दत्तात्रेय के परिवार का अर्थ अ. गाय : भगवान दत्तात्रेय के पीछे खडी हुई गोमाता पृथ्वी एवं कामधेनू का प्रतीक होती है । कामधेनू हमें इच्छित वस्तू प्रदान करती है । पृथ्वी एवं गोमाता भी हमें सभी इच्छित प्रदान करती है। आ. श्वान (कुत्ता) : यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद, इन वेदों का प्रतीक हैं । इ. औंदुबर का वृक्ष : भगवान दत्तात्रेय का पूजनीय स्वरूप ! इस वृक्ष में भगवान दत्तात्रेय का तत्त्व सर्वाधिक रहता है । ५ . मूर्तिविज्ञान भगवान दत्तात्रेय के मूर्ति में चित्रित अन्य वस्तुओं का भावार्थ आगे दिए अनुसार है । अ. कमंडलू एवं जपमाला : माला ब्रह्मदेव का प्रतीक है । आ. शंख एवं चक्र : श्रीविष्णु का प्रतीक हैं । इ. त्रिशूला एवं डमरू : शिव का प्रतीक है । ई. झोली : यह अहं का लय हुआ है, इसका प्रतीक है । झोली लेकर घर-घर घूमकर भिक्षा मांगने से अहं नष्ट होता है । ६. प्रमुख तीर्थस्थल अ. माहूर : तहसील किनवट, जनपद नांदेड, महाराष्ट्र. आ. गिरनार : यह सौराष्ट्र में जूनागढ के समीप है । यहां १०सहस्र सीढियां हैं । इ. कारंजा : श्री नृसिंह सरस्वती का जन्मस्थान ! काशी के ब्रह्मानंद सरस्वतीजीने यहां सर्वप्रथम दत्तमंदिर की स्थापना की थी। ई. औदुंबर : श्री नृसिंह सरस्वतीजीने चातुर्मास के काल में यहां निवास किया था । यह स्थान महाराष्ट्र के भिलवडी स्थानक से १०कि.मी. की दूरीपर कृष्णा नदी के तटपर है । उ. नरसोबा की वाडी : यह स्थान महाराष्ट्र में है । श्री नृसिंहसरस्वतीने यहांपर १२ वर्ष व्यतीत किए ।यहां कृष्णा एवं पंचगंगा नदियों का मिलन है । ऊ. गाणगापुर : यह स्थान पुणे-रायचूर मार्गपर कर्नाटक में है । यहां भिमा एवं अमरजा नदियों का मिलन है । यहांपर नृसिंहसरस्वतीने अपने २३ वर्ष व्यतीत किए थे । ७. भगवान दत्तात्रेय की आराधना कैसे करें ? अ. गंध : भगवान दत्तात्रेय को अनामिकाद्वारा (छोटी उंगली के समीपवाली उंगली से) तिलक लगाएं । आ. फूल : जाई एवं निशीगंधा के फूल सात अथवा सात की गुणा में अर्पित करें । इ. उदबत्ती : चंदन, केवडा, चमेली, जाई अथवा अंबर इन गंधों की उदबत्तियां लगाएं । ई. इत्र : भगवान दत्तात्रेय को 'खस' इस गंध का इत्र अर्पण करें। उ. प्रदक्षिणा : भगवान दत्तात्रेय की प्रदक्षिणा करें । संदर्भ : सनातन का ग्रंथ 'भगवान दत्तात्रेय' हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| क्या जर्मन अंतिम संरक्षक होंगे संस्कृत के ? Posted: 14 Dec 2021 03:13 AM PST क्या जर्मन अंतिम संरक्षक होंगे संस्कृत के और इसके कीमती विरासत व संस्कृति के?संकलन अश्विनीकुमार तिवारीएक लेख पढ़ रहा था जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह होती है .. "Will Germans be the eventual custodians of Sanskrit, its rich heritage and culture?" हिंदी में "क्या जर्मन अंतिम संरक्षक होंगे संस्कृत के और इसके कीमती विरासत व संस्कृति के??" मतलब क्या है कि जर्मनी जिस तरह से संस्कृत को लेकर गम्भीर है वैसा और कहीं नहीं है और इस आधार पे ही बोला जा रहा कि क्या जर्मनी ही इसका अंतिम संरक्षक होगा ?? जर्मनी के 14 टॉप यूनिवर्सिटियों में संस्कृत की पढ़ाई हो रही है व रिसर्च भी। साउथ एशिया इंस्टीट्यूट और हैडलबर्ग यूनिवर्सिटी समर (summer) में स्पोकन कोर्स ऑर्गेनाइज करती है जिसमें एडमिशन लेने के लिए दुनिया भर से होड़ लगा हुआ होता है.. एप्लिकेशन की बाढ़ आ जाती है विश्व भर से जिसमें कि छंटाई करने की नौबत आ जाती है और छंटाई करना भी पड़ता है। ये यूनिवर्सिटी केवल जर्मनी में ही नहीं बल्कि स्विट्जरलैंड, इटली और आप यकीन नहीं मानोगे भारत में भी संस्कृत स्पोकन का समर स्कूल ऑर्गेनाइज करती है। बताइये कि भारत की चीज भारत को ही बेचा जाता है। किस कारण ?? Professor Dr. Axel Michaels, head of classical Indology (University of Heidelberg) कहते है कि " आज से 15 साल पहले जब हम इसका शुरुआत किये थे तो शुरुआती के दो साल में ही बंद करने की स्थिति में थे लेकिन हमने ऐसा नहीं किया बल्कि इसको और मजबूत बनाने पे ध्यान दिया और अन्य युरोपियन कंट्री के लिए भी कोर्स के लिए ओपन किया!" आज जर्मनी में 14 यूनिवर्सिटी हैं जहां संस्कृत की पढ़ाई चल रही और ब्रिटेन के 4 यूनिवर्सिटी में। प्रत्येक वर्ष हम समर में एक महीने के लिए समर स्कूल रन करते हैं जिसमें दुनिया भर के एप्लिकेशन आते हैं।.. अब तक 254 स्टूडेंट इसमें पार्टिशिपेट हो चुके हैं 34 अलग-अलग देशों से.. और प्रत्येक साल इसमें गज्जब का इज़ाफ़ा हो रहा है जिसमें कि हमें एप्लिकेशन को रिजेक्ट भी करना पड़ रहा है। जर्मनी के बाद अमेरिका से सबसे ज्यादा स्टूडेंट होते हैं उसके बाद ब्रिटेन इटली और अन्य यूरोपीय देश। आगे प्रोफेसर कहते है कि "किसी पोलिटिकल आइडियोलोजी के तहत संस्कृत को धर्म के साथ जोड़ना सबसे स्टुपिड और विघातक बात है.. जो इनके महान विरासत को दाग लगाते है! .. यहां तक कि बुद्धीज्म का जो मूल विचार है वो संस्कृत में है..अगर हम शुरुआती दर्शन,इतिहास,भाषा,विज्ञान व संस्कृति के उत्पत्ति को बेहतर ढंग से जानना व समझना चाहते है तो हमें ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट पढ़ने पड़ेंगे जो कि सबसे पुराने विचार व अनुसंधान का नतीजा है!" Francesca Lunari एक मेडिकल की छात्रा है जो हैडलबर्ग यूनिवर्सिटी में संस्कृत का अध्ययन कर रही है.. वो कहती है कि "मैं साइको एनालिसिस में ज्यादा इंटरेस्टेड हूँ और इसके लिए ये जानना जरूरी है कि कैसे मानवीय विचार ग्रंथ,संस्कृति और समाज से होते हुए निकला .. और इसको समझने के लिए जो सबसे शुरुआती स्टेप है वो है संस्कृत है।.. मुझे बांग्ला के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक गिरीन्द्र बॉस के मनोविज्ञान को पढ़ना है जो कि बांग्ला में है और भारत में भी लोग इनको नहीं पढ़ते जिन्होंने बहुत कमाल का कार्य किया है इस क्षेत्र में.. मुझे उनके कार्य को डेसिफर करना है और उसके लिए संस्कृत ही शुरुआती स्टेप है।" ये आगे कहती है कि "हम एक महान वैश्विक संस्कृति व विरासत को पूर्णतः विलुप्त होते हुए देखेंगे यदि हिंदी बांग्ला जैसे मेजर लैंग्वेज को यूं ही इंडियन इंग्लिश के सामने घुटने टेकते हुए पाते है तो .. जो कि दिनों दिन कमजोर ही होता जा रहा है.. यही आज संस्कृत के साथ हुआ है .. और ये चिंता का विषय है क्योंकि इंडियन परिवार अपने बच्चों को अपने लैंग्वेज में न पढ़ा के इंग्लिश पे ज्यादा जोर देते हैं और दे रहे हैं।" डॉ. माइकल कहते है कि "पॉलिटिक्स व इकोनॉमिक्स के क्रमिक विकास को वह बेहतर समझ सकता है जो चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करता हो" आने वाले सेमेस्टर में 'human physiology and psychology in the early Upanishads' भी पढ़ाया जाएगा। आईआईटी के मैथेमेटिसियन आनंद मिश्रा कहते है कि "जब हमने पाणिनि के संस्कृत व्याकरण का स्टडी किया तो पाया कि ये कम्प्यूटिंग लैंग्वेज के हिसाब से सबसे सूटेबल लैंग्वेज है।" .. और इसके ऊपर काम भी शुरू है। जर्मनी हमेशा से संस्कृत विद्वानों के लिए संरक्षक व भंडार रहा है.. जितने भी हार्वर्ड,कैलिफोर्निया व ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी में संस्कृत विद्वान हैं वे सभी के सभी जर्मन हैं .. ऐसा क्यों है तो इसके जवाब में डॉ माइकल कहते है कि " ऐसा इसलिए है कि हमने कभी इंडिया को उपनिवेश नहीं बनाया जैसा कि ब्रिटेन ने किया और हमने हमेशा इनके ऊपर रोमांटिक व्यू ही रखा है!" लेकिन यहाँ जब लंबे समय तक मुगलों व अंग्रेजों के अधीन सबकुछ रहा तो संस्कृत आज सेकुलरिज्म का दुश्मन घोषित हो गया है। नरेंद्र मोदी जब जर्मनी यात्रा पे जाते है तो यही बात कहते है कि "आज देश में कोई संस्कृत न्यूज बुलेटिन नहीं है क्योंकि ऐसा लगता है कि इससे सेकुलरिज्म खतरे में पड़ जाएगा!" ये बातें 2015 की है ... आज त्रिभाषा की बात हो रही .. नई शिक्षा नीति की बात हो रही है तो सबसे ज्यादा मरोड़ या परेशानी किससे हो रही है तो वो है संस्कृत .. पता नहीं क्यों इन्हें संस्कृत के नाम से जुलाब होने लगता है.. दस्त रुकते नहीं रुकते हैं.. हिचकोले मार-मार के उबाल मारता है.. रह-रह के उबाल मारता है.. जबकि साफ कह दिया है कि संस्कृत विकल्प में है.. अगर आपको पढ़ना है तो पढ़े नहीं तो विकल्प के रूप में अन्य भारतीय भाषा भी है.. लेकिन नहीं सारा मुड़फुटौवल इसी पे करना है.. पिछले दो दिन से गली-गली से महान भाषाविद के नाना सब उफिया के माफिक बाहर निकल रहे हैं.. जो हिंदी भी ढंग से टाइप नहीं कर पाते वे संस्कृत के एक्सपर्ट बन के बैठे हुए हैं। .. इन्हें विरोध करना ही करना है क्योंकि सेकुलरिज्म की बात जो आ जाती है न। तुम्हें नहीं पढ़ना है तो मत पढ़ न .. लेकिन जहां संस्कृत का ओरिजिन है वहां गर देश-विदेश से स्कॉलर आ के ज्ञान अर्जित करेंगे तो किनका फायदा है ??? तुम्हें पैसे कमाने है तो तुम पढ़ो न जर्मन,फ्रेंच,पुर्तगाली,रूसी,इटालियन .. तुम्हें कौन मना किया है .. सरकार ने व्यवस्था भी किया हुआ है.. लेकिन जो स्कॉलर लोग हैं उन्हें क्यों तुम अपनी बचकानी सेकुलरिज्म की आड़ में उपहास उड़ा रहे हो ??? क्या ये नहीं होना चाहिए कि जहां विश्व के टॉप यूनिवर्सिटीज में जर्मन स्कॉलर विराजमान हैं वहाँ कोई भारतीय हो ?? क्या ये नहीं हो सकता ?? क्यों नहीं हो सकता.. जब यहां एक्सपर्ट तैयार होंगे तभी तो वो विश्व भर में जाएंगे न .. नहीं तो ऐसा न हो कि हमें संस्कृत पढ़ाने वाले जर्मन लोग ही आगे होंगे। मने हमारी चीज हमें ही पढ़ाएँगे। कुछ ऐसा ही विरोध रहा तो हिंदी भी हिन्दू के साथ जुड़ जायेगा और सेकुलरिज्म का दुश्मन घोषित हो जाएगा तब भी कोई फॉरेनर ही हमें हिंदी सीखा रहा होगा। कुछ तो शर्म करो रे। जो एक आम भारतीय को बोलना चाहिए वो एक जर्मन प्रोफेसर बोल रहा है.. जो कि मैं ऊपर ही कोट किया हूँ और पुनः इधर भी कर रहा हूँ जो इन शेखुलरों को समर्पित है.. "किसी पोलिटिकल आइडियोलोजी के तहत संस्कृत को धर्म के साथ जोड़ना सबसे स्टुपिड और विघातक बात है.. जो इनके महान विरासत को दाग लगाते है!" (इसको आप अपने तरीके से भी बोल सकते है.. मने कि सभ्य तरीके से।)😊 ✍🏻गंगवा, खोपोली से। मैं अभी वाराणसी में था तो मैं चौखम्भा प्रकाशन पहुंच गया पूछते पूछते। रिक्शे से उतरा तो पूछने लगा चौखम्भा कहां है तो एक पान वाले ने पूछा किताब लेनी है? हमने कहा हां तो उसने कहा कि वो जो रेमंड का बोर्ड लगा है उसके बगल में देखिए, वहीं किताबें मिल जाएंगी। हम उसे धन्यवाद देकर किताब देखने चल पड़े और पहुंच गए दुकान पर। दुकान पर कुछ बीएचयू के छात्र चिकित्सा के ग्रंथ खरीद रहे थे और उसी समय मैने पूछ लिया, "तन्त्र पर ग्रन्थ हैं?" "हां, उधर लगे हैं देख लीजिए" मैं जूते निकाल कर पहुंच गया देखने। सब देखने के बाद हमने सौन्दर्यलहरी, त्रिपुरा रहस्य का ज्ञान खण्ड और तन्त्रसार नामक ग्रन्थ निकाल लिए। ग्रंथों का दाम जोड़ा जा रहा था और तभी हमने जिज्ञासावश पूछ लिया, "श्रीधरी टीका होगी?" "हां है" "कितने की है लगभग इस समय?" "20000 की है 16000 की पड़ेगी" "अच्छा, अगली बार ले जाऊंगा अभी ले जाने की व्यवस्था नही है" मैं पैसे गिनते हुए बोल रहा था, "अच्छा बिक्री तो अधिक होगी नही इसकी?" "नही ऐसा नहीं है, विदेश से लोग आते हैं खरीदने" "विदेश से? अच्छा और भारत वाले?" "भारत वाले नही लेते, एक दो साल में कभी कभार कोई आता है तो आता है नही तो नही" ये बात सुनकर मुझे एकदम धक्का लगा। पुरी पीठ के पूर्वाचार्य श्रीधरस्वामी जी जिन्होंने श्रीमद्भागवतमहापुराण पर टीका लिखी और ऐसी टीका जिसपर स्वयं नारायण के अवतार श्री चैतन्यमहाप्रभु भी लट्टू हुए बिना नहीं रह सके उसका महत्त्व भारत के लिए शून्य है? आखिर किसके लिए श्रम किया था आचार्य ने? अमेरिका के लिए? रूस के लिए अथवा सनातनियो के लिए? पुरी मठ के ही पूर्वाचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी ने वैदिक गणित पर जो शोध किया वह किसके लिए था? क्या रक्षा करेगा हिंदू धर्म की? फेसबुक पर हो हल्ला करने से रक्षा हो जाएगी अथवा अमुक दल का प्रचार करने और उसके लिए लड़ने से हो जाएगी? अमुक दल को धर्म की बागडोर थमा के आप निश्चिंत हो जाएंगे तो धर्म की रक्षा होगी? अपने ही शास्त्रों के प्रति आपकी अरुचि है, आप उनसे कतराते हैं और पुनः कहते हैं कि आचार्य करते क्या हैं? क्या आचार्य आपकी तरह टुच्ची भाषा का प्रयोग करते हुए सबसे लड़ें? गाली गलौज करें अथवा किसी स्वघोषित हिंदूवादी के जेल जाने पर मुकदमा लड़ें? लज्जा आती है आपको? एक आचार्य वृद्धावस्था में भी भ्रमण कर कर के धर्म की अलख जगाने के लिए तत्पर हैं और आप उनपर ही प्रश्न कर देते हैं? आपको भान है कि कितने शास्त्र लुप्त हो चुके हैं और कितने लुप्तप्राय हैं? चौखम्भा जैसे प्रकाशनों को जीवित रखने से ही धर्म की रक्षा होगी अन्यथा सोशल मिडिया के हिंदुत्व का झुनझुना आप तहमद पहन कर बजाते रह जाएंगे। बुरा लगा हो तो अपनी खोपड़ी किसी दीवार पर पटक लीजिएगा। चलते हैं। ✍🏻पण्डित शुचिव्रत मिश्र एक बार किसी सेमिनार में हिस्ट्री के एक परफेसर साहेब यह बता रहे थे,कि महाभारत काल के लोग कृषि से अनभिज्ञ थे...पर,जैसे ही उनके बाद वाले वक्ता ने श्रीमद्भागवत गीता के 18वें अध्याय का 44 वां श्लोक उद्धृत किया - कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म श्रूद्रस्यापि स्वभावजम् || ....परफेसर साहेब चुपचाप हाल से बाहर चले गए...जब महाभारत काल के लोग कृषिकर्म से अनभिज्ञ थे,फिर यह शब्द कैसे आया??? ....सेमिनार के बाद एक दिन,जिस वक्ता ने यह श्लोक उद्धृत किया था...उन्होने अपने घर के पास एक पुजारी से जब यह पूछा कि क्या महाभारत काल के लोग कृषि से अनभिज्ञ थे??यह सुनते ही पुजारी ने जो कि दसवीं या बारहवीं पास थे तुरंत ही उपरोक्त श्लोक को उद्धृत किया... साभार...... भारत में कई सदियों पहले एक किताब (मेरुतुंगाचार्य रचित प्रबन्ध चिन्तामणि) आई थी जिसमें महान लोगों के बारे में कई हस्तलिखित कहानियाँ थी। कोई कहता है किताब १३१० के दशक में आई तो कोई उसे १३६० के दशक का मानता है, १३१० वाले ज़्यादा लोग हैं। खैर मुद्दा वो नहीं है, किताब का १४ वीं सदी का होना ही काफी है। उसमें राजा भोज पर भी कई कहानिया है जिसमें से एक ये है, जिसे थोड़ा ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए - एक रात अचानक आँख खुल जाने से राजा भोज ने देखा कि चाँदनी के छिटकने से बड़ा ही सुहावना समय हो रहा है, और सामने ही आकाश में स्थित चन्द्रमा देखने वाले के मन मे आल्हाद उत्पन्न कर रहा है। यह देख राजा की आँखें उस तरफ अटक गई और थोड़ी देर में उन्होने यह श्लोकार्ध पढ़ा - यदेतइन्द्रान्तर्जलदलवलीलां प्रकुरुते। तदाचष्टे लेाकः शशक इति नो सां प्रति यथा॥ अर्थात् - "चाँद के भीतर जो यह बादल का टुकड़ा सा दिखाई देता है लोग उसे शशक (खरगोश) कहते हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं समझता।" संयोग से इसके पहले ही एक विद्वान् चोर राज महल मे घुस आया था और राजा के जाग जाने के कारण एक तरफ छिपा बैठा था। जब भोज ने दो तीन वार इसी श्लोकार्ध को पढ़ा और अगला श्लोकार्ध उनके मुँह से न निकला तब उस चोर से चुप न रहा गया और उसने आगे का श्लोकार्ध कह कर उस श्लोक की पूर्ति इस प्रकार कर दी- अहं त्विन्दु मन्ये त्वरिविरहाक्रान्ततरुणो। कटाक्षोल्कापातव्रणशतकलङ्काङ्किततनुम्॥ अर्थात् - "मै तो समझता हूं कि तुम्हारे शत्रुओ की विरहिणी स्त्रियो के कटाक्ष रूपी उल्काओं के पड़ने से चन्द्रमा के शरीर में सैकड़ों घाव हो गए हैं और ये उसी के दाग़ हैं।" अपने पकड़े जाने की परवाह न करने वाले उस चोर के चमत्कार पूर्ण कथन को सुनकर भोज बहुत खुश हुये और सावधानी के तौर पर उस चोर को प्रातःकाल तक के लिये एक कोठरी मे बंद करवा दिया। परंतु उस समय विद्वता की पूछ परख ज्यादा थी सो अगले दिन प्रातः उसे भारी पुरस्कार देकर विदा किया गया। लगभग 250 साल के लंबे अंतराल के बाद, गेलेलियों ने ३० नवंबर सन १६०९ को पहली बार टेलिस्कोप से चंद्रमा देखा और अपनी डायरी में नोट किया कि, "चंद्रमा की सतह चिकनी नहीं है जैसी कि मानी जाती थी (क्योंकि केवल आंखो से वह ऐसी ही दिखती है), बल्कि असमतल और ऊबड़-खाबड़ है।" वहाँ उन्हे पहाड़ियाँ और गढ़हों जैसी रचनाएँ नज़र आई थी। उन्होने टेलिस्कोप से खुद के देखे चंद्रमा एक स्केच भी अपनी डायरी में बनाया। कहानी का सार बस इतना है कि जिस समय चर्च यह मानता था कि रात का आसमान एक काली चादर है, जिसमें छेद हो गए और उसमे से स्वर्ग का प्रकाश तारों के रूप में दिख रहा है, उस समय भारत के एक चोट्टे को भी ये पता था कि चंद्रमा की सतह समतल नहीं है और उस पर जो दाग हैं वो उल्काओं के गिरने से बने हैं। बात खतम। अब ये अलग बात है कि स्वयंभू वामपंथी इतिहासकारों, सेक्युलरता के घातक रोग से पीड़ित लिबरलों, और खुद पर ही शर्मिंदा कुछ भारतीय गोरों को यह बात आज भी नहीं पता, क्योंकि ना तो उन्हे इतिहास का अध्ययन करना आता है और ना ही उनमें इतनी क्षमता ही है। - ✍🏻अनिमेष तिवारी 🎋"भूतपूर्व वैयाकरणज्ञ 🔥भव्य-भारत"🎋 एक समय था, जब भारत सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक क्षेत्र सबसे आगे था । प्राचीन काल में सभी भारतीय बहुश्रुत,वेद-वेदाङ्गज्ञ थे । राजा भोज को तो एक साधारण लकडहारे ने भी व्याकरण में छक्के छुडा दिए थे ।व्याकरण शास्त्र की इतनी प्रतिष्ठा थी की व्याकरण ज्ञान शून्य को कोई अपनी लड़की तक नही देता था ,यथा :- "अचीकमत यो न जानाति,यो न जानाति वर्वरी।अजर्घा यो न जानाति,तस्मै कन्यां न दीयते" यह तत्कालीन लोक में ख्यात व्याकरणशास्त्रीय उक्ति है 'अचीकमत, बर्बरी एवं अजर्घा इन पदों की सिद्धि में जो सुधी असमर्थ हो उसे कन्या न दी जाये" प्रायः प्रत्येक व्यक्ति व्याकरणज्ञ हो यही अपेक्षा होती थी ताकि वह स्वयं शब्द के साधुत्व-असाधुत्व का विवेकी हो,स्वयं वेदार्थ परिज्ञान में समर्थ हो, इतना सम्भव न भी हो तो कम से कम इतने संस्कृत ज्ञान की अपेक्षा रखी ही जाती थी जिससे वह शब्दों का यथाशक्य शुद्ध व पूर्ण उच्चारण करे :- यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्। स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥ अर्थ : " पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण (अवश्य) पढ़ो ताकि 'स्वजन' 'श्वजन' (कुत्ता) न बने और 'सकल' (सम्पूर्ण) 'शकल' (टूटा हुआ) न बने तथा 'सकृत्' (किसी समय) 'शकृत्' (गोबर का घूरा) न बन जाय। " भारत का जन जन की व्याकरणज्ञता सम्बंधित प्रसंग "वैदिक संस्कृत" पेज के महानुभव ने भी आज ही उद्धृत की है जो महाभाष्य ८.३.९७ में स्वयं पतञ्जलि महाभाग ने भी उद्धृत की हैं । सारथि के लिए उस समय कई शब्द प्रयोग में आते थे । जैसे---सूत, सारथि, प्राजिता और प्रवेता । आज हम आपको प्राजिता और प्रवेता की सिद्धि के बारे में बतायेंगे और साथ ही इसके सम्बन्ध में रोचक प्रसंग भी बतायेंगे । रथ को हाँकने वाले को "सारथि" कहा जाता है । सारथि रथ में बाई ओर बैठता था, इसी कारण उसे "सव्येष्ठा" भी कहलाता थाः----देखिए,महाभाष्य---८.३.९७ सारथि को सूत भी कहा जाता था , जिसका अर्थ था----अच्छी प्रकार हाँकने वाला । इसी अर्थ में प्रवेता और प्राजिता शब्द भी बनते थे । इसमें प्रवेता व्यकारण की दृष्टि से शुद्ध था , किन्तु लोक में विशेषतः सारथियों में "प्राजिता" शब्द का प्रचलन था । भाष्यकार ने गत्यर्थक "अज्" को "वी" आदेश करने के प्रसंग में "प्राजिता" शब्द की निष्पत्ति पर एक मनोरंजक प्रसंग दिया है । उन्होंने "प्राजिता" शब्द का उल्लेख कर प्रश्न किया है कि क्या यह प्रयोग उचित है ? इसके उत्तर में हाँ कहा है । कोई वैयाकरण किसी रथ को देखकर बोला, "इस रथ का प्रवेता (सारथि) कौन है ?" सूत ने उत्तर दिया, "आयुष्मन्, इस रथ का प्राजिता मैं हूँ ।" वैयाकरण ने कहा, "प्राजिता तो अपशब्द है ।" सूत बोला, देवों के प्रिय आप व्याकरण को जानने वाले से निष्पन्न होने वाले केवल शब्दों की ही जानकारी रखते हैं, किन्तु व्यवहार में कौन-सा शब्द इष्ट है, वह नहीं जानते । "प्राजिता" प्रयोग शास्त्रकारों को मान्य है ।" इस पर वैयाकरण चिढकर बोला, "यह दुरुत (दुष्ट सारथि) तो मुझे पीडा पहुँचा रहा है ।" सूत ने शान्त भाव से उत्तर दिया, "महोदय ! मैं सूत हूँ । सूत शब्द "वेञ्" धातु के आगे क्त प्रत्यय और पहले प्रशंसार्थक "सु" उपसर्ग लगाकर नहीं बनता, जो आपने प्रशंसार्थक "सूत" निकालकर कुत्सार्थक "दुर्" उपसर्ग लगाकर "दुरुत" शब्द बना लिया । सूत तो "सूञ्" धातु (प्रेरणार्थक) से बनता है और यदि आप मेरे लिए कुत्सार्थक प्रयोग करना चाहते हैं, तो आपको मुझे "दुःसूत" कहना चाहिए, "दुरुत" नहीं । उपर्युक्त उद्धरण से यह स्पष्ट है कि सारथि, सूत और प्राजिता तीनों शब्दों का प्रचलन हाँकने वाले के लिए था । व्याकरण की दृष्टि से प्रवेता शब्द शुद्ध माना जाता था । इसी प्रकार "सूत" के विषय में भी वैयाकरणों में मतभेद था । इत्यलयम् 🌺 संलग्न कथानक के लिये "वैदिक संस्कृत" पृष्ठ के प्रति कृतज्ञ हूँ।💐 हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| ज्ञान , भक्ति और कर्म का द्योतक गीता Posted: 14 Dec 2021 03:02 AM PST
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| ज्ञान कुंज एकेडमी में आयोजित हुआ अमृत महोत्सव Posted: 14 Dec 2021 02:59 AM PST ज्ञान कुंज एकेडमी में आयोजित हुआ अमृत महोत्सव
भाटपार रानी, देवरिया से हमारे संवाददाता वेद प्रकाश तिवारी की खास खबर | इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ को भारत सरकार 'आजादी का अमृत महोत्सव' के तौर पर मना रही है। 15 अगस्त 1947 को भारत, ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र हुआ था। आजादी के 75 साल का ये जश्न 12 मार्च 2021 से शुरू हो चुका है जो 75 सप्ताह तक चलेगा। 15 अगस्त 2023, 78वें स्वतंत्रता दिवस पर अमृत महोत्सव का समापन होगा। इसी क्रम में भाटपार रानी कस्बेे का एक प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान , ज्ञान कुंज एकेडमी ने स्वतंत्रता के 75 वर्ष पर होनेअमृत महोत्सव का आयोजन किया । राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के बाद संस्था के छात्र-छात्राओं द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया। सभी ने आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर सपूतों के अहम योगदान को याद करते हुए उन वीरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट किया । ज्ञान कुंज एकेडमी के प्राचार्य ने कहा कि देश उन वीरों के योगदान को सर्वदा याद रखेगा तथा उनका ऋणी रहेगा । इस अवसर पर बच्चों को संबोधित करते हुए संस्था के प्रबंधक श्री राजेश कुमार सिंह ने उक्त पंक्तियों से अपना संबोधन किया कि 'दे सलामी इस तिरंगे को जिसमें तेरी शान हैसर हमेशा ऊंचा रखना जब तक दिल में जान है । आज तिरंगा फहरता है अपनी पूरी शान से, हमें मिली है आजादी वीरों के बलिदान से । उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों की जीवनी और उनके दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि हम किसी भी पेशे में रहे या नौकरी में रहे या हम किसी भी स्थिति में जिएं, पर हमारे अंदर देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी होनी चाहिए। क्योंकि पहले देश है उसके बाद बाकी सब कुछ । बाद में संस्था के शिक्षक गण श्री हरि ओम ,श्री प्रत्यूष वर्मा, अलका सिंह, नेहा तिवारी इत्यादि ने भी अपने संबोधन में सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को श्रद्धांजलि देते हुए कुछ लोगों की जीवनी पर प्रकाश डाला। बच्चों को इस बात के लिए संकल्पित किया कि वह आने वाले कल का भविष्य हैं,भारत के नेता हैं, उन्हीं के ऊपर देश का भार होगा, इसलिए उन्हें हमेशा इस बात को याद रखना है कि अपने हितों की बात पीछे है सबसे पहले राष्ट्रहित होना चाहिए । हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| हिन्द, हिन्दू, हिन्दी और हिन्दुत्व Posted: 14 Dec 2021 02:56 AM PST हिन्द, हिन्दू, हिन्दी और हिन्दुत्वपं.मार्कण्डेय शारदेय ) 'हिन्द' फारसी शब्द है, जिसका अर्थ भारत है।वास्तव में अरबी-फारसीभाषी विदेशियों ने सिन्धु नदी से जोड़कर इस भूभाग को देखा है।भाषाविज्ञान के अनुसार 'स' के 'ह' उच्चारण से ऐसा हुआ है।यहाँ के निवासियों को उन्होंने हिन्दू कहा।'स्तान' स्थान का ही यह परिवर्तित रूप है।इस तरह 'हिन्दुस्तान' बना, जिसका अर्थ भी भारत ही है।'हिन्दुस्तानी' भी भारतीय हुआ। चूँकि उन विदेशियों ने भी अपनी उपासना-पद्धति यहाँ फैलाई और उनमें से कुछ रहने भी लगे।ऐसे में यहाँ के निवासियों के साथ फर्क बताने के लिए मूल निवासियों को हिन्दू कहकर रूढ़ किया गया।यहाँ के लोग इससे पहले सनातनी कहलाते थे और इनका धर्म था- सनातन।अब ये स्वयं को प्रचलन के आधार पर हिन्दू कहने लगे और इनका धर्म 'हिन्दुत्व' व 'हिन्दू धर्म' कहा जाने लगा।इसी तरह भाषा के रूप में चली 'हिन्दी' शब्द भी फारसी का ही है। आगे चलकर अंग्रेज हिन्दु से इण्डु और इण्डिया, इण्डियन का प्रयोग करने लगे।इस तरह हिन्द, हिन्दुस्तान कहें या इण्डिया; ये भारत के ही बोधक हैं।हिन्दू, हिन्दुस्तानी कहें या इण्डियन; ये भारतीयों की ही संज्ञा है।हाँ, हमारे यहाँ संस्कृत का 'त्व' प्रत्यय भाववाचक है।इसे हिन्दू शब्द में जोड़कर हिन्दुत्व बना, जिसका अर्थ हिन्दू होने का भाव है।इसी हिन्दुत्व के घेरे में हिन्दुओं की सभ्यता-संस्कृति भी आ जाती है।इस कारण हिन्दू हिन्दुत्व से अगल नहीं हो सकते।भाव आन्तरिक शक्ति है।देह और देही की तरह है। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 14 Dec 2021 02:52 AM PST गीताजयन्ती पर समर्पित
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| अभी ठहरो सनम मेरे जरा सी शाम होने दे पर खूब बरसीं तालियां Posted: 13 Dec 2021 06:38 AM PST अभी ठहरो सनम मेरे जरा सी शाम होने दे पर खूब बरसीं तालियां स्थानीय दानी बीघा स्थित सत्येंद्र नारायण सिन्हा पार्क में राष्ट्रीय स्तर की संस्था शब्द अक्षर के बैनर तले एक काव्य- संध्या का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता शहर के जाने-माने शायर आफताब राणा तथा संचालन युवा कवि नागेंद्र केसरी ने किया। नवोदित कवि हिमांशु चक्रपाणि ने अपनी ग़ज़ल की पंक्तियां प्रस्तुत करते हुए कहा कि "अभी ठहरो सनम मेरे, जरा सी शाम होने दे। कि दिल में जख्म है गहरा,जरा आराम होने दे।। चक्रपाणि की यह प्रस्तुति ने उपस्थित श्रोताओं-दर्शकों के मन मानस को झकझोर दिया। कई पुस्तकों के रचनाकार एवं फिल्म निर्देशक प्रभात बांधुल्य की लाजवाब मगही रचना-'एने ओने उड़इत हे रे चिड़ई, हाल उनकर बता दे रे चिड़ई'ने खूब तालियां बटोरीं। ईश्वर को अरदास करती तथा उपस्थित जनसमुदाय को भक्ति रस में डुबोती हुई स्वर साम्राज्ञी चौहान आरती सिंह ने कहा कि-'मेरे ईश्वर मेरे मौला यही अरदास है मेरी, सम्हालो जिंदगी मेरी खड़ी हूं आस में तेरी। हेड मास्टर चंद्रशेखर प्रसाद साहू की इस रचना- 'मन भीगा भीगा तरल हृदय मन मुग्ध मृदुल जागे सपने, आशा का निर्झर फूट पड़ा तट हैं उम्मीदों के अपने' पर खूब तालियां बरसीं।डा हेरंब कुमार मिश्र जो एक सुख्यात उद्घोषक हैं ने मगध की महिमा का बखान करते हुए कहा कि- 'मगह के बानी मगह के पानी मगह के भुइयां अउ असमान, मिलके आवऽ मिलजुल गावऽ मगही माटी के गुनगान। व्यंग्य कवि अनुज बेचैन ने गुरुजी को नसीहत देते हुए कहा कि-'हे गुरुजी बालकों का यह विनय सुन लीजिए, लीजिए मत एक पैसा खूब शिक्षा दीजिए'। धनंजय जयपुरी ने एक भावपूर्ण ग़ज़ल प्रस्तुत करते हुए कहा कि-'मैं दिवाना हुआ हूं तेरी याद में, मैं तड़पता रहा हूं तेरी याद में' जिसपर श्रोताओं ने खूब ठहाके लगाए। कवि श्रीराम राय ने अपनी प्रत्युत्पन्न मति से उपस्थित कवि-कवयित्रियों पर दो-दो पद्य पंक्तियां न्योछावर की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आफताब राणा ने कहा कि अर्श को गुमान है, पर फर्श ही पहचान है। इस संगोष्ठी में उपर्युक्त लोगों के अलावा शिक्षक नेता अशोक पांडेय, शिक्षक चंदन कुमार, कुंदन कुमार, रोहित कुमार उपस्थित थे। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
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