दिव्य रश्मि न्यूज़ चैनल |
- जहरीली टॉफी खाने से चार बच्चों की मौत
- शहीद दिवस
- अपने देश की स्वतंत्रता के लिए मृत्यु को भी आनंद से गले लगाने वाले महान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव
- कैसे तुमको बतलाऊँ
- विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभट
- चक्र सुदर्शन धारी
- रिश्ते टूटे,अपने छूटे
- बिहार पर्यावरण संरक्षण में देश से 30 साल आगेए नीतीश कुमार “ग्लोबल क्लाइमेट लीडर” अतुल बगई, UNEP
| जहरीली टॉफी खाने से चार बच्चों की मौत Posted: 23 Mar 2022 06:08 AM PDT जहरीली टॉफी खाने से चार बच्चों की मौतदेवरिया ब्यूरो वेद प्रकाश तिवारी की खबर । उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले से दर्दनाक खबर सामने आई है। यहां चार बच्चों की टॉफी खाने से मौत हो गई। टॉफी में जहरीला पदार्थ मिले होने की आशंका है। घटना पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी संज्ञान लिया है और अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए हैं। जानकारी के अनुसार, कुशीनगर के कसया थाना इलाके के कुड़वा उर्फ़ दिलीपनगर गांव के सिंसई लठउर टोला में आज सुबह तकरीबन सात बजे टॉफी खाने से चार मासूम बच्चों की मौत हो गई। टॉफी के अलावा नौ रुपये गठरी में मिले हैं। टॉफी गीली थी। टॉफी में किसी जहरीले पदार्थ की मिलावट की आशंका है। बताया जा रहा है कि मृतकों में रसगुल नाम के शख्स के तीन बच्चे मंजना (7), स्वीटी (5), समर (3) और रसगुल की बहन खुशबू का बेटा आयुष (5) शामिल हैं, जो टॉफी खाने से बेहोश हो गए। मौके पर पहुंची पुलिस व तहसीलदार मांधाता प्रताप सिंह ने बच्चों को सीएचसी भिजवाया, जहां चिकित्सक ने मासूम बच्चों की हालत गंभीर देख जिला अस्पताल रेफर कर दिया। वहां ले जाते समय रास्ते में चारों की मौत हो गई। परिजन तीन लोगों पर हत्या करने का आरोप लगा रहे हैं। टॉफी के रैपर पर गोल्ड आलमंड चाकलेट डिलाइट लिखा हुआ है। सीओ कसया पीयूष कांत राय ने बताया कि घटना की जानकारी मिली है। टॉफी खाने से बच्चों के मौत की जानकारी हुई है। जांच पड़ताल चल रही है। वहीं, मामले में उत्तर प्रदेश के कार्यवाहक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बच्चों की टॉफी खाने से हुई दुर्घटना का संज्ञान लिया है। उन्होने डीएम और सीएमओ को तत्काल मौके पर जाने को कहा। उन्होंने घटना पर दुःख व्यक्त करते हुए पीड़ित परिवार को तत्काल सहायता दिए जाने तथा जांच के बाद रिपोर्ट उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए हैं हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 22 Mar 2022 11:31 PM PDT शहीद दिवसजिन्होंने बीज बो दिए थे ऐसे, तत्पर थे देश के युवा देने को बलिदान क्रांतिवीर सुखदेव, राजगुरु, भगतसिंह की कुर्बानी,याद रखेगा हिंदुस्तान सौ सौ जन्म न्यौछावर करने भाव भरे थे, लक्ष्य था ऊंची रखना माॅ॑ की शान गोरों से मुक्त कराने मातृभूमि को,खाई माटी की सौगंध,रखे हथेली प्राण इंकलाब जिंदाबाद कह,हो गये माताओं के तीनों लाल एक साथ कुर्बान तेईस मार्च हो गया भारत के इतिहास का अमर दिवस बलिदान क्रांतिवीरों आओ फिर से, अंग्रेजी संस्कृति से टकराओ कलुषित पाश्चात्य संस्कृति से,अपना भारत मुक्त कराओ विश्वासों के दीप जलाकर,देश है तुमको पुकार रहा आओ आकर राह दिखाओ, राष्ट्र राह तुम्हारी जोह रहा उठे राष्ट्र प्रेम देश में,हर हृदय में फिर से ज्वाला जागे जागे देश का गौरव अभिनव,कुंठाओं का कौरव दल भागे क्रांति की मशाल जलाने, फिर रहे जवानी देश की आगे प्रखर शौर्य पराक्रम भरपूर रहे, दूर प्रमाद तिमिश्रा भागे पावन सुरसरि सी धार बहे, वैभवशाली हो देश हमारा आप सदृश्य क्रांतिवीरों पर,बलि बलि जाये देश हमारा चमकता माता का शीश किरीट रहे,हो अविराम लक्ष्य हमारा रहे कामना अविरल, तिरंगा जग में लहर लहर लहराये हमारा फॅ॑दा चूम हॅ॑स हॅ॑स झूल गए फाॅ॑सी पर,थे तुम संपूर्ण देश के प्यारे न्यारे आप तीनों थे माॅ॑ भारती के दुलारे, नतमस्तक हैं शीश हमारे भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, कोटि कोटि अभिनंदन वंदन करता है यह देश तुम्हरा स्वीकार करो श्रद्धांजलि कृतज्ञ राष्ट्र की,जो युगों युगों रहेगा ऋणी तुम्हारा जय हिंद वन्दे मातरम् चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"(ओज कवि एवं राष्ट्रवादी चिंतक), अहमदाबाद, गुजरात हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 22 Mar 2022 10:55 PM PDT अपने देश की स्वतंत्रता के लिए मृत्यु को भी आनंद से गले लगाने वाले महान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव23 मार्च - भगतसिंह, राजगुरू एवं सुखदेव बलिदान दिवसभारतमाता के लिए बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों में भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव, इन तीनों के नाम एकत्र लिए जाते हैं । अंग्रेज अधिकारी सैंडर्स के अत्याचारों से मुक्त करने वाले इन तीनों को फांसी का दंड सुनाया गया था । ये तीनों वीर देशभक्ति पर गीत गाते-गाते आनंद से फांसी चढ गए । 23 मार्च को भगतसिंह, राजगुरू एवं सुखदेव का बलिदान दिन है, इस निमित्त यह लेख है। तत्कालीन परिस्थिति एवं क्रांतिकारियों द्वारा उसपर निकाला गया उपाय वर्ष 1928 में भारतीय गतिविधियों का अभ्यास करने के लिए इंग्लैंड से 'सायमन कमीशन' नामक शिष्टमंडल भारत में आया । भारत में सर्वत्र इस शिष्टमंडल का काले झंडे दिखाकर निषेध किया गया । उस समय लाला लाजपतराय के नेतृत्व में भव्य निषेध मोर्चा निकाला गया । संपूर्ण परिसर में 'सायमन लौट जाओ' के नारे गूंजने लगे । जनसमूह को हटाने के लिए आरक्षकों ने अमानुष लाठी प्रहार किए । इसमें लाला लाजपतराय घायल हो गए और उसमें ही उनका अंत हो गया । देशभक्त क्रांतिकारियों को यह सहन नहीं हुआ । क्रांतिकारियों ने लालाजी की मृत्यु के लिए जिम्मेदार अंग्रेज अधिकारी सैंडर्स को मार डालना तय किया । उस अनुसार लालाजी के प्रथम मासिक श्राद्ध के दिन भगतसिंह, राजगुरू एवं सुखदेव, ये तीनों ही वेश बदलकर आरक्षक (पुलिस) अधिकारी के निवासस्थान के पास पहुंचे । सैंडर्स को देखते ही सुखदेव ने संकेत किया । भगतसिंह और राजगुरू ने एक ही समय पर गोलियां चलाकर उसकी बलि ले ली और वहां से भाग निकले । अंग्रेज सरकार ने तीनों को पकडने के लिए अथक प्रयत्न किए । इसके साथ ही घोषणा भी करवा दी कि उन्हें पकडवानेवाले को पारितोषिक दिया जाएगा; परंतु काफी दिनों तक आरक्षकों को चकमा देते हुए तीनों क्रांतिकारक भूमिगत रहे । अंतत: एक दिन धोखे से वे पकडे गए । अंत में 23 मार्च 1931 को भारतमाता के इन तीनों सपूतों को फांसी दे दी गई । भगत सिंह का अल्प परिचय जन्म : भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब राज्य के एक सरदार (सिख) घराने में हुआ । बचपन : भगत सिंह जब 6-7 वर्ष के थे, तब की यह बात है । एक बार उन्होंने किसान को खेत में गेहूं बोते देखा । उसे देख उनकी जिज्ञासा जागी । उन्होंने किसान से पूछा, ''किसान दादा, आप ये गेहूं खेत में क्यों डाल रहे हैं ? किसान बोला, ''बेटा, गेहूं बोने से उसके पौधे आएंगे और प्रत्येक पौधे में फिर ढेरों गेहूं की बालियां आएंगी ।'' यह सुनकर नन्हा भगत बोला, ''फिर यदि बंदूक की गोलियां खेत में बो दी जाएं, तो क्या उससे भी पौधे आएंगे ? उनमें भी बंदूकें आएंगी ? किसान ने पूछा, ''बेटा, तुम्हें गोलियां किसलिए चाहिए ?'' तब क्षणभर का भी विलंब किए बिना आवेशपूर्ण स्वर में वह बोला,''हिंदुस्थान का राज्य छीननेवाले अंग्रेजों को मारने के लिए ।'' युवावस्था : पर्याप्त महाविद्यालयीन शिक्षा एवं घर की सर्व परिस्थिति अनुकूल होते हुए भी उन्होंने देशसेवा के लिए आजन्म अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा की और वह निभाई भी । वे 'नौजवान भारत सभा', 'कीर्ति किसान पार्टी' एवं 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन' नामक संगठनों से संबंधित थे । प्रखर देश प्रेम दर्शानेवाले प्रसंग प्रसंग 1 : फांसी का दंड मिलने पर भगत सिंह अपनी मां से बोले, ''मां, तुम चिंता क्यों करती हो ? मैं फांसी चढ भी जाऊं, तब भी अंग्रेजी सत्ता को यहां से उखाड फेंकने के लिए एक वर्ष के अंदर पुन: जन्म लूंगा ! प्रसंग 2 : फांसी चढने से पहले एक सहयोगी ने भगत सिंह से पूछा, ''सरदार जी, फांसी चढ रहे हो । कोई अफसोस तो नहीं ? इस पर भगतसिंह ने जोर से हंसते हुए कहा, ''अरे, इस मार्ग पर पहला कदम रखते ही 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा सर्वत्र पहुंचे, केवल यही एक विचार किया था । यह नारा मेरे करोडों देशबंधुओं के कंठ से जब निकलेगा, तब वह अंग्रेजों के साम्राज्य पर घाव करेगा और करता ही रहेगा । इस छोटी आयु का इससे बढकर क्या मोल होगा ? शिवराम हरी राजगुरू जन्म : 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र राज्य के पुणे के निकट खेड में एक देशस्थ ब्राह्मण कुटुंब में शिवराम राजगुरू का जन्म हुआ । अचूक निशानेबाजी, उत्तम स्मरणशक्ति उन्हें जन्मतः प्राप्त थी । न जाने कितने ही ग्रंथ उन्हें कंठस्थ थे । वे हिंदुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे । राजगुरू की सहनशीलता दिखानेवाले प्रसंग प्रसंग 1 : एक बार राजगुरू भट्टी के अंगारों पर अपने क्रांतिकारी मित्रों के लिए रोटियां सेंक रहे थे । तब एक सहक्रांतिकारक ने अंगारों की तपिश लगने पर भी उन्हें शांति से रोटियां सेंकते देख, उनकी प्रशंसा की । तब दूसरे मित्र ने जानबूझकर उन्हें चिढाने के लिए कहा, ''यदि इसने कारागृह जाने पर वहां होनेवाली भयंकर यातनाएं सहन कर लीं, तब ही मैं इसे मानूंगा ।" अपनी सहनशीलता के विषय में शंका राजगुरु को अच्छी नहीं लगी । उन्होंने कढछी गरम कर, अपनी खुली छाती में लगा दी । छाती पर फोडा हो गया । उन्होंने पुन: एक बार फिर वैसा ही किया और हंसते-हंसते उस मित्र से बोले, अब तो इसकी निश्चिती हो गई न कि मैं कारागृह की यातानाएं सहने में सक्षम हूं । राजगुरू की सहनशीलता के विषय में संदेह करने पर मित्र को शर्म आई । मित्र ने क्षमा मांगते हुए बोला, ''तुम्हारी वास्तविक पहचान मुझे अब हुई।' प्रसंग 2 : एक धोखे से राजगुरु पकडे गए । लाहौर में उन पर अनगिनत अत्याचार किए गए । लाहौर की भीषण गर्मी में चारों ओर से तपती भट्टियां लगाकर उनके बीच राजगुरु को बिठाया गया । उन्हें मारा-पीटा । बर्फ की शिलाओं पर लिटाया गया । इंद्रीय मरोडी गई । तब भी वे स्थिर रहे । यह देख उनके सिर पर विष्ठा से भरी टोकरियां उडेली गईं । फौलादी मन के राजगुरु ने ये सभी अत्याचार सहन किए; परंतु अपने सहयोगियों के नाम नहीं बताए । प्रसंग 3 : फांसी चढने से पहले कारागृह के एक सहयोगी द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए राजगुरु बोले, ''अरे, फांसी पर चढते ही हमारा प्रवास क्षणभर में समाप्त हो जाएगा; परंतु तुम सभी अलग-अलग दंड भुगतने की यात्रा पर निकले हो । तुम्हारी यह दुर्गम यात्रा अनेक वर्षाें तक चलती रहेगी, इसका मुझे दु:ख है । सुखदेव थापर जन्म : सुखदेव का जन्म पंजाब राज्य में, 15 मई 1907 को हुआ । भगत सिंह एवं राजगुरू के सहयोगी ही सुखदेव की प्रमुख पहचान स्वतंत्रता की लडाई में सुखदेव का योगदान - सुखदेव भी हिंदुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कार्यकारी सदस्य थे । उन पर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के विचारों का प्रभाव था । लाहौर में नेशनल कॉलेज में उन्होंने भारत के वैभवशाली इतिहास और विश्व क्रांति के विषय में, रूस क्रांति से संबंधित साहित्य सामग्री का अध्ययन करने के लिए एक मंडल स्थापित किया । भगत सिंह, कॉम्रेड रामचंद्र एवं भगवतीचरण व्होरा के सहयोग से उन्होंने लाहौर में 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना की । युवकों को स्वतंत्रता की लड़ाई में सहभागी होने के लिए उद्युक्त करना, शास्त्रीय दृष्टिकोण आत्मसात करना, साम्यवाद का विरोध करना और अस्पृश्यता निवारण, ये इस सभा के उद्देश्य थे । वर्ष 1929 में जब वे कारागृह में थे, तब कारागृह के सहयोगियों द्वारा हो रहे अनगिनत अत्याचार के विरोध में आरंभ की भूख हडताल में उनका सहभाग था । स्वतंत्रता के लिए मृत्यु को भी आनंद से गले लगानेवांले महान क्रांतिकारी 23 मार्च 1931 को लाहौर के मध्यवर्ती कारागृह में भगतसिंह, राजगुरू एवं सुखदेव को फांसी दी गई । वे हंसते-हंसते फांसी चढ गए । इन महान देशभक्तों को त्रिवार अभिवादन ! हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 22 Mar 2022 10:45 PM PDT कैसे तुमको बतलाऊँकैसे तुमको बतलाऊँ, क्या कर कैसे समझाऊँ, जीवन में कितनी ख़ुशियाँ, काँटे तुमको दिखलाऊँ? अपनों की रूठा रूठी, ग़ैरों का नित आँख दिखाना, निज स्वार्थ अपने बनते, कैसे यह पहचान कराऊँ? जेब खुली और मुँह बन्द, आँखों पर भी पर्दा हो, ग़ैरों के मन को भाते, अपनों की क्या बात बताऊँ? सबके दुख में खड़े रहो, निज दुख की चर्चा न हो, गिरगिट से रंग बदलते देखे, कैसे तुमको समझाऊँ? जिनके सुख की ख़ातिर, निज हित को भी त्याग दिया, रिश्ते नातों की ख़ातिर, अपनी ख़ुशियों को वार दिया। फिर भी वो सब रूठे रूठे हैं, कुछ सच्चे कुछ झूठे झूठे हैं, सिखलाया व्यवहार जगत का, कैसे इनको बिसराऊँ? अ कीर्ति वर्द्धन हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभट Posted: 22 Mar 2022 10:42 PM PDT विश्वविख्यात खगोलशास्त्री आर्यभटसंकलन अश्विनी कुमार तिवारीखगोलशास्त्र का अर्थ है ग्रह, नक्षत्रों की स्थिति एवं गति के आधार पर पँचांग का निर्माण, जिससे शुभ कार्यों के लिए उचित मुहूर्त निकाला जा सके। इस क्षेत्र में भारत का लोहा दुनिया को मनवाने वाले वैज्ञानिक आर्यभट के समय में अंग्रेजी तिथियाँ प्रचलित नहीं थीं। अपने एक ग्रन्थ में उन्होंने कलियुग के 3,600 वर्ष बाद की मध्यम मेष संक्रान्ति को अपनी आयु 23 वर्ष बतायी है। इस आधार पर विद्वान् उनकी जन्मतिथि 21 मार्च, 476 ई. मानते हैं। उनके जन्मस्थान के बारे में भी विद्वानों एवं इतिहासकारों में मतभेद हैं। उन्होंने स्वयं अपना जन्म स्थान कुसुमपुर बताया है। कुसुमपुर का अर्थ है फूलों का नगर। इसे विद्वान् लोग आजकल पाटलिपुत्र या पटना बताते हैं। 973 ई0 में भारत आये पर्शिया के विद्वान अलबेरूनी ने भी अपने यात्रा वर्णन में 'कुसुमपुर के आर्यभट' की चर्चा अनेक स्थानों पर की है। कुछ विद्वानों का मत है कि उनके पंचांगों का प्रचलन उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक है, इसलिए कुसुमपुर कोई दक्षिण भारतीय नगर होगा। कुछ लोग इसे विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में बहने वाली नर्मदा और गोदावरी के बीच का कोई स्थान बताते हैं। कुछ विद्वान आर्यभट को केरल निवासी मानते हैं। यद्यपि आर्यभट गणित, खगोल या ज्योतिष के क्षेत्र में पहले भारतीय वैज्ञानिक नहीं थे; पर उनके समय तक पुरानी अधिकांश गणनाएँ एवं मान्यताएँ विफल हो चुकी थीं। पैतामह सिद्धान्त, सौर सिद्धान्त, वसिष्ठ सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त और पौलिष सिद्धान्त, यह पाँचों सिद्धान्त पुराने पड़ चुके थे। इनके आधार पर बतायी गयी ग्रहों की स्थिति तथा ग्रहण के समय आदि की प्रत्यक्ष स्थिति में काफी अन्तर मिलता था। इस कारण भारतीय ज्योतिष पर से लोगों का विश्वास उठ गया। ऐसे में लोग इन्हें अवैज्ञानिक एवं अपूर्ण मानकर विदेशी एवं विधर्मी पंचांगों की ओर झुकने लगे थे। आर्यभट ने इस स्थिति का समझकर इस शास्त्र का गहन अध्ययन किया और उसकी कमियों को दूरकर नये प्रकार से जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया। उन्होंने पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की अपनी धुरी तथा सूर्य के आसपास घूमने की गति के आधार पर अपनी गणनाएँ कीं। इससे लोगों का विश्वास फिर से भारतीय खगोलविद्या एवं ज्योतिष पर जम गया। इसी कारण लोग उन्हें भारतीय खगोलशास्त्र का प्रवर्तक भी मानते हैं। उन्होंने एक स्थान पर स्वयं को 'कुलप आर्यभट' कहा है। इसका अर्थ कुछ विद्वान् यह लगाते हैं कि वे नालन्दा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। उनके ग्रन्थ 'आर्यभटीयम्' से हमें उनकी महत्वपूर्ण खोज एवं शोध की जानकारी मिलती है। इसमें कुल 121 श्लोक हैं, जिन्हें गीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद और गोलापाद नामक चार भागों में बाँटा है। वृत्त की परिधि और उसके व्यास के संबंध को 'पाई' कहते हैं। आर्यभट द्वारा बताये गये इसके मान को ही आज भी गणित में प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी, चन्द्रमा आदि ग्रहों के प्रकाश का रहस्य, छाया का मापन, कालगणना, बीजगणित, त्रिकोणमिति, व्यस्तविधि, मूल-ब्याज, सूर्योदय व सूर्यास्त के बारे में भी उन्होंने निश्चित सिद्धान्त बताये। आर्यभट की इन खोजों से गणित एवं खगोल का परिदृश्य बदल गया। उनके योगदान को सदा स्मरण रखने के लिए 19 अपै्रल, 1975 को अन्तरिक्ष में स्थापित कियेे गये भारत में ही निर्मित प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम 'आर्यभट' रखा गया। आर्यभट ने ज्योतिषशास्त्र के आजकल के उन्नत साधनों के बिना जो खोज की थी,यह उनकी महत्ता है। कोपर्निकस (1473 से 1543 ई.) ने जो खोज की थी उसकी खोज आर्यभट हजारों वर्ष पहले कर चुके थे। "गोलपाद" में आर्यभट ने लिखा है "नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं।" इस प्रकार आर्यभट ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। इन्होंने सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को समान माना है। इनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग (चतुर्युग) तथा एक चतुर्युग में सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग को समान माना है। आर्यभट के अनुसार किसी वृत्त की परिधि और व्यास का संबंध 62,832 : 20,000 आता है जो चार दशमलव स्थान तक शुद्ध है। आर्यभट ने बड़ी-बड़ी संख्याओं को अक्षरों के समूह से निरूपित करने कीत्यन्त वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया है। गणित स्थानीय मान प्रणाली और शून्य, स्थान-मूल्य अंक प्रणाली, जिसे सर्वप्रथम तीसरी सदी की बख्शाली पाण्डुलिपि में देखा गया, उनके कार्यों में स्पष्ट रूप से विद्यमान थी। उन्होंने निश्चित रूप से प्रतीक का उपयोग नहीं किया, परन्तु फ्रांसीसी गणितज्ञ जार्ज इफ्रह के मतानुसार- रिक्त गुणांक के साथ, दस की घात के लिए एक स्थान धारक के रूप में शून्य का ज्ञान आर्यभट के स्थान-मूल्य अंक प्रणाली में निहित था। आर्यभट ने ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया था; वैदिक काल से चली आ रही संस्कृत परंपरा को निरंतर रखते हुए उन्होंने संख्या को निरूपित करने के लिए वर्णमाला के अक्षरों का उपयोग किया, मात्राओं (जैसे ज्याओं की तालिका) को स्मरक के रूप में व्यक्त करना। अपरिमेय (इर्रेशनल) के रूप में π आर्यभट ने पाई ({\displaystyle \pi }{\displaystyle \pi }) के सन्निकटन पर कार्य किया और संभवतः उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया था कि पाई इर्रेशनल है। आर्यभटीयम् (गणितपाद) के दूसरे भाग में वे लिखते हैं: "चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्। अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥" १०० में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर ६२००० जोड़ें। इस नियम से २०००० परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है। (१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६ इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात ((४ + १००) × ८ + ६२०००) / २०००० = ३.१४१६ है, जो पाँच महत्वपूर्ण आंकडों तक बिलकुल सटीक है। आर्यभट ने आसन्न (निकट पहुंचना), पिछले शब्द के ठीक पहले आने वाला, शब्द की व्याख्या की व्याख्या करते हुए कहा है कि यह न केवल एक सन्निकटन है, वरन यह कि मूल्य अतुलनीय (या इर्रेशनल) है। यदि यह सही है, तो यह एक अत्यन्त परिष्कृत दृष्टिकोण है, क्योंकि यूरोप में पाइ की तर्कहीनता का सिद्धांत लैम्बर्ट द्वारा केवल १७६१ में ही सिद्ध हो पाया था। आर्यभटीय के अरबी में अनुवाद के पश्चात् (पूर्व.८२० ई.) बीजगणित पर मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी की पुस्तक में इस सन्निकटन का उल्लेख किया गया था। क्षेत्रमिति और त्रिकोणमिति गणितपाद ६ में, आर्यभट ने त्रिकोण के क्षेत्रफल को इस प्रकार बताया है- "त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः" इसका अनुवाद यह है : किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल, लम्ब के साथ भुजा के आधे के (गुणनफल के) परिणाम के बराबर होता है।[12] आर्यभट ने अपने काम में द्विज्या (साइन) के विषय में चर्चा की है और उसको नाम दिया है अर्ध-ज्या इसका शाब्दिक अर्थ है "अर्ध-तंत्री"। आसानी की वजह से लोगों ने इसे ज्या कहना शुरू कर दिया। जब अरबी लेखकों द्वारा उनके काम का संस्कृत से अरबी में अनुवाद किया गया, तो उन्होंने इसको जिबा कहा (ध्वन्यात्मक समानता के कारणवश)। चूँकि, अरबी लेखन में, स्वरों का इस्तेमाल बहुत कम होता है, इसलिए इसका और संक्षिप्त नाम पड़ गया ज्ब। जब बाद के लेखकों को ये समझ में आया कि ज्ब जिबा का ही संक्षिप्त रूप है, तो उन्होंने वापिस जिबा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जिबा का अर्थ है "खोह" या "खाई" (अरबी भाषा में जिबा का एक तकनीकी शब्द के आलावा कोई अर्थ नहीं है)। बाद में बारहवीं सदी में, जब क्रीमोना के घेरार्दो ने इन लेखनों का अरबी से लैटिन भाषा में अनुवाद किया, तब उन्होंने अरबी जिबा की जगह उसके लेटिन समकक्ष साइनस को डाल दिया, जिसका शाब्दिक अर्थ "खोह" या खाई" ही है। और उसके बाद अंग्रेजी में, साइनस ही साइन बन गया। वास्तव में "साइन " और "कोसाइन " के आधुनिक नाम आर्यभट द्वारा प्रचलित ज्या और कोज्या शब्दों के गलत (अपभ्रंश) उच्चारण हैं। उन्हें अरबी में जिबा और कोजिबा के रूप में उच्चारित किया गया था। फिर एक अरबी ज्यामिति पाठ के लैटिन में अनुवाद के दौरान क्रेमोना के जेरार्ड द्वारा इनकी गलत व्याख्या की गयी; उन्होंने जिबा के लिए अरबी शब्द 'जेब' लिया जिसका अर्थ है "पोशाक में एक तह", एल साइनस (सी.११५०). आर्यभट की खगोलीय गणना की विधियां भी बहुत प्रभावशाली थी। त्रिकोणमितिक तालिकाओं के साथ, वे इस्लामी दुनिया में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती थी। और अनेक अरबी खगोलीय तालिकाओं (जिज) की गणना के लिए इस्तेमाल की जाती थी। विशेष रूप से, अरबी स्पेन वैज्ञानिक अल-झर्काली (११वीं सदी) के कार्यों में पाई जाने वाली खगोलीय तालिकाओं का लैटिन में तोलेडो की तालिकाओं (१२वीं सदी) के रूप में अनुवाद किया गया और ये यूरोप में सदियों तक सर्वाधिक सूक्ष्म पंचांग के रूप में इस्तेमाल में रही। आर्यभट और उनके अनुयायियों द्वारा की गयी तिथि गणना पंचांग अथवा हिंदू तिथिपत्र निर्धारण के व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए भारत में निरंतर इस्तेमाल में रही हैं, इन्हे इस्लामी दुनिया को भी प्रेषित किया गया, जहाँ इनसे जलाली तिथिपत्र का आधार तैयार किया गया जिसे १०७३ में उमर खय्याम सहित कुछ खगोलविदों ने प्रस्तुत किया, जिसके संस्करण (१९२५ में संशोधित) आज ईरान और अफगानिस्तान में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रयोग में हैं। जलाली तिथिपत्र अपनी तिथियों का आंकलन वास्तविक सौर पारगमन के आधार पर करता है, जैसा आर्यभट (और प्रारंभिक सिद्धांत कैलेंडर में था).इस प्रकार के तिथि पत्र में तिथियों की गणना के लिए एक पंचांग की आवश्यकता होती है। यद्यपि तिथियों की गणना करना कठिन था, पर जलाली तिथिपत्र में ग्रेगोरी तिथिपत्र से कम मौसमी त्रुटियां थी। भारत के प्रथम उपग्रह आर्यभट, को उनका नाम दिया गया।चंद्र खड्ड आर्यभट का नाम उनके सम्मान स्वरुप रखा गया है। खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत में नैनीताल के निकट एक संस्थान का नाम आर्यभट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईएस) रखा गया है। अंतर्विद्यालयीय आर्यभट गणित प्रतियोगिता उनके नाम पर है।[27] बैसिलस आर्यभट, इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा २००९ में खोजी गयी एक बैक्टीरिया की प्रजाति का नाम उनके नाम पर रखा गया है। टिप्प्णियाँ क.^ "चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्त-परिणाहः।।" (आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक १०) ख. "अनुलोमगतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लंकायाम्।।"(आर्यभटीय, गोलपाद, श्लोक 9) अर्थ-नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
| Posted: 22 Mar 2022 10:38 PM PDT
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| Posted: 22 Mar 2022 10:31 PM PDT
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| बिहार पर्यावरण संरक्षण में देश से 30 साल आगेए नीतीश कुमार “ग्लोबल क्लाइमेट लीडर” अतुल बगई, UNEP Posted: 22 Mar 2022 10:26 PM PDT बिहार पर्यावरण संरक्षण में देश से 30 साल आगेए नीतीश कुमार "ग्लोबल क्लाइमेट लीडर" अतुल बगई, UNEP
नई दिल्ली। बिहार पर्यावरण संरक्षण के मामले में देश से 30 साल आगे है। भारत ने अपने कार्बन उत्सर्जन को 2070 तक नेट.जीरो करने का लक्ष्य तय किया है। ग्लासगो में पिछले साल हुए जलवायु सम्मेलन कॉप26 में भारत के द्वारा इसकी घोषणा की गई थी। लेकिनए बिहार अपने कार्बन उत्सर्जन को 2040 तक ही नेट.जीरो करने की योजना बना रहा है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए जल.जीवन.हरियाली जैसा बड़ा अभियान शुरू करने वाला बिहार देश का पहला राज्य है। संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को श्ग्लोबल क्लाइमेट लीडरश् पुकारा गया और श्जल.जीवन.हरियालीश् अभियान को दुनिया के लिए पथ.प्रदर्शक माना गया। ष्उक्त बातें यूनाइटेड नेशन एनवायर्नमेंट प्रोग्राम के भारत प्रमुख एवं पर्यावरणविद् अतुल बगई ने ने मंगलवार को श्बिहार दिवसश् के अवसर पर दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब में श्बिहार का गौरवशाली अतीत एवं वर्तमान में विकास के पथ पर अग्रसर बिहारश् विषय पर आयोजित परिचर्चा में कही। परिचर्चा का आयोजन बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा किया गया था। इसमें बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा जल संसाधन विभाग के मंत्री श्री संजय कुमार झा मुख्य अतिथि थे। पर्यावरणविद् अतुल बगई ने जानकारी दी कि दिसंबर 2021 में पटना में एक मीटिंग हुई थीए जिसमें 20 विभागों के प्रमुख सचिव उपस्थित थे। इसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निर्देश दिया कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में बिहार को 2040 तक नेट जीरो करने के लिए एक कारगर नीति बनाएं। श्री अतुल बगई ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न संकट पूरी दुनिया और मानव जाति के लिए गंभीर चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर 24 सितंबर 2020 को हुए इंटरनेशनल राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने के लिए भारत से सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आमंत्रित किया था। इस कॉन्फ्रेंस में उन्हें श्ग्लोबल क्लाइमेट लीडरश् कहा गया और श्जल.जीवन.हरियालीश् अभियान को दुनिया के लिए पथ.प्रदर्शक माना गया। इससे पहले नवंबर 2019 में बिहार दौरे पर आये बिल गेट्स ने भी पर्यावरण संरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विजन तथा जल.जीवन.हरियाली अभियान की मुक्तकंठ से तारीफ की थी। श्री अतुल बगई ने कहा कि जल संरक्षण और हरित आवरण में वृद्धि के लिए श्जल.जीवन.हरियालीश् अभियान के तहत 11 बिंदुओं पर आधारित कार्ययोजना तैयार कर उसे राज्यभर में मिशन मोड में लागू किया जा रहा है। इसके तहत जल संसाधनों को पुनर्जीवित किया जा रहा है और हर साल करोड़ों की संख्या में पेड़ लगाये जा रहे हैं। इस अभियान पर चरणबद्ध तरीके से कुल 24,524 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। बिहार के सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल की सराहना करते हुए श्री अतुल बगई ने कहा कि बिहार सरकार द्वारा हरित आवरण बढ़ानेए जल के संरक्षण और प्रबंधन तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए उठाये जा रहे कदम अत्यंत सराहनीय हैं। झारखंड से बिहार के बंटवारे के बाद बिहार का हरित आवरण 9 प्रतिशत रह गया था। वर्ष 2012 में हरियाली मिशन की स्थापना की गई और 24 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया। इसके तहत लगभग 22 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए हैं। अब राज्य का हरित आवरण 15 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। बिहार सरकार ने इसे 17 प्रतिशत से अधिक करने का लक्ष्य रखा है। परिचर्चा में मुख्य अतिथि बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क तथा जल संसाधन मंत्री श्री संजय कुमार झा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मॉडल देश.दुनिया के लिए नजीर है। नीतीश कुमार की दृष्टि स्पष्ट है. पृथ्वी पर जब तक जल और हरियाली हैए तभी तक जीवन सुरक्षित है। श्री संजय कुमार झा ने कहा कि जल.जीवन.हरियाली अभियान के तहत एक अवयब है जल के अधिशेष वाले क्षेत्र से जल को जल संकट वाले क्षेत्र में ले जाना। इसके तहत बिहार में गंगा जल आपूर्ति योजना का पहली बार कार्यान्वयन किया जा रहा है। इस योजना के तहत मॉनसून के महीनों में गंगा नदी के अधिशेष जल को लिफ्ट कर पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण चार शहरों. गयाए बोधगयाए राजगीर और नवादा में पहुंचाया जाएगा और वहां सालोभर पेयजल के रूप में उपयोग किया जाएगा। श्री संजय कुमार झा ने कहा कि बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में श्हर खेत तक सिंचाई का पानीश् पहुंचने से कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को निश्चित रूप से एक नई ताकत मिलेगी। इसके लिए जल संसाधन और कृषि सहित पांच विभागों के पदाधिकारियों के संयुक्त तकनीकी सर्वेक्षण दलों के द्वारा राज्य के प्रत्येक ग्राम तथा टोले के असिंचित क्षेत्रों का सर्वेक्षण कराया गया है। सर्वेक्षण में जिन योजनाओं को चिह्नित किया गया हैए उनसे राज्य के 7 लाख 79 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने की संभावना बन रही है। इनमें आहर.पईनए जल अधिशेष क्षेत्र से पानी उठा कर और पानी की कमी वाले क्षेत्र में ले जाने का कामए चेक डैमए एण्टी फ्लड स्लूईसए नहरों का पुनर्स्थापनए विस्तारीकरणए नलकूप आदि प्रकार की योजनाएं हैंए जिनका क्रियान्वयन उक्त पांचो विभागों के द्वारा प्रारंभ किया जाना है। श्री संजय कुमार झा ने कहा कि दुनियाभर के अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने और नये रोजगार के सृजन के लिए सुगम यातायात तथा बिजली की पर्याप्त उपलब्धता पहली शर्त है। नया बिहार इस शर्त को पूरा करते हुएए विकास की एक नई उड़ान भरने के लिए श्टेकऑफ फेजश् में है। पूरे बिहार में सड़कए रेल और हवाई कनेक्टिविटी के साथ सुलभ संपर्कता है। राज्य के कोटे में पर्याप्त बिजली उपलब्ध है। कभी अपहरण के लिए बदनाम रहे बिहार में कानून.व्यवस्था की स्थिति निरंतर बेहतर हुई है। इस नये बिहार में उद्योगए आईटी सेवाओंए शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में निवेश की व्यापक संभावनाएं हैं। पूर्व केंद्रीय स्वास्थ सचिव एवं बिहार काडर के सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी सीके मिश्रा ने कहा कि नीतीश कुमार द्वारा शुरू की गई हर घर नल का जल पहुंचाने की योजना बिहार की वर्तमान और आनेवाली पीढ़ियों के बेहतर स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की दिशा में व्यापक प्रयास किये गये हैं। वर्ष 2006 में कराये गये एक सर्वेक्षण में पता चला था कि बिहार के प्रखंड स्तर के अस्पतालों में प्रतिमाह औसतन 39 लोग ही इलाज कराने पहुंचते थे। सुविधाओं में निरंतर वृद्धि के कारण अब प्रखंड स्तर के अस्पतालों में हर माह औसतन 10 हजार से अधिक लोग अपना इलाज करा रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार एवं द प्रिंट के राजनीतिक संपादक डीके सिंह ने कहा कि बिहार जैसी सघन आबादी वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कृषि मुख्य सहारा हैए जो खाद्य सुरक्षाए रोजगार और ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार में कृषि एवं सहवर्ती क्षेत्र की औसत वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक रही है। इस दौरान प्रमुख अनाजों के उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए बिहार को केंद्र सरकार से पांच बार प्रतिष्ठित श्कृषि कर्मण पुरस्कारश् हासिल हो चुका है। तीन कृषि रोडमैप को जमीन पर सफलतापूर्वक उतारने के कारण बिहार में कृषि क्षेत्र का कायाकल्प हुआ है। जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर अमिताभ सिंह ने कहा कि बिहार देश का सबसे सघन आबादी वाला प्रदेश में है। वित्तीय संसाधनों की सीमित उपलब्धता और ढेर सारी चुनौतियों के बावजूदए पिछले डेढ़ दशक में बिहार की औसत विकास दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक रही है और इसे श्देश का ग्रोथ इंजनश् कहा जाने लगा है। बिहार इस समय प्रति एक हजार वर्ग किमी क्षेत्रफल पर 3ए086 किमी पथ घनत्व के साथ देश में तीसरे स्थान पर है। पथ घनत्व का राष्ट्रीय औसत 1ए617 किमी प्रति एक हजार वर्ग किमी है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में न सिर्फ ढांचागत सुविधाओं का व्यापक विकास हुआ हैए बल्कि महिला सशक्तिकरण और समाज सुधार की दिशा में भी अनेक उल्लेखनीय पहल की गई है। समारोह को कई अन्य विशिष्ट वक्ताओं ने संबोधित किया। अतिथियों का स्वागत सूचना एवं जनसंपर्क विभागए बिहार सरकार के निदेशक कंवल तनुज ने किया। समारोह में अनेक वरिष्ठ पत्रकारए प्रोफेसर एवं बुद्धिजीवी मौजूद थे। 196 गुब्बारे हवा में छोड़े गयेए हुआ सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नवंबर 2005 में बिहार की सत्ता संभाली थी। तब से अब तक कुल 196 महीनों में नीतीश कुमार के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में बिहार के नवनिर्माण के प्रतीक के रूप में परिचर्चा से पहले मंत्री श्री संजय कुमार झा एवं अन्य अतिथियों ने मिलकर 196 रंग.बिरंगे हीलियम गुब्बारे हवा में छोड़े। बताया गया कि ये गुब्बारे नये बिहार की विकास की उड़ान के प्रतीक हैंए बिहार वासियों के उत्साहए उमंगए जोश और जुनून के प्रतीक हैं। इस मौके पर गायक सत्येंद्र संगीत एवं अन्य कलाकारों ने बिहार के राज्यगीत के गायन के साथ.साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किया। हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag |
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