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Friday, January 28, 2022

दिव्य रश्मि न्यूज़ चैनल

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स्वयं मेहसूस करो

Posted: 27 Jan 2022 10:02 PM PST

स्वयं मेहसूस करो

हम तो राह के राहगीर है 
आते जाते मिल जाते है।
बातों ही बातों में अपनी  
कहानी खुद सुना देते है।
तभी तो मोहब्बत के 
दीप जल जाते है। 
तो किसी के जीवन में
अँधेरा छा जाता है।। 

इसी तरह के मेरे 
गीत कविता होते है। 
जो मनकी चंचलता को
बहार निकल देते है।
चलती है जैसे जैसे हवाएं 
मन दौड़ने लगता है।
और मोहब्बत के दीप
दिलमें जलने लगते है।। 

मिलेगा फिर तुम्हें सकून 
अपने दिलके अंदर से। 
मिट जायेगी तुम्हारी तड़प
जिसे तुम पाना चाहते हो। 
मोहब्बत में मेहबूबा ही
जीवन का आधार होती है। 
सफल हो जाये मोहब्बत तो
वो ही जीवन संगनी होती है।। 

संसार का चक्र भी
इसी तरह से चलता है। 
स्नेह प्यार की दुनियाँ भी
इसी तरह से बनती है। 
दिलों में जिंदा रखना है
अगर तुम्हें मोहब्बत को। 
तो स्वंय को भी मोहब्बत
दिल से करना होगा।। 

जय जिनेंद्र 
संजय जैन "बीना" मुंबई
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विश्व की पहली भूगोल पुस्तक - श्री विष्णु पुराण . World's first Geography Book - Shri Vishnu Puran

Posted: 27 Jan 2022 09:12 PM PST

ऋग्वेद में भूगोल 

संकलन अश्विनी कुमार तिवारी
आज हमें बताया जाता है कि सबसे पहले आर्यभट ने कहा था कि पृथ्वी गोल है... 
लेकिन हमें तो बचपन में यह पढ़ाया गया था कि सबसे पहले कॉपरनिकस ने कहा था कि पृथ्वी गोल है। 

और तब कोपरनिकस के साथ ईसाइयों ने बड़ा ही अमानवीय व्यवहार किया था। क्योंकि बाइबिल के जेनेसिस के अध्याय में लिखा था कि पृथ्वी चपटी है। 

हमारे अंदर जब थोड़ी जागरूकता आई तो हम कॉपरनिकस से थोड़ा पीछे गए।तब जाकर हमें पता चला कि आर्यभट ने हमें पहले ही बताया था कि पृथ्वी गोल है। 

परंतु ऋग्वेद 1/33/8 में कहा गया है - 
चक्राणास: परिणहं पृथिव्या। 
यानी पृथ्वी चक्र के जैसी गोल है। 
पृथ्वी से जुड़ा जो भी विषय हम पढ़ते हैं - उस विषय का नाम है - 'भूगोल'.(भू = पृथ्वी     और      गोल = वृत्ताकार) यह नाम ही साबित करता है कि पृथ्वी गोल है। फिर हमें वैदिक ऋषियों ने बताया कि - 
माता भूमि: पुत्रोस्हं पृथिव्या:। 
यानी हम पृथ्वी की संतानें हैं, 
अर्थात पृथ्वी हमारी माँ है। 
पृथ्वी माता कैसे हैं? 
माँ के गर्भ में हम एक झिल्ली में होते हैं, ताकि माता के शरीर के अंदर के बैक्टीरिया हमें नुकसान नहीं पहुँचा सकें। माँ के गर्भ में इस झिल्ली द्वारा ही हमें सुरक्षित रखा जाता है। अन्यथा हम वहीं सड़ - गल जाते...और कभी जन्म नहीं ले पाते। ठीक इसी प्रकार... पृथ्वी भी एक झिल्ली में सुरक्षित है। इसे हम 'ओजोन परत' कहते हैं। यह परत हमें सूर्य के हानिकारक अल्ट्रावॉइलेट विकिरणों से सुरक्षित रखती है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नासा ने ओज़ोन परत का चित्र लिया है। यह सुनहरे रंग की दिखती है।

ऐसा ही उल्लेख ऋग्वेद में पाया जाता है। वहाँ पृथ्वी को 'हिरण्यगर्भा' कहा गया है। 'हिरण्य' अर्थात 'हिरन के जैसा' या सुनहरे रंग का। मतलब, जिस जिस तथ्य की जानकारी आधुनिक विज्ञान को आज पता चली, उसकी जानकारी हमारे ऋषियों को लाखों साल पहले प्राप्त हो चुकी थी। इस जानकारी का इतनी सूक्ष्मता से वर्णन हमारे ऋग्वेद में मिलता है।

आज हम जानते हैं कि पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। इसलिए सूर्योदय हमेशा पूरब में होता है। इस सम्बंध में ऋग्वेद (7/992) में ऋषि कहते हैं - कि 
बूढ़ी महिला की तरह झुकी हुई पृथ्वी पूरब की ओर जा रही है। ऋग्वेद हमें यह भी बताता है कि 
पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई है। 
आज आधुनिक विज्ञान भी यही बताता है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.44 डिग्री पर झुकी हुई है।

इसके अतिरिक्त एक घूमते हुए लट्टू में जो एक लहर सी आती है, उसी प्रकार पृथ्वी के घूर्णन में भी एक लहर आती है। इसके कारण पृथ्वी की एक और गति बनती है। इस चक्र को पूरा करने में पृथ्वी को  छब्बीस हजार वर्ष लगते हैं। 
भास्कराचार्य ने इसे 'भचक्र सम्पात' कहा है  और इसकी कालावधि 25812 वर्ष निकाली थी। यह आज की गणना के लगभग बराबर ही है। इस गति के कारण पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के सामने और तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के विपरीत में होता है। जब यह सूर्य के विपरीत में होता है तो 'हिम युग' होता है और जब यह सूर्य के सामने होगा तो यहाँ ताप बढ़ जाएगा जिससे बर्फ पिघलने लगेगी। इसके लिए आधुनिक विज्ञानियों ने पिछले 161 वर्षों के 
उत्तरी ध्रुव में होने वाले तापमान में परिवर्तन की एक तालिका बनाई है। इससे भी यह बात सिद्ध हो जाती है।
तो क्यों न हम गर्व करें स्वयं के सनातनी होने पर।

विश्व की पहली भूगोल पुस्तक - श्री विष्णु पुराण . World's first Geography Book - Shri Vishnu Puran 


जी हाँ! ठीक शीर्षक पढ़ा आपने, पृथ्वी का संपूर्ण लिखित वर्णन सबसे पहले विष्णु पुराण में देखने को मिलता है... विष्णु पुराण के रचियता है... महान ऋषि पाराशर...

ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे... राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की...

यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है। 

यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-

"त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया। 
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्। 
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि। 
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः। 
वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥"

इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।

ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-
१. पूर्व भाग-प्रथम अंश
२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश
३. पूर्व भाग-तीसरा अंश
४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश
५. पूर्व भाग-पंचम अंश
६. पूर्व भाग-छठा अंश
७. उत्तरभाग

यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता... क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है ... परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके "पूर्व भाग-द्वितीय अंश" का परिचय देना चाहूँगा .... इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है...

ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं...

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है... (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि - Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)

ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं -
१. जम्बूद्वीप
२. प्लक्षद्वीप
३. शाल्मलद्वीप
४. कुशद्वीप
५. क्रौंचद्वीप
६. शाकद्वीप
७. पुष्करद्वीप

ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है... इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है...

सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।

सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।
मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।

इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,

ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-

पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व

ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।

मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।

मेरु के पूर्व में

शीताम्भ, 
कुमुद, 
कुररी, 
माल्यवान, 
वैवंक आदि पर्वत हैं।

मेरु के दक्षिण में

त्रिकूट, 
शिशिर, 
पतंग, 
रुचक 
और निषाद आदि पर्वत हैं।

मेरु के उत्तर में

शंखकूट, 
ऋषभ, 
हंस,
नाग 
और कालंज पर्वत हैं।

समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।

भारतवर्ष के नौ भाग हैं: 

इन्द्रद्वीप, 
कसेरु, 
ताम्रपर्ण, 
गभस्तिमान, 
नागद्वीप, 
सौम्य, 
गन्धर्व 
और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।

यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन -

प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:
शान्तहय, 
शिशिर, 
सुखोदय, 
आनंद, 
शिव,
क्षेमक, 
ध्रुव ।

यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।

इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं: 

गोमेद, 
चंद्र, 
नारद, 
दुन्दुभि, 
सोमक, 
सुमना 
और वैभ्राज।

इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन

इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों : 
श्वेत, 
हरित, 
जीमूत, 
रोहित, 
वैद्युत, 
मानस 
और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

इसमें महाद्वीप में 
कुमुद, 
उन्नत, 
बलाहक, 
द्रोणाचल, 
कंक, 
महिष, 
ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।

इस महाद्वीप में -
योनि, 
तोया, 
वितृष्णा, 
चंद्रा, 
विमुक्ता, 
विमोचनी 
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।

यहाँ - 
श्वेत, 
हरित, 
जीमूत, 
रोहित, 
वैद्युत, 
मानस 
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं। 

यहां - 
कपिल, 
अरुण, 
पीत
और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं। 

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन

इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे। 

इनके सात पुत्रों : 
उद्भिद, 
वेणुमान, 
वैरथ, 
लम्बन, 
धृति, 
प्रभाकर,
कपिल

इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत -
विद्रुम, 
हेमशौल, 
द्युतिमान, 
पुष्पवान, 
कुशेशय, 
हरि 
और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।

नदियां -

धूतपापा, 
शिवा, 
पवित्रा, 
सम्मति, 
विद्युत, 
अम्भा
और मही नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष - 

उद्भिद, 
वेणुमान,
वैरथ, 
लम्बन, 
धृति, 
प्रभाकर, 
कपिल नामक सात वर्ष हैं। 

वर्ण - 

दमी, 
शुष्मी, 
स्नेह 
और मन्देह नामक चार वर्ण हैं। 

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन - 

इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे। 

इनके सात पुत्रों : 

कुशल, 
मन्दग, 
उष्ण, 
पीवर, 
अन्धकारक, 
मुनि 
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत -

क्रौंच, 
वामन, 
अन्धकारक, 
घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, 
दिवावृत, 
पुण्डरीकवान, 
महापर्वत 
दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।

नदियां -

गौरी, 
कुमुद्वती, 
सन्ध्या, 
रात्रि, 
मनिजवा, 
क्षांति 
और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष -

कुशल, 
मन्दग, 
उष्ण, 
पीवर, 
अन्धकारक, 
मुनि और 
दुन्दुभि ।

वर्ण -

पुष्कर, 
पुष्कल, 
धन्य 
और तिष्य नामक चार वर्ण हैं। 

यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन - 

इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।

इनके सात पुत्रों : 

जलद, 
कुमार, 
सुकुमार, 
मरीचक,
कुसुमोद, 
मौदाकि 
और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। 

यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।

पर्वत - 

उदयाचल, 
जलाधार, 
रैवतक, 
श्याम, 
अस्ताचल, 
आम्बिकेय 
और अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।

नदियां - 

सुमुमरी, 
कुमारी, 
नलिनी, 
धेनुका, 
इक्षु, 
वेणुका 
और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।

सात वर्ष -

जलद, 
कुमार, 
सुकुमार, 
मरीचक, 
कुसुमोद, 
मौदाकि 
और महाद्रुम । 

वर्ण - 

वंग, 
मागध, 
मानस 
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन -

इस द्वीप के स्वामि सवन थे।

इनके दो पुत्र थे: 

महावीर 
और धातकि। 

यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।

पर्वत -
मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।

नदियां -
यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।

वर्ष - 
महवीर खण्ड 
और धातकि खण्ड। 
महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है । 
वर्ण - 
वंग, 
मागध, 
मानस 
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।
यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

समुद्रो का वर्णन -
यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।
पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)
आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो... हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी...
१. विष्णु पुराण में पारसीक - ईरान को कहा गया है,
२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था, 
३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.
४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.
५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.
६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.
७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.
इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है... ये थी हमारे ऋषियों की महानता। - 
अंत में एक बात और - महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था। 
महाभारत में कहा गया है कि - यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है- 
उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था- 
"सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। 
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥ 
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। 
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ 
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।
"अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।"
अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।
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अनजान राहें

Posted: 27 Jan 2022 09:07 PM PST

अनजान राहें 

वीरान सी अनजान राहें दुर्गम पथ बियाबान राहें। 
मंजिलों तक ले जाती हर मुश्किल सुनसान राहें।
 
उबड़ खाबड़ पथरीली गर्म मरुस्थल रेतीली। 
पर्वतों की डगर सुहानी हिम खंडों में बर्फीली।

घने वनों से होकर गुजरे लंबी चौड़ी सुगम राहें। 
गांवों शहरों को जोड़ें कच्ची पक्की दुर्गम राहें। 

घुमावदार सी होती राहें सफर में हो हमराह राहें। 
जिंदगी जीना सिखलाती हमको ये अनजान राहें।

सदा सफलता दिलाती खुद मार्गदर्शक बन जाती। 
हर पड़ाव पर साथ देती दूर्गम से सुगम बन जाती। 

बढ़ते रहने का संदेशा जन-जन को देती है राहे। 
डगर डगर पे पथिक परीक्षा अक्सर लेती है राहें।

बढ़ चले जब मुसाफिर ना रहती अनजान राहें। 
हिम्मत और हौसलों को ना करती परेशान राहें। 

विकट मुश्किलों भरी हो कष्टों सी अनजान राहें। 
कर्मवीर पथ बढ़ चले हंसी चेहरों पे मुस्कान राहें।

रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
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जब कभी सोचता हूँ

Posted: 27 Jan 2022 09:05 PM PST

जब कभी सोचता हूँ

कविता लिखना
भाव नहीं आते हैं,
गहरे समंदर मे,
सीप के मोती से
कहीं खो जाते हैं।
कभी-कभी अचानक
कविता
मेरे जहन मे मचल जाती है,
मन आतुर कर जाती है।
यदि तुरंत ही विचारों को
लेखनी से नहीं बांधा,
तो
लहर के सामान आकर,
फिर वापस चली जाती है।
कविता
बड़ी चंचला है।
कविता मन के जंगल मे
हिरणी सी कुलाचें भरती,
कभी कोयल सी कूकती,
तो कभी फुदकती
मन के आँगन मे
सोन चिरैया सी।
कविता
तभी कविता बन पाती
जब मन के आँगन मे
फुदकते भावों को
लेखनी से
कागज पर कैद करता हूँ।
मैं जानता हूँ
कैद करने से
आज़ादी ख़त्म हो जाती है।
पर
कविता की आज़ादी
शायद
लेखनी मे बंध कर ही
नया जीवन पाती है।
कविता
मेरे पन्नों मे सिमट जाती है,
फिर कविता,
किताब मे छप कर
जीवन्त हो जाती है।
कविता
वात्सल्य बन जाती है।
कविता
प्रेरणा बन जाती है।

डॉ अ कीर्तिवर्धन
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नसीहतें

Posted: 27 Jan 2022 07:21 AM PST

नसीहतें

नसीहतें मां-बाप की 
सुन लेना एक बार 
जिंदगी सुधर जाए 
एतबार कीजिए

भला चाहते आपका 
अपने ही देते सीख 
बड़ों की नसीहतों को 
खूब मान दीजिए

नसीहतें ना दीजिए 
कर्म भी जग में करे 
हुनर दिखला कर 
खूब यश लीजिए

जिंदगी की जंग में भी 
हौसला रखना जरा 
मुकाम हासिल कर 
नसीहतें दीजिए

रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
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पूर्वज-रिक्थ

Posted: 27 Jan 2022 07:17 AM PST

पूर्वज-रिक्थ

पूर्वजों की गौरवगाथा को तू जानबूझ क्यों भुला रहे हो।
उनके पद-चिह्नों पर न चल, क्यों बुनियादें हिला रहे हो।।

समृद्धि और ख्याति का गौरवमय इतिहास रहा है।    
आपद्धर्म, संघर्ष सामना करने का गुण खास रहा है।।

वे त्याग तपस्या परहित में जीवन का समय लगाते थे।
भूले, बिछड़े, पिछड़े को वे सत्पथ की राह दिखाते थे।।

साहसी, आत्मविश्वासी वे उत्तम विचार के पोषक थे।
 थर-थर वे कांपा करते थे  जो अभिमानी और शोषक थे।।

उस विराट, उस निर्विवाद शक्ति के पथ को तू अपनाओ‌।
स्वाभिमान के साथ "विवेक" तू संकल्पित लक्ष्य को पाओ।।

    डॉक्टर विवेकानंद मिश्र डॉक्टर विवेकानंद पथ, गोल बगीचा गया बिहार
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पुनर्गठित हुआ वंदे मातरम फाउंडेशन की कार्यकारिणी समिति

Posted: 27 Jan 2022 07:15 AM PST

पुनर्गठित हुआ वंदे मातरम फाउंडेशन की कार्यकारिणी समिति

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 27 जनवरी 
वृद्धाश्रम के वृद्ध महिलाओं एवं पुरूषों की मदद, निःशुल्क कानूनी सलाह, मुफ्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने वाली संस्थान 'वंदे मातरम फाउंडेशन' ने अपनी कार्यकारणी समिति को पुनर्गठित किया है। पुनर्गठित समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने संस्थान को कैसे मजबूत बनाया जाय और इसके कार्यकलाप को बेहतर तरीकों से कार्यान्वित किया जाय पर सघन रूप से विचार- विमर्श भी किया।
वंदे मातरम फाउंडेशन के अध्यक्ष राजन कुमार सिन्हा ने 26 जनवरी (बुधवार) को श्रीकृष्णा नगर किदवईपुरी स्थित कार्यालय में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि वंदे मारतम फाउंडेशन का गठन अक्तूबर 2008 में किया गया था। उस समय से नियमित रूप से यह संस्था गरीबों, वृद्धों एवं असहाय छात्रों को सहयोग करने का काम कर रही है और प्रत्येक वर्ष लाल बहादुर शास्त्री और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयन्ती मानाता है। जयंती के अवसर पर समाज सेवा, पत्रकारिता आदि कार्यों में उत्कृष्ट कार्यों के लिए लोगों को सम्मानित भी किया जाता है।
उन्होंने बताया कि यह संस्थान अपने कार्यक्रमों को गति देने और सुव्यवस्थित ढंग से संस्थान को आगे बढ़ाने के लिए कार्यकारिणी समिति का पुर्नगठन किया गया है। पूर्व से गठित कार्यकारिणी समिति को सर्वसम्मति से 26 जनवरी (बुधवार) को भंग कर दिया गया और नयी कार्यकारिणी समिति का पुर्नगठन किया गया।
अध्यक्ष ने बताया कि पुनर्गठित कार्यकारिणी समिति मे उपाध्यक्ष-सह-मीडिया सलाहकार के पद पर जितेन्द्र कुमार सिन्हा को, कोषाध्यक्ष पद पर सूरज कुमार सिंह को, संगठन सचिव के पद पर सुजीत कुमार को, अध्यक्ष महिला मोर्चा के पद पर चन्दा दास को तथा सदस्य के रूप में सोनी गुप्ता को सर्वसम्मति से मनोनीत किया गया है।
उन्होंने बताया कि पूर्व से कार्यकारिणी के उपाध्यक्ष पुष्पा तिवारी, प्रधान महासचिव रवीन्द्र कुमार, महासचिव रश्मि लता, सचिव राज कुमार गुप्ता तथा मीडिया प्रभारी -सह- प्रवक्ता अनुराग समरूप को यथावत पद पर बने रहने की सहमति हुई।
अध्यक्ष ने यह भी बताया कि बैठक में ही रेणु सिंह, शशांक राज, धीरज सिंह और सोनी गुप्ता ने वंदे मातरम फाउंडेशन की सदस्यता ग्रहण किया।
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यूथ हॉस्टल में हुआ झंडोतोलन

Posted: 27 Jan 2022 07:12 AM PST

यूथ हॉस्टल में हुआ झंडोतोलन

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 27 जनवरी ::
गणतंत्र दिवस के अवसर पर यूथ हॉस्टल, (फ्रेजर रोड) पटना में यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष मोहन कुमार ने झंडोत्तोलन किया। झंडोत्तोलन के पश्चात मोहन कुमार ने कहा कि समाज में परिवर्तित हो रहा है, युवा सोच का विकास हो रहा है, मीडिया जागृत हो रही है और हम सभी के सहयोग से जनता भी जाग रही है, टेक्नोलॉजी संबंधित लोगों का संख्या बढ़ रहा है इन्हीं सब कारणों से देश का भ्रष्ट तंत्र सतर्क हो गया है। ज्यादा समय तक शासन और प्रशासन में भ्रष्टाचार अपराध और अयोग्यता नहीं चल पाएगी हमारे भविष्य का गणतंत्र (गुण तंत्र) पर आधारित होगा।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कोरोना वैश्विक महामारी जैसे आपदा काल में गणतंत्र दिवस समारोह का आयोजन कुछ भले ही फीका नजर आ रहा हो, परंतु युवाओं के दिलों में गणतंत्र की भावनाएं दिन प्रतिदिन प्रबल नजर आ रही है। आने वाले समय में देश को एक संतुलित मार्गदर्शन प्रदान करेगा जिससे समतामूलक समाज का निर्माण संभव होगा।
उक्त अवसर पर एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष सुधीर मधुकर, वरिष्ठ पत्रकार आलोक नंदन, नीतीश कुमार, समाजसेवी सोनिया सिंह, यूथ हॉस्टल के सभी कर्मचारी गण, सदस्य सहित अन्य लोग उपस्थित थे।
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मोतिहारी मे किया ध्वजारोहण आयुष्मान भारत फ़ाउंडेशन

Posted: 27 Jan 2022 07:10 AM PST

मोतिहारी मे किया ध्वजारोहण आयुष्मान भारत फ़ाउंडेशन

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, 27 जनवरी, पटना (मोतिहारी): :
गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश के अग्रणी युवा संगठन आयुष्मान भारत द्वारा 26 जनवरी (बुधवार) को महर्षि वाल्मीकि पैरामेडिकल कालेज मोतीहारी के प्रांगण मे कार्यक्रम आयोजित कर ध्वजारोहण किया गया l
आयुष्मान भारत के राष्ट्रीय डाक्टर संघ अध्यक्ष डा आर के गुप्ता ने राष्ट्रीय ध्वज को फहराया और उसे सलामी देते हुए देश के बीर जवानो को नमन करते हुए कहा कि गणतंत्र दिवस का दिन हम भारतीयों के लिए बहुत ही हर्षोल्लास का दिन होता है। हमलोग का अपना संविधान लागू हुआ था। इसलिए आज के दिन देश की राजधानी में शोर्य प्रदर्शन किया जाता है।
कार्यक्रम में कोविड-19 के नियमो का पूर्णतः पालन किया गया। कार्यक्रम में चिकित्सक कुमार राजकिरन, चिकित्सक ऐ के मिश्रा, चिकित्सक आशीष अग्रवाल, चिकित्सक सत्यम झा, अनिल कुमार गुप्ता, अब्दुल अंसारी रोशन ठाकुर, राजन ठाकुर, शत्रुघन कुमार, नन्हे कुमार और अंकित तिवारी उपस्थित थे।
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28 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक पंचांग एवं राशिफल - सभी १२ राशियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन ? क्या है आप की राशी में विशेष ? जाने प्रशिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. प्रेम सागर पाण्डेय से |

Posted: 27 Jan 2022 06:39 AM PST

28 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक पंचांग एवं राशिफल - सभी १२ राशियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन ? क्या है आप की राशी में विशेष ? जाने प्रशिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. प्रेम सागर पाण्डेय से |

28 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक पंचांग

सूर्योदय एवं चन्द्रोदय

सूर्योदय : 06:36:45

सूर्यास्त : 05:24:40

तिथि : एकादशी - रात्रि 08:08:36 तक तदुपरांत द्वादशी

नक्षत्र ज्येष्ठा - रात्रि 02:15:33 तक तदुपरांत मूल

योग: ध्रुव - रात्रि 07:10:24 तक तदुपरांत व्याघात

करण : बव -

बालव -

वार : शुक्रवार

पक्ष : कृष्ण पक्ष

चन्द्र मास एवं सम्वत

शक सम्वत : 1943 प्लव

चन्द्रमास : माघ - पूर्णिमान्त

पौष - अमान्त

विक्रम सम्वत : 2078 आनन्द

गुजराती सम्वत : 2078 प्रमादी

विशेष ~ षट्तिला एकादशी व्रत (सभी के लिए), पूरब दिशा में बुध का उदय।

पं. प्रेम सागर पाण्डेय् नक्षत्र ज्योतिष वास्तु अनुसंधान केन्द्र नि:शुल्क परामर्श - रविवार

28 जनवरी 2022, शुक्रवार का दैनिक राशिफल

मेष (Aries): आज के दिन ताजगी और स्फूर्ति का अभाव रहेगा। क्रोध की अधिकता रहेगी। काम बिगड़ने की संभावना है। ऑफिस में अधिकारियों और घर थ में कुटुंबीजनों और विरोधियों के साथ वाद-विवाद में पड़े बिना मौन रहकर दिन व्यतीत करना बेहतर रहेगा। किसी धार्मिक कार्य में या धार्मिक स्थान पर जाने का अवसर आएगा।

शुभ रंग = उजला

शुभ अंक : 4

वृषभ (Tauras): अत्यधिक कार्यभार और खानपान में लापरवाही से आपका स्वास्थ्य खराब होगा। समय से भोजन और नींद न लेने के कारण मानसिक रूप से बेचैनी का अनुभव होगा। प्रवास में विघ्न आने की संभावना है। निर्धारित समय कार्य पूरा नहीं कर सकने से रोष पैदा हो सकता है। योग, ध्यान और अध्यात्म से राहत मिल सकती है।

शुभ रंग = क्रीम

शुभ अंक : 2

मिथुन (Gemini): मौज-मस्ती और मनोरंजन की प्रवृत्तियों में आपको विशेष रुचि होगी। दोस्तों और परिजनों के साथ घूमने-फिरने का प्लान बनाएंगे। सार्वजनिक जीवन में मान प्रतिष्ठा की वृद्धि होगी। विपरीत लिंगीय व्यक्तियों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा। आपके हाथ से दान-धर्म और सखावत के कार्य होंगे।

शुभ रंग = हरा

शुभ अंक : 3

कर्क (Cancer): आज का दिन खुशी और सफलता का है। परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। नौकरीपेशा वालों को ऑफिस में अनुकूल वातावरण मिलेगा। नौकर वर्ग और ननिहाल पक्ष से लाभ होगा। स्वास्थ्य बना रहेगा। आर्थिक लाभ होगा। आवश्यक खर्च होंगे। प्रतिस्पर्धियों को परास्त कर सकेंगे।

शुभ रंग = पींक

शुभ अंक : 8

सिंह (Leo): आज आप शारीरिक मानसिक स्वस्थता से काम करेंगे। सृजनात्मक प्रवृत्तियों में विशेष दिलचस्पी रहेगी। साहित्य और कला के क्षेत्र में कुछ नए सृजन करके प्रेरणा मिलेगी। प्रेमीजनों और प्रिय व्यक्तियों के साथ मुलाकात होगी। संतान के शुभ समाचार मिलेंगे। धार्मिक या परोपकार के कार्य आपके मन को आनंदित करेंगे।

शुभ रंग = फीरोजा़

शुभ अंक : 6

कन्या (Virgo): आज आपको प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ेगा। शारीरिक स्वास्थ्य के सम्बंध में शिकायत रहेगी। मन पर चिंता का बोझ रहने से बेचैनी का अनुभव होगा। पारिवारिक सदस्यों के साथ खटराग होगा। माता के स्वास्थ्य के सम्बंध में चिंता होगी। पढ़ाई के लिए अनुकूल समय नहीं है। स्थायी संपत्ति, वाहन से सम्बंधित समस्याएं निर्मित होंगी। धन खर्च होगा।

शुभ रंग = हरा

शुभ अंक : 3

तुला (Libra): वर्तमान समय भाग्यवृद्धि का होने से साहस और कार्य हाथ में लेने के लिए आज शुभ दिन है। योग्य जगह पर पूंजी निवेश आपको लाभ दे सकता है। परिवार में भाई-बंधुओं के साथ आत्मीयता और मेल-मिलाप रहेगा। छोटे धार्मिक यात्रा का आयोजन कर सकेंगे। विदेश से अच्छे समाचार मिलेंगे।

शुभ रंग = क्रीम

शुभ अंक : 2

वृश्चिक (Scorpio) आपको नकारात्मक मानसिक वृत्ति टालने की सलाह देते हैं। न बोलने में नौगुण की नीति अपनाकर चलेंगे तो पारिवारिक सदस्यों के साथ संघर्ष से बच सकेंगे। स्वास्थ्य सम्बंधी शिकायत रहेगी। अनावश्यक खर्च पर अंकुश लगाना आवश्यक है। विद्यार्थियों को पढ़ाई में अवरोध आएगा।

शुभ रंग = आसमानी

शुभ अंक : 7

धनु (Sagittarius): आपके निर्धारित कार्य में सफलता और आर्थिक लाभ की संभावना है। सपरिवार मांगलिक प्रसंग में उपस्थित होंगे। प्रवास की, विशेष रूप से किसी तीर्थयात्रा की संभावना है। स्वजनों के साथ मिलन आपको हर्षित करेगा। दांपत्य जीवन में निकटता और मधुरता का अनुभव करेंगे। समाज में आपके यश और कीर्ति में वृद्धि होगी।

शुभ रंग = उजला

शुभ अंक : 4

मकर (Capricorn): आप धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों में व्यस्त रहेंगे। पूजा-पाठ या धार्मिक कार्य के पीछे धन खर्च होगा। सगे-सम्बंधियों के साथ संभलकर बोलें क्योंकि आपकी वाणी से किसी को चोट पहुंच सकती है। कम सफलता मिलने से हताशा होगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। दांपत्य जीवन में खटराग होगा। महादेव आपकी मुसीबत कम करेंगे।

शुभ रंग = क्रीम

शुभ अंक : 2

कुंभ (Aquarius): नए कार्य या आयोजन हाथ में ले सकेंगे। लक्ष्मीजी की कृपा आपके साथ है। नौकरी धंधे में लाभ होगा। मित्र वर्ग, विशेष रूप से स्त्री मित्रों से आपको लाभ होगा। सामाजिक मंडल में आप ख्याति और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेंगे। पत्नी और पुत्र की तरफ से आप सुख और संतोष का अनुभव करेंगे। प्रवास, पर्यटन और वैवाहिक संयोग निर्मित होंगे।

शुभ रंग = आसमानी

शुभ अंक : 7

मीन (Pisces): आपके लिए आज का दिन शुभ फलदायक है। काम की सफलता और उच्च पदाधिकारियों का प्रोत्साहन आपके उत्साह को दोगुणा कर देगा। व्यापारियों की आय में वृद्धि होगी। बकाया राशि का भुगतान होगा। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। परिवार में सुख-शांति होगी। उन्नति के संयोग बनेंगे। सरकार की तरफ से लाभ होगा।

शुभ रंग = उजला

शुभ अंक : 4 
प्रेम सागर पाण्डेय् ,नक्षत्र ज्योतिष वास्तु अनुसंधान केन्द्र ,नि:शुल्क परामर्श - रविवार , दूरभाष 9122608219 / 9835654844
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कॉन्वेंट विद्यालय बनते जा रहे हैं बलपूर्वक धर्मांतरण के केंद्र !’ विषय पर ऑनलाइन विशेष संवाद !

Posted: 27 Jan 2022 05:38 AM PST

कॉन्वेंट विद्यालय बनते जा रहे हैं बलपूर्वक धर्मांतरण के केंद्र !' विषय पर ऑनलाइन विशेष संवाद !

*कॉन्वेंट विद्यालय धर्मांतरण के केंद्र बन रहे हैं और इसके लिए राजनीतिक समर्थन प्राप्त है !* - श्री. अर्जुन संपथ, अध्यक्ष, हिन्दू मक्कल कत्छी
तमिलनाडु की 'लावण्या' नामक एक किसान की बुद्धिमान लड़की ईसाईयों द्वारा संचालित विद्यालय में दसवीं कक्षा में पढ रही थी । उस पर ईसाई धर्म स्वीकारने के लिए दबाव डाले जाने पर उसने आत्महत्या की । ईसाईयों द्वारा स्वास्थ्य व शिक्षा क्षेत्र में धर्मांतरण करने के लिए अधिकाधिक प्रयास किए जाते हैं । कॉन्वेंट विद्यालयों में हिन्दू छात्रों को हिन्दू संस्कृति का पालन करने से विरोध किया जा रहा है और सभी ईसाई संचालित विद्यालय धर्मांतरण के केंद्र बनते जा रहे हैं । इसे राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है । इसके संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय ने भी प्रश्‍न उठाए हैं, ऐसा प्रतिपादन 'हिन्दू मक्कल कत्छी'के अध्यक्ष श्री. अर्जुन संपथ ने किया । हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा 'कॉन्वेंट बन रहे हैं धर्मांतरण के केंद्र !' विषय पर आयोजित 'विशेष संवाद' में वे बोल रहे थे ।
इस संवाद में श्री. संपथ ने आगे कहा कि धर्मांतरण के कारण कन्याकुमारी जैसे जनपद में आज हिन्दू अल्पसंख्यक बन चुके हैं । राज्य की सरकार ईसाईप्रेमी है । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टैलिन ने ही एक बैठक में सार्वजनिक रूप से बताया था कि 'यह सरकार केवल अल्पसंख्यकों के लिए है ।' यहां के प्रशासन पर इसी का प्रभाव है । कर्नाटक में धर्मांतरणविरोधी कानून पारित हो चुका है;इसलिए हमने तमिलनाडु में भी यह मांग की है । इस संवाद में अंग्रेजी दैनिक 'दी पायोनियर' के वरिष्ठ पत्रकार श्री.कुमार चेल्लप्पन ने कहा कि किसी भी प्रसारमाध्यम ने 'लावण्या' आत्महत्या प्रकरण का संज्ञान नहीं लिया । प्रसारमाध्यमों ने विद्यालय का नाम, लडकी का नाम अथवा इस घटना के पीछे किस का हाथ है, इसकी जानकारी नहीं दी है । यहां के मुख्य प्रवाह के प्रसारमाध्यमों ने मार्क्सवादी, ईसाई और मुसलमानों के पक्षधर लोग हैं; इसलिए वे धर्मांतरण जैसे समाचारों को प्रसिद्धि नहीं देते । यहां के प्रसारमाध्यम ईसाई और मुसलमान कट्टरवादियों के वक्तव्यों को तुरंत प्रसिद्धि देते हैं । मुख्यमंत्री स्टैलिन ने वक्तव्य दिया था कि 'सनातन धर्म सबसे खतरनाक है ।' यहां की बाल कल्याण गैरसरकारी संस्थाओं को ईसाई और मुसलमान चलाते हैं । इन संस्थाओं को मिलनेवाले विदेशी चंदे की जानकारी सरकार को नहीं दी जाती
। केरल और तमिलनाडु राज्यों में बच्चों पर अत्याचार की कई घटनाएं होती हैं । इसमें यदि ईसाई अथवा मुसलमान आरोपी हों, तो यहां के प्रसारमाध्यम उन्हें संरक्षण देते हैं । आज के समय में गांव के गांव धर्मांतरित किए जा रहे हैं । समाज में 'कॉन्वेंट विद्यालय सबसे अच्छे होते हैं', इस प्रकार की अनुचित मानसिकता बनाई गई है; परंतु हम भी हिन्दुओं के लिए विद्यालय चलाकर हिन्दू बच्चों को हमारे धर्म का अमूल्य ज्ञान दे सकते हैं और उन्हें अच्छे अभियंता और डॉक्टर बना सकते हैं, ऐसा भी श्री. कुमार चेल्लप्पन ने बताया ।
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गुरु का महत्व और शिष्य के दायित्व

Posted: 27 Jan 2022 05:27 AM PST

गुरु का महत्व और शिष्य के दायित्व

(हिफी डेस्क-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
भारत के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विकास में गुरु-शिष्य परम्परा का विशेष महत्व रहा है।
सवाल है शिष्य किसे कहते हैं और शिष्यत्व का महत्व क्या है?
उसका सीधा अर्थ है। आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो गुरु द्वारा बताई साधना करता है, उसे 'शिष्य' कहते हैं। शिष्यत्व का महत्व यह है कि उसे देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण एवं समाजऋण चुकाने नहीं पडते।
शिष्य के अनेक गुणों में से कुछ प्रमुख गुण आगे निम्नानुसार हैं:
पहला है मुमुक्षुत्व: वास्तव में जबतक शिष्य यह बात ठान न ले, अर्थात जबतक उसमें वैसी इच्छा न हो, तब तक वह जीवन्मुक्त नहीं हो सकता। जिसकी प्रज्ञा जागृत हुई, वही वास्तविक शिष्य है।
दूसरा है- आज्ञाकारिता: यह शिष्य के समस्त गुणों में सर्वश्रेष्ठ है।
कहते हैं गुर्वाज्ञा का बुद्धि से विश्लेषण न करें परंतु
बुद्धि का प्रयोग कर आज्ञापालन अधिक अच्छे ढंग से अवश्य करें! ऐसा क्यों?
आज्ञा की पृष्ठभूमि से शिष्य कदाचित अनभिज्ञ हो लेकिन उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि 'गुरु की विचारधारा कल्याणकारी है' अतः सत्शिष्य सद्गुरु की आज्ञा का पालन निस्संदेह करता है। वे कहें 'नामजप कर', तो वह उसी अनुसार करता है। 'उससे क्या लाभ होगा?', इसका विचार वह नहीं करता। जब गुरु ने कहा 'निरंतर नामजप करो', तब अंबू ने सात दिन लगातार नामजप किया। इसके परिणामस्वरूप उसे साक्षात्कार हुआ और वह अंबुराव महाराज बना। गुरु की बात पर विश्वास न हो, तो प्रथम उनके कहे अनुसार आचरण करें, तत्पश्चात कारण पूछें। यदि गुरु कहें, 'माता-पिता के पास जाओ एवं उनकी बात मानो', तब भी बुरा न मानकर गुरु के कहे अनुसार ही करें। 'गुरु मुझे अपने से दूर कर रहे हैं', 'माता-पिता के पास जाओ' ऐसा कहते हैं परंतु 'माता-पिता के पास जाना माया का भाग है' इत्यादि विचार मन में लाना उचित नहीं है। गुरु के 'जा' कहने में भी कुछ उद्देश्य होता है। बिट्ठलपंत नेे (संत ज्ञानेश्वर के पिता ने) संसार त्याग कर संन्यास लिया था। गुरु ने उनसे कहा 'संसारी बनो', क्योंकि गुरु जगत को संत ज्ञानेश्वर देना चाहते थे।

गुरु के किसी उद्दिष्ट के या उनके द्वारा बताई गई किसी सेवा के कार्यकारण भाव को भली-भांति समझकर, न्यूनतम समय में एवं उचित ढंग से उसे पूर्णत्वतक ले जाना गुरु को अपेक्षित होता है। गुरु यदि कहें, 'पूजा करो' और शिष्य बुद्धि का प्रयोग कर अधिकाधिक अच्छे ढंग से पूजा करे, तो यह अवज्ञा नहीं होतीय अपितु गुरु इस बात से प्रसन्न होते हैं।

श्री गुरु के आज्ञापालन का रहस्य क्या है?

आज्ञापालन की क्षमता गुरु-आज्ञा में ही है। गुरु कभी ऐसा नहीं कहते, जिसका पालन नहीं कर पाओगे। यद्यपि 'आज्ञापालन नहीं हो पाएगा' ऐसा बाह्यतः प्रतीत हो, तब भी गुरु ही अंतःकरण में आज्ञापालन का सामथ्र्य प्रदान करते हैं। इस प्रकार आज्ञापालन की क्षमता प्राप्त करने के लिए पहले चरण में गुरुके कहे अनुसार कार्य करना और आगे गुरु के मन की बात जानकर कार्य करना आवश्यक होता है। आज्ञापालन न करने का दोष भी शिष्य को लगता है। गुरुचरित्र में बताया गया है कि जो गुरु की बात नहीं मानता, वह रौरव नरक में जाता है। वह यमलोक में वास करता है और अखंड कष्ट भोगता है। वह नर पापी और दरिद्र बनकर रह जाता है।

गुर्वाज्ञापालन कैसे करना चाहिए, इसके कुछ शिष्यों के उदाहरण

'एक बार धौम्य ऋषि ने आरुणि नामक अपने शिष्य से खेत में फसल को पानी देने के लिए कहा। आरुणि ने खेत में जाकर देखा कि सारा पानी बह जाने के कारण फसलों को पानी नहीं मिल रहा था। आरुणि ने बांध बनाकर, पत्थर डालकर पानी रोकने का प्रयत्न कियाय परंतु प्रवाह के वेग के कारण बांध टिक न सका। अंततः वह स्वयं बांध के दोनों छोरों के बीच लेट गया। इससे पानी थम गया तथा सारी फसल को पानी मिला।' (गुरुचरित्र, अध्याय 16)

'पर्वतेश्वर नामक शूद्र ने अपनी पत्नी एवं संतान की इच्छा के विरुद्ध गुरु-आज्ञा हेतु खेत में उगी हुई, ठेके में ली हुई ज्वार की फसल काट डाली। (आगे चलकर उन कटे हुए पौधों में कई गुना अधिक ज्वार की फसल हुई।)' (गुरुचरित्र, अध्याय 47)

इन उदाहरणों से शिष्य की गुरु के प्रति भक्ति और समर्पण दिखता है। गुरु त्रिकालज्ञानी हैं, इसलिए उनके द्वारा बताई हुई बात बुद्धिसे समझ में न भी आ रही हो, तबभी शिष्य के लिए वह परम हितकारी होती है। इसलिए उसे मान लेना चाहिए।

गुरु के प्रति दृढ श्रद्धा होनी चाहिए।

कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

1993 में मुंबई में भीषण दंगे हुए थे। सैकडों हिन्दू-मुसलमान मारे गए। ऐसी स्थिति में साधु समान नित्य के वेश में, स्वामी परमानंद सिर पर जटा बांधे एवं लंबी दाढी रख, मुसलमानों की एक घनी बस्ती में परिचित व्यक्ति से मिलने गए। कुछ कालोपरांत जब हमने उनसे पूछा, 'उस समय डर नहीं लगा क्या?'' उन्होंने उत्तर दिया, ''गुरु के समर्थ होते हुए डर कैसा?''

गुरुचरित्र के कुछ उदाहरण

'जब श्री गुरु ने एक ब्राह्मण स्त्री को, बांझ भैंस को दुहने के लिए कहा, तो उसने श्रद्धापूर्वक दूध निकालना आरंभ किया तथा भैंस ने अत्यधिक दूध दिया ।' (श्री गुरुचरित्र, अध्याय 22)

'गुरु पर संपूर्ण श्रद्धा के कारण कुष्ठरोग से पीडित नरहरि ब्राह्मण ने उनकी आज्ञानुसार चार वर्ष तक शुष्क, ईंधन हेतु लाई गई गूलर के पेड की (उदुम्बर की) एक टहनी को रोपकर पानी से सींचा । लोगों ने उसे पागल कहकर उसका उपहास किया परंतु उसने उसे पानी से सींचना जारी रखा। आगे चलकर उस टहनी पर कोमल पत्ते निकले तथा नरहरि का कुष्ठरोग भी ठीक हो गया।' (श्री गुरुचरित्र, अध्याय 40)

समर्थ रामदास स्वामीजी के चरित्र से कुछ उदाहरण

एक बार जब समर्थ रामदास स्वामीजी का एक शिष्य मार्ग पर चल रहा था, तो कहीं पर उसने देखा कि, एक घर के युवा पालनकर्ता की मृत्यु पर उसके वृद्ध माता-पिता, पत्नी, बच्चे सभी रो रहे हैं । उसे दया आई। 'राम-राम' कहकर उसने शव पर पानी छिडका, तो मृत युवक जीवित हो उठा। यह घटना जब उस शिष्य ने स्वामीजी को सुनाई, तो स्वामीजी ने उसे एक थप्पड मारा और बोले, ''राम-राम'' कहकर राम को दो बार क्यों पुकारा ? पहली पुकार से ही राम कार्य संपन्न करेंगे, ऐसी श्रद्धा नहीं थी क्या?'' एक बार शिष्य अंबादास को समर्थ रामदास स्वामीजी ने वृक्ष की एक शाखा के सिरे पर बैठकर शाखा काटने के लिए कहा। गुरु पर पूर्ण श्रद्धा होने के कारण उसने उनके कहे अनुसार शाखा काटना आरंभ किया। शाखा कटते ही वह वृक्ष के नीचे स्थित कुएं में गिर पडा। तीन दिन के उपरांत जब स्वामीजी ने उससे पूछा, 'कुशल-मंगल है न ?'' इस पर वह बोला, 'आपकी कृपा से ठीक हूं।'' तत्पश्चात स्वामीजी ने उसे बाहर निकाला तथा उसका नाम 'कल्याण' रखा। (हिफी)
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शौर्य व संस्कृति का समन्वय

Posted: 27 Jan 2022 05:23 AM PST

शौर्य व संस्कृति का समन्वय

(डाॅ दिलीप अग्निहोत्री-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
भारतीय राष्ट्र की अवधारणा अति प्राचीन है। शाश्वत रूप में इसका युगों युगों से अस्तित्व रहा है। यही कारण है कि समय के साथ दुनिया की अनेक सभ्यता संस्कृति विलुप्त हो गई। इनके स्थान पर दूसरी सभ्यताओं का प्रादुर्भाव हुआ। सभ्यताओं के बीच संघर्ष भी चलता रहा है। विदेशी आक्रांताओं के कारण भारत का भूभाग अवश्य कम हुआ है लेकिन राष्ट्र के रूप में भारत की विरासत आज भी व्यापक रूप में स्थापित है। शौर्य व संस्कृति के समन्वय ने ही भारत को विश्व गुरू के रूप में प्रतिष्ठित किया था। शौर्य के बल पर भारत ने कभी अपनी संस्कृति सभ्यता का विस्तार नहीं किया था। किसी के मत को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया। यहां तो वसुधा को कुटुंब मानते हुए सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना की गई। गणतंत्र दिवस राष्ट्रीय शौर्य के प्रदर्शन का भी अवसर होता है। राष्ट्रीय राजधानी का राजपथ इसका गवाह बनता है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से गणतंत्र दिवस पर शौर्य के साथ भारतीय संस्कृति का सन्देश भी दिया जा रहा है।
अब भारत न केवल स्वावलम्बी व आत्मनिर्भर बन रहा है,बल्कि चालीस से अधिक देशों को सामरिक सामग्री का निर्यात भी करने लगा है। आत्मनिर्भर भारत व मेक इन इंडिया अभियान सफल हो रहा है। भारत मेक फॉर वर्ल्ड की दिशा में अग्रसर है।
पिछले छह वर्षों के दौरान सामरिक सामग्री निर्यात में सात सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मध्य पूर्व,दक्षिण पूर्व, एशिया और लैटिन अमेरिकी देशों को आकाश मिसाइल, ब्रह्मोस मिसाइल,तटीय निगरानी प्रणाली,रडार और एयर प्लेटफार्म जैसे सुरक्षा उपकरण और हथियार निर्यात किया जा रहा है। स्वदेशी भारत ड्रोन दुनिया में सर्वाधिक उच्च तकनीक का है। इसके अलावा स्वदेशी एन्टी सबमरीन युद्धपोत आई इन एस कवरत्ती को भी नौसेना में शामिल किया गया है। यह भी राडार के पकड़ में नहीं आता। इसी प्रकार अर्जुन टैंक, पिनाक रॉकेट लांच सिस्टम,आकाश,नाग मिसाइल,तेजस विमान, ध्रुव हेलिकॉप्टर,अग्नि बैलिस्टिक मिसाइल, अस्त्र मिसाइल,अस्मि पिस्टल स्वदेशी है। इस आधार पर भारत कुछ विकसित देशों की बराबरी पर आ गया है। देश में अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर, राइफल्स आदि का भी निर्माण होगा। बुलेट प्रूफ जैकेट व बर्फीले क्षेत्रों के लिए जूतों का उत्पादन भी देश में हो रहा है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का एलसीए तेजस एमके वन ए इसी साल जून में पहली उड़ान भरेगा। भारतीय वायु सेना को अंतिम परिचालन मंजूरी संस्करण के सभी दस हल्के लड़ाकू विमान सौंपने का मार्ग प्रशस्त हुआ। तेजस मार्क वन ए फाइटर जेट की हुई डील टू फ्रंट वार की तैयारियां कर रही भारतीय वायुसेना को नई आसमानी लड़ाकू ताकत देने वाली है। एक वर्ष पूर्व बेंगलुरु में एयरो इंडिया शो के दौरान भारतीय वायुसेना के लिए तिरासी एलसीए तेजस एमके वन ए की आपूर्ति के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ अड़तालीस हजार करोड़ रुपये के सौदे पर हस्ताक्षर किए थे। इस सौदे के समय रक्षा मंत्रालय ने एचएएल से अगले दो वर्ष में तीन विमान और अगले पांच वर्षों तक प्रति वर्ष सोलह विमानों की आपूर्ति करने को कहा था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सौदे से एक दिन पहले ही बेंगलुरु में तेजस की नई प्रोडेक्शन यूनिट का उद्घाटन किया था। भारतीय वायुसेना को मिलने वाले एलसीए तेजस लड़ाकू विमान पैसठ प्रतिशत स्वदेशी होंगे। स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने के लिए देशी उत्तम राडार लगाये जायेंगे। यानी वायुसेना को मिलने वाले विमानों का पहला जत्था इजरायल के राडार की जगह देशी उत्तम राडार से लैस होगा। तिरासी एलसीए एमके वन ए में से तिरसठ विमानों में इलेक्ट्रॉनिक एईएस राडार लगेंगे,जिसके लिए डीआरडीओ और एचएएल में करार हुआ है। सरकार ने तय किया है कि अब हर साल गणतंत्र दिवस का पर्व तेईस से तीस जनवरी तक सप्ताह भर का होगा। समारोह तेईस जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती से शुरू होकर तीस जनवरी को शहीद दिवस तक चलेंगे।
पहली बार मुख्य परेड की शुरुआत राष्ट्रीय कैडेट कोर के शहीदों को शत शत नमन कार्यक्रम से हुई। पहली बार भारतीय वायु सेना के पचहत्तर विमान और हेलीकॉप्टर ने भव्य फ्लाईपास्ट किया। रक्षा और संस्कृति मंत्रालयों की ओर से आयोजित राष्ट्रव्यापी वंदे भारतम नृत्य प्रतियोगिता के माध्यम से चुने गए चार सौ अस्सी कलाकारों ने राजपथ पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। पांच राफेल लड़ाकू विमान ने विनाश फॉर्मेशन में राजपथ के ऊपर से उड़ान भरी। वरुण फॉर्मेशन में और पचहत्तर नंबर के आकार में सत्रह जगुआर लड़ाकू विमान आसमान में गर्जना की। उत्तर प्रदेश की झांकी में काशी विश्वनाथ धाम को दर्शाया गया है। राजपथ पर परेड में उत्तर प्रदेश की झांकी में खास तौर पर विश्वनाथ धाम की झांकी और बनारस के घाट पर संस्कृति की झलक को शामिल किया गया है। गंगा स्नान करते साधु और पूजन करते हुए बटुकों का दल भी था। राजपथ की परेड में ये दूसरा अवसर है, जब काशी की खास झांकी शामिल हुई है। इसके पहले महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की झांकी परेड में शामिल हो चुकी है। काशी विश्वनाथ धाम के नव्य और भव्य विस्तारित स्वरूप को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत वर्ष दिसम्बर को शिवभक्तों और राष्ट्र के लिए समर्पित किया था। अब यह धाम श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। मंदिर में दर्शन पूजन करने वालों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। पिछले गणतंत्र दिवस पर यूपी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की झांकी प्रस्तुत की थी। जिसको प्रथम पुरष्कार मिला था। मंदिर निर्माण का सपना पांच शताब्दी पुराना रहा है। पहले इसका कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा था। अंततः यह सपना साकार हुआ। पांच सदियों का समय कोई कम नहीं होता। ऐसे में मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होना ऐतिहासिक व अभूतपूर्व था। श्री रामभूमि पर मंदिर निर्माण हेतु नरेंद्र मोदी ने भूमि पूजन किया था। गणतंत्र दीवस परेड में इस ऐतिहासिक प्रसंग की अभिव्यक्ति सहज स्वाभाविक थी। पिछली बार उत्तर प्रदेश की झांकी में दीपोत्सव को भी सजाया गया था। दीपोत्सव की भव्यता रामायण के प्रेरक प्रसंगों पर आधारित झांकी भी प्रदर्शित की थी। इसमें रामायण की रचना करते महर्षि वाल्मीकि,उनके आश्रम और पीछे मंदिर की प्रतिकृति थी। अयोध्या हमारे लिए पवित्र नगरी है और राममंदिर हर आस्थावान के लिए श्रद्धा का विषय है। इस प्राचीन नगरी की प्राचीन विरासत की झांकी का प्रदर्शन भी किया गया था। (हिफी)
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बीटिंग द रिट्रीट में बदलाव

Posted: 27 Jan 2022 05:19 AM PST

बीटिंग द रिट्रीट में बदलाव

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
कहते हैं ठहरा हुआ पानी भी एक न एक दिन बदबू देने लगता है, इसलिए परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। मानव एवं प्रकृति दोनों का सहचर्य रहा है। प्रकृति में बदलाव होता है तो हमें कुछ अटपटा भले ही लगे, लेकिन बाद में रुचिकर और हितकर भी हो जाता है। गणतंत्र दिवस की परेड के बाद तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम होता है। इस दिन भी राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देते हुए परेड निकलती है। इस अवसर पर एक ध्वनि बजायी जाती है जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को प्रिय थी। अब तय किया गया है कि बीटिंग रिट्रीट में स्वर्गीय प्रदीप का कालजयी गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों... की ध्वनि बजेगी। हो सकता है कि कुछ लोग इस पर नुक्ताचीनी करें लेकिन स्वर्गीय प्रदीप का यह गीत राष्ट्रीय पर्वों पर बहुत ही सम्मान के साथ सुना जाता है। कहते हैं पहली बार जब दिल्ली के रामलीला मैदान में लतामंगेशकर ने यह गीत गाया था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आंसू निकल आए थे। प्रदीप जी से यह गीत भी बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य से लिखवाया गया था। इसलिए वीटिंग द रिट्रीट में इस गीत की धनि सुनना सार्थक कदम माना जाएगा।

पता चला है कि इस बार 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड के बाद जब 29 जनवरी को बीटिंग रिट्रीट होगी तो उसमें बदलाव के बाद गीत 'एबाइड विद मी' की धुन को हटाकर ऐ मेरे वतन के लोगों की धुन बजाई जाएगी। ये गाना देश की सेना को सम्मान देने वाला माना जाता रहा है। पहली बार इसे 27 जनवरी 1963 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने गाया गया था। ये गाना कैसे बना और फिर कैसे लोगों की जुबान पर चढ़ गया, इसकी भी अपनी एक कहानी है।

इस सदाबहार कालजयी गाने को कवि प्रदीप ने लिखा था और इसे सबसे पहले लता मंगेशकर ने 27 जनवरी 1963 को गाया था। जब लता इसको गा रही थीं तो माहौल इतना भावुक हो गया कि ज्यादातर लोगों की आंखों में आंसू छलक आए, जिसमें नेहरू भी थे। क्या आपको पता है इस गाने का जन्म कैसे हुआ था। कवि प्रदीप ने एक इंटरव्यू में बाद में बताया कि ये गाना कैसे बना। कैसे हुई इसकी पैदाइश। 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की बुरी हार हुई थी। पूरे देश का मनोबल गिरा हुआ था। ऐसे हालात में लोगों ने फिल्म जगत और कवियों की ओर देखा कि वो कैसे सबके उत्साह और मनोबल को बढ़ा सकते हैं। सरकार ने भी फिल्म उद्योग से इस बारे में कुछ करने की गुजारिश की, जिससे देश फिर जोश से भर उठे। चीन से मिली हार के गम पर मरहम लगाई जा सके। उस जमाने में कवि प्रदीप ने देशभक्ति के कई गाने लिखे थे। उन्हें ओज का कवि माना जाने लगा था। लिहाजा उन्हीं से कहा गया कि आप एक गीत लिखें। तब देश में फिल्मी जगत के तीन महान गायकों की तूती बोलती थी। वो थे मोहम्मद रफी, मुकेश और लता मंगेशकर। चूंकि देशभक्ति के कुछ गाने रफी और मुकेश की आवाज में गाये जा चुके थे, लिहाजा नया गाना लता मंगेशकर को देने की बात सूझी लेकिन इसमें एक अड़चन थी। उनकी आवाज सुरीली और रेशमी थी। उसमें जोशीला गाना शायद फिट नहीं बैठ पाता। तब कवि प्रदीप ने एक भावनात्मक गाना लिखने की सोची इस तरह 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाने का जन्म हुआ, जिसे जब दिल्ली के रामलीला मैदान में लता ने नेहरू के सामने गाया तो उनकी आंखों से भी आंसू छलक गए।

इस गीत ने अगर कवि प्रदीप को अमर कर दिया तो लता मंगेशकर हमेशा के लिए एक गाने से ऐसी जुड़ीं कि ये उनकी भी बड़ी पहचान बन गया। कवि प्रदीप ने इस गीत का राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की। कवि प्रदीप शिक्षक थे। कविताएं भी लिखा करते थे। एक बार किसी काम के सिलसिले में उनका मुंबई जाना हुआ। वहां उन्होंने एक कवि सम्मेलन में हिस्सा लिया। वहां एक शख्स आया था जो उस वक्त बॉम्बे टॉकीज में काम करता था। उसे उनकी कविता बहुत पसंद आई और उसने ये बात बॉम्बे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय को सुनाई।

इसके बाद कवि प्रदीप हिमांशु राय से मिलवाया गया। हिमांशु राय को उनकी कविताएं बहुत पसंद आईं। उन्हें तुरंत 200 रुपए प्रति माह पर रख लिया गया, जो उस वक्त एक बड़ी रकम होती थी।

कवि प्रदीप का मूल नाम 'रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी' था। उनका जन्म मध्य प्रदेश प्रांत के उज्जैन में बड़नगर नामक स्थान में हुआ। कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म बंधन से बनी। हालांकि 1943 की स्वर्ण जयंती हिट फिल्म किस्मत के गीत "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" के जरिए वो ऐसे महान गीतकार हो गए, जिनके देशभक्ति के तरानों पर लोग झूम जाया करते थे। इस गाने पर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार उनसे नाराज हो गई। उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए गए। बचने के लिए वह भूमिगत हो गये। लगभग पांच दशक के फिल्मी पेशे में कवि प्रदीप ने 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखे। उनके देशभक्ति गीतों में, फिल्म बंधन (1940) में "चल चल रे नौजवान", फिल्म जागृति (1954) में "आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं", "दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल" और फिल्म जय संतोषी मां (1975) में "यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां" है। भारत सरकार ने उन्हें सन 1997-98 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया। 1998 में कवि प्रदीप का निधन हो गया था। कालजयी बन चुके गाने ऐ मेरे वतन के लोगों का संगीत सी. रामचंद्र ने दिया था। उनकी धुन भी दिल को छूने वाली थी। सी रामचंद्र को चितालकर या अन्ना साहिब भी कहा जाता था। वह फिल्मों में संगीत निर्देशक थे और कभी कभार प्लेबैक सिंगर की भूमिका भी निभाई। उन्होंने बालीवुड की कई फिल्मों में संगीत दिया। उनका जन्म 12 जनवरी 1918 को एक मराठी ब्राह्मण परिवार में अहमदनगर में हुआ। पांच जनवरी 1964 को उनका निधन हो गया। (हिफी)
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शाह व कैप्टन की रणनीति

Posted: 27 Jan 2022 05:16 AM PST

शाह व कैप्टन की रणनीति

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
देश के पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा के चुनाव में क्या इस बार सबसे रोचक नतीजे पंजाब से मिलेंगे? यह सवाल यूं ही नहीं उठ रहा है बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वहां के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ मिलकर इस तरह का चक्रव्यूह रचा है जिससे भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनाकर वहां उभर सकती है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर भाजपा ने सरकार बनायी थी। शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा को एक उपेक्षित सहयोगी दल ही समझा। इस बार के चुनावी परिवेश में कांग्रेस विभाजित हो चुकी है और जिस गुट के पास में सत्ता है, उसके सीएम और प्रदेश अध्यक्ष ही आपस में लड़ रहे हैं। मुख्य विपक्षी दल आम आदमी पार्टी (आप) है लेकिन सभी का ध्यान कांग्रेस छोड़कर आए पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके साथी सुखदेव सिंह पर है। ढींढसा अच्छा जनाधार रखते हैं। इनके सहारे ही भाजपा पहली बार 117 सदस्यीय विधानसभा वाले राज्य पंजाब में 65 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस को 37 सीटों पर चुनाव लडाने और उनके
साथी सुखदेव सिंह ढींढसा को 15 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की रणनीति भाजपा के चाणक्य की है। कैप्टन ने सिद्धू को हराने की प्रतिज्ञा पहले ही कर ली है।
पंजाब में बीजेपी, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस और सुखदेव सिंह ढींढसा की पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे का ऐलान हो गया। समझौते के तहत पंजाब में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर 65 सीटों पर लड़ेगी। अमरिंदर की पार्टी 37 सीटों पर लड़ेगी और 15 सीटों पर ढींढसा की पार्टी मैदान में उतरेगी। पंजाब में 20 फरवरी को सभी 117 सीटों पर वोट डाले जाएंगे और 10 मार्च को नतीजे आएंगे।
अमरिंदर सिंह की पार्टी ने एक दिन पहले ही उम्मीदवारों का ऐलान किया है। ढींढसा की पार्टी शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 22 सीटों पर अपनी पार्टी के उम्मीदवारों का ऐलान किया है। इस लिस्ट में भारतीय हॉकी टीम के पूर्व खिलाड़ी अजीत पाल सिंह का नाम भी शामिल है। कैप्टन खुद पटियाला शहर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। अमरिंदर ने सीटों पर नामों की घोषणा करते हुए कहा था, हमने अच्छे उम्मीदवारों को उनके जीतने की संभावनाओं के आधार पर मैदान में उतारा है। साथ ही विभिन्न समुदायों और धर्मों के प्रतिनिधित्व का भी ध्यान रखा है। पंजाब लोक कांग्रेस को जो 37 सीटें मिली हैं, उसमें 26 सीटें मालवा क्षेत्र से आती हैं, जहां कैप्टन के परिवार का काफी प्रभाव माना जाता है। यह रीजन पहले के पटियाला की शाही रियासत के तहत आता है।
इसी क्षेत्र से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के लिए बड़ी बढ़त हासिल की थी, इसमें उनके कृषि सुधारों का बड़ा योगदान था। हालांकि कैप्टन के समर्थकों का कहना है कि इस बार पूर्व मुख्यमंत्री कृषि कानूनों की वापसी के जरिये जनता का समर्थन हासिल करेंगे। पंजाब के पूर्व सीएम ने कहा है कि उनकी पार्टी के प्रत्याशियों का मजबूत राजनीतिक जनाधार और विश्वास है। उनकी स्थानीय इलाकों में जबरदस्त पकड़ भी है। हालांकि इस लिस्ट में सिर्फ एक महिला प्रत्याशी फरजाना आलम खान का नाम शामिल है, जो अकाली दल की पूर्व विधायक हैं और पूर्व पुलिस प्रमुख इजहार आलम खान की पत्नी हैं। वो मालवा क्षेत्र की मालेरकोटला सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगी। अमरिंदर सिंह पहले ही साफ कर चुके हैं कि वो पटियाला शहर सीट से चुनाव लड़ेंगे, जो लंबे समय से उनका गढ़ रहा है। गौरतलब है कि करीब 40 साल कांग्रेस में रहे अमरिंदर सिंह ने पंजाब के मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की कवायद के बाद कांग्रेस छोड़ दी थी। उन्होंने कृषि कानूनों की वापसी को लेकर केंद्र सरकार से संपर्क साधा था। गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात भी की थी। कृषि कानूनों की वापसी के बाद अमरिंदर सिंह ने बीजेपी के साथ पंजाब चुनाव में जाने की घोषणा की थी। इससे पंजाब में चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है, आम आदमी पार्टी के अलावा, अकाली दल-बसपा का गठबंधन, कांग्रेस, बीजेपी-पंजाब लोक कांग्रेस के गठजोड़ के अलावा किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल की पार्टी भी चुनावी समर में उतरी है।
विधानसभा चुनावों में कोरोनावायरस महामारी के चलते चुनाव आयोग ने रैलियों और जनसभा को लेकर गाइडलाइंस जारी की हैं लेकिन एक के बाद एक ऐसी खबरें आ रही हैं, जहां पर चुनावी कार्यक्रमों के लिए कोविड नियमों का उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं। चुनाव आयोग ने पंजाब चुनावों में प्रचार के लिए नोटिस भेजा है। पंजाब के संगरूर में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भगवंत मान पर प्रचार के दौरान कोरोना नियम के उल्लंघन का आरोप लगा है, जिसके चलते चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार भगवंत मान मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने और धुरी से उम्मीदवार घोषित होने के बाद पहली बार अपने निर्वाचन क्षेत्र धुरी पहुंचे थे। धुरी सीट संगरूर जिले में आती है। दरअसल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में आठ जनवरी को चुनाव की तारीखों की घोषणा करते हुए निर्वाचन आयोग ने 15 जनवरी तक रैलियों, रोड शो और बाइक रैलियों तथा इसी तरह के प्रचार कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। आयोग ने 15 जनवरी को प्रतिबंध को 22 जनवरी तक बढ़ा दिया था। शनिवार को इसे बढ़ाकर 31 जनवरी कर दिया गया। पंजाब में चुनाव की तारीखें रविदास जयंती की यात्रा के चलते बदली गई हैं। यहां 117 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव अब 14 फरवरी के बजाय 20 फरवरी को एक चरण में हो रहे हैं। संशोधित कार्यक्रम के मुताबिक नामांकन की अंतिम तारीख 1 फरवरी होगी। नामांकन पत्रों की जांच 2 फरवरी को की
जाएगी और 4 फरवरी तक नाम वापस लिए जा सकेंगे। मतों की गणना सभी पांचों चुनावी राज्यों में 10 मार्च को होनी है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिद्धू ने आम आदमी पार्टी के पंजाब में मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की पूरी कवायद पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये पूरी तरह एक फर्जीवाड़ा था। सिद्धू ने कहा, अरविंद केजरीवाल ने आप के मुख्यमंत्री पद का चेहरा तय करने के लिए जनता की राय मांगी थी और इसके लिए एक नंबर जारी किया था। दावा किया कि उसे 21 लाख मैसेज और कॉल मिली हैं। लेकिन अगर ये नंबर 24 घंटे भी काम करे तो एक दिन में 5 हजार से ज्यादा मैसेज या कॉल नहीं आ सकते। यह लोगों को बेवकूफ बनाने की एक चाल थी। इस प्रकार कांगे्रस भी आप से ही उलझी है तो भाजपा के लिए मैदान साफ है। (हिफी)
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चीन में हाइपरसोनिक इंजन का टेस्ट

Posted: 27 Jan 2022 05:12 AM PST

चीन में हाइपरसोनिक इंजन का टेस्ट

बीजिंग। चीन ने एक नए हाइपरसोनिक इंजन को टेस्ट किया है. दावा किया जा रहा है कि परीक्षण उड़ान के दौरान इंजन ने सभी पैमानों को पूरा किया है। इस इंजन के जरिए चीन डीएफ-17 जैसी दूसरी हाइपरसोनिक मिसाइल बना सकता है. 11 मीटर लंबी चीन की डीएफ-17 मिसाइल 1800 किलोमीटर से 2500 किलोमीटर की दूरी तक हमला करने में सक्षम है। चीन भविष्य में इस इंजन की मदद से हाइपरसोनिक विमान और पृथ्वी की निचली कक्षा में जाने वाला प्लेन भी बना सकता है। अगर चीन नई हाइपरसोनिक मिसाइल बनाता है तो इससे भारत, अमेरिका समेत पूरी दुनिया को खतरा बढ़ जाएगा। चाइना सेंट्रल टेलीविजन (सीसीटीवी) ने बताया कि इस हाइपरसोनिक इंजन को सिंघुआ विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के तहत आने वाले लेबोरेटरी ऑफ स्प्रे कम्बश्चन एंड प्रपल्शन ने विकसित किया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस इंजन ने सफलतापूर्वक पहले उड़ान परीक्षण को पूरा किया है। टेस्ट फ्लाइट में सहायता के लिए दो स्टेज वाले रॉकेट बूस्टर का इस्तेमाल किया गया। उड़ान के दूसरे स्टेज में इंजन पूर्व निर्धारित ऊंचाई और स्पीड पर पहुंचा। इस दौरान इंजन का एयर इनलेट काम करने लगा और स्प्रे टेक्नोलॉजी से इंजन के कम्बश्चन चेंबर में जेट ईंधन की आपूर्ति भी शुरू हो गई।
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इमरान सरकार के तख्तापटल की आशंका

Posted: 27 Jan 2022 05:09 AM PST

इमरान सरकार के तख्तापटल की आशंका

इस्लामाबाद। पाकिस्तान में पीएम इमरान खान और उनकी सरकार मुश्किल में है। ऐसी आशंका है कि सेना ही सरकार का तख्तापलट कर दे। वहीं इमरान खान ने कहा है कि सत्ता से बेदखल होने पर वह और अधिक खतरनाक होंगे. इधर बुधवार को पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने इमरान खान से मुलाकात की। यह बैठक प्रधानमंत्री ऑफिस में हुई और आधिकारिक बयान में बताया गया कि इस मीटिंग में पाकिस्तानी सेना से संबंधित व्यावसायिक मामलों पर चर्चा की गई लेकिन इसके विवरण नहीं दिए गए। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा और पीएम इमरान खान की मुलाकात के बाद अब ऐसे संकेत हैं कि पाकिस्तानी सेना एक बार फिर से तख्तापलट जैसा बड़ा कदम उठा सकती है। भ्रष्टाचार रोकने में बुरी तरह नाकाम साबित हुई इमरान खान सरकार अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इस समय पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियां सरकार पर जमकर हमला बोल रही हैं।
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सऊदी अरब व थाईलैण्ड 30 साल बाद बने दोस्त

Posted: 27 Jan 2022 05:06 AM PST

सऊदी अरब व थाईलैण्ड 30 साल बाद बने दोस्त

दुबई। सऊदी अरब और थाईलैंड पूरे 30 साल बाद फिर से दोस्त बन गए हैं. सऊदी ने पूर्ण राजनयिक संबंधों की बहाली का मंगलवार को आदेश दिया। एक हीरे की चोरी को लेकर इन दोनों देशों के रिश्ते खत्म हो गए थे। इनके बीच बातचीत तक बंद थी. हालांकि, अब दोनों देशों के बीच दोबारा से समझौता हो गया है। दरअसल, 1989 में एक प्रिंस फैसल बिन फहद के महल से 91 किलो के गहने और अन्य मूल्यवान रत्न चोरी हो गए थे। ये चोरी एक थाई नागरिक क्रिआंगक्राई टेकामोंग ने की थी, जो वहां नौकर के तौर पर काम कर रहा था। चोरी के बाद उसने गहनों को महल में एक वैक्यूम क्लीनर बैग में छिपा दिया था। इसमें एक मूल्यवान 50 कैरेट का ब्लू डायमंड भी था। इन गहनों को क्रिआंगक्राई थाईलैंड के लैम्पांग प्रांत में अपने घर भेजने में कामयाब रहा था, लेकिन गहनों को निपटाना उसके लिए मुश्किल साबित हुआ। उसने गहनों को कम दाम में बेचना शुरू किया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह शक के घेरे में आ गया। रॉयल थाई पुलिस ने जांच शुरू की और गहनों की बरामदी की और क्रिआंगक्राई को सात साल जेल की सजा सुनाई थी।
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पाक ने उगला जहर ,भारत ने मुंहतोड़ दिया जवाब

Posted: 27 Jan 2022 05:04 AM PST

पाक ने उगला जहर ,भारत ने मुंहतोड़ दिया जवाब

नई दिल्ली। कश्मीरी आतंकवादियों को पालने वाले पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ जहर उगला है. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत मुनीर अकरम ने आरोप लगाया कि भारत ने साल 1989 से लेकर अब तक 96 हजार कश्मीरियों की जान ली है। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि भगवा पार्टी से जुड़े अतिवादी हिंदू समूह खुलेआम भारत में मुस्लिमों के नरसंहार की बात कह रहे हैं. ऐसे में भारत ने पाकिस्तान को करारा जबाव दिया है। पाकिस्तान के मनगढ़ंत और झूठे आरोप का जवाब देते हुए भारत के स्थायी मिशन के काउंसलर आर मधुसूदन ने कहा कि पाकिस्तान का इतिहास ही आतंकवादियों को पालने-पोसने का रहा है। 2008 में मुंबई आतंकवादी हमले के आरोपियों को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है। ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही मिला था। भारतीय काउंसलर ने पाकिस्तान के काले कारनामों को उजागर करते हुए कहा कि दुनिया जानती है कि पाकिस्तान का आतंकवादियों को पनाह देने, मदद करने और खुले आम सपोर्ट करने का इतिहास रहा है। यह एक ऐसा देश है जिसे सारी दुनिया आतंकवाद का स्पॉन्सर मानती है। यहां तक यूएनएससी ने जिन आतंकियों पर बैन लगाया है, उनमें भी सबसे ज्यादा पाकिस्तान में ही रहते हैं। इतना ही नहीं, आज दुनिया भर में होने वाले आतंकवादी हमलों का कोई न कोई कनेक्शन पाकिस्तान से रहता ही है. मधु सूदन ने सुरक्षा परिषद को याद दिलाया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ओसामा बिन लादेन का न सिर्फ समर्थन करते हैं, बल्कि उसी के रास्ते पर चलते हैं।
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षटतिला ऐकादशी व्रत 28 जनवरी 2022, शुक्रवार को रखें

Posted: 27 Jan 2022 04:47 AM PST

षटतिला ऐकादशी व्रत 28 जनवरी 2022, शुक्रवार को रखें 

संवाददाता कन्हैया तिवारी की कलम से |

एक समय दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि हे महाराज, पृथ्वी लोक में मनुष्य ब्रह्महत्यादि महान पाप करते हैं, पराए धन की चोरी तथा दूसरे की उन्नति देखकर ईर्ष्या करते हैं। साथ ही अनेक प्रकार के व्यसनों में फँसे रहते हैं, फिर भी उनको नर्क प्राप्त नहीं होता, इसका क्या कारण है?


वे न जाने कौन-सा दान-पुण्य करते हैं जिससे उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। यह सब कृपापूर्वक आप कहिए। पुलस्त्य मुनि कहने लगे कि हे महाभाग! आपने मुझसे अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछा है। इससे संसार के जीवों का अत्यंत भला होगा। इस भेद को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इंद्र आदि भी नहीं जानते परंतु मैं आपको यह गुप्त तत्व अवश्य बताऊँगा।


उन्होंने कहा कि माघ मास लगते ही मनुष्य को स्नान आदि करके शुद्ध रहना चाहिए। इंद्रियों को वश में कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या तथा द्वेष आदि का त्याग कर भगवान का स्मरण करना चाहिए। पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उनके कंडे बनाना चाहिए। उन कंडों से 108 बार हवन करना चाहिए।


उस दिन मूल नक्षत्र हो और एकादशी तिथि हो तो अच्छे पुण्य देने वाले नियमों को ग्रहण करें। स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर सब देवताओं के देव श्री भगवान का पूजन करें और एकादशी व्रत धारण करें। रात्रि को जागरण अवश्य ही करना चाहिए।


उसके दूसरे दिन धूप-दीप, नैवेद्य आदि से भगवान का पूजन करके खिचड़ी का भोग लगाएँ। तत्पश्चात पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी का अर्घ्य देकर स्तुति करनी चाहिए-


👉 प्रभु की स्तुति 👇


हे भगवान! आप दीनों को शरण देने वाले हैं, इस संसार सागर में फँसे हुअओं का उद्धार करने वाले हैं। हे पुंडरीकाक्ष! हे विश्वभावन! हे सुब्रह्मण्य! हे पूर्वज! हे जगत्पते! आप लक्ष्मीजी सहित इस मेरे अर्घ्य को ग्रहण करें।


इसके पश्चात जल से भरा कुंभ (घड़ा) ब्राह्मण को दान करें तथा ब्राह्मण को श्यामा गौ और तिल पात्र देना भी उत्तम है। तिल स्नान और भोजन दोनों ही श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार जो मनुष्य जितने तिलों का दान करता है, उतने ही हजार वर्ष स्वर्ग में वास करता है।


1. तिल स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल का हवन, 4. तिल का तर्पण, 5 तिल का भोजन और 6. तिलों का ‍दान- ये तिल के 6 प्रकार हैं। इनके प्रयोग के कारण यह षटतिला एकादशी कहलाती है। इस व्रत के करने से अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि कहने लगे कि अब मैं तुमसे इस एकादशी की कथा कहता हूँ।


👉 एकादशी कथा 👇


एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से यही प्रश्न किया था और भगवान ने जो षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा- सो मैं तुमसे कहता हूँ। भगवान ने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो।


प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।


भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो❓ मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।


घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है❓इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।


उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।

अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिल या तिल से बने हुए वस्तुओं का का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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दादीमाई

Posted: 27 Jan 2022 04:28 AM PST

दादीमाई

बहुत दिनों के बाद मिला जब
 घर से मुझे संदेशा ।
 अनहोनी कुछ घटित हुई है 
हुआ मुझे अंदेशा ।।
 बीती रात को सपनों  में जो
 आकर मुझे उठाई थी।
 श्वेत वस्त्र मे बिहस रही थी
          वह जो दादी माई थी ।।

 एक हाथ बालों पर मेरे 
दूजे हाथ मिठाई थी ।
गोद में लेकर मुझको मेरे 
गालों को सहलाई थी।।
 अपने कम्पित हाथों से वो
 लड्डू मुझे खिलाई थी ।
प्यार लुटाती हद से ज्यादा 
           वह जो दादी माई थी ।।

जल्दी ही जब गया था मिलने 
टूटी खाट पर सोई थी ।
फटे पुराने कपड़ों में वह 
खूब लिपट कर रोई थी ।।
बोली बबुआ देख तुम्हें 
आंख मेरी भर आई थी।
 लेकिन मैं सब समझ रहा था 
           वह जो दादी माई थी।।

 मांस नहीं थे तन पर उसके
 प्राण बचे थे सांसों में ।
मुझे देख वह बीह्वल हो गई
 प्रेम भरा था आंखों में ।।
मिलने के खातिर वो मुझको 
खबर भेज बुलवाई थी ।
इतना प्यार वो मुझसे करती
            वह जो दादी माई थी ।।

आधी रोटी पड़ी खाट पर 
आधी रोटी खाई थी ।
शायद इस दुनिया से उसकी
 होने वाली विदाई थी ।।
भरी आंख से देख रहा था
 कैसी घड़ी ये आई थी ।
रखा हाथ उसके बालों पर 
            वह जो दादी माई थी।।

 मेरा संदेशा हुआ हकीकत 
भरी हुई अंगनाई थी ।
श्वास शुन्य उस तन को देखा
 हाथ में वही मिठाई थी ।।
सपनों में वो कल लेकर जो
 मुझसे मिलने आई थी।
 खाया जिसके लड्डू को फिर
            वही तो दादी माई थी ।।

यह मेरे द्वारा ही लिखित कविता है ।
       कवि---प्रेमशंकर प्रेमी
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पुराणों में भारतवर्ष की महिमा -

Posted: 27 Jan 2022 01:10 AM PST

पुराणों में भारतवर्ष की महिमा -

संकलन अश्विनी कुमार तिवारी
ये पृथ्वी सप्तद्वीपा है । इनके नाम हैं - जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, तथा पुष्करद्वीप । सातों द्वीपों के मध्य जम्बूद्वीप है । जम्बूद्वीप के अधिपति महाराज आग्नीध्र के नौ पुत्र हुए - जिनके नाम थे - नाभि, किम्पुरूष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरू, भद्राश्व और केतुमाल । राजा आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के नौ खंड कर अपने प्रत्येक नौ पुत्रों को वहाँ का राजा बनाया । इन खंड़ो का विस्तार नौ नौ हजार योजन बताया गया है । इन्हीं पुत्रों के नाम से नौ वर्ष (अर्थात् खंड ) प्रसिद्ध हुये ।
राजा नाभि के नाम से ही एक वर्ष अर्थात् एक खंड का नाम अजनाभ वर्ष हुआ । राजा नाभि एवं उनकी पत्नी मेरूदेवी के एक पुत्र थे जिनका नाम था ऋषभदेव । ऋषभेदव जी के सबसे बड़े पुत्र का नाम था भरत ।
राजा भरत
वे अत्यंत प्रतापी तथा धर्मात्मा थे, अतः अजनाभ वर्ष का नाम हो गया भारतवर्ष ।
''अजनाभं नामऐतद्भारात्वर्षं भारतमिति ।''
क्या पृथ्वी का यही खंड जहाँ हम लोग रहते हैं , भारतवर्ष है ? इसका प्रमाण क्या है ?
शास्त्रों में बताया गया है की भारतवर्ष में नर-नारायण हैं | इसी भारतवर्ष में भगवान श्रीहरि नर-नारायण रूप में है । केदारनाथ, बद्रीनाथ के रास्ते में दो पर्वत नर और नारायण हैं ऐसा माना जाता है कि देवर्षि नारद जी भगवान की आराधना नर-नारायण के रूप में करते हैं ।
नर और नारायण पर्वत
विष्णु पुराण में भी भारतवर्ष की स्थिति के बारे में बताया गया है -
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम् ।
वर्शं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।।
ऐसा भूखण्ड जो समुद्र के उत्तर तथा हिमालय से दक्षिण में स्थित है वही भारतवर्ष है और वहीं पर चक्रवर्ती भरत जी की संतति निवास करती है ।पुराणों के आधार पर इस भारतवर्ष का विस्तार 9000 योजन माना जाता है । एक योजन में 9 मील माना जाता है । अतः भारतवर्ष का विस्तार 81000 मील माना जा सकता है ।
भारतवर्ष अन्य वर्षों से श्रेष्ठ है क्यों कि यह कर्म भूमि है तथा अन्य वर्ष भोग भूमियाँ हैं -
'यतो हि कर्मभूरेशा ह्यतो न्या भोगभूमयः' (विष्णुपुराण) ।
ऐसा कहा जाता है कि मानव भगवान की सुन्दरतम रचना है और मानव को स्वतंत्रता है कर्मों को करने की । अच्छे कर्मों के द्वारा मानव अपना उद्धार कर सकता है । ऐसी स्वतंत्रता देवताओं को भी प्राप्त नहीं है क्योंकि वह भोगयोनि है । परंतु मनुष्यों में भी भारतवर्ष में जन्म लेने वाले को ही ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त है क्योंकि भारतवर्ष कर्मभूमि है तथा अन्य वर्ष भोगभूमि है । यही कारण है कि पृथ्वी पर भारतवर्ष के अतिरिक्त कहीं भी कर्म विधि नहीं है । उसका विधान हमारे वर्णाश्रम व्यवस्था में है । वर्णाश्रम व्यवस्था सनातन धर्म का मूल है । सभी वर्णांे तथा आश्रमों में पूर्णतया प्रतिष्ठित मनुष्य जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी होता है । यहाँ पर पैदा होने वाले मनुष्य अपने-अपने कर्मों के आधार पर स्वर्ग तथा अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं । इसलिए संसार के किसी अन्य धर्मों में वर्णाश्रम व्यवस्था का विधान नहीं है । अन्य धर्म भोग को बढ़ावा देता है परंतु सनातन धर्म योग को बढावा देता है । अतः भारतवर्ष में पैदा होने वाले प्राणी अन्य जगहों पर पैदा होने वालों से अधिक प्रबुद्ध होता है । भारतवर्ष का कण-कण ऊर्जा से भरा हुआ तीर्थ है जिसने भी भारतवर्ष की पदयात्रा की है उन्हें नई ऊर्जा तथा दिषा मिली है । पाण्डवों ने भारतवर्ष की पदयात्रा की थी वनवास काल में तभी उन्हें नई ऊर्जा मिली और धर्मराज्य की स्थापना हुई । भगवान राम ने भी वनवास काल में भारतवर्ष की पदयात्रा की तभी वह रामराज्य स्थापित करने में सफल रहें । आदिशंकराचार्य ने भारतवर्ष की पदयात्रा कर दिग्विजय किया और भारतवर्ष के एकता के सूत्र को और भी मजबूत किया । वर्तमान काल में भी महात्मा गांधी ने पूरे भारतवर्ष की पदयात्रा की तभी वे ब्रिटिश साम्राज्य का नाश कर पाये ।
भारतवर्ष अपने आप में तीर्थ है जिस तरह तीर्थस्थानों की परिक्रमा से नई ऊर्जा मिलती है उसी तरह भारतवर्ष की परिक्रमा से भी नई ऊर्जा मिलती है । ये स्वयं प्रमाणित है । आप यहाँ पर किसी से भी भाग्य, भगवान, आत्मा, परमात्मा के बारे में बातें करके देख सकते हैं सभी के पास कुछ-न-कुछ अपने विचार होते हैं और वे विचार हमारे किसी-न-किसी शास्त्र में वर्णित होते हैं । हलाँकि वे उन शास्त्रों से हो सकता है अवगत नही हों । इसलिये यहाँ पर मनुष्य ही नहीं देवता भी जन्म लेकर यज्ञ यागादि अच्छे कर्मों के द्वारा पुण्य अर्जित कर अच्छे लोकों में जाना चाहते हैं । हमारे सनातन धर्म में ही भगवान के अवतार लेने की बात है । अन्य धर्मों मे नहीं क्योंकि सनातन धर्म भारतवर्ष में ही प्रचलित है और यह भारतवर्ष योगभूमि है । अतः यहाँ पर नये कर्म किये जा सकते है और अन्य खण्डों में नये कर्म नहीं हो सकते है - केवल पुरातन कर्मों का भोग ही हो सकता है । अतः देवगण भी यही गान करते हैं -
गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्ते तु भारतभूमि भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।।
(श्रीविष्णुपुराण 2/3/24)
अर्थात् जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग के मार्गभूत भारतवर्ष में जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं ।
हिंदू संसार में सबसे अधिक राष्ट्र प्रेमी और राष्ट्रभक्त लोग हैं।ऐसी उत्कृष्ट और गहरी और व्यापक राष्ट्रभक्ति संसार में लगभग कहीं भी नहीं है क्योंकि इतना प्राचीन और स्वाभाविक राष्ट्र विश्व में और कोई नहीं हैं ।
परंतु अंग्रेजो के द्वारा भारतीय शिक्षा का सर्वनाश करके फिर अपने चेलों को सत्ता सौंपने के बाद उन लोगों ने जो भारतीय ज्ञान परंपरा का सर्वनाश किया है ,उसके बाद से हिन्दू लोगों के पास राजनीतिक चेतना बहुत अल्प है और वे तोतों की तरह से वे ही बातें करते रहते हैं जो हिंदू द्रोही सत्ताधीशो ने शोर मचाया है और जो उनके द्वारा प्रायोजित विद्यालय विद्या संस्थानों में पढ़ाया जाता है जो कि झूठ है, भयंकर झूठ। पर हिन्दू अब वही दुहराते रहते हैं।
भारत को एक राष्ट्र मानकर अन्य लघु राष्ट्रों जैसा एक मानना घोर अज्ञान है।
यह यूरोप के 37 राष्ट्रों के बराबर आज है।पहले यह समस्त यूरोप से बड़ा था।
50 से अधिक मुस्लिम देशों के बराबर है अकेले भारत।
इसके विषय में सोचते और बोलते समय सदा यह ध्यान रखें, कृपया।
✍🏻रामेश्वर मिश्रा पंकज

स्वाभाविक राष्ट्र है भारत

यह आज हमें पता है कि भारत का वर्तमान स्वरूप 15 अगस्त 1947 की देन है। आज अखंड भारत की कल्पना में हम केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ते हैं। परंतु हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि बर्मा, श्रीलंका, अफगानिस्तान आदि भी भारत के ही भाग रहे हैं। यदि हम केवल 15 अगस्त 1947 के बाद के भारत को ही लें तो भी इस समय विश्व में केवल छह नेशन स्टेट या राष्ट्र ऐसे हैं जो आकार में भारत से बड़े हैं और ये छहों अस्वाभाविक राष्ट्र हैं। एक एक कर सभी पर विचार करते हैं।
पहला राष्ट्र है आस्ट्रेलिया। आस्ट्रेलिया क्या है? उसके केवल तटीय इलाकों में लोग बसे हैं। दिल्ली के बराबर आबादी है। इस नाम का भी कोई इतिहास नहीं है। यह बीसवीं शताब्दी में बना एक अस्वाभाविक राष्ट्र है। दूसरा बड़ा राष्ट्र है यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका। अमेरिका तो इस इलाके का नाम भी नहीं है। आज भी यूनाइटेड स्टेट्स किसी अमेरिगो नामक आदमी के नाम से जाना जाता है। इसे वेस्ट इंडिया ही कह दिया होता या वेस्ट इंडियन सबकोंटिनेंट ही कह दिया होता। यदि आपको किसी स्थान को उनके मूल नाम से नहीं बुलाना है तो कुछ पहचाना सा नाम तो रखना चाहिए था। किसी को पता ही नहीं है कि अमेरिगो कौन था। अमेरिका का मूल नाम तो टर्टल कोंटीनेंट यानी कि कच्छप महाद्वीप है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तो उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में अस्तित्व में आया है। इसके टूटने का रुदन सैमुएल हंटिंगटन अपनी पुस्तक क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में कर रहे हैं। भारत में इस पर काफी बहस चल रही है, परंतु बहस करने वालों ने ठीक से उसकी प्रस्तावना तक नहीं पढ़ी है। प्रस्तावना में ही वह कह रहा है कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका टूट रहा है। क्यों? क्योंकि उसके नीचे मैक्सिको उसे धक्का दे रहा है। मैक्सिको वहाँ का मूल है। वे वहाँ के मूलनिवासी हैं। उनका अपना क्षेत्र है। दीवाल बनाने से क्या होगा? दीवाल तो चीन ने भी बनाई थी। फिर भी उसे मंगोल, हूण, शक, मांचू सभी पराजित करते रहे।
तीसरा राष्ट्र है कैनेडा। संयुक्त राष्ट्र के ऊपर कैनेडा है। यहाँ कुछ फ्रांसीसी लोग हैं, कुछ अंग्रेज हैं और इन्होंने एक राष्ट्र बना लिया। यहां का पूरा इतिहास खंगाल डालिये, कैनेडा नाम नहीं मिलेगा। अस्वाभाविक राष्ट्र है। चौथा राष्ट्र है ब्राजील। यह नाम भी आपको इतिहास में नहीं मिलेगा। उन्नीसवीं शताब्दी तक ब्राजील का कोई अस्तित्व नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से भगाए गए कुछेक फ्रांसीसी, अंग्रेज और जर्मन लोगों की रचना है। ये कृत्रिम सीमाएं हैं।
पाँचवां बड़ा राष्ट्र है जिसे हम पहले यूएसएसआर के नाम से जानते रहे हैं सोवियत संघ। उससे टूट कर सोलह राष्ट्र अलग हो गए, अब बचा है रूस। रूस के तीन चौथाई हिस्से के बारे में उसे स्वयं ही उन्नीसवीं शताब्दी तक पता नहीं था। यह हिस्सा था रूस का एशियायी हिस्सा। यह तो प्राचीन काल से भारत का हिस्सा रहा है। साइबेरिया का उच्चारण बदलें तो सिबिरिया होता है यानी शिविर का स्थान। इतालवी लोग स्थानों को स्त्रीलिंग से बुलाते हैं। इसलिए शिविर शिविरिया बन गया जिसे हम आज साईबेरिया कहते हैं। यह रूस का हिस्सा नहीं था। यह हिस्सा रहा है भरतवंशी शकों का, भरतवंशी मंगोलों का। इसे आप नक्शों में आसानी से देख सकते हैं। कब तक रहा है? उन्नीसवीं शताब्दी तक। यह कोई प्राचीन इतिहास नहीं है, जिसे ढूंढना पड़े। यह आधुनिक इतिहास है। फ्रांसीसी क्रांति या पुनर्जागरण के काल के बाद के इतिहास को आधुनिक काल माना जाता है। परंतु यह तो उससे भी कहीं नई घटना है। उन्नीसवीं शताब्दी तक रूस इस इलाके को जानता भी नहीं है। वह स्वयं उसे क्या बतलाता है, इसे देख लीजिए। अ_ारहवीं शताब्दी तक रूस अपनी सीमाएं क्या बता रहा है, देख लीजिए। जैसे हम कहते हैं न कि हमारी सीमाएं गांधार तक रही हैं, रूस अपनी सीमाओं के बारे में क्या कहता है? इसलिए यह भी स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है। कृत्रिम देश है। शीघ्र ही अपनी स्वाभाविक सीमाओं में आ जाएगा। इसकी स्वाभाविक सीमाएं क्या हैं? आज के यूक्रेन में एक स्थान है कीव। कीव के उत्तर में एक नदी चलती है। उस नदी के आस-पास का इलाका ही वास्तविक रूस है। और कीव सहित यूक्रेन आज रूस से बाहर है।
पाँच विशाल देशों के बाद अगला देश है चीन। चीन का वर्तमान आकार तो पंडित नेहरू का दिया हुआ है। तिब्बत तो कभी उसका था ही नहीं। जिसे भारत के यूरोपीय चश्मेवाले बुद्धिजीवी पूर्वी तूर्कीस्तान या फिर चीनी तूर्कीस्तान कहते हैं, वह भी उसका नहीं रहा है। इसे भी वर्ष 1949 में जवाहरलाल नेहरू ने चीन के लिए छोड़ दिया। यह तो महाकाल के उपासकों का स्थान रहा है। महाकाल के उपासक रहे महान मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ ने चीन को पराजित किया था। चीन में मंगोलिया और मंचूरिया का हिस्सा मिला हुआ है। ये दोनों इलाके साम्यवादी चीन का हिस्सा 1949 के बाद रूस और चीन की सहमति से बने। रूस में लेनिन, स्टालिन जैसे कुछ तानाशाह लोग सत्ता में आ गए थे। उन्हें दुनिया भर में मित्र चाहिए था। कहा जाता है दुनिया भर में परंतु उसका वास्तविक अर्थ होता है यूरेशिया में। शेष चारों महादेश तो गिनती में होते ही नहीं हैं। तो साम्यवादी रूस को केवल एक सहयोगी मिला माओ के नेतृत्व वाला साम्यवादी चीन। साम्यवादी रूस ने मंगोलिया और मंचुरिया को चीन का हिस्सा मान लिया।
दूसरा विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की रचना हुई जिसमें यूएसएसआर स्थायी सदस्य था। दूसरा स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव भारत को मिला था, परंतु जवाहरलाल नेहरू ने कूटनीतिक मूर्खता में वह प्रस्ताव चीन को दिलवा दिया। इन दोनों साम्यवादी देशों ने मिल कर बंदरबाँट की। परंतु आज चीन टूट रहा है। तीन हिस्सों में। यह अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट है। मंचुरिया और मंगोलिया, दोनों ही चीन को अपने कब्जे में रखने वाले देश हैं। वर्ष 1914 तक मंचुरिया का गुलाम रहा है। यह तो हमें कहीं पढ़ाया नहीं जाता कि तेरहवीं शताब्दी से लेकर वर्ष 1914 तक चीन भरतवंशी मंगोलों तथा मंचुओं का गुलाम रहा है।
हमने देखा कि 15 अगस्त 1947 के भारत से दुनिया के छह नेशन-स्टेटों का क्षेत्रफल अधिक है और वे छहों अस्वाभाविक राष्ट्र हैं और ये छहों अतिशीघ्र टूट जाएंगे। आज के दिन भी भारत क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा स्वाभाविक राष्ट्र है। हम जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश का जन्म कैसे हुआ है। अक्सर यह कहा जाता है कि हम पड़ोसी रोज नहीं बदल सकते। परंतु हमने हर रोज पड़ोसी ही तो बदला है। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी कब था, वह तो हमारा घर था। हमारा पड़ोसी अफगानिस्तान भी कब था, वह भी हमारा घर ही था। चीन भी आपका पड़ोसी कब था, नेपाल कब था हमारा पड़ोसी? हमने तो घरवालों को ही पड़ोसी बना दिया है।
याद करें कि युद्ध अपराध के कारण संयुक्त राष्ट्र ने ट्रीटी ऑफ वर्साई के कारण जर्मनी के दो हिस्से कर दिए, वह जर्मनी एक हो गया। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत एक हो गया। ऐसे में पाकिस्तान और भारत क्यों एक नहीं हो सकते? भारत का नक्शा देखिए, नीचे पेनिनसुलर भारत है, परंतु ऊपर विराट हिमालय है। अफगानिस्तान तो दुर्योधन का ननिहाल गाँधार ही तो था। शकुनि यहीं का था। और निकट इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह का राज्य गाँधार तक था। वर्ष 1905-10 में पंडित दीनदयालू शर्मा काबुल और कांधार में संस्कृत पर भाषण देने जाते हैं, सनातनधर्मरक्षिणी और गौरक्षिणी सभाएं करते हैं। गाँधी जी के जाने पर वायसराय खड़ा नहीं होता, पंरतु पंडित दीनदयालू शर्मा से मिलने के लिए इंग्लैंड का राजा भी खड़ा होता है। वर्ष 1910 में अफगानिस्तान नाम का कोई देश था ही नहीं। वर्ष 1922 में अंग्रेजों ने इसे बनाया रूस और उनके ब्रिटिश इंडिया के बीच बफर स्टेट के रूप में।
महाभारत में राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ढेर सारे राजा आते हैं। वे राजा जो युधिष्ठिर को कर देते हैं, वे सभी आते हैं। जो प्रदेश भारत के चक्रवर्ती सम्राट को कर देते हैं, वे भारत ही कहलाएंगे न? यह भारत कहाँ से कहाँ तक है? यवन प्रांत जिसे आज ग्रीक कहते हैं। परंतु ग्रीक स्वयं को ग्रीक नहीं कहते। वे स्वयं को एलवंशीय कहते हैं। उनके देश का नाम आज भी ग्रीस नहीं एलेनिक रिपब्लिक है। एलवंश मतलब बुद्ध और इला की संतान। यह भारतीय ग्रंथों में मिल जाएंगे। राजसूय यज्ञ के बाद युद्ध के वर्णन में स्पष्ट वर्णन है कि कौन-कौन सी सेनाएं पांडवों के साथ हैं और कौन-कौन कौरवों के साथ। वहाँ 250 जनपदों का उल्लेख है जिसमें दरद, काम्बोज, गाँधार, यवन, बाह्लीक, शक सभी नाम आते हैं। जिसे आज हम इस्लामिक देश के रूप में जानते हैं, यह पूरा इलाका शिव. ब्रह्मा, दूर्गा का पूजक सनातन धर्मावलम्बी चक्रवर्तीं भारतीय सम्राट के जनपद रहे हैं।
यह एक रोचक सत्य है कि अंग्रेजों को वर्ष 1910 तक पता नहीं था कि अशोक, देवानां पियदासी कौन है? वे महाभारत को नकार देते हैं। यदि हम महाभारत को गलत भी मान लें तो वायुपुराण, विष्णुपुराण, रामायण, कालीदास का रघुवंश, पाणिनी के अष्टाध्यायी आदि में किए गए भारतसंबंधी वर्णनों को देखें। यदि इन भारतीय संदर्भों से हमारी तुष्टि न हो तो फिर एक मुस्लिम लेखक का संदर्भ देखिए। अल बिरुनी का भारत पुस्तक को पढि़ए। अल बिरुनी की पुस्तक में भारत की सीमाओं और लोगों का वर्णन है। इसमें एक वर्णन है कि भारत के लोगों ने चारों दिशाओं में चार नगरों से आकाशीय गणना की है। उसकी आज तो जाँच की जा सकती है। वह कह रहा है कि इन चारों स्थानों पर भारत के लोग रहते हैं। ये चारों स्थान हैं – उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव, और पूरब तथा पश्चिम के शहरों का अक्षांश और देशांतर गणना दी हुई है। अल बिरुनी का कहना है कि ये गणनाएं तभी सही हो सकती हैं, जब आप वहाँ लगातार जा रहे हों।
पिरी राइस का नक्शा दुनिया का एक नक्शा है। यह फटी-पुरानी अवस्था में किसी विद्वान को मिला। उसने उसे देखा। उस नक्शे की विशेषता है कि उसमें दक्षिणी ध्रुव दिखाया गया है। दक्षिणी ध्रुव पर दो किलोमीटर मोटी बर्फ की परत जमी हुई है। वर्ष 1966 में इंग्लैंड और स्वीडेन ने एक सिस्मोलोजिकल सर्वेक्षण किया और उसके आधार पर दक्षिणी ध्रुव का नक्शा बनाया। यह नक्शा पिरी राइस के नक्शे के एकदम समान है। तो प्रश्न उठा कि पिरी राइस का नक्शा इतना पहले कैसे बना? उस विद्वान ने उस नक्शे को अमेरिका के एयर फोर्स के टेक्नीकल डिविजन के स्क्वैड्रन लीडर को भेजा। स्क्वैड्रन लीडर ने उत्तर लिखा कि नक्शा तो सही है, परंतु उस समय जब बर्फ नहीं थी, जब जानने के लिए जो यंत्र और तकनीकी ज्ञान चाहिए, वह नहीं रहा होगा। वह कहता है कि इस दो किलोमीटर की बर्फ की तह जमने में कई दशक लाख वर्ष लगे। यह नक्शा लगभग तबका बना हुआ है। यह उद्धरण मैप्स ऑफ एनशिएंट सी किंग्स के हैं। पिरी राइस तूर्क का डकैत था। तूर्कों को आमतौर पर हम मुसलमान मान लेते हैं। परंतु ध्यान दें कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक इसे यूरोप अनातोलिया बोलते थे। तूर्क लोग जब वर्तमान तूर्किस्तान पहुँचे, तब उसका नाम तूर्किस्तान रखा। वे वास्तव में दूर्गा और शिव के उपासक रहे हैं।
पिरी राइस लिख रहा है कि उसने यह नक्शा पुराने नक्शों के आधार पर बनाया है। अमेरिकन नक्शा बनाने वाले विद्वान लिखते हैं कि इस रास्ते पर लगातार समुद्री यात्राएं होती रही हैं। दक्षिणी ध्रुव पर यात्राएं हो रही हैं व्यापारिक और सैन्य कारणों से। अलग-अलग हिमयुगों में नक्शे बनाए गए हैं। इसे बनाने वाले और यात्रा करने वाले वे लोग हैं, जिनके नाम से एक महासागर का नाम ही रख दिया गया है। हिंद महासागर। दूसरे किसी भी देश के नाम पर महासागर का नाम नहीं रखा गया है, क्यों? इस हिंद महासागर में हिंद का तटीय प्रदेश छोटा सा ही है। फिर भी इसका नाम हिंद महासागर इसलिए है कि इसमें भारतीय ऐसे चलते हैं जैसे कनॉट प्लेस में दिल्ली पुलिस और जनता चलती है। इसी प्रकार हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी और उनकी रक्षा के लिए चतुर्गिंणी सेना चलती है। चतुर्गिंणी में चौथा अंग कौन है? चार प्रकार की सेना है नौसेना। इसका प्रमाण है अजंता में बड़े-बड़े जहाजों का चित्रण है जिसमें हाथी-घोड़े और हथियार लदे होते हैं। ऐसे ही भित्तिचित्र भारत के उत्तर में स्थित पाँच स्तानों में भी मिले हैं।
इस प्रकार हम पाते हैं कि भारत एक स्वाभाविक राष्ट्र है और अत्यंत विशाल राष्ट्र रहा है। इसके ढेरों प्रमाण मिलते हैं। कुछ प्रमाण यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं।
✍🏻प्रो. कुसुमलता केडिया(लेखिका धर्मपाल शोधपीठ, भोपाल की निदेशक हैं।)
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केंद्र को राज्यों और आईएएस अधिकारियों दोनों से परामर्श करके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में आयी कमी का समाधान करना चाहिए:-केएम चंद्रशेखर और टीकेए नायर

Posted: 27 Jan 2022 01:06 AM PST

केंद्र को राज्यों और आईएएस अधिकारियों दोनों से परामर्श करके केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में आयी कमी का समाधान करना चाहिए:-केएम चंद्रशेखर और टीकेए नायर

भारतीय प्रशासनिक सेवा सुर्खियों में है, क्योंकि पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा आईएएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति संबंधी नियमों में केंद्र सरकार के प्रस्तावित संशोधनों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज करायी गईं हैं। प्रभावी शासन के लिए और सहकारी संघवाद की भावना का सम्मान करते हुए, नियमों में किसी भी बड़े बदलाव के लिए राज्यों के साथ परामर्श किया जाना चाहिए।
आईएएस अधिकारियों की भर्ती, नियुक्ति, उन्हें प्रशिक्षण देने तथा विभिन्न राज्य कैडर में आवंटित करने का कार्य केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है, आईएएस अधिकारियों को न केवल अपने राज्य कैडर में बल्कि, केंद्र सरकार में भी, जब भी ऐसा करने के लिए कहा जाये, सेवाएँ प्रदान करने का कार्यादेश दिया जाता है।
केंद्र सरकार में उप सचिव/निदेशक से सचिव तक के वरिष्ठ पदों पर विभिन्न राज्य कैडर से आईएएस अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति एवं अन्य सेवाओं के अधिकारियों, क्षेत्र-विशेष के विशेषज्ञों तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति होने की उम्मीद की जाती है।
इस प्रकार आईएएस अधिकारी उन राज्य सरकारों, जिनसे वे संबंधित हैं और केंद्र सरकार जो उनकी नियुक्ति प्राधिकारी है, के दोहरे नियंत्रण में होते हैं। आईएएस की योजना और संरचना में केंद्र और राज्य दोनों को- देश के प्रभावी शासन के लिए अधिकारियों की सेवाओं का उपयोग करने में सक्षम बनाने के लिए शक्ति के विभाजन की परिकल्पना की गई है।
आईएएस अधिकारियों की सेवा शर्तों से संबंधित मामलों में अंतिम अधिकार केंद्र सरकार में निहित है, जिसमें नियुक्ति, स्थानान्तरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई शामिल हैं, लेकिन राज्य सरकारों के पास भी प्रासंगिक नियमों के माध्यम से इन मामलों में भागीदारी की भूमिका है।
इसलिए केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित आईएएस कैडर नियमों में बदलाव को हमारी अर्ध-संघीय राजनीति के अंतर्गत केंद्र एवं राज्य सरकारों की संरचना और कामकाज के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार द्वारा 5 और 12 जनवरी को लिखे दो पत्रों में आईएएस कैडर नियमों में बदलाव करने और कुछ जोड़ने का प्रस्ताव दिया गया है। पहले पत्र में प्रस्ताव है कि राज्य सरकारें "केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति के लिए" विभिन्न स्तरों पर पात्र अधिकारी उपलब्ध कराएंगी, जिन्हें प्रतिनियुक्ति आरक्षित माना जायेगा। इसकी गणना केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से की जाएगी और असहमति की स्थिति में केंद्र सरकार का विचार अंतिम रूप से मान्य होगा। इसके अलावा, यह राज्य सरकारों को एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर केंद्र सरकार के निर्देश को पूरा करने का कार्यादेश देता है।
12 जनवरी को लिखे पत्र के माध्यम से और आगे जाते हुए, केंद्र ने किसी भी केंद्रीय पद पर नियुक्ति के लिए किसी राज्य में किसी भी आईएएस अधिकारी की सेवाओं को प्राप्त करने का अधिकार अपने पास रखा है, जहां "राज्य सरकार निर्धारित समय के भीतर केंद्र के निर्णय को प्रभाव में लायेगी।" अधिक बदलाव के साथ यह कहा गया है कि यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट अवधि के भीतर इस निर्देश की उपेक्षा करती है, तो अधिकारी (अधिकारियों) को केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट तिथि से कैडर से कार्यभार-मुक्त कर दिया जाएगा।"
इन कदमों में जल्दबाजी दिखती है। ऐसा करना जरूरी हो गया, क्योंकि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले अधिकारियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गयी है। एक अनुमान के मुताबिक, अनिवार्य आरक्षित वर्ग 2014 के 69 फीसदी से कम होकर 2021 में 30 फीसदी रह गया है।
यह निश्चित रूप से गंभीर कमी को दर्शाता है, लेकिन नियमों में बड़े बदलावों का प्रस्ताव करने के बजाय, भारत सरकार को पहले आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और जांच करनी चाहिए कि केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति अब पहले की तरह लोकप्रिय क्यों नहीं रह गई है।
क्या केंद्र में सेवा की शर्तें राज्यों की तुलना में खराब हो गई हैं, जिससे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति राज्यों में नियुक्त अधिकारियों के लिए कम आकर्षक हो गई है? क्या उच्च स्तर पर पैनल प्रणाली में बदलाव ने उन अधिकारियों के लिए दरवाजे बंद कर दिए हैं जो अन्यथा केंद्र में सेवा के लिए उपलब्ध होते? क्या केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आईएएस अधिकारियों के सेवा कार्यकाल में अनिश्चितता बढ़ गई है?
भारत सरकार को इस तथ्य से भी अवगत होना चाहिए कि जमीनी स्तर के प्रशासन की जिम्मेदारी राज्यों की होती है। यहां तक कि केंद्रीय योजनाओं को भी बड़े पैमाने पर राज्य सरकारों के माध्यम से लागू किया जाता है। राज्यों से केंद्र में अधिकारियों का मनमाना और अचानक स्थानांतरण राज्य में शासन को कमजोर करते हुए अत्यधिक हानिकारक हो सकता है।
इसके अलावा, गैर-भाजपा राज्य इस बात से चिंतित हैं कि वे अपने संवैधानिक रूप से प्रदत्त शासन करने के अधिकार के गंभीर उल्लंघन के रूप में देखते हैं, जिसमें कुछ औचित्य भी है राज्य संस्थानों के माध्यम से शासन करते हैं, जिनका एक महत्वपूर्ण हिस्सा आईएएस होते हैं।
केंद्र सरकार और गैर-भाजपा राज्य सरकारों के बीच बढ़ते मतभेदों और टकराव के क्षेत्रों की पृष्ठभूमि में, प्रस्तावित संशोधनों पर विवाद टाला जा सकता है।
इसलिए यह अच्छा है कि केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ परामर्श की प्रक्रिया शुरू की है। उन्हें अधिकारियों को भी शामिल करते हुए प्रक्रिया को व्यापक करने की सलाह दी जाएगी। इसके बाद राज्य तय करें कि केंद्र में प्रतिनियुक्ति के लिए विभिन्न स्तरों पर आईएएस अधिकारियों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित संशोधन सही दिशा में हैं, या नहीं – इसके साथ ही राज्यों के प्राधिकार, शासन की जिम्मेदारी और कार्यात्मक दक्षता को भी कमजोर नहीं किया जाना चाहिए तथा अधिकारियों पर अनुचित संकट और उनके पारिवारिक जीवन में व्यवधान भी पैदा नहीं होना चाहिए।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि समाधान, सहकारी संघवाद में निहित है। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2015 में बर्नपुर में एक समारोह में कहा था, "हमारे संविधान ने हमें एक संघीय ढांचा दिया है। अफसोस की बात है कि केंद्र-राज्य संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण थे। मैं मुख्यमंत्री रहा हूं, और मैं जानता हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए हमने सहकारी संघवाद पर फोकस रखते हुए बदलाव किये हैं... इसलिए मैं टीम इंडिया कहता हूं... टीम इंडिया के दृष्टिकोण के बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता।" केएम चंद्रशेखर, पूर्व कैबिनेट सचिव, भारत सरकार रहे हैं और टीकेए नायर ने पीएम मनमोहन सिंह के प्रधान सचिव के रूप में कार्य किया है।
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