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Saturday, April 2, 2022

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राष्ट्रीय हिंदू शक्ति संगठन मुजफ्फरनगर द्वारा 251 दीपक जलाकर विक्रम संवत 2079 का किया स्वागत

Posted: 02 Apr 2022 08:39 AM PDT

राष्ट्रीय हिंदू शक्ति संगठन मुजफ्फरनगर द्वारा 251 दीपक जलाकर विक्रम संवत 2079 का किया स्वागत 

आज दिनांक 2/4/2022  को राष्ट्रीय हिंदू शक्ति संगठन मुजफ्फरनगर द्वारा तुलसी पार्क  निकट शिव चौक पर हिंदू नव वर्ष के अवसर पर 251 दीपक जलाकर विक्रम संवत 2079 बनाकर और दीपक जलाकर भगवान श्री गणेश की आरती कर हिंदू नव वर्ष मनाया इस अवसर पर बोलते हुए संजय अरोरा राष्ट्रीय संयोजक ने कहां की सभी हिंदुओं को हिंदू नव वर्ष मनाना चाहिए उन्होंने कहा कि प्रत्येक हिंदुओं को अपने घरों पर भगवा ध्वज फहराना चाहिए तथा उन्होंने कहा कि आज अपनी युवा पीढ़ी को अपने हिंदू नववर्ष की महत्ता बतानी चाहिए इस अवसर बोलते हुए श्रीमती सरिता शर्मा अरोड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष महिला ने कहा कि भारतवर्ष विश्व गुरु रह चुका हैं हमारा कैलेंडर अंग्रेजी कैलेंडर से बहुत प्राचीन है हिंदुओं के सभी त्योहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार ही मनाए जाते है  इस अवसर पर विजय त्यागी जिलाध्यक्ष विपिन शर्मा नगर अध्यक्ष ने  सभी हिंदुओं को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहां की आज की युवा पीढ़ी को नववर्ष का महत्व पता होना चाहिए इस अवसर पर जिला महामंत्री राजीव त्यागी ने कहा कि हिंदू नव वर्ष दुनिया में श्रेष्ठ है उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी हिंदू वीरों का कार्यकर्ताओं का धन्यवाद किया कार्यक्रम से अंत में प्रसाद के रूप में मिष्ठान व फलों का वितरण किया गया है इस अवसर पर मुख्य रूप से प्रवीन जैन विजय त्यागी विपिन शर्मा अशोक त्यागी अंकित पाल  प्रमोद वर्मा रेनू वर्मा   निरुपमा गोयल प्रियंका चौधरी चरण सिंह त्यागी राजीव त्यागी सोनू त्यागी बोधराज त्यागी ईलम  चंद त्यागी संदीप त्यागी साधु राम संपूर्णानंद त्यागी पिंटू त्यागी ओम कुमार राम फल त्यागी कपिल त्यागी सरवन ऋषभ त्यागी अमर दीप काका आदि काफी हिंदू वीर उपस्थित थे 
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श्रद्धा व उल्लास से मनाया जा रहा नव संवत्सर 2079

Posted: 02 Apr 2022 08:10 AM PDT

श्रद्धा व उल्लास से मनाया जा रहा नव संवत्सर 2079
नवरात्र पर सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं का सैलाब

लखनऊ। भारतीय नव संवत्सर 2079 आज पूरे देश में श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इसी दिन प्रातः काल कलश स्थापना कर आदि शक्ति मां दुर्गा की उपासना का नवरात्र पर्व शुरू हुआ है। चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही राजा विक्रमादित्य द्वारा प्रारम्भ किया गया नया वर्ष हिन्दू धर्मावलम्बी बहुत धूमशाम से अब मनाने लगे हैं। कई स्थानों पर इस अवसर पर शोभा यात्रा भी निकाली गयी। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सनातन हिन्दू महासभा ने गोमती नगर स्थित विराम खण्ड-5 जीवन प्लाजा से मर्यादा पुरुषोत्तम राजा रामचन्द्र की शोभा यात्रा निकाली।

आज से चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष का प्रारंभ हुआ है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन देशभर के दुर्गा मंदिरों में प्रातःकाल से ही पूजा के लिए भक्त आने लगे हैं। दिल्ली के झंडेवालान मंदिर में सुबह की आरती हुई, जिसमें काफी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। माता रानी के जयकारों से मंदिर गूंज उठा। मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भक्तों का आना जारी है। यही स्थिति देश भर के मंदिर की है। दिल्ली में मां दुर्गा के दर्शन के लिए झंडेवालान मंदिर में सुबह से ही भक्तों की कतार लग गई है। करोलबाग में स्थित झंडेवालान मंदिर एक प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। यहां पर लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए झंडेवाली देवी के दर्शन करने आते हैं। झंडेवालान मंदिर ट्रस्ट से जुड़े रविंद्र गोयल ने एएनआई से कहा कि वह सभी श्रद्धालुओं का स्वागत करते हैं और सभी को हिंदू नववर्ष की शुभकामनाएं एवं बधाई देते हैं। मंदिर परिसर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए है। सुरक्षा में 2500 से अधिक लोगों को लगाया गया है और मंदिर परिसर में 160 सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं। चैत्र नवरात्रि को बसंत नवरात्रि भी कहते हैं। यह 02 अप्रैल से शुरु हुई है, जिसका समापन 11 अप्रैल को होगा। पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ कलश स्थापना के साथ होता है। इसमें मां दुर्गा के 09 स्वरुपों की पूजा अर्चना करते हैं। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन हर साल राम नवमी मनाई जाती है।
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केजरीवाल का अब गुजरात पर धावा

Posted: 02 Apr 2022 08:08 AM PDT

केजरीवाल का अब गुजरात पर धावा

मुख्यमंत्री मान के साथ पहुंचे साबरमती आश्रम चलाया चरखा
अहमदाबाद। आप प्रमुख अरविन्द केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान गुजरात में चुनावी तैयारियों के लिए पहुंच चुके हैं। दिल्ली सीएम केजरीवाल और पंजाब के नए-नवेले सीएम भगवंत मान की जोड़ी अहमदाबाद में पहुंचने के बाद साबरमती आश्रम पहुंची। जहां दोनों नेताओं ने चरखा भी चलाया। साबरमती आश्रम पहुंचने पर दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आज यहां आकर बहुत अच्छा लगा, हम अपने आप को धन्य मानते हैं कि गांधी के देश में पैदा होने का अवसर मिला। मैं सीएम बनने से पहले यहां आ चुका हूं। मैं शहीदों की धरती से आता हूं। आज यहां आकर बहुत अच्छा लगा। पंजाब के हर घर में चरखा है, चरखे से सूत कातते हैं। आज गांधी जी का ओरिजनल चरखा दिखा। हम नेशनलिस्ट लोग हैं, देश को प्यार करने वाले लोग हैं। गुजरात के लोग इंकलाबी लोग हैं। केजरीवाल और भगवंत मान आज से दो दिन के गुजरात दौरे पर हैं। इस दौरे पर दोनों नेता अहमदाबाद में रोड शो भी करेंगे। 3 अप्रैल अरविंद केजरीवाल सुबह 10.30 बजे स्वामीनारायण मंदिर दर्शन के लिये पंहुचेंगे। जिसके बाद गुजरात से जुड़े पार्टी नेताओं से मुलाकात करेंगे और फिर शाम में दिल्ली रवाना होंगे।
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देउबा ने की पीएम मोदी से मुलाकात

Posted: 02 Apr 2022 08:06 AM PDT

देउबा ने की पीएम मोदी से मुलाकात

नयी दिल्ली। नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। इससे पूर्व 1 अप्रैल को वह भाजपा के कार्यालय में गये थे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की थी। नेपाल के पीएम देउबा तीन दिवसीय भारत यात्रा पर आये हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा तीन दिवसीय यात्रा के लिए भारत आ गए हैं। उनका विमान शुक्रवार दोपहर दिल्ली पहुंचा था। सूत्रों के मुताबिक, उनकी यात्रा का मकसद दोनों देशों के बीच के संबंधों को मजबूत करना है। दो अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। दिल्ली में आधिकारिक मुलाकातों के अलावा नेपाली पीएम वाराणसी भी जाएंगे। जुलाई 2021 में नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद देउबा का यह पहला भारत दौरा है। इससे पहले वह चार बार नेपाल के पीएम रहे और हर कार्यकाल में उन्होंने भारत का दौरा किया। वह आखिरी बार 2017 में पीएम के तौर पर भारत आए थे। अपनी यात्रा के दौरान देउबा सबसे पहले भाजपा मुख्यालय पहुंचे। यहां उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने नेपाल के प्रधानमंत्री देउबा से मुलाकात की।देउबा की भारत यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय आदान-प्रदान की परंपरा का हिस्सा है। यह दोनों देशों को विकास, आर्थिक साझेदारी, कारोबार, स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग, कनेक्टिविटी, ऊर्जा, लोगों से लोगों के बीच संबंधों और अन्य आपसी हितों के मुद्दों के पहलू की समीक्षा करने का अवसर प्रदान करेगा।
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लोक पर्वों की भी धरती है राजस्थान

Posted: 02 Apr 2022 08:05 AM PDT

लोक पर्वों की भी धरती है राजस्थान

महिलाएं कहीं भी हों पर धूमधाम से मनाती हैं गणगौर

(रमेश सर्राफ धमोरा-हिन्दुस्तान समाचार फीचर)

राजस्थान का नाम सुनते ही मन अपने आप ही आनंदित हो उठता है। राजस्थान की कुछ ऐसी ही तस्वीर लोगों के मन में बनी रहती है। एक तरफ जहां राजस्थान के बहादुर योद्धाओं की कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है। वहीं यहां के पर्व त्यौहार भी अपने आप में अलग ही महत्व रखतें हैं। राजस्थानी परम्परा के लोकोत्सव अपने आप में एक पुरानी विरासत को संजोए हुए हैं। गणगौर भी राजस्थान का ऐसा ही एक प्रमुख लोक पर्व है। लगातार 17 दिनों तक चलने वाला गणगौर का पर्व मूलतः कुंवारी लड़कियों व महिलाओं का त्यौंहार है। राजस्थान की महिलाएं चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हांे गणगौर के पर्व को पूरे उत्साह के साथ मनाती है। विवाहिता एवं कुंवारी सभी आयु वर्ग की महिलायें गणगौर की पूजा करती है।

होली के दूसरे दिन से सोलह दिनों तक लड़कियां प्रतिदिन प्रातः काल ईसर-गणगौर को पूजती हैं। जिस लड़की की शादी हो जाती है वो शादी के प्रथम वर्ष अपने पीहर जाकर गणगौर की पूजा करती है। इसी कारण इसे सुहागपर्व भी कहा जाता है। कहा जाता है कि चैत्र शुक्ल तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह शंकर भगवान के साथ हुआ था। उसी की याद में यह त्यौहार मनाया जाता है।

पौराणिक आख्यान के अनुसार कामदेव मदन की पत्नी रति ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया तथा उन्हीं के तीसरे नेत्र से भस्म हुए अपने पति को पुनः जीवन देने की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कामदेव को पुनः जीवित कर दिया तथा विष्णुलोक जाने का वरदान दिया। उसी की स्मृति में प्रतिवर्ष गणगौर का उत्सव मनाया जाता है। गणगौर पर्व पर विवाह के समस्त नेगचार व रस्में की जाती है।

राजस्थान की राजधानी जयपुर में गणगौर उत्सव दो दिन तक धूमधाम से मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों में आधे दिन का अवकाश रहता है। ईसर और गणगौर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा राजमहल से निकलती है। इनको देखने बड़ी संख्या में देशी-विदेशी सैनानी उमड़ते हैं। सभी उत्साह से भाग लेते हैं। इस उत्सव पर एकत्रित भीड़ जिस श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ धार्मिक अनुशासन में बंधी गणगौर की जय-जयकार करती हुई भारत की सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करती है, उसे देखकर अन्य धर्मावलम्बी भी इस संस्कृति के प्रति श्रृद्धा भाव से ओतप्रोत हो जाते हैं। ढूंढाड़ की भांति ही मेवाड़, हाड़ौती, शेखावाटी सहित इस मरुधर प्रदेश के विशाल नगरों में ही नहीं बल्कि गांव-गांव में गणगौर पर्व मनाया जाता है एवं ईसर-गणगौर के गीतों से हर घर गुंजायमान रहता है।

होलिका दहन के दूसरे दिन गणगौर पूजने वाली लड़कियां होली दहन की राख लाकर उसके आठ पिण्ड बनाती हैं एवं आठ पिण्ड गोबर के बनाती हैं। उन्हें दूब पर रखकर प्रतिदिन पूजा करती हुई दीवार पर एक काजल व एक रोली की टिकी लगाती हैं। शीतलाष्टमी तक इन पिण्डों को पूजा जाता है। फिर मिट्टी से ईसर गणगौर की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजती हैं। लड़कियां प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में गणगौर पूजते हुये गीत गाती हैं-

गौर ये गणगोर माता खोल किवाड़ी, छोरी खड़ी है तन पूजण वाली।

गीत गाने के बाद लड़कियां गणगौर की कहानी सुनती है। दोपहर को गणगौर के भोग लगाया जाता है तथा कुए से लाकर पानी पिलाया जाता है। लड़कियां कुएं से ताजा पानी लेकर गीत गाती हुई आती हैं-

म्हारी गौर तिसाई ओ राज घाट्यारी मुकुट करो,

बीरमदासजी रो ईसर ओराज, घाटी री मुकुट करो,

म्हारी गौरल न थोड़ो पानी पावो जी राज घाटीरी मुकुट करो।

लड़कियां गीतों में गणगौर के प्यासी होने पर काफी चिन्तित लगती है एवं गणगौर को जल्दी से पानी पिलाना चाहती है। पानी पिलाने के बाद गणगौर को गेहूं चने से बनी घूघरी का प्रसाद लगाकर सबको बांटा जाता है और लड़कियां गीत गाती हैं-

म्हारा बाबाजी के माण्डी गणगौर, दादसरा जी के माण्ड्यो रंगरो झूमकड़ो,

ल्यायोजी-ल्यायो ननद बाई का बीर, ल्यायो हजारी ढोला झुमकड़ो।

रात को गणगौर की आरती की जाती है तथा लड़कियां नाचती हुई गाती हैं। गणगौर पूजन के मध्य आने वाले एक रविवार को लड़कियां उपवास करती हैं। प्रतिदिन शाम को क्रमवार हर लडकी के घर गणगौर ले जायी जाती है, जहां गणगौर का ''बिन्दौरा'' निकाला जाता है तथा घर के पुरुष लड़कियों को भेंट देते हैं। लड़कियां खुशी से झूमती हुई गाती हैं-

ईसरजी तो पेंचो बांध गोराबाई पेच संवार ओ राज म्हे ईसर थारी सालीछां।

गणगौर विसर्जन के पहले दिन गणगौर का सिंजारा किया जाता है। लड़कियां मेहन्दी रचाती हैं। नये कपड़े पहनती हैं, घर में पकवान बनाये जाते हैं। सत्रहवें दिन लड़कियां नदी, तालाब, कुए, बावड़ी में ईसर गणगौर को विसर्जित कर विदाई देती हुई दुःखी हो गाती हैं-

गोरल ये तू आवड़ देख बावड़ देख तन बाई रोवा याद कर।

गणगौर की विदाई का बाद कई महिनो तक त्यौहार नहीं आते इसलिए कहा गया है-''तीज त्यौहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर''। अर्थात् जो त्यौहार तीज (श्रावणमास) से प्रारम्भ होते हैं उन्हें गणगौर ले जाती है। ईसर-गणगौर को शिव पार्वती का रूप मानकर ही बालाएं उनका पूजन करती हैं। गणगौर के बाद बसन्त ऋतु की विदाई व ग्रीष्म ऋृतु की शुरुआत होती है। दूर प्रान्तों में रहने वाले युवक गणगौर के पर्व पर अपनी नव विवाहित प्रियतमा से मिलने अवश्य आते हैं। जिस गोरी का साजन इस त्यौहार पर भी घर नहीं आता वो सजनी नाराजगी से अपनी सास को उलाहना देती है। ''सासू भलरक जायो ये निकल गई गणगौर, मोल्यो मोड़ों आयो रे''। राजस्थान को देव भूमि कहा जाय तो अनुचित नहीं होगा। सम्प्रदाय यहां वैचारिक दृष्टि से फले फूले हैं। उन सब में परस्पर सहिष्णुता एवं एक दूसरे के उपास्य देवों के प्रति सहज सम्मान का भाव रहा है। राजस्थानी शासकों ने विश्व कल्याण की भवना से अभिभूत होकर लोक मान्यताओं का सदा सम्मान किया है। इसी कारण यहां सभी पौराणिक एवं वैदिक देवी देवताओं के मन्दिर हैं। उनके उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं। गणगौर का उत्सव भी ऐसा ही लोकोत्सव है। जिसकी पृष्ठ भूमि पौराणिक है। काल प्रभाव से उनमें शास्त्राचार के स्थान पर लोकाचार हावी हो गया है। परन्तु भाव भंगिमा में कोई कमी नहीं आई है। हमें आज आवश्यकता है इस लोकोत्सव को अच्छे वातावरण में मनाये। हमारी प्राचीन परम्परा को अक्षुण बनाये रखे। इसका दायित्व है उन सभी सांस्कृतिक परम्परा के प्रेमियों पर है जिनका इससे लगाव है। जो ऐसे पर्वो को सिर्फ पर्यटक व्यवसाय की दृष्टि से न देखकर भारत के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देखने के हिमायती हैं।
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आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुकूल अवसर

Posted: 02 Apr 2022 08:00 AM PDT

आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुकूल अवसर

द्वितीया को होगी माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा

(डॉ. दिलीप अग्निहोत्री-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

भारत के ऋषियों ने प्रकृति में भव्यता का प्रत्यक्ष अनुभव किया। उसे भव्य मानते हुए प्रणाम किया। चरक संहिता में कहा गया-

यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे अर्थात जो इस ब्रह्माण्ड में है वही सब हमारे शरीर में भी है। भौतिक संसार पंचमहाभूतों से बना है-आकाश, वायु, अग्नि,जल और पृथ्वी। उसी प्रकार हमारा यह शरीर भी इन्हीं पाँचों महाभूतों से बना हुआ है। इस प्रकार ब्रह्माण्ड और शरीर में समानता है। स्थूल व सूक्ष्म की दृष्टि से ही अंतर है। प्रकृति तथा पुरुष में समानता है। चरक संहिता में यह भी कहा गया कि-

यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषाः।

तावन्तः पुरुषे यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोकेः

अर्थात ब्रह्माण्ड में चेतनता है। मनुष्य भी चेतन है। पंचमहाभूतों के सभी गुण मनुष्य में हैं। प्रकृति में सन्धिकाल का विशेष महत्व है। वर्ष और दिवस में दो संधिकाल महत्वपूर्ण होते है। दिवस में सूर्योदय व सूर्यास्त के समय संधिकाल कहा जाता है। सूर्योदय के समय अंधकार विलीन होने लगता है,उसके स्थान पर प्रकाश आता है। सूर्यास्त के समय इसकी विपरीत स्थिति होती है। भारतीय चिंतन में इस संधिकाल में उपासना करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त वर्ष में दो संधिकाल होते है। इसमें मौसम का बदलाव होता है। ऋतु के समय संयम से स्वास्थ भी ठीक रहता है। नवरात्र आराधना भी वर्ष में दो बार इन्हीं संधिकाल में आयोजित होती है।

यह शक्ति आराधना का पर्व है। इसी के अनुरूप संयम नियम की भी आवश्यकता होती है। पूरे देश में इक्यावन शक्तिपीठ पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते है। मां दुर्गा का प्रथम रूप है शैल पुत्री। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म होने से इन्हें शैल पुत्री कहा जाता है। नवरात्र की प्रथम तिथि को शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इसी क्रम में माँ दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की भावना जागृत होती है। मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा है। इनकी आराधना तृतीया को की जाती है। चतुर्थी के दिन मां कुष्मांडा की आराधना की जाती है। नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मां का छठवां रूप कात्यायनी है। छठे दिन इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र की सप्तमी के दिन मां कालरात्रि की आराधना का विधान है। देवी का आठवां रूप मां गौरी है। इनका अष्टमी के दिन पूजन का विधान है। मां सिद्धिदात्री की आराधना नवरात्र की नवमी के दिन की जाती है। माँ जगदम्बा जो स्वयं वाणीरूपा है, वही वाणी, बुद्धि, विद्या प्रदायिनी भी है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। माता ब्रह्मचारिणी की पूजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। ऐसा भक्त इसलिए करते हैं ताकि मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकें। आज नवरात्र का दूसरा दिन है। नवरात्र के दूसरे दिन माता के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की पूजा की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी।

ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। मुख पर कठोर तपस्या के कारण तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। यह स्वरूप श्वेत वस्त्र पहने दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमंडल लिए हुए सुशोभित है। ब्रह्मचारिणी देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी,अपर्णा और उमा। कहा जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर पार्वती स्वरूप में थीं। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोप तपस्या की थी। कठोर तप के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया। मां जगदम्बे की भक्ति के लिए मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र का नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए-

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

अर्थात- सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। मां दुर्गा की तीसरी शक्ति मां चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्रमा सुशोभित है। स्वर्ण के समान इनका दमकता हुआ तेजोमय स्वरूप है। इनके दस हाथ हैं,जिनमें अस्त्र-शस्त्र लिए हुए मां सिंह पर आरूढ़ हैं। मां राक्षसों के विनाश के लिए युद्ध में प्रस्थान करने को उद्यत हैं। मान्यता है कि इनके घंटे की ध्वनि सुनकर दैत्य, राक्षस आदि भाग जाते हैं।.मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान आत्मिक रूप से सशक्त बनाता है। नकारात्मक ऊर्जा का निराकरण होता है। सकारात्मक भाव व सद्गुणों का विकास होता है-

पिंडज प्रवरारूढ़ा चंडकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता।। 'या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नसस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
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मान तय करें प्राथमिकता

Posted: 02 Apr 2022 07:58 AM PDT

मान तय करें प्राथमिकता

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

पंजाब में एक नया राजनीतिक युग शुरू हुआ है। अब तक वहां कांग्रेस और अकाली दल अपनी विशुद्ध कुर्सी राजनीति को चला रहे थे। आम आदमी पार्टी पर कुछ लोगों को तो भरोसा है, वरना दिल्ली में लगातार तीन बार और पंजाब में दो बार जनता उसके पक्ष में मजबूती से नहीं खड़ी होती। पंजाब में 2017 में आम आदमी पार्टी मुख्य विपक्षी दल थी और इस बार प्रचण्ड बहुमत मिला, ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली की जनता ने दिया है। इसलिए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी क्योंकि अभी हाल में उन्हांेने (मान ने) जो कदम उठाए हैं, उनसे ऐसा लगता है कि वे जनता के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन केन्द्र सरकार से भी उलझ रहे हैं। चण्डीगढ़ का मामला अभी विवादित है, इसलिए उसे केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। भगवंत मान चंडीगढ़ के कर्मचारियों पर केन्द्रीय सेवा नियमों को लागू करने का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने चण्डीगढ़ पंजाब को देने का प्रस्ताव भी विधानसभा में पेश कर दिया है। दूसरी तरफ भगवंत मान पंजाब में युवाओं को नशे से मुक्ति दिलाने और उनको रोजगार देने का वादा करके सत्ता में आए हैं। शिक्षा व्यवस्था में सुधार कर रहे हैं। जनहित में इन्हीं कार्यों को प्राथमिकता देना उनके हित में रहेगा। पंजाब के हालात दिल्ली से अलग हैं। वहां केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप ढाल बन सकता है लेकिन पंजाब अगर बिगड़ेगा तो मान के पास कोई बहाना नहीं होगा।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अगले शैक्षणिक सत्र के शुरू होने से कुछ दिन पहले सभी निजी स्कूलों को फीस बढ़ाने या बच्चों को चुनिंदा दुकानों से किताब, पोशाक या स्टेशनरी का सामान खरीदने के लिए मजबूर करने के खिलाफ निर्देश जारी किया है। मान ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा देना चाहते हैं, लेकिन यह महंगा हो गया है, जिससे इसका खर्च वहन कर पाना मुश्किल हो गया है। मान ने एक वीडियो संदेश में घोषणा करने से पहले कहा, "आज मैं दो बड़े फैसलों की घोषणा करने जा रहा हूं जो हमारी सरकार ने शिक्षा क्षेत्र से संबंधित लिये हैं।" मान ने कहा, "पंजाब में कोई भी निजी स्कूल इस सेमेस्टर में फीस नहीं बढ़ाएगा, जब नए दाखिले होंगे।" उन्होंने कहा कि राज्य का कोई भी निजी स्कूल बच्चों या उनके अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताब, पोशाक और स्टेशनरी का सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि निजी स्कूलों को बच्चों और उनके अभिभावकों को स्टेशनरी का सामान, किताब और यूनिफॉर्म बेचने वाली सभी दुकानों का पता देना होगा। मान ने कहा, "यह माता-पिता पर निर्भर करता है कि वे अपने बच्चों के लिए इन वस्तुओं को कहां से खरीदना चाहते हैं।" उन्होंने कहा कि फैसले तत्काल प्रभाव से लागू होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस संबंध में विस्तृत नीति जल्द ही जारी की जाएगी। इससे पहले 19 मार्च को मान ने पुलिस विभाग में 10,000 पदों सहित राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में 25,000 रिक्तियों को भरने की घोषणा की थी।

इस प्रकार पंजाब में सत्ता संभालने के बाद सीएम भगवंत मान ने स्कूली शिक्षा को लेकर दो बड़े फैसले लिये हैं। अपने पहले निर्णय में उन्होंने निजी स्कूल के फीस बढ़ाने पर पाबंदी लगा दी है, साथ ही दूसरे फैसले में मुख्यमंत्री ने यह आदेश दिया है कि कोई भी स्कूल किसी खास दुकान से किताब और ड्रेस खरीदने का दबाव नहीं डालेगा। बच्चों के पैरेंट्स अपनी सुविधा के अनुसार कहीं से भी बुक और यूनिफॉर्म खरीद सकेंगे। प्राइवेट स्कूल के फीस बढ़ाने पर रोक लगाने फैसले के बाद अब इस सत्र में होने वाले एडमिशन में स्कूल फीस में बढ़ोतरी नहीं होगी। इन फैसलों को लेकर पंजाब सरकार जल्द ही पॉलिसी बनाकर जारी कर देगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि शिक्षा महंगी होने के कारण आम लोगों की पहुंच से दूर हो गई है। उन्होंने कहा कि, महंगी फीस के कारण माता-पिता को बच्चों को स्कूल से निकालना पड़ रहा है और बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पंजाब सरकार ने शिक्षा से जुड़े यह 2 अहम निर्णय लिये हैं। राज्य सरकार ने पंजाब के सभी प्राइवेट स्कूल को आदेश दिया है कि वे इस सत्र में एक रूपया भी फीस नहीं बढ़ाएंगे और यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू करेंगे। बता दें कि दिल्ली की तरह पंजाब में भी शिक्षा का मुद्दा आम आदमी पार्टी के एजेंडे में सबसे ऊपर था। पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राज्य के स्कूल तंत्र को सुधारने और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने का वादा किया था। बताया जाता है कि पंजाब चुनावों में मिली प्रचंड जीत के पीछे आम आदमी पार्टी के लिए शिक्षा एक बहुत बड़ा फैक्टर रहा है। भगवंत मान केन्द्र से भी टकरा रहे हैं। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के कर्मचारियों पर केंद्रीय सेवा नियमों को लागू करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ एक दिवसीय पंजाब विधानसभा विशेष सत्र में प्रस्ताव पारित किया गया। इस दौरान केंद्र शासित प्रदेश को पूरी तरह पंजाब को देने की मांग की गई है। मुख्यमंत्री भगवंत मान चंडीगढ़ के मामलों से संबंधित यह प्रस्ताव लाए हैं जिस पर चर्चा हुई। इससे पूर्व स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने राणा गुरजीत सिंह और उनके बेटे राणा इंद्र प्रताप सिंह को विधायक के तौर पर शपथ दिलाई। एक दिन के सत्र के लिए विधानसभा की कार्य सूची में कहा गया था कि मुख्यमंत्री मान केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ से संबंधित मामलों के संबंध में एक प्रस्ताव पेश करेंगे। मान ने पहली ही कहा था कि यह पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के खिलाफ है। उन्होंने यह भी कहा था कि पंजाब चंडीगढ़ पर अपने दावे के लिए लड़ेगा। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के कर्मचारियों पर केंद्रीय सेवा नियम लागू करने के केंद्र के हालिया फैसले पर पंजाब में आप, कांग्रेस और शिअद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कई नेताओं ने कहा कि भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) के नियमों में बदलाव के बाद यह पंजाब के अधिकारों के लिए एक और बड़ा झटका है। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि इस कदम से चंडीगढ़ के कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर लाभ होगा क्योंकि उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 58 से बढ़कर 60 वर्ष हो जाएगी और महिला कर्मचारियों को वर्तमान एक वर्ष के बजाय दो साल की चाइल्ड केयर लीव मिलेगी। इस बीच कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने राज्य के संघीय अधिकारों को हड़पने के लिए केंद्र सरकार के विभिन्न प्रयासों को विफल करने के लिए भगवंत मान से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। खैरा ने कहा कि मान को तुरंत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से समय मांगना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंजाब सहित देश के हर राज्य ने अपनी शक्तियां भारत के संविधान से ली हैं। खैरा ने कहा कि हमारे संविधान के निर्माताओं ने केंद्र और राज्य दोनों में निहित शक्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित और निर्धारित किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि चंडीगढ़ में केंद्र सरकार के सेवा नियमों को लागू करने का एकतरफा फैसला पंजाब के पुनर्गठन अधिनियम 1966 का पूरी तरह से उल्लंघन है। उन्होंने दावा किया कि यह न केवल भेदभावपूर्ण है बल्कि चंडीगढ़ पर पंजाब के वैध अधिकार को भी कमजोर करता है। भगवंत मान अगर इस विवाद में उलझ गये तो राज्य की जनता से किये वादे पूरे करने मुश्किल होंगे।
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चीन ने यूक्रेन युद्ध के लिए नाटो को जिम्मेदार बताया

Posted: 02 Apr 2022 07:56 AM PDT

चीन ने यूक्रेन युद्ध के लिए नाटो को जिम्मेदार बताया

बीजिंग। चीन ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि उसी ने यूक्रेन में युद्ध को भड़काया है। चीन ने सीधे सीधे नाटो की भूमिका पर ही सवाल खड़ा कर अमेरिका को कठघरे में लाने का प्रयास किया है। उसका कहना है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद ही नाटो को खत्म कर देना चाहिए था। चीन की अमेरिका से खिलाफत छिपी नहीं हैं। पिछले कुछ सालों में चीन ने आर्थिक महाशक्ति के तौर पर अमेरिका को खुली चुनौती दी है। अमेरिका पर भी चीन के बढ़ते प्रभाव का असर देखा जा रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा, " युक्रेन संकट में एक गुनहगार और प्रमुख भड़काने वाला होने के नाते अमेरिका ने 1999 के बाद के दो दशकों तक अपनी अगुआई में नाटा का पांच चरणों में पूर्व की ओर विस्तार किया" नाटो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुए शीत युद्ध में बनाया गया सैन्य संगठन है जिसका मकसद सोवियत संघ के प्रभाव को यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में बढ़ने से रोकना था। झाओ ने कहा कि नाटो के सदस्यों की संख्या 16 से 30 करते हुए वे एक हजार किलोमीटर पूर्व की ओर रूस के नजदीक आ गए और रूस को पीछे धकेलने का प्रयास किया। सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही नाटो को खत्म करने के मांग उठ रही थी जबकि उस समय विघटन का शिकार रूस कुछ कहने की स्थिति नहीं था।
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यूक्रेन के 2 हेलिकाप्टर रूस में घुसे

Posted: 02 Apr 2022 07:53 AM PDT

यूक्रेन के 2 हेलिकाप्टर रूस में घुसे

रूस और यूक्रेनके बीच युद्ध को पूरा एक महीना हो चुका है। जंग में यूक्रेन के कई शहर तबाह हो चुके हैं। रूस को भी अच्छा खासा नुकसान हो रहा है। फिर भी दोनों में कोई भी हार मानने को तैयार नहीं हैं। यूक्रेनी सेना रूस के हमलों का मुंहतोड़ जवाब दे रही है। यूक्रेन मिलिट्री के दो हेलीकॉप्टर रूस के बेलगोरोड में घुस आए। यूक्रेनी हेलीकॉप्टर्स ने बेलगोरोड में एक फ्यूल डिपो पर एयर स्ट्राइक की। इसके बाद वहां आग लग गई, जिससे कई विस्फोट हुए। ऐसा पहली बार हुआ है कि यूक्रेन की सेना ने अब रूसी सीमा में घुसकर पलटवार किया है। बेलगोरोड के गवर्नर व्याचेस्लाव ग्लैडकोव ने मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर कहा कि हेलीकॉप्टरों ने कम ऊंचाई पर सीमा पार करने के बाद फ्यूल डिपो पर हमला किया। इससे डिपो में आग लग गई। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। लैडकोव ने कहा कि आग लगने से 2 श्रमिक झुलस हो गए। उन्हें नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जबकि शहर के पास के कुछ इलाकों को खाली कराया जा रहा है। रूसी तेल फर्म रोसनेफ्ट और इस फ्यूल डिपो के मालिक ने एक अलग बयान में कहा कि आग में कोई हताहत नहीं हुआ। उन्होंने आग लगने के कारणों के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। दरअसल, बेलगोरोड में रूसी सेना ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बंकर और ट्रैंच बनाए थे। यहां पर 1943 में खुर्स्क की एक प्रसिद्ध लड़ाई लड़ी गई थी। ये सभी हथियार और मिलिट्री बाइक और गाड़ियां उसी वक्त की हैं। अब इस जगह को एक बड़े वॉर मेमोरियल और ओपन म्यूजयिम मे तब्दील कर दिया गया है। इसी खुर्स्क क्षेत्र से इनदिनों भारतीय मूल के अभय सिंह को रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की राजनीतिक पार्टी से स्थानीय एमएलए बनाया गया है।
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इमरान को स्थानीय सरकार के चुनाव में सफलता

Posted: 02 Apr 2022 07:51 AM PDT

इमरान को स्थानीय सरकार के चुनाव में सफलता

 इस्लामाबाद। सियासी संकट में घिरे प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थानीय सरकार के चुनाव में 'जबरदस्त सफलता' मिली है। संसद में बहुमत खोने के बाद प्रधानमंत्री खान रविवार को अपने खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का सामना करेंगे। 'जियो न्यूज' के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा में स्थानीय निकाय चुनाव के दूसरे चरण में सत्तारूढ़ पीटीआई बढ़त बनाए हुए है। मतगणना अभी जारी है। प्रांत में 65 तहसील परिषदों के अध्यक्षों और महापौरों के पदों के लिए मतदान हुआ। नतीजे बताते हैं कि 64 तहसील परिषदों में से 48 की गिनती पूरी हो चुकी है। अपुष्ट परिणामों के अनुसार, पीटीआई 24 तहसील परिषदों में सफल रही और सात तहसील परिषदों में बढ़त बनाए हुए है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (जेयूआई-एफ) ने सात सीटों पर जीत हासिल की और चार अन्य तहसील परिषदों में बढ़त बनाए हुए है। सात तहसील परिषदों में निर्दलीय उम्मीदवार सफल हुए। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) दो तहसील परिषदों को हासिल करने में कामयाब रही और तीन अन्य में बढ़त बनाए हुए है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने एक सीट जीती और दूसरी सीट पर आगे है।
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श्रीलंका में आपातकाल

Posted: 02 Apr 2022 07:50 AM PDT

श्रीलंका में आपातकाल

भारत ने 40 हजार टन डीजल भेजा
नई दिल्ली। श्रीलंका में खाने पीने के साथ जरूरी चीजों की कमी हो जाने पर आगजनी, हिंसा, प्रदर्शन, सरकारी संपत्तियों में तोड़ फोड़ की गई। लंबे पावर कट, और ईंधन की कमी ने लोगों की दिक्कतें और बढ़ा दी। देश में बिगड़ते हालात देख राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने आपातकाल लागू कर दिया है। श्रीलंका में जारी आर्थिक संकट के बीच विदेशी मुद्रा की कमी के कारण ईंधन जैसी आवश्यक चीजों की कमी हो गई है। रसोई गैस की भी कमी हो गई है। सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल लोगों ने कहा कि सरकार के कुप्रबंधन के कारण विदेशी मुद्रा संकट और गंभीर हो गया है। पड़ोसी देश श्रीलंका इस समय अपने सबसे खराब आर्थिक संकट से गुजर रहा है। इस बीच, भारत की तरफ से 40,000 टन डीजल की खेप श्रीलंका के तटों तक पहुंच चुकी है। भारत ने डीजल की ये खेप क्रेडिट लाइन के तहत दी है। कोलंबो में 13-13 घंटे के पावर कट से जूझ रही जनता सड़कों पर उतर आई है और राष्ट्रपति के इस्तीफे की मांग कर रही है। लोगों के पास खाने-पीने की चीजों की भी भारी कमी हो गई हैं। ईंधन की कीमतें भी आसमान छू रही है।
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“भोजन भाव की वस्तु है, इसे जितनी श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करेंगे, वह उतना है सकारात्मक असर शरीर पर डालेगा” - दिनेश कुमार

Posted: 02 Apr 2022 07:27 AM PDT

पोषण पखवाड़ा में "पारंपरिक भोजन" थीम पर परिचर्चा का किया गया आयोजन

"भोजन भाव की वस्तु है, इसे जितनी श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करेंगे, वह उतना है सकारात्मक असर शरीर पर डालेगा" - दिनेश कुमार

पारंपरिक भोजन के प्रति आमजनों को जागरूक करने के उद्देश्य से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के फील्ड आउटरीच ब्यूरो, छपरा इकाई तथा आईसीडीएस, सोनपुर के सहयोग से 02 अप्रैल को सारण जिले के सोनपुर स्थित ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) में पोषण पखवाड़ा अंतर्गत "पारंपरिक भोजन" थीम पर परिचर्चा का आयोजन किया गया।
परिचर्चा में अति विशिष्ट अथिति वक्ता के रूप में शामिल प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, पटना के निदेशक दिनेश कुमार ने कहा कि भोजन भाव की वस्तु है। भोजन को ग्रहण करने से पूर्व इसे प्रणाम कर, पूरे श्रद्धा एवं सम्मान के साथ करना चाहिए। जिन्होंने भोजन बनाया है, उनके प्रति भी सम्मान प्रकट करना चाहिए। फिर आप देखेंगे की वही भोजन आपके शरीर पर किस प्रकार सकारात्मक असर डालता है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ भोजन उनके आसपास ही मौजूद है और वे ही चीजें सर्वश्रेष्ठ औषधि हैं। उन्होंने कहा कि अगर हम अमाशय और लीवर के मुकाबले जीभ को अधिक महत्व देंगे तो फिर पेट की समस्याएं तो होंगी ही। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि हमारा पेट जिन चीजों के लिए बना है, उनमें वैसे ही खाद्य पदार्थ डाले जाने चाहिए। ठीक वैसे ही जैसा कि हम डीजल वाहन में पेट्रोल या फिर पेट्रोल वाहन में डीजल नहीं डालते हैं। उन्होंने कहा कि भोजन केवल वह नहीं जो हमारी थाली में परोसा जाता है। बल्कि हवा, पानी और वातावरण भी एक प्रकार का भोजन ही है, जो आपके शरीर पर असर डालता है। लिहाजा, उसमें भी शुद्धता होनी चाहिए।
परिचर्चा की रूपरेखा पर विषय प्रवेश संबोधन करते हुए कार्यक्रम के आयोजक एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के पटना स्थित रीजनल आउटरीच ब्यूरो के क्षेत्रीय प्रचार अधिकारी सह कार्यक्रम प्रमुख पवन कुमार सिन्हा ने कहा है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में पूरे देश भर में राष्ट्रीय पोषण मिशन के अंतर्गत 21 मार्च से 4 अप्रैल, 2022 तक पोषण पखवाड़ा का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में मंत्रालय के छपरा स्थित फील्ड आउटरीच ब्यूरो तथा आईसीडीएस, सोनपुर के सहयोग से इस सर्गाभित परिचर्चा का आयोजन किया गया है। इस परिचर्चा का मुख्य उद्देश्य आमजनों को पारंपरिक भोजन के महत्व एवं फायदों के बारे जागरूक करना है। प्रशिक्षु छात्रओं एवं आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं के बीच परिचर्चा के आयोजन से बड़े पैमाने पर लोगों को पारंपरिक भोजन के प्रति जागरूक किया जा सकेगा।
सारण जिले के डीपीओ (आईसीडीएस) उपेंद्र ठाकुर ने परिचर्चा को संबोधित करते हुए कहा कि बदलते दौर में भोजन की गुणवत्ता में आ रही गिरावट और उससे होने वाली बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से ही पोषण पखवाड़ा जैसे उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन चीजों से हमारे शरीर का निर्माण होता है, उस अनुरूप हम भोजन नहीं करते हैं। हम फास्ट फूड अधिक खा रहे हैं, जिसका प्रतिकूल असर हमारे शरीर पर पड़ रहा है। उन्होंने छात्रों एवं आईसीडीएस से जुड़ी तमाम महिलाओं से आग्रह किया कि वे अपने घरों और आसपास के इलाकों में लोगों को पारंपरिक भोजन के प्रति जागरूक करें। उन्होंने आह्वान किया कि लोग अपनी दिनचर्या में पारंपरिक भोजन को शामिल करें।
परिचर्चा में अति विशिष्ट अतिथि वक्ता के तौर पर शामिल राजकीय रामेश्वरी भारतीय विज्ञान संस्थान, दरभंगा के सहायक प्राध्यापक डॉ. विजेंद्र कुमार ने कहा कि पारंपरिक भोजन में आयुर्वेद की बहुत भूमिका है। उन्होंने कहा कि मसाले हमें पौधों से प्राप्त होते हैं। शरीर में सभी मसाले एंजाइम को जागृत करते हैं और शरीर को संतुलित रूप देते हैं। उन्होंने कहा कि जितनी भी चिकनी चीजें हैं, वह पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं। लोगों को फाइबर युक्त भोजन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सहजन विटामिन सी का सबसे उत्तम स्रोत है। लोगों को मौसमी फलों एवं सब्जियों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। लोगों को कोल्ड ड्रिंक में पैसा देकर बीमारी नहीं खरीदना चाहिए।
परिचर्चा को संबोधित करते हुए सोनपुर की सीडीपीओ सबिना अहमद ने कहा कि स्वस्थ शरीर से ही स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण संभव है। उन्होंने युवाओं को आह्वान करते हुए कहा कि वह खुद भी और आसपास के लोगों को भी पोषक युक्त तत्वों के सेवन एवं पारंपरिक भोजन की ओर उन्मुख होने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि हम लोग परंपराओं से धीरे-धीरे विलग होते जा रहे हैं। हमें अपनी पुरानी विरासत की ओर पुनः लौटने की आवश्यकता है।
परिचर्चा को संबोधित करते हुए डायट, सोनपुर के प्राचार्य अभय कुमार ने कहा कि कई पीढ़ियों से चली आ रही भोजन की कला परंपरागत भोजन कहलाता है। परंपरागत भोजन ना केवल हमारे शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है बल्कि यह हमारे मानसिक विकास के लिए भी बेहद जरूरी है।
परिचर्चा को संबोधित करते हुए डायट की व्याख्याता डा. विजय श्री ने कहा कि लोगों को परंपरागत तरीके से तैयार भोजन ही करना चाहिए। भोजन करने से आधा घंटा पूर्व और भोजन करने के आधा घंटा बाद तक पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन पालथी मारकर ही करना सर्वश्रेष्ठ है।
परिचर्चा को संबोधित करते हुए सोनपुर के चिकित्सा पदाधिकारी डा. हरिशंकर चौधरी ने कहा कि हरी साग-सब्जियों के सेवन से हमारा शरीर स्वस्थ एवं दिमाग तेज होता है। पालक जहां आयरन का अच्छा स्रोत है, वहीं दाल प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। फास्ट फूड के सेवन से लोगों में कोलेस्ट्रॉल बेहद बढ़ गया है, जिससे कई प्रकार की बीमारियां लोगों को घर कर गई हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को फाइबर युक्त खाना खाना चाहिए, इससे पेट ठीक रहता है। फ्रिज में रखा हुआ खाना खाने से उसके पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं
परिचर्चा का संचालन करते हुए फील्ड आउटरीच ब्यूरो, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, छपरा के सहायक क्षेत्रीय प्रचार अधिकारी सर्वजीत सिंह ने कहा कि पारंपरिक भोजन जो कि हमारे खानपान की व्यवस्था में शुरू से ही शामिल है, हमें उसको सतत और सुदृढ़ बनाना पड़ेगा तभी हम पोषण की नीव को मजबूत कर पाएंगे। हमें अपने घरों में मोटे अनाज को थोड़ी जगह देनी पड़ेगी ताकि हमें पारंपरिक भोजन का स्वाद मिल सके और हम अपने नई पीढ़ी को भी पारंपरिक भोजन से अवगत करा पाएंगे। जो भी सरलता से हम अपने घरों में बना सकें जो सुपाच्य हो वह हमारे पारंपरिक भोजन का हिस्सा है। आज की भागदौड़ वाले समय में हम भूल जाते हैं की पोषण के लिए हमें क्या करना चाहिए अगर हम पारंपरिक भोजन को समय पर लेते हैं तो हमें कुपोषण से निजात मिल सकती है
कार्यक्रम का संचालन डायट के प्रथम वर्ष के छात्र अभिषेक कुमार ने किया। मौके पर डायट की व्यख्याता रिजवान सहित संस्थान के छात्र-छात्राएं, सभी शिक्षकगण, आईसीडीएस सोनपुर की पर्यवेक्षिकाएं, सेविकाएं तथा सहायिकाएं बड़ी संख्या में मौजूद थीं।
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भारतीय जन क्रांति दल ने मनाया अपना स्थापना दिवस

Posted: 02 Apr 2022 06:59 AM PDT

भारतीय जन क्रांति दल ने मनाया अपना स्थापना दिवस

आज पटना के केन्द्रीय कार्यालय में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव की अध्यक्षता में पार्टी की स्थापना दिवस का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ | कार्यक्रम में उपस्थित सभी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर एवं दीप प्रज्वलित कर की|
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय महासचिव डॉ राकेश दत्त मिश्र ने बतायाकि आज नव सृष्टिसंवत् एवं विक्रमी संवत्सर आरम्भ हुआ है। हमारे पास समय की अवधि की जो गणनायें हैं वह दिन, सप्ताह, माह व वर्ष में होती हैं। यदि सृष्टि की उत्पत्ति, मानवोत्पत्ति अथवा वेदोत्पत्ति का काल जानना हो तो वह वर्षों में बताया जाता हैै। वैदिक गणनाओं में वर्ष की अवधि सामान्यतः 360 दिन मानी जाती है। लगभग इतनी अवधि पूरी होने पर वर्ष वा संवत्सर बदलते हैं। आज सृष्टि संवत्सर 1,96,08,53,123 आरम्भ हुआ है वहीं विक्रमी संवत् 2079 का प्रथम दिवस है। अंग्रेजी वर्ष आरम्भ होने पर इसको मानने वाले लोग परस्पर शुभकामनाओं का आदान प्रदान करते हैं। उन्हीं के अनुकरण से हमारे भी अनेक बन्धु इसी प्रकार से एक दूसरे को शुभकामनायें एवं बधाई देने लगे हैं। इस नवसंवत्सर दिन का यही महत्व है कि इतने वर्ष पूर्व सृष्टि, वेद व मानव का आरम्भ यहां हुआ था तथा महान पराक्रमी आर्य वा हिन्दू राजा विक्रमादित्य शकों को युद्ध में पराजित कर राज्यारूढ़ हुए थे। महाराज विक्रमादित्य जी की राजधानी उज्जैन मानी जाती है। विक्रमादित्य एक आदर्श राजा थे। उन्हें हम कुछ कुछ राजा राम की तरह मान सकते हैं। उनकी स्मृति बनाये रखने के लिए तत्कालीन विद्वानों ने इस संवत्सर को आरम्भ किया था।

हम जिस संसार में रहते हैं वह व समस्त ब्रह्माण्ड ईश्वर से निर्मित व संचालित है। वेदों में ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति सहित मनुष्यों के कर्तव्य अकर्तव्यों का विस्तृत वा पूर्ण ज्ञान है। जब ब्रह्मा के मन में विचार आया एकोहं बहुस्याम: तब उन्हों ने सृष्टि का निर्माण किया और वो दिन भी चैत्र प्रतिपदा का ही था |अतः सृष्टि बनाने का कार्य ईश्वर ने किसी समय विशेष पर आरम्भ किया होगा और किसी विशेष समय पर इस सृष्टि का निर्माण सम्पन्न हुआ होगा। यह भी निश्चित है कि ब्रह्माण्ड वा हमारे सौर्य मण्डल के बन जाने वा इसमें जल, वायु, अग्नि व अन्य सभी आवश्यक पदार्थों की उपलब्धि होने तथा जिस स्थान विशेष (अनेक प्रमाणों से यह स्थान तिब्बत था) पर मानव सृष्टि अस्तित्व में आई, वह भी इस सृष्टि का कोई दिन विशेष रहा होगा। यदि उपलब्घ जानकारी के आधार पर कहें तो उस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन था व उसी का अनुमान होता है। मनुष्यों की उत्पत्ति के साथ ही ईश्वर को सृष्टि की आदि में उत्पन्न युवावस्था के स्त्री-पुरुषों को जीवन के सामान्य व विशेष व्यवहार करने के लिए भाषा व व्यवहार ज्ञान की भी उपलब्धि वा पूर्ति करनी थी अन्यथा उनका सामान्य जीवनप्रवाह सम्भव न होता। अतः ईश्वर ने इसी दिन, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को, चार ऋषियों, अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को, वेदों का ज्ञान देने के साथ इतर मनुष्यों को परस्पर व्यवहार करने के लिए भाषा का ज्ञान भी दिया था, यह अनुमान होता है।
पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सुबोध कुमार सिंह ने अपने संवोधन में कहाकि भारतीय नवसम्वत् दिवस की यह विशेषता है कि यह ऐसी ऋतु में आरम्भ होता है कि जब न अधिक शीत होता है, न उष्णता और न ही वर्षा ऋतु। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन वातावरण बहुत सुहावना व मनोरम होता है। खाद्यान्न गेहूं की फसल लगभग तैयार हो जाती है। सभी हरी भरी वृक्ष व वनस्पतियां आंखों को आह्लादित करती हैं। सर्वत्र नये नये पुष्प अपनी सुन्दरता से एक नये काव्य की रचना करते प्रतीत होते हैं। यह समस्त वातावरण व प्राकृतिक सौन्दर्य अपने आप में एक उत्सवसा ही प्रतीत होता है। यही ऋतु मानवोत्पत्ति के लिए उपयुक्त प्रतीत होती है। यदि अन्य ऋतुओं में मानवोत्पत्ति होती तो हमारे आदि स्त्री-पुरुषों को असुविधा व कठिनाई हो सकती थी। ईश्वर के सभी काम निर्दोष होते हैं। अतः यह उसी का प्रमाण है कि मानव सृष्टि उत्पत्ति ईश्वर ने एक सुन्दर व सुरम्य स्थान तिब्बत जहां पर्वत व वन हैं तथा जल सुलभ है, की थी। हमें यह अनुभव होता है कि इस दिन हमें अपने आदि पूर्वजों को स्मरण कर स्वयं को उन जैसा ज्ञानी व स्वस्थ व्यक्ति बनाने का संकल्प वा प्रयास करना चाहिये। यदि विश्व के सभी लोग परस्पर मिल कर उस आदिकालीन स्थिति पर विचार करें तो अविद्या व अज्ञान पर आधारित तथा मनुष्यों के दुःख के प्रमुख कारण मत-मतान्तरों से मनुष्यों को अवकाश मिल सकता है और संसार में एक ज्ञान व विवेक से पूर्ण वैदिक मत स्थापित हो सकता है जिससे संसार में सुख, शान्ति व कल्याण का वातावरण बन सकता है।

पार्टी की उपस्थित महिला कार्यकर्ता गुडिया देवी ने कहाकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नवसंवत्सर के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम राजा रामचन्द्र जी के अयोध्या आकर सिंहासनारुढ़ होने की मान्यता भी प्रचलित है। विद्वान मानते हैं कि इसी दिन महाभारत युद्ध के समाप्त होने पर राजा युधिष्ठिर जी का राज्याभिषेक हुआ था। आदर्श महापुरुष व वैदिक संस्कृति के अनुरागी रामचन्द्र जी का जन्म दिवस रामनवमी का महापर्व पर्व भी इस दिवस के ठीक नवें दिन नवमी को होता है। आर्यसमाज की स्थापना भी चैत्र शुक्ल पंचमी को हुई थी। यह भी भारत के इतिहास में एक युगान्तरकारी कार्य था जिससे समस्त विश्व के मानवों को ईश्वर व जीवात्मा से सम्बन्धित ज्ञान व ईश्वरोपासना की सत्य व प्रमाणिक विधि ऋषि दयानन्द सरस्वती जी के द्वारा प्राप्त हुई थी। अतः न केवल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन अपितु पूरा पक्ष ही महत्वपूर्ण है। इस पर्व को देश व विश्व में मनाया जाना चाहिये। यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी पर्व को मनाते समय जहां आनन्द व उल्लास होना चाहिये वहीं ईश्वर-चिन्तन और अग्निहोत्र यज्ञ का भी अनुष्ठान किया जाना चाहिये क्योंकि यह दो कार्य संसार में श्रेष्ठतम् व उत्तम कर्म हैं। इसके अनन्तर अन्य सभी वेदविहित कार्य किये जाने चाहिये। ऐसा करने से ही परिवार, समाज व देश का वातावरण आदर्श व अनुकरणीय बन सकता है। यह भी आवश्यक है कि किसी भी पर्व पर किसी भी व्यक्ति को सामिष भोजन व मद्यपान किंचित भी नहीं करना चाहिये। वेदानुसार यह दोनो कार्य अत्यन्त हेय एवं घृणित हैं, मनुष्यों को इनसे बचना चाहिये और देश व राज्य की सरकारों को इनको दण्डनीय बनाने के साथ इन्हें समाप्त करने की योजना भी बनानी चाहिये।



राष्ट्रीय प्रवक्ता लक्ष्मण पाण्डेय ने बतायाकि हम संसार में यह भी देखते हैं कि संसार में जितने भी मत, सम्प्रदाय, वैदिक संस्कृति से इतर संस्कृतियां व सभ्यतायें हैं, वह सभी विगत 3-4 हजार वर्षों में ही अस्तित्व में आईं हैं जबकि सत्य वैदिक धर्म व संस्कृति एवं वैदिक सभ्यता विगत 1.96 अरब वर्षों से संसार में प्रचलित है। वैदिक धर्म ही सभी मनुष्यों का यथार्थ धर्म है। यह बात ज्ञान व विवेक पर आधारित, पूर्ण वैज्ञानिक होने सहित युक्ति एवं तर्क से सिद्ध है। वेद के ईश्वरीय ज्ञान होने के कारण वेदेतर मतों की वैदिक सिद्धान्तों की पोषक मान्यतायें ही स्वीकार्य होती है, विपरीत मान्यतायें नहीं।

जितेन्द्र सिन्हा ने कहाकि आज के दिन चाहे वो राजनीत हो या पत्रकारिता सभी जगह मूल्यों का ह्रास हुआ है जरूरत है मूल्यों के पुनरवलोकन कर उन्हें स्थापित करने की|

कार्यक्रम में डॉ राकेश दत्त मिश्र, दिलीप कुमार, जितेन्द्र सिन्हा, गुडिया देवी, राज कुमार पाठक,लक्ष्मण पाण्डेय, सुबोध सिंह, अजय उप्पाध्याय, नीरज पाठक पियूष रंजन,शेखर गुप्ता, नविन राम, धंनजय पासवान, सुबोध सिंह राठौड़ आदि ने अपने विचार रखें |
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3 अप्रैल 2022, रविवार का दैनिक पंचांग एवं राशिफल - सभी १२ राशियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन ? क्या है आप की राशी में विशेष ? जाने प्रशिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. प्रेम सागर पाण्डेय से |

Posted: 02 Apr 2022 06:33 AM PDT

3 अप्रैल 2022, रविवार का दैनिक पंचांग एवं राशिफल - सभी १२ राशियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन ? क्या है आप की राशी में विशेष ? जाने प्रशिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. प्रेम सागर पाण्डेय से |

3 अप्रैल 2022, रविवार का दैनिक पंचांग

🔅 तिथि द्वितीया 12:00 PM

🔅 नक्षत्र अश्विनी 12:10 PM

🔅 करण :

                कौलव 12:40 PM

                तैतिल 12:40 PM

🔅 पक्ष शुक्ल

🔅 योग वैधृति 07:51 AM

🔅 वार रविवार

☀ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ

🔅 सूर्योदय 05:49 AM

🔅 चन्द्रोदय 06:52 AM

🔅 चन्द्र राशि मेष

🔅 सूर्यास्त 06:11 PM

🔅 चन्द्रास्त 08:06 PM

🔅 ऋतु वसंत
☀ हिन्दू मास एवं वर्ष

🔅 शक सम्वत 1944 शुभकृत

🔅 कलि सम्वत 5123

🔅 दिन काल 12:27 PM

🔅 विक्रम सम्वत 2079

🔅 मास अमांत चैत्र

🔅 मास पूर्णिमांत चैत्र
☀ शुभ और अशुभ समय

☀ शुभ समय

🔅 अभिजित 11:28:18 - 12:18:07

☀ अशुभ समय

🔅 दुष्टमुहूर्त 04:27 PM - 05:17 PM

🔅 कंटक 09:48 AM - 10:38 AM

🔅 यमघण्ट 01:07 PM - 01:57 PM

🔅 राहु काल 04:33 PM - 06:06 PM

🔅 कुलिक 04:27 PM - 05:17 PM

🔅 कालवेला या अर्द्धयाम 11:28 AM - 12:18 PM

🔅 यमगण्ड 11:53 AM - 01:26 PM

🔅 गुलिक काल 03:00 PM - 04:33 PM

☀ दिशा शूल

🔅 दिशा शूल पश्चिम

☀ चन्द्रबल और ताराबल

☀ ताराबल

🔅 अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, रेवती

☀ चन्द्रबल

🔅 मेष, मिथुन, कर्क, तुला, वृश्चिक, कुम्भ

🌹विशेष ~ ब्रह्मचारिणी देवी, ज्येष्ठागौरी दर्शन पूजन, सिन्धारा द्वितीया, मस्त्यावतार (अपराहन्ने)। 🌹

पं.प्रेम सागर पाण्डेय् नक्षत्र ज्योतिष वास्तु अनुसंधान केन्द्र नि:शुल्क परामर्श - रविवार

3 अप्रैल 2022, रविवार का दैनिक राशिफल

मेष (Aries): खर्च में संयम रखने की सलाह आपको देते हैं, क्योंकि आज धन खर्च का विशेष योग है। धन संबंधी एवं लेन-देन संबंधी सभी कार्यों में सावधानी रखने की जरूरत है। किसी के साथ विवाद न हो, इसका ध्यान रखें। मित्रों एवं परिवारजनों के साथ मनमुटाव होने की और आरोग्य बिगड़ने की आशंका है। आज का दिन मध्यम फलदायी है।

शुभ रंग = गुलाबी

शुभ अंक : 8

वृषभ (Tauras) : आज का दिन आपकी रचनात्मक और कलात्मक शक्तियों में वृद्धि होगी। मानसिक रूप से आज आप वैचारिक स्थिरता की अनुभूति करोगे, जिसके परिणामस्वरुप आप लगन के साथ काम कर पाएँगे। अपना आर्थिक उत्तदायित्व अच्छी तरह से निभा पाएँगे।आर्थिक योजना बना सकेगें। आभूषण, सौंदर्य प्रसाधन और मनोरंजन के पीछे खर्च होगा। परिवार के सदस्यों के साथ आनंदपूर्वक समय बीतेगा। आप के आत्मविश्वास में वृद्धि होगी।

शुभ रंग = आसमानी

शुभ अंक : 7

मिथुन (Gemini): आज आपका दिन शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता के साथ व्यग्रतापूर्ण तरीके से बीतेगा। शारीरिक कष्ट, विशेषकर आंखों में पीड़ा होने की संभावना है। परिवारजनों और स्नेहियों के साथ कोई घटना घटने की संभावना है। आज कोई भी कार्य बिना विचारे नहीं करने की सलाह देते है। आपकी बात-चीत या व्यवहार से किसी को कोई भ्रम न हो इसका ध्यान रखें। दुर्घटना से संभलना अनिवार्य है। आय की अपेक्षा खर्च अधिक होगा। मानसिक चिंता के कारण मन व्यग्र रहेगा। अनुचित कार्यों में शक्ति का व्यय होगा। आध्यात्मिकता और ईश्वरीय शक्ति सहायक सिद्ध होगी।

शुभ रंग = हरा

शुभ अंक : 3

कर्क (Cancer) : आज का दिन आपके लिए बहुत लाभकारी है। आपकी आय में वृद्धि होगी। किसी अन्य तरीके से भी आर्थिक लाभ होगा। मित्रों के साथ भेंट होगी। स्त्री मित्रों से विशेष लाभ मिलेगा। व्यापार में लाभ होगा। संतान और जीवनसाथी से सुख मिलेगा। विवाह के योग हैं। संतान से मुलाकात होगी। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। चिंता से मुक्ति का अनुभव करेंगे। मित्रों के साथ किसी प्राकृतिक स्थान पर जाने की योजना बन सकती है। आज का दिन भोजन सुख के लिए अच्छा है।

शुभ रंग = गुलाबी

शुभ अंक : 8

सिंह (Leo) : आप के व्यवसाय हेतु आज का दिन बहुत अच्छा एवं श्रेष्ठ है। आज हर काम सफलतापूर्वक संपन्न होगा। उच्च पदाधिकारियों की आप पर कृपादृष्टि रहेगी। आज आपका प्रभुत्व चरम सीमा पर रहेगा। पिता की ओर से लाभ के संकेत है। सरकारी कार्यों में लाभ मिलेगा। आरोग्य अच्छा रहेगा। गृहस्थजीवन मधुरतापूर्ण होगा। जमीन, मकान एवं संपत्ति के सौदे सफल रहेंगे।

शुभ रंग = लाल

शुभ अंक : 5

कन्या (Virgo) : आज आपका दिन अच्छा रहेगा। सगे-संबंधी के साथ प्रवास का आयोजन हो सकता है। स्त्री मित्रों से लाभ होना संभव है। धार्मिक कार्य तथा धार्मिक यात्रा में व्यस्त रहेंगे। विदेश में रहनेवाले स्नेहिजनों के समाचार से आनंद होगा। भाई-बंधु से लाभ होने की संभावना है। आज का दिन आर्थिक लाभ का दिन है।

शुभ रंग = हरा

शुभ अंक : 3

तुला (Libra) : आज आपको नए कार्य की शुरुआत करने की सलाह देते है। भाषा और व्यवहार पर संयम रखना आपके हित में होगा। द्वेष से दूर रहिए और हितशत्रुओं से सावधान रहें । तबीयत का ध्यान रखें। रहस्यमय बातें और गूढ़विद्या के प्रति आप आकर्षित होंगे। आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करने के लिए अच्छा समय है। संभवतः पानी और स्त्री से दूर रहें। गहन चिंतन के द्वारा मन की शांति प्राप्त कर पाएंगे।

शुभ रंग = आसमानी

शुभ अंक : 7

वृश्चिक (Scorpio): आज आपका दिन कुछ भिन्न तरीके से बीतेगा । स्वयं के लिए आप समय निकाल पाएंगे। मित्रों के साथ घूमना-फिरना, मौज-मस्ती, मनोरंजन, छोटे पर्यटन तथा भोजन और वस्त्र-परिधान इत्यादि से आप बहुत आनंदित रहेंगे। मान-सम्मान में वृद्धि होगी और सम्मानित किये जाने की संभावना है। वाहन सुख प्राप्त होगा। प्रियजन से मुलाकात से मन प्रसन्न रहेगा एवं वैवाहिक सुख का पूर्ण आनंद प्राप्त होगा।

शुभ रंग = गुलाबी

शुभ अंक : 8

धनु (Sagittarius): आज आप के लिए आर्थिक लाभ का दिन है। घर में शांति और आनंद का वातावरण रहेगा, जो कि आपके मन को प्रसन्न रखेगा। नौकरी करनेवाले लोगों को नौकरी से लाभ और सहकर्मियों से सहयोग मिलेगा। कार्यसिद्धि तथा यश मिलेगा। शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपके नीचे कार्य करनेवालों का सहयोग मिलेगा। मातृपक्ष से अच्छे समाचार मिलेंगे। प्रतिस्पर्धिओं पर विजय मिलेगी। अपनी वाणी पर संयम रखिएगा। स्त्री मित्रों से भेंट होगी।

शुभ रंग = पींक

शुभ अंक : 1

मकर (Capricorn) : आज आपका मन चिंताग्रस्त और दुविधायुक्त रहेगा। ऐसी मनोदशा में आप किसी भी कार्य में दृढ़ निश्चय नहीं रह पाएंगे। आज के दिन कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य न करें क्योंकि आज भाग्य साथ नहीं देगा। संतान के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। घर में बड़ों का स्वास्थ्य थोड़ा बिगड़ सकता है। कार्यालय में उच्च पदाधिकारियों की अप्रसन्नता का सामना करना पडेगा। निरर्थक व्यय बढ़ेगा। संतानों के साथ मतभेद होंगे।

शुभ रंग = केशरी

शुभ अंक : 8

कुंभ (Aquarius) : आज आप के स्वभाव में प्रेम छलकेगा। इस कारण मानसिक रूप से व्यग्रता का अनुभव होगा। धनोपार्जन सम्बंधित योजना बन सकती है। स्त्रियों के आभूषण, वस्त्र, सौंदर्य-प्रसाधन के पीछे धन खर्च होगा। माता से लाभ होने की संभावना है। जमीन, मकान एवं वाहन आदि के सौदों में ध्यान रखना अतिआवश्यक है। विद्योपार्जन करनेवालों को विद्याप्राप्ति में सफलता मिलेगी। स्वभाव में हठीलापन टालिएगा।

शुभ रंग = क्रीम

शुभ अंक : 2

मीन (Pisces) : आज आपका दिन शुभ फलदायी होगा, आपकी सृजनात्मक और कलात्मक शक्तियों में वृद्घि होगी। वैचारिक स्थिरता के कारण आपके कार्य आज अच्छी तरह से संपन्न कर पाएंगे। महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए आज का दिन शुभ है। जीवनसाथी के साथ समय अच्छी तरह से बितेगा। मित्रों के साथ छोटे पर्यटन का सफल आयोजन होगा। भाई-बंधुओं से लाभ होगा। कार्य में सफलता मिलेगी। मान-सम्मान मिलेगा, प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त कर सकेंगे।

शुभ रंग = पींक

शुभ अंक : 1 
प्रेम सागर पाण्डेय् ,नक्षत्र ज्योतिष वास्तु अनुसंधान केन्द्र ,नि:शुल्क परामर्श - रविवार , दूरभाष 9122608219 / 9835654844
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चाहतें तन्हाइयों की जब बढ़ने लगे

Posted: 02 Apr 2022 06:25 AM PDT

चाहतें तन्हाइयों की जब बढ़ने लगे,

रिश्तों के दरम्यां भी दरारें पड़ने लगें।
बस स्वार्थ की ही बात चारों ओर हो,
तब घरों को तोड़कर मकां बनने लगे।

होने लगी दीवार अब आंगन में खड़ी,
भाई से भाई, मां बाप जुदा होने लगे।
मकान जब से बनाया सपनों का अपने,
फूलों की बगिया में नागफनी बढने लगे।

सभी सुख साधन मगर, भोगने वाला नही,
मिल बांट खाना पीना, ख्वाब से लगने लगे।
दादी दादा राह तकते, द्वार पर आये कोई,
तकते तकते राह, मां बाप भी थकने लगे।

अ कीर्ति वर्द्धन
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सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाॅ. विन्देश्वर पाठक का 80वाँ जन्मदिन हर्षोंउल्लास के साथ मनाए गए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाॅ. विन्देश्वर पाठक के जन्मदिन पर भेजी शुभकामना संदेश

Posted: 02 Apr 2022 06:16 AM PDT

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाॅ. विन्देश्वर पाठक का 80वाँ जन्मदिन हर्षोंउल्लास के साथ मनाए गए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाॅ. विन्देश्वर पाठक के जन्मदिन पर भेजी शुभकामना संदेश



सुलभ स्वच्छता, समाज सुधार एवं मानवाधिकार आंदोलन के संस्थापक पद्मभूषण डाॅ. विन्देश्वर पाठक का 80वाँ जन्मदिन सुलभ मित्र संसार द्वारा नई दिल्ली के महावीर इन्क्लेव स्थित सुलभ ग्राम में बड़े ही धूमधाम और हर्षोंउल्लास के साथ मनाए गए। डाॅक्टर पाठक के जन्मदिन के पावन अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता आपके द्वार अभियान के संस्थापक, सुलभ इंटरनेशनल के मानद् सलाहकार तथा पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने ''जय श्री सीताराम जी'' के अंगवस्त्रम् सप्रेम भेंटकर स्वागत अभिनंदन कर जन्मदिन की बधाई दी।


डाॅक्टर पाठक के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में श्री मिश्र द्वारा भारत के चर्चित साहित्यकार व कवि एवं पूर्व विधान पार्षद श्री बाबूलाल मधुकर द्वारा लिखित हिंदी उपन्यास फातिमा दीदी तथा मगही मेघदूत पुस्तक सप्रेम भेंटकर जन्मदिन को यादगार बनाए गए। वहीं सुलभ इंटरनेशनल के मानद् वरीय परामर्शी तथा पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अजीत कुमार शुक्ला ने सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक माननीय डाॅ. विन्देश्वर पाठक के जन्मदिन पर पुष्पगुच्छ सप्रेम भेंटकर जन्मदिन की बधाई दी। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाॅ. विन्देश्वर पाठक के जन्मदिन पर हार्दिक श ुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए मंगलकामना संदेश भेजा गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के बधाई संदेश में डाॅ. विन्देश्वर पाठक के जीवन यात्रा को अनेक प्रेरक प्रसंगों और संघर्षों की गाथा बताया है। श्री मोदी ने कहा कि शिक्षा, समानता, पर्यावरण और स्वच्छता जैसे सामाजिक सरोकार के विषयों के प्रति आपकी निष्ठा और सामान्य जन के जीवन को बेहतर बनाने की आपकी प्रतिबद्धता सराहनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने कहा कि आपके सहज व्यक्तित्व और देश व समाज की प्रगति के लिए आपके विचारों ने मुझे सदैव प्रभावित किया है। स्वच्छ भारत जैसे जन भागीदारी से ऊर्जित अभियान की सफलता में अपके संकल्पिक प्रयासों की भूमिका बहुत अहम् रही है।
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गोवा में सम्मानित हुए मरहौरा के होम्योपैथिक के चिकित्सक,डॉ मुकेश कुमार

Posted: 02 Apr 2022 05:26 AM PDT

गोवा में सम्मानित हुए मरहौरा के होम्योपैथिक के चिकित्सक,डॉ मुकेश कुमार

सारण संवाददाता का रिपोर्टगोवा में वेलसन होम्योपैथिक कंपनी द्वारा चौथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया था जिसमें होम्योपैथ के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ मुकेश कुमार को अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा आइकन अवार्ड से सम्मानित किया गया।असाध्य,पुराने और बार-बार होने वाले जटिल रोगो पर व्याख्यान हेतु वेलसन होम्योपैथी कंपनी द्वारा डॉ मुकेश कुमार को गोवा में आमंत्रित किया गया।जहां उन्होंने असाध्य,पुराने और बार-बार होने वाली जटिल बीमारियों पर अपनी बात रखी।उन्होंने कई ऐसे रोग के बारे में बताएं जिससे वे अपनी चिकित्सा पद्धति से ठीक कर चुके हैं। बता दें कि कोरोना महामारी में डॉक्टर मुकेश कुमार ने पुलिसकर्मी,बैंक कर्मी समेत सरकारी कर्मी एवं आम जनों के बीच बड़ी मात्रा में अरसेनिक 30दवा का वितरण किया था लोगों के बीच लगातार सक्रिय रहकर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के तरीकों का प्रचार किया था मुश्किल समय में डॉक्टर मुकेश ने सेवा भावना से चिकित्सक का कर्तव्य निभाया था करोना काल में जहां सभी सरकारी एवं गैर सरकारी अस्पताल तथा क्लीनिक की बंदी में भी डॉक्टर मुकेश कुमार ने निर्भीक होकर कोरोना वायरस से लड़ने में लोगों की मदद में आगे रहे थे।
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संवत 2079 दे आपको..

Posted: 02 Apr 2022 03:13 AM PDT

संवत 2079 दे आपको..

विधा : कविता

करे न कोई गम अब
जाते हुए 2078 संवत का। 
जो बीता सो बीता
अब गुजर गया साल। 
सिखा गया जाते जाते
लोगों के दिलमें प्रेमभाव। 
नहीं आया विपत्ति में
धनदौलत अबकी बार।
भूला कर अपने सारे गम
करे नई सोच के साथ शुरूआत।। 

नया साल दे आपको,
मन माफिक परिणाम।
सभी ख्वाब पूरी हो,
करते प्रार्थना ईश्वर से । 
सभी को रिद्धि दे, 
सिद्धि दे,
वंश में वृद्धि दे।
ह्रदय में ज्ञान दे,
चित्त में ध्यान दे।
अभय वरदान दे,
दुःखो को दूर कर।
सुख भर पूर दे, 
आशा को संपूर्ण कर।
सज्जन जो हित दे, 
कुटुंब में प्रीत दे ।
जग में जीत दे, 
माया दे, साया दे ।
और निरोगी काया दे,
मान-सम्मान दे।
सुख समृद्धि और ज्ञान दे।
शान्ति दे, शक्ति दे,
और भक्ति भरपूर दें...।
ऐसी में देता हूँ,
शुभ कामनाएं दिलसे।
रहे अमन और शांति
अपने इस मुल्क में।
हिल मिल कर रहे
हमसब अपने भारत में।। 


 आप सभी को अग्रिम विक्रम संवत 2078 को भूलकर  नव संवत 2079 की और गुड़ी पड़वा की मंगल शुभकामनाएं, आप सभी को दिल से देता हूँ। जो आपको हर खुशी के साथ शक्ति शांति समृध्दी दे।। 

जय जिनेन्द्र 
संजय जैन "बीना" मुम्बई
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अपनी हथेलियों पर सरसों उगा रहा था मैं नामक गजल पर जमकर बरसी तालियां

Posted: 02 Apr 2022 03:10 AM PDT

अपनी हथेलियों पर सरसों उगा रहा था मैं नामक गजल पर जमकर बरसी तालियां

गायन,वादन कला के सिद्धहस्त प्रतिमान अनिल चंचल के धरणीधर रोड स्थित आवास पर गंगा-जमुनी तहजीब के तहत एक कविगोष्ठी सह मुशायरा का भव्य आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता मशहूर शायर शब्बीर हसन शब्बीर तथा संचालन प्रसिद्ध उद्घोषक आफताब राणा ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में औरंगाबाद बार एसोसिएशन के सम्मानित अध्यक्ष रसिक बिहारी सिंह ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सर्वप्रथम आयोजक अनिल चंचल ने आगत कवियों शायरों को पाटल पुष्प देकर स्वागत किया, तदुपरांत काव्य गोष्ठी की विधिवत शुरुआत की गई।
युवा कवि नागेंद्र दुबे ने झूठ के हो रहे चौमुखी विकास पर व्यंग्य करते हुए कहा- "झूठ का पर्याय हैं वे खेलते हैं खेल, याद रखना तोड़ते हैं झूठ से वे मेल। झूठ खाते झूठ पीते बोलते हैं झूठ,स्याह खद्दर ओढ़कर ही बेचते हैं झूठ।" भागदौड़ की दुनिया में सुकून के दो पल गुजारने की नसीहत देते हुए सैफुद्दीन खान सैफ ने कहा कि- "उदास राह में दिल बेकरार है क्यूं, जरा करीब तो आओ मंजिल मिलेगी तुम्हें।" गुलफाम सिद्दीकी की ये मार्मिक पंक्तियां -"इसी चमन में कबूतर हैं नीलकंठ भी हैं, खुदा करे न कभी इस चमन में आग लगे" पर दर्शक दीर्घा में उपस्थित साहित्य सेवियों द्वारा बेतरतीब तालियां बरसायी गईं। धनंजय जयपुरी की श्रृंगार रस से ओतप्रोत कविता- "तुम आन बसी हमारे मन में दिन रैन न चैन मिले मुझको" पर श्रोता-दर्शक भाव विभोर हो गए। विनय मामूली बुद्धि ने अपनी रचना पेश करते हुए कहा कि- " मैं शुद्ध अक्षरों की अशुद्धि हूं, जी हां मैं ही विनय मामूली बुद्धि हूं। इनकी हास्य व्यंग्य से ओतप्रोत रचना को सुनकर दर्शक लोटपोट हुए बिना नहीं रह सके। पेशे से दंत चिकित्सक परंतु शेरो शायरी पर भी अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले डा यूसूफ ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हुए कहा कि-"मुद्दत हुई इस पर ठहरा हुआ हूं मैं, भूले से कभी तू भी मेरा नाम लिया कर। अपनी जात से वाबस्ता कर मुझे, होकर खफा मुझसे ना मेरी जान लिया कर।" भारत स्तर के विभिन्न कवि सम्मेलन व मुशायरे में अपनी नगमानिगारी की दमदार उपस्थिति कराने वाले मशहूर शायर इकबाल अख्तर दिल ने अपनी ग़ज़ल पेश करते हुए कहा कि-" कुछ ऐसे ख्वाब का पैकर बना रहा था मैं, इस हथेली पर सरसों उगा रहा था मैं। "संचालन के क्रम में आफताब राणा ने कहा कि- "जब दुआ के हाथ पत्थर हो गए, तो हर शजर बे समर हो गए।"
ज्योति रंजन ने बड़े ही सधे अंदाज में "आने से उसके आए बहार जाने से उसके जाए बहार बड़ी मस्तानी है" नामक गाने की प्रस्तुति से उपस्थित जनसमूह का मन मोह लिया।
धन्यवाद ज्ञापन के क्रम में अनिल चंचल ने एक नगमा- "बड़ी दूर से आए हैं प्यार का तोहफा लाए हैं" गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।इस अवसर पर कलीम राहत, परवेज,अत्ताउल्लाह इत्यादि ने भी अपनी अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर उपस्थित जनसमूह का मनोरंजन किया।
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नववर्ष

Posted: 02 Apr 2022 03:06 AM PDT

नववर्ष

हर हर महादेव गूंजे सब रामनाम जय कार करे। 
श्रद्धा और विश्वास भरकर हर हिंदू हूंकार भरे।

वर्ष नया हो हर्ष नया हो घटा प्रेम की छाई हो। 
जय श्री राम के नारों से गूंज रही अमराई हो।

आस्था विश्वास हृदय में भावो की बहती धारा। 
चक्र गदा त्रिशूल हाथों में रक्षक हैं राम हमारा।

धर्म ध्वजा के राजदुलारे घट घट वासी राम हमारे। 
मर्यादा पुरुषोत्तम प्यारे सकल चराचर के रखवारे।

घर घर भगवा लहराए जग केसरिया बाना दमके। 
उमंग भरी हो तरुणाई खुशियों भरा भाल चमके।

रामकृष्ण की पुण्यधरा अविरल बहती गंगाधारा।
अटल हिमालय हुंकार भरे बसे शिव भोला प्यारा। 

सनातन नववर्ष हमारा मेरे हिंद की पहचान है। 
वंदन अभिनंदन हमारा मधुर वाणी लय तान है।

रमाकांत सोनी सुदर्शन 
नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान
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ऊंचे आसन सजा दरबार

Posted: 02 Apr 2022 08:21 AM PDT

ऊंचे आसन सजा दरबार

सज गया ऊंचे आसन, माता सुंदर दरबार तेरा। 
शब्द मोती चुनकर लाया, करना बेड़ा पार मेरा। 
विंध्यवासिनी कमल नयनी, पद्मासना महागौरी। 
कात्यायनी कुष्मांडा, सिंह सवार माता गौरी। 
कालरात्रि जय महाकाली, खड्ग खप्पर वाली। 
रक्तबीज को भस्म किया, बनकर काली कंकाली। 
चंड मुंड महिषासुर मारे, शुंभ निशुंभ खत्म किये। 
भक्तों पे करो कृपा मां, भाव सुमन हाथ लिये। 
जय पराक्रम यशदात्री, सुख समृद्धि भंडार भरो। 
ज्योतिर्मय आलोक भरो, भक्तों पे उपकार करो। 
साधक भाव भक्ति से, भजन तिहारे गाता है। 
मधुर भाव लेकर लड़िया, शब्द सुमन चढ़ाता है।
शक्ति स्वरूपा रूप अनूपा, जग वंदन जय जननी। 
दुखहर्ता मां जगदंबा, सुख वैभव मंगल करणी।
रमाकांत सोनी नवलगढ़
जिला झुंझुनू राजस्थान
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कालगणना विज्ञान बनाम अंधविश्वास

Posted: 02 Apr 2022 01:29 AM PDT

कालगणना विज्ञान बनाम अंधविश्वास


संकलन अश्विनी कुमार तिवारी
चान्द्र-नववर्ष
नव-संवत्सर,
वर्ष प्रतिपदा,
वासंतिक नवरात्र आरम्भ, घटस्थापन,
युगादि,
गुड्डी पड़वा,
चैती-चांद,
गणगौर,
कश्मीरी नवरेह,
चैती बसोवा, पारसी नवरौज, तिब्बती लोसर,
मणिपुरी चैत्रौबा,
कल्पारम्भ,
जीव-सृष्टि आरम्भ संवत् ,
कलियुगाब्द ,
सप्तर्षि संवत् आरम्भ, विक्रमी संवत् आरम्भ, भारतीय राष्ट्रीय शकान्त शालिवाहन संवत् ,
महर्षि गौतम जयंती,


सौर नववर्ष-


महाविषुव संक्रांति (ओडीशा),
मेष संक्रांति (मध्य भारत), विषु (केरल),
वैशाखी (पंजाब),
रंगाली या बोहाग बिहू (असम),
पहला बोहाग (बंगाल),
पुत्ताण्डु (तमिलनाडु), जुड़ि-शीतल (मिथिला),
राळी पूजा (हिमाचल), ब्रह्मदेश (बर्मा-म्यामार), कम्बुजदेश (कम्बोडिया), लवदेश (लाओस),
मलयदेश (मलेशिया), हिन्देशिया (इंडोनेशिया), श्यामदेश (थाईलैंड), सिंहपुर (सिंगापुर), स्वर्णलंका या सिंहल देश(श्रीलंका), वियतनाम, मारीशस देशों का नवनर्ष ।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् विक्रमी,
नवसंवत्सर का आरम्भ ।
✍🏻आचार्य अत्रेय


कालगणना विज्ञान बनाम अंधविश्वास
लेखक - रवि शंकर
कार्यकारी संपादक, भारतीय धरोहर


एक जनवरी, ईस्वी संवत् बीत चुका है और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत् का प्रारंभ हो रहा है। जहाँ तक उत्सव मनाने की बात है, उत्सवधर्मी भारतीय दोनों ही अवसरों पर मौज-मस्ती कर लेते हैं। परंतु जब इतिहास और व्यवहार की बात आती है तो भारत की सरकार और बुद्धिजीवी दोनों ही केवल और केवल ईस्वी संवत् का ही प्रयोग करते हैं। इन्होंने पूरे देश पर एक मिथ्या, अवैज्ञानिक और तर्करहित कालगणना केवल इसलिए थोप रखी है कि यूरोपीय और अमेरिका, आस्ट्रेलिया सरीखे नवयूरोप के लोग इसे मानते हैं। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात् भारतीय नववर्ष के स्वागत के अवसर पर कालगणना पर विचार करना उचित होगा।
विज्ञान की बात करें तो इसके लिए भी एक सुनिश्चित सीमा बांध दी गई है। आज विज्ञान का अर्थ होता है यूरोपीय तथा नवयूरोपीय देशों द्वारा विकसित और स्वीकृत विज्ञान। यह एक प्रकार का अंधविश्वास ही है और इसके कारण ही भारतीय ज्योतिष को अंधविश्वास मान लिया जाता है और एक नितांत काल्पनिक तथा अशुद्ध कालगणना को वैज्ञानिक कह दिया जाता है। आधुनिक यूरोपीय विज्ञान के अंधविश्वास में फंसे लोगों को बुद्धिजीवी कहना भी हालांकि एक प्रकार का बौद्धिक व्यभिचार ही होगा, फिर भी आवश्यक है उनके द्वारा फैलाए जा रहे इस अंधविश्वास का खंडन उनके ही तर्कों तथा तथ्यों से किया जाए। इसलिए भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता को स्थापित करने से पहले हम यह देखते हैं कि वर्तमान में प्रचलित कालगणना के आधार क्या हैं और वे आधार कितने वैज्ञानिक हैं।
सबसे पहली बात ईस्वी संवत् की है। आज इसे कॉमन एरा यानी कि सामान्य युग कहा जाने लगा है, परंतु इससे पहले इसे ईसा पूर्व तथा ईस्वी संवत् के रूप में ही लिखा-पढ़ा जाता था। ईसा पूर्व और ईस्वी संवत् का सीधा अर्थ है कि ईसा के पहले और ईसा के बाद का काल। प्रश्न उठता है कि क्या ईसाई मजहब के प्रवर्तक हजरत ईसा एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं? यदि विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास को देखें तो उनमें कहीं भी हजरत ईसा ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं दिखाए जाते। ऐसे में वैज्ञानिक इतिहासलेखन के नाम पर भारत के समस्त ग्रंथों और परंपराओं को मिथकीय मानने वाली बौद्धिक जमात एक मिथकीय व्यक्तित्व के आधार पर कालगणना क्यों पढ़ और पढ़ा रही है? क्या देश की जनता को इन महान विद्वान कहे और माने जाने वाले प्रोफेसरों, रीडरों तथा लेक्चररों से यह पूछने का हक नहीं है कि भारत के कण-कण में बसे श्रीराम को मिथकीय चरित्र मानने वाले ये लोग ईसा के आधार पर कालगणना भारत के बच्चों को पढ़ाये जाने का विरोध क्यों नहीं कर पाए?
वास्तव में ईस्वी संवत् एक सांप्रदायिक कालगणना है। यह ईसाइयों द्वारा स्वीकृत कालगणना है, जैसे कि मुसलमान हिजरी संवत् मानते हैं और कुछ अन्य संप्रदाय उनके प्रवर्तकों के अनुसार संवत् स्वीकार करते हैं। यह देखना निश्चय ही आश्चर्यजनक ही है कि सत्य की आराधना करने वाले वैज्ञानिकों को कोई भी वैज्ञानिक घटना आधारित कालगणना नहीं मिली और वे भी इसी सांप्रदायिक कालगणना को अपनाए हुए हैं। इस पर भी यह अपराधबोध उन सभी के मन में अवश्य रहा होगा कि वे पूरे विश्व को एक प्रकार का धोखा दे रहे हैं और इसलिए अ_ारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही इसका नाम बदलने की प्रक्रिया का प्रारंभ कर दिया गया। सबसे पहले अंग्रेजों ने इसे कॉमन एरा कहना प्रारंभ कर दिया। इससे ईसा पूर्व की अंग्रेजी बिफोर क्राइस्ट के छोटे रूप को बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ी, केवल उसमें एक ई अक्षर जोड़ दिया गया और इस प्रकार बीसी बन गया बीसीई यानी सामान्य युग से पूर्व। ए.डी. यानी एनस डोमिनी यानी इयर ऑफ लार्ड यानी ईस्वी सन् को कॉमन एरा यानी सामान्य युग कहा गया और इस तरह यह बन गया सीई। वर्ष 2002 में इंग्लैंड और उसके पड़ोसी द्वीप वेल्श ने इसे आधिकारिक रूप से शिक्षा प्रणाली में शामिल कर दिया। इसके बाद भी नौ वर्षों तक विश्व इसे अपना नहीं पाया। वर्ष 2011 में अमेरिका और आस्ट्रेलिया ने भी इसे अधिकृत रूप से लागू कर दिया।
चूंकि यूरोपीय और नवयूरोपीय सभी देश ईसाईमत प्रधान देश हैं, इसलिए उनके लिए स्वाभाविक ही था कि वे अपने सांप्रदायिक दिखने वाली गणना को एक सेकुलर छवि प्रदान करने की कोशिश करते। परंतु दुर्भाग्यवश भारत के किसी भी बुद्धिजीवी ने इस पर प्रश्न खड़़ा नहीं किया, बल्कि वे इसकी अंधी नकल में जुट गए। भारतीय इतिहासलेखक भी बीसी और एडी के स्थान पर बीसीई तथा सीई का प्रयोग करने लगे। इतना ही नहीं, बल्कि बीसी और एडी लिखने वालों को इतिहासज्ञान में पिछड़ा और अल्पज्ञ भी माना और बताया जाने लगा। भारतीय इतिहासकारों को यह पूछना चाहिए था कि सीई यानी कि कॉमन एरा में कॉमन प्वाइंट यानी कि साझा बिंदु क्या है? यदि यह साझा बिंदु ईसा का जन्म ही है तो फिर बीसी और एडी में क्या बुराई है? यदि यह कोई अन्य ऐतिहासिक या खगोलीय घटना है तो फिर वे बताएं कि वह घटना क्या है?
ईसा पूर्व तथा ईस्वी संवत् तथा कॉमन एरा तथा बिफोर कॉमन एरा की सांप्रदायिकता, अनैतिहासिकत्व तथा अवैज्ञानिकता को समझने के बाद अब हम यह देखते हैं कि मानव इतिहास का जो काल विभाजन आज देश के कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, वह कितना वैज्ञानिक और तथ्यपूर्ण है। वर्तमान में मानव के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया जाता है – पुरा पाषाणयुग, पाषाणयुग, कांस्ययुग और लौहयुग। इसका कालखंड भी कुछ-कुछ निर्धारित है। कुछ-कुछ इसलिए कि ये कालखंड हैं और इसलिए इनकी सीमा ही आंकी जा सकती है, निश्चित काल नहीं (कृपया चार्ट देखें)। उदाहरण के लिए लौह युग का काल 1000 वर्ष ईसा पूर्व का माना जाता है। इस युगगणना को कुछ इस प्रकार निर्धारित कर दिया गया है कि इसमें का विज्ञान गायब हो गया है और इसमें केवल अंधविश्वास शेष बच गया है। यानी आप इस पर प्रश्न खड़े नहीं करते, बस इसे मान लेते हैं और इसके आधार पर ही नए मिलने वाले तथ्यों की व्याख्या करते हैं।
इस अंधविश्वास को समझना हो तो एक उदाहरण देख सकते हैं। लौह युग को 1000 वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है यानी ईसा के 1000 वर्ष से पहले मानव को लोहे का प्रयोग ज्ञात नहीं था। अब इतिहास का एक तथ्य देखें। कालीबंगा, राजस्थान में 3000 वर्ष ईसा पूर्व का एक जुता हुआ खेत खुदाई में मिला है। यह खेत बिल्कुल आधुनिक तरीके से दो फसलों की मिश्रित खेती के लिए जुता हुआ है। अब खेत की जुताई बिना हल के नहीं की जा सकती और हल बिना लोहे के नहीं बन सकता। वस्तुत: लकड़ी का कोई भी सामान बिना लोहे के औजारों की सहायता के नहीं बन सकता। परंतु चूंकि आज के विज्ञान के अंधविश्वास में 1000 वर्ष ईसा पूर्व से पहले लोहे के औजार के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता, इसलिए इतने महत्वपूर्ण प्रमाण की उपेक्षा कर दी जाती है और कहा जाता है कि कांसे से ही यह सब कुछ किया गया होगा।
बहरहाल, भले ही भारत में आज इन युगों के विभाजन को आज अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया हो, फिर भी इन युगों के विभाजन का प्रतिपादन करने वाले विद्वान भी इसकी व्यर्थता को नकार नहीं पाए हैं। उदाहरण के लिए हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट सिविलीजेशन में चाल्र्स साइनोवोस लिखते हैं, 'किसी एक तथा समान देश के लोगों ने क्रमश: अनगढ़ पत्थरों, तराशे हुए पत्थरों, कांसे तथा लोहे का प्रयोग करना सीखा। परंतु सभी देश एक ही समय में एक साथ एक ही युग में नहीं रहे। मिश्र ने तभी लोहे का प्रयोग प्रारंभ कर दिया जब ग्रीक कांस्ययुग में ही जी रहे थे और डेनमार्क के बर्बर लोग पत्थरों का ही प्रयोग कर रहे थे। अमेरिका में तराशे गए पत्थरों का युग (नूतन पाषाण युग) यूरोपियों के वहाँ जाने के बाद समाप्त हुआ। हमारे अपने काल में अभी भी आस्ट्रेलिया के असभ्य कबीले अनगढ़ पत्थरों के काल में ही रह रहे हैं। …इस प्रकार ये चार युग मानवता की यात्रा के कालखंडों को प्रदर्शित नहीं करते, बल्कि हरेक देश में ये सभ्यता के विकास की कहानी कहते हैं।'
एक जनवरी, 2018 ईस्वी संवत् बीत चुका है और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत् 2086 आ रही है। जहाँ तक उत्सव मनाने की बात है, उत्सवधर्मी भारतीय दोनों ही अवसरों पर मौज-मस्ती कर लेते हैं। परंतु जब इतिहास और व्यवहार की बात आती है तो भारत की सरकार और बुद्धिजीवी दोनों ही केवल और केवल ईस्वी संवत् का ही प्रयोग करते हैं। इन्होंने पूरे देश पर एक मिथ्या, अवैज्ञानिक और तर्करहित कालगणना केवल इसलिए थोप रखी है कि यूरोपीय और अमेरिका, आस्ट्रेलिया सरीखे नवयूरोप के लोग इसे मानते हैं। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात् भारतीय नववर्ष के स्वागत के अवसर पर कालगणना पर विचार करना उचित होगा।
विज्ञान की बात करें तो इसके लिए भी एक सुनिश्चित सीमा बांध दी गई है। आज विज्ञान का अर्थ होता है यूरोपीय तथा नवयूरोपीय देशों द्वारा विकसित और स्वीकृत विज्ञान। यह एक प्रकार का अंधविश्वास ही है और इसके कारण ही भारतीय ज्योतिष को अंधविश्वास मान लिया जाता है और एक नितांत काल्पनिक तथा अशुद्ध कालगणना को वैज्ञानिक कह दिया जाता है। आधुनिक यूरोपीय विज्ञान के अंधविश्वास में फंसे लोगों को बुद्धिजीवी कहना भी हालांकि एक प्रकार का बौद्धिक व्यभिचार ही होगा, फिर भी आवश्यक है उनके द्वारा फैलाए जा रहे इस अंधविश्वास का खंडन उनके ही तर्कों तथा तथ्यों से किया जाए। इसलिए भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता को स्थापित करने से पहले हम यह देखते हैं कि वर्तमान में प्रचलित कालगणना के आधार क्या हैं और वे आधार कितने वैज्ञानिक हैं।
सबसे पहली बात ईस्वी संवत् की है। आज इसे कॉमन एरा यानी कि सामान्य युग कहा जाने लगा है, परंतु इससे पहले इसे ईसा पूर्व तथा ईस्वी संवत् के रूप में ही लिखा-पढ़ा जाता था। ईसा पूर्व और ईस्वी संवत् का सीधा अर्थ है कि ईसा के पहले और ईसा के बाद का काल। प्रश्न उठता है कि क्या ईसाई मजहब के प्रवर्तक हजरत ईसा एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं? यदि विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास को देखें तो उनमें कहीं भी हजरत ईसा ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं दिखाए जाते। ऐसे में वैज्ञानिक इतिहासलेखन के नाम पर भारत के समस्त ग्रंथों और परंपराओं को मिथकीय मानने वाली बौद्धिक जमात एक मिथकीय व्यक्तित्व के आधार पर कालगणना क्यों पढ़ और पढ़ा रही है? क्या देश की जनता को इन महान विद्वान कहे और माने जाने वाले प्रोफेसरों, रीडरों तथा लेक्चररों से यह पूछने का हक नहीं है कि भारत के कण-कण में बसे श्रीराम को मिथकीय चरित्र मानने वाले ये लोग ईसा के आधार पर कालगणना भारत के बच्चों को पढ़ाये जाने का विरोध क्यों नहीं कर पाए?
वास्तव में ईस्वी संवत् एक सांप्रदायिक कालगणना है। यह ईसाइयों द्वारा स्वीकृत कालगणना है, जैसे कि मुसलमान हिजरी संवत् मानते हैं और कुछ अन्य संप्रदाय उनके प्रवर्तकों के अनुसार संवत् स्वीकार करते हैं। यह देखना निश्चय ही आश्चर्यजनक ही है कि सत्य की आराधना करने वाले वैज्ञानिकों को कोई भी वैज्ञानिक घटना आधारित कालगणना नहीं मिली और वे भी इसी सांप्रदायिक कालगणना को अपनाए हुए हैं। इस पर भी यह अपराधबोध उन सभी के मन में अवश्य रहा होगा कि वे पूरे विश्व को एक प्रकार का धोखा दे रहे हैं और इसलिए अ_ारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही इसका नाम बदलने की प्रक्रिया का प्रारंभ कर दिया गया। सबसे पहले अंग्रेजों ने इसे कॉमन एरा कहना प्रारंभ कर दिया। इससे ईसा पूर्व की अंग्रेजी बिफोर क्राइस्ट के छोटे रूप को बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ी, केवल उसमें एक ई अक्षर जोड़ दिया गया और इस प्रकार बीसी बन गया बीसीई यानी सामान्य युग से पूर्व। ए.डी. यानी एनस डोमिनी यानी इयर ऑफ लार्ड यानी ईस्वी सन् को कॉमन एरा यानी सामान्य युग कहा गया और इस तरह यह बन गया सीई। वर्ष 2002 में इंग्लैंड और उसके पड़ोसी द्वीप वेल्श ने इसे आधिकारिक रूप से शिक्षा प्रणाली में शामिल कर दिया। इसके बाद भी नौ वर्षों तक विश्व इसे अपना नहीं पाया। वर्ष 2011 में अमेरिका और आस्ट्रेलिया ने भी इसे अधिकृत रूप से लागू कर दिया।
चूंकि यूरोपीय और नवयूरोपीय सभी देश ईसाईमत प्रधान देश हैं, इसलिए उनके लिए स्वाभाविक ही था कि वे अपने सांप्रदायिक दिखने वाली गणना को एक सेकुलर छवि प्रदान करने की कोशिश करते। परंतु दुर्भाग्यवश भारत के किसी भी बुद्धिजीवी ने इस पर प्रश्न खड़़ा नहीं किया, बल्कि वे इसकी अंधी नकल में जुट गए। भारतीय इतिहासलेखक भी बीसी और एडी के स्थान पर बीसीई तथा सीई का प्रयोग करने लगे। इतना ही नहीं, बल्कि बीसी और एडी लिखने वालों को इतिहासज्ञान में पिछड़ा और अल्पज्ञ भी माना और बताया जाने लगा। भारतीय इतिहासकारों को यह पूछना चाहिए था कि सीई यानी कि कॉमन एरा में कॉमन प्वाइंट यानी कि साझा बिंदु क्या है? यदि यह साझा बिंदु ईसा का जन्म ही है तो फिर बीसी और एडी में क्या बुराई है? यदि यह कोई अन्य ऐतिहासिक या खगोलीय घटना है तो फिर वे बताएं कि वह घटना क्या है?
ईसा पूर्व तथा ईस्वी संवत् तथा कॉमन एरा तथा बिफोर कॉमन एरा की सांप्रदायिकता, अनैतिहासिकत्व तथा अवैज्ञानिकता को समझने के बाद अब हम यह देखते हैं कि मानव इतिहास का जो काल विभाजन आज देश के कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, वह कितना वैज्ञानिक और तथ्यपूर्ण है। वर्तमान में मानव के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया जाता है – पुरा पाषाणयुग, पाषाणयुग, कांस्ययुग और लौहयुग। इसका कालखंड भी कुछ-कुछ निर्धारित है। कुछ-कुछ इसलिए कि ये कालखंड हैं और इसलिए इनकी सीमा ही आंकी जा सकती है, निश्चित काल नहीं (कृपया चार्ट देखें)। उदाहरण के लिए लौह युग का काल 1000 वर्ष ईसा पूर्व का माना जाता है। इस युगगणना को कुछ इस प्रकार निर्धारित कर दिया गया है कि इसमें का विज्ञान गायब हो गया है और इसमें केवल अंधविश्वास शेष बच गया है। यानी आप इस पर प्रश्न खड़े नहीं करते, बस इसे मान लेते हैं और इसके आधार पर ही नए मिलने वाले तथ्यों की व्याख्या करते हैं।
इस अंधविश्वास को समझना हो तो एक उदाहरण देख सकते हैं। लौह युग को 1000 वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है यानी ईसा के 1000 वर्ष से पहले मानव को लोहे का प्रयोग ज्ञात नहीं था। अब इतिहास का एक तथ्य देखें। कालीबंगा, राजस्थान में 3000 वर्ष ईसा पूर्व का एक जुता हुआ खेत खुदाई में मिला है। यह खेत बिल्कुल आधुनिक तरीके से दो फसलों की मिश्रित खेती के लिए जुता हुआ है। अब खेत की जुताई बिना हल के नहीं की जा सकती और हल बिना लोहे के नहीं बन सकता। वस्तुत: लकड़ी का कोई भी सामान बिना लोहे के औजारों की सहायता के नहीं बन सकता। परंतु चूंकि आज के विज्ञान के अंधविश्वास में 1000 वर्ष ईसा पूर्व से पहले लोहे के औजार के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता, इसलिए इतने महत्वपूर्ण प्रमाण की उपेक्षा कर दी जाती है और कहा जाता है कि कांसे से ही यह सब कुछ किया गया होगा।
बहरहाल, भले ही भारत में आज इन युगों के विभाजन को आज अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया हो, फिर भी इन युगों के विभाजन का प्रतिपादन करने वाले विद्वान भी इसकी व्यर्थता को नकार नहीं पाए हैं। उदाहरण के लिए हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट सिविलीजेशन में चाल्र्स साइनोवोस लिखते हैं, 'किसी एक तथा समान देश के लोगों ने क्रमश: अनगढ़ पत्थरों, तराशे हुए पत्थरों, कांसे तथा लोहे का प्रयोग करना सीखा। परंतु सभी देश एक ही समय में एक साथ एक ही युग में नहीं रहे। मिश्र ने तभी लोहे का प्रयोग प्रारंभ कर दिया जब ग्रीक कांस्ययुग में ही जी रहे थे और डेनमार्क के बर्बर लोग पत्थरों का ही प्रयोग कर रहे थे। अमेरिका में तराशे गए पत्थरों का युग (नूतन पाषाण युग) यूरोपियों के वहाँ जाने के बाद समाप्त हुआ। हमारे अपने काल में अभी भी आस्ट्रेलिया के असभ्य कबीले अनगढ़ पत्थरों के काल में ही रह रहे हैं। …इस प्रकार ये चार युग मानवता की यात्रा के कालखंडों को प्रदर्शित नहीं करते, बल्कि हरेक देश में ये सभ्यता के विकास की कहानी कहते हैं।'
प्रश्न उठता है कि यदि यह बात सच है तो किस आधार पर अपने देश में बच्चों को यह पढ़ाया जाता है कि लौह युग केवल हजार वर्ष ईसापूर्व में प्रारंभ हुआ? फिर हम पूरी दुनिया के इतिहास को नियोलिथिक, पैलियोलिथिक आदि युगों में क्यों बांट देते हैं? यह कालखंड तो हरेक देश का अलग-अलग होना था। इसके लिए हरेक देश के इतिहास की अलग-अलग पड़ताल करनी थी। उदाहरण के लिए भारत की बात करें तो यहाँ वेदों में लोहे का स्पष्ट उल्लेख है। आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार भी वेद तो कम से कम 4-5 हजार वर्ष पुराने हैं। स्पष्ट है कि भारत का लौहयुग कम से कम 4-5 हजार वर्ष पुराना होना ही चाहिए। ऐसे में शेष युग तो और भी पीछे चले जाएंगे। इसमें अभी एक और समस्या है।
समस्या यह है कि विश्व के सभी देशों में नूतन पाषाण युग के बाद कांस्य युग नहीं आया। प्राचीन भारत के इतिहासकारों में एक प्रमुख नाम स्व. राधाकुमुद मुखर्जी अपनी पुस्तक हिंदू सभ्यता में लिखते हैं, 'भारतवर्ष में अन्य देशों की भांति विकास-क्रम की ये सारी अवस्थाएं होती हैं। केवल कांस्य-युग के स्थान पर (कुछ प्रदेशों को छोड़ कर) ताम्र-युग से मिलती संस्कृति यहाँ हुई।' वे यह भी लिखते हैं कि 'पूर्व-प्रस्तर काल के अवशेष यहाँ कम ही हैं।Ó इसका अर्थ यह है कि भारत में पत्थरों के औजारों का प्रयोग नहीं के बराबर हुआ। एक और मजेदार बात यह है कि पाषाण युग में भी भारत में लोहे के औजार मिल रहे हैं। राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं, 'दक्षिण भारत में कई स्थानों पर नवप्रस्तर युग की बस्तियां तथा उनके औजारों को गढऩे की कर्मशालाओं के स्थान पाए गए हैं। ज्ञात होता है कि वे लोग अपने औजारों को कड़ी चट्टानों पर बनाई हुई घाइयों में घिसते और माडते थे। 10 से 14 इंच तक लम्बी और दो इंच गहरी घाइयां पाई गई हैं। इन बस्तियों में चाक के बढिय़ा बर्तन बहुतायत में मिले हैं, लम्बे ताबूत मिले हैं, जिनके साथ कभी-कभी लोहे के औजार भी पाए गए हैं। पत्थर की शिलाओं से निर्मित समाधियां या स्थाणु-संज्ञक निखात स्थान (मैगेलिथिक टोम्ब) मद्रास, बम्बई, मैसूर और हैदराबाद (दक्षिण) राज्य में बहुतायत में मिले हैं, परंतु उनमें प्राप्त लोहे के औजारों से वे नवप्रस्तर युग की ज्ञात होती हैं। …पाषाण-युग के बाद दक्षिण भारत में लौह-युग और उत्तर भारत में ताम्र-युग आया।'
उपरोक्त विवरण साफ कर देता है कि मानव सभ्यता का पाषाण युग, नवपाषाण युग, कांस्य युग और लौह युग का विभाजन भारत पर लागू नहीं होता। जिसे यूरोपीय पाषाण युग कह रहे हैं, भारत में उस काल में भी लोहे के औजार मिल रहे हैं और भारत में तो कांस्य युग आ ही नहीं रहा है। यहाँ पहले लौह तथा ताम्र युग आ रहा है। हालांकि यदि भारतीय शास्त्रों के मत को देखें तो यह सारा युग विभाजन मूर्खतापूर्ण ही जान पड़ता है। महाभारत जोकि आज से पाँच हजार वर्ष पहले की घटना है और जिसकी ऐतिहासिकता को नकारने का कोई कारण नहीं है, में लोहे का पर्याप्त से अधिक प्रयोग पाया जाता है। पाँच हजार वर्ष पूर्व यूरोप का इतिहास प्रारंभ ही हो रहा था। वहाँ तो इस समय मनुष्य पूर्वपाषाण युग में जी रहा था।
फिर आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार रामायण की घटना आज से 8-9 हजार वर्ष पहले हुई। रामायण में भी लोहे के प्रयोग के भरपूर वर्णन हैं। ऐसे में भारत में लौह युग तो और पहले का मानना पड़ेगा। इस काल में यूरोप में मानव के इतिहास का प्रारंभ भी नहीं होता। वहाँ डार्विन के मतानुसार अभी बंदर ही उछल-कूद कर रहे थे। यदि भारतीय मतों को मानें तो रामायण का काल और पीछे जाएगा और रामायण तो हमारे इतिहास में काफी बाद की घटना है, उससे पहले लाखों वर्षों का इतिहास घटा है जिसमें लोहे के प्रयोग के पर्याप्त उल्लेख हैं।
इस सारे विवरण से यह साफ हो जाता है कि मानव सभ्यता के विकास को आज जिन चार कालखंडों में बाँटा जाता है, वे न केवल मिथ्या हैं, बल्कि भ्रामक भी हैं। उन्हें ये चार कालखंड इसलिए बनाने पड़ें ताकि वे पूरी दुनिया के इतिहास को यूरोप के इतिहास के सांचे में ढाल सकें। वे यह बता सकें कि यूरोप शेष दुनिया से थोड़ा बहुत ही पीछे था, और उसने पिछले 3-4 सौ वर्षों में पूरी दुनिया को पीछे कर दिया है। सचाई यह है कि दुनिया का इतिहास इन चार कालखंडों में नहीं बाँटा जा सकता। प्रख्यात भूगर्भशास्त्री चाल्र्स हैपगुड अपनी पुस्तक मैप्स ऑफ एनशिएंट सीकिंग्स में लिखते हैं, 'पाषाण युग की संस्कृति, नवपाषाण युग, कांस्य युग, और लौह युग के क्रमबद्ध स्तरों से होती हुई मानवी सभ्यता के सरल एकरैखिक विकास की संकल्पना को त्याग दिया जाना चाहिए। आज हम पाते हैं कि दुनिया के सभी महादेशों में आदिम संस्कृतियां विकसित आधुनिक समाज के साथ रहती हैं – आस्ट्रेलिया के बुशमेन, दक्षिण अफ्रीका के बुशमेन, दक्षिण अमेरिका और गुएना के सच्चे आदिम लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ कबीलाई लोग आदि। हमें अब यह मान लेना चाहिए कि आज से 20 हजार वर्ष पहले जब यूरोप में पाषाण युगीन लोग रह रहे थे, पृथिवी के अन्य हिस्सों में उससे कहीं अधिक विकसित संस्कृतियां उपस्थित थीं और आज हमारे पास जो कुछ भी है, उसका एक हिस्सा उनकी ही विरासत है जोकि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी गईं।'
प्रसिद्ध अंतरिक्षविज्ञानी डॉ. ओमप्रकाश पांडेय कहते हैं, 'इस तरह का कालविभाजन वास्तव में समय के एकरैखिक विकास की यहूदी-ईसाई संकल्पना की उपज है। भारतीय संकल्पना में काल की गति चक्रीय है, एकरैखिक नहीं और इसलिए भारतीय संकल्पना समय की अधिक बड़ी दूरी को माप सकती है।Ó इसलिए भारतीय युग गणना लाखों-करोड़ों वर्षों की बात करती है, जो बाइबिल के ईसा की कालगणना से बंधे यूरोपीयों को समझ में नहीं आ पाती। चाल्र्स हैपगुड सरीखे जो यूरोपीय इस बाधा से मुक्त हो गए हैं, वे भी मानव सभ्यता का इतिहास लाखों वर्षों का मानने लगे हैं। यह देखना महत्वपूर्ण है कि भारत की जिस करोड़ों तथा अरबों वर्षों की गणना को यूरोपीय मिथक मान कर खारिज कर देते हैं, आज का भूगर्भशास्त्र भी लगभग उसी प्रकार की करोड़ों तथा अरबों वर्षों की गणना करने लगा है।
आज की भूगर्भशास्त्रीय कालगणना को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने भारतीय कालगणना के मापकों को ग्रीक नाम देकर अपना रखा है। अंतर केवल उनकी थोड़ी बहुत अज्ञानता और कालगणना के अशुद्ध तरीकों के कारण उनके काल का ही है। एक तुलनात्मक विवरण देखें।
भूगर्भशास्त्र में काल की सबसे पुरानी माप हैडियन की है जो कि आज से 4.6 से लेकर 4.0 अरब वर्ष पहले का है। भूगर्भशास्त्रियों का मत है कि इतने समय पूर्व सृष्टि का आरंभ हुआ। अब इसकी तुलना करें हमारे एक कल्प या ब्राह्म दिन से। भारतीय मतानुसार ब्रह्मा का एक दिन-रात यानी कि चौबीस घंटे मानवीय गणना में 4.32 अरब वर्षों का होता है। इसे हम एक कल्प भी कहते हैं। कल्प के प्रारंभ में सृष्टि का आरंभ माना जाता है। भूगर्भशास्त्रियों ने इस पूरे कालखंड को दो भागों जिसे वे इयॉन कहते हैं, में तो बाँटा है, परंतु वे दो भाग समान नहीं हैं। पहला विभाजन है प्रिकैम्बियन इयॉन जो कि 4.6 अरब वर्ष से 54.2 करोड़ वर्ष पूर्व तक का है और दूसरा है फैनेरोजोइक इयॉन जोकि 54.2 करोड़ वर्ष से लेकर आज तक का काल है। दोनों इयॉन को एरा में बाँटा गया है। प्रिकैम्बियन इयॉन में दो एरा हैं। पहला आर्कियन एरा चार अरब वर्ष पूर्व से लेकर 2.5 अरब वर्ष पूर्व तक का है और दूसरा प्रोटेरोजोइक एरा 2.5 अरब वर्ष से लेकर 54.2 करोड़ वर्ष पूर्व तक का है। यह विभाजन भी समान नहीं है। एरा को आगे पीरियड में बाँटा गया है। आर्कियन एरा में चार पीरियड और प्रोटेरोजोइक एरा में तीन पीरियड हैं।
फैनेरोजोइक इयॉन को तीन एरा में बाँटा गया है। पहला, पैलियोजोइक एरा 54.2 करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर 25.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक का, दूसरा, मेसोजोइक एरा 25.1 करोड़ वर्ष से लेकर 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व का और तीसरा, सेनोजोइक एरा 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर आज तक का। इन तीनों एरा को भी आगे पीरियड में बाँटा गया है। पीरियड को इपोक में और फिर उन्हें एज में बाँटा गया है। ये सारे विभाजन बड़े ही असमान और अस्त-व्यस्त हैं। इनमें कोई क्रमबद्धता नहीं दिखती।
इस कालविभाजनों के लिए भूगर्भशास्त्रियों ने जो प्रमाण दिए हैं, उनका आड़ोलन करने से हमें इस कालविभाजन की प्रामाणिकता और सत्यता का पता चलता है। भूगर्भशास्त्री विभिन्न चट्टानों के अध्ययन और उनके काल के रासायनिक निर्धारण से यह कालविभाजन करते हैं। इस कालविभाजन में सबसे बड़ी खामी यही है। चट्टानों की आयु से सृष्टि के चक्र को समझना असंभव काम है। सृष्टि के चक्र में जल-प्लावन, बर्फयुग जैसी अनेक प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं ऐसी घटती रहती हैं जो चट्टानों के निर्माण और विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं जबकि भूगर्भशास्त्री यह मान कर कालनिर्णय करते हैं कि प्रकृति में भूगर्भशास्त्रीय प्रक्रियाएं प्रारंभ से लेकर आज तक गति और प्रमाण में समान दर से होती रही हैं। यह सिद्धांत वर्ष 1795 में जेम्स हट्टन ने दिया था जिसे थियोरी ऑफ यूनिफार्मिटी यानी समानता का सिद्धांत कहते हैं। यही सिद्धांत आज तक मान्य है और इसके आधार पर ही सारी भूगर्भशास्त्रीय कालगणना की जाती है।
चूंकि यह मानवीय गणना की क्षमता से परे एक लंबे कालखंड की बात है, इसलिए इसमें हमें कुछ चीजें मान कर ही चलनी होती हैं। परंतु यह कहना कहीं से भी ठीक नहीं है कि प्राकृतिक घटनाएं प्रारंभ से लेकर आज तक हमेशा एक ही गति और प्रमाण में होती रही हैं। यह संभव नहीं है। पृथिवी पर ताप और दाब जब हमेशा एक समान नहीं रहा है तो फिर प्रक्रियाओं की गति एक समान कैसे हो सकती है? इसके अतिरिक्त पृथिवी की अपनी स्थिति भी कभी एक समान नहीं रही है। कभी वह आग का गोला थी और कभी पूरी तरह जल में डूबी हुई। साथ ही विख्यात भूगर्भशास्त्री चाल्र्स हैपगुड ने ध्रुवीय प्रदेशों के विचलन का जो सिद्धांत दिया है, यदि उसे मान लिया जाए तो चुम्बकीय क्षेत्र भी बदलेगा। इसके कारण भी प्राकृतिक प्रक्रियाएँ कभी भी एक समान गति से नहीं चल सकतीं। इसलिए भूगर्भशास्त्र की ये सारी गणनाएं वस्तुत: एक मिथ्या सिद्धांत पर टिकी हैं।
अब यदि हम इसकी तुलना करें भारतीय कालगणना से तो हमें ध्यान में आता है कि भारतीय गणनाएं आकाशीय नक्षत्रों पर आधारित हैं। आकाशीय स्थिति में होने वाले परिवर्तन कभी भी पृथिवी की परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होते, बल्कि इसके उलट आकाशीय स्थितियों पर ही पृथिवी की परिस्थितियां निर्भर करती हैं। स्वाभाविक ही है कि पृथिवी की कालगणना करने के लिए आकाश एक अधिक स्थिर और प्रामाणिक आधार है। इसलिए भारतीय ज्योतिष ने आकाशीय नक्षत्रीय गणना को ही प्रमाण माना और उसके आधार पर गणनाएं कीं। जब आज का वैज्ञानिक यूरोपीय जगत सृष्टि की आयु केवल 4004 ईसा पूर्व में बता रहा था, हम उस समय भी पृथिवी की आयु एक अरब, 96 करोड़ वर्ष बता रहे थे। देखा जाए तो हमने एक कल्प को दो भागों में बाँटा – दिन और रात। फिर हमने उसे सात मन्वन्तरों में बाँटा। मन्वन्तरों को चतुर्युगियों में बाँटा गया। फिर युगों की गणना की गई। युगों की गणना में भी एक नियम बाँधा गया। एक युग चार लाख 32 हजार वर्षों का माना गया। शेष युग क्रम से उसके दुगुना, तिगुना और चौगुना हुए। इस प्रकार एक चतुर्युगी एक कल्प का हजारवाँ हिस्सा हुई। ज्योतिष की आकाश संबंधी सभी गणनाएं अक्षरश: सही होती हैं। ऐसे में इन गणनाओं को नकारने का कोई ठोस कारण सामने में नहीं है।
यदि हम भारतीय युग गणना की तुलना आज के भूगर्भशास्त्रीय काल गणना से करें तो कुछ ऐसा चित्र सामने आता है।
अहोरात्र = हैडियन
कल्प = इयॉन
परार्ध = एरा
मन्वन्तर = पीरियड
चतुर्युगी = इपोक
युग = एज
इसमें अंतर केवल इन विभिन्न ईकाइयों की कालावधि का है। भारतीय युग गणना जहाँ आकाशीय नक्षत्रों के अधिक स्थिर तथा प्रामाणिक आधार पर है और इसलिए क्रमबद्ध तथा सुव्यवस्थित है, वहीं भूगर्भशास्त्रीय गणना चट्टानों के विकास के अस्थिर तथा अप्रामाणिक आधार पर निर्भर है और इस कारण इसमें कोई सूत्रबद्धता नहीं है। विभिन्न इयॉन, एरा, पीरियड, इपोक और एज के काल भिन्न-भिन्न हैं और इस भिन्नता के कारण केवल कुछेक अनुमान हैं। इसके अलावे भूगर्भशास्त्रीय गणनाएं केवल चट्टानों का विकास क्रम बताती हैं, उसे ही पृथिवी के विकास का भी आधार मान लिया जाता है।
उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखें तो हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि भारतीय कालगणना न केवल वैज्ञानिक है, बल्कि वह अधिक ऐतिहासिक, प्रामाणिक और सेकुलर भी है। भारतीय वैज्ञानिकों तथा इतिहासकारों को न केवल स्वयं इसे अपनाना चाहिए, बल्कि उन्हें विश्वपटल पर इसकी स्वीकार्यता के लिए संघर्ष भी करना चाहिए।
✍🏻साभार भारतीय धरोहर
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वह वर्ष गया - यह वर्ष नया

Posted: 02 Apr 2022 01:22 AM PDT

वह वर्ष गया - यह वर्ष नया

सच्चिदानन्द प्रेमी
रोहन चाचा ने गेहूं का बोझा सुरभि गाय के गोबर से लीपे हुए खलिहान में पटकते हुए कहा- लगऽ हौ नयका साल आ गेलो । खिड़की दरवाजे बंद कर सोई हुई कोहबर कुंज से माननीया ने कहा -आ हा ह !कितना सुंदर बसंत है !लगता है नए वर्ष का जन्म हो गया !-
खिड़की दरवाजे सब बंद ही रहे
घर आंगन कैसे मकरंद हो गए?

दुर्गा सप्तशती की आराधना में बैठे जगमोहन दादा ने श्लोक उच्चरित करते हुए कहा-
प्रथमम् शैल पुत्री च द्वितीय ब्रह्म चारिणी ॥
यही तो आनंद है,जगन्नमाता की आराधना के साथ हमारा नया वर्ष आज से ही शुरू हुआ ।
आज से नया वर्ष क्यों शुरू हुआ, इसके पीछे हमारा पुराना इतिहास खड़ा है ।
1-आज विक्रम संवत् 2079 का पहला दिन है ।
2-आज कलयुग संवत् 5122 वर्ष का पहला दिन है ।
3-आज वेद सम्बत का 1,96,08,53,123 वर्ष का पहला दिन है ।
4-आज मानव सृष्टि का 1,96,08,53,123 वर्ष शुरू हुआ ।
5-आज कल्प संवत का 1,97,38,13,123 हुआ।उसका भी आज पहला दिन है ।
6- ज्योतिष के प्रमुख ग्रंथ हिमाद्रि के अनुसार जगत (सृष्टी) की उत्पति आज ही के दिन सुर्योदय के समय हुई थी-
चैत्र मासी जगद् ब्रह्मा ससर् प्रथमेऽहनि ।
शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तथा सूर्योदये सति ॥
जगत की उत्पत्ति का आज पहला दिन है।कल्प संवत 1,97,38,13,123 वाँ वर्ष ।
7-पूर्व तीन चतुर्युग के पश्चात आज के दिन ही त्रिबिष्टप के मानसरोवर में अमैथुनी पद्धति से ॠषियों की उत्पत्ति हुई थी और उत्पन्न होते ही वे समाधिस्थ हो गए थे।
8- जगत (सृष्टी) की उत्पति के 5 वर्ष बाद आज ही के दिन वेदों का आविर्भाव हुआ था ।
9-आज के दिन ही है 12,05,33,122 वर्ष पूर्व वैवस्वत मन्वंतर का आरंभ हुआ ।
10- 5122वर्ष पूर्व आज के दिन ही कलियुग का प्रादुर्भाव हुआ था। भारतीय गणना के अनुसार कलियुग की उम्र आज5122 वर्ष हुई ,परन्तु पाश्चात्य गणनाकार बैली के अनुसार इसकी उम्र 5154 वर्ष हुई।
11-चक्रवर्ती सम्राट श्री राम प्रभु का राज्याभिषेक आज के दिन ही हुआ था।
13- महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी आज के दिन ही हुआ था ।
14-सम्राट विक्रमादित्य ने 2079 वर्ष पूर्व आज के दिन ही संगठित राष्ट्र की स्थापना की थी ।
15-सिक्खों के दूसरे गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म आज के दिन ही हुआ था ।
हमारे पास नया वर्ष मनाने के इतने सारे औचित्य हैं, इसलिए हम आज के दिन नया वर्ष मनाते हैं ।
आज का दिन कितना पावन, मनभावन और पवित्र है ।साहित्यकारों की मंडली में एक कवि( डॉ प्रेमी) ने अपना गीत सुनाया -
नए वर्ष में हम छू लेंगे नभ के चांद सितारे।
नए वर्ष में मधुमय होंगे सागर के जल खारे ॥
नए वर्ष के आगमन पर लताओं ने वहुरंगी पुष्प खिलाए, गंध बिखेरते पुष्पो से पराग झरे ,दिग्- दिगंत में अरूणाई छाई,भौंरों के की भ्रामरी सुन किशोरों की तरुणाई ने अंगड़ाई ली-
बसंत के चपल चरण!
मार्च का अर्थ होता है आरंभ। मार्च पास्ट- सेना के अधिकारी ने आदेश दिया- मार्च! लेफ्ट- राइट- लेफ्ट करती हुई टुकड़ी आगे बढ़ गई ।यही तो नव संवत्सर है ।
नई फसलें, नए अन्न, दलहन- तिलहन- सब्जी- साग, सब नया नया। खेत आराम करने लगे, खलिहान निहाल हो गए- नया वर्ष आ गया । रात की निद्रा से उबरते हुए सुबह-सुबह लाला ने पूछा- दादा जी! नया वर्ष आ गया क्या ? उत्साह शरीर धारण कर चतुर्दिक क्या दसों दिशाओं में भ्रमण कर रहा है। माथे पर कलश लिए राजमार्ग पर घंट घरियाल के साथ लोग जा रहे हैं। सर्वत्र आनंद ही आनंद है। यही नया वर्ष है। डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
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मुख्यमंत्री ने पटना मेट्रो रेल निर्माण कार्य की प्रगति सहित अन्य योजनाओं की समीक्षा की, अधिकारियों को दिए आवश्यक दिशा-निर्देश

Posted: 01 Apr 2022 08:48 AM PDT

मुख्यमंत्री ने पटना मेट्रो रेल निर्माण कार्य की प्रगति सहित अन्य योजनाओं की समीक्षा की, अधिकारियों को दिए आवश्यक दिशा-निर्देश

  • कार्य योजना के अनुरुप पटना मेट्रो रेल के निर्माण कार्य में तेजी लाएं ताकि जल्द से जल्द लोगों को इसका लाभ मिल सके।
  • पटना म्यूजियम और बिहार म्यूजियम के बीच सब-वे टनल कनेक्शन का निर्माण जल्द से जल्द शुरु करें।
  • निराश्रित एवं बेसहारा वृद्धजनों के आश्रय हेतु 'मुख्यमंत्री वृद्धजन आश्रय स्थल योजना' के क्रियान्वयन पर तेजी से काम शुरू करें। वहां खाने-पीने, चिकित्सकीय सुविधाओं के साथ-साथ अन्य सुविधाओं की व्यवस्था रखें।

पटना, 01 अप्रैल 2022 को मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने 1 अणे मार्ग स्थित संकल्प में पटना मेट्रो रेल निर्माण कार्य की प्रगति सहित अन्य योजनाओं की समीक्षा की।
नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव श्री आनंद किशोर ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से पटना मेट्रो रेल निर्माण कार्य की अद्यतन स्थिति की जानकारी दी। उन्होंने भूमि अधिग्रहण की स्थिति, भूमि हस्तांतरण की स्थिति, कार्य प्रगति की स्थिति के संबंध में विस्तृत जानकारी दी।
श्री आनंद किशोर ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से प्रधानमंत्री फुटपाथ विक्रेता आत्मनिर्भर निधि (स्वनिधि) योजना के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फुटपाथ विक्रेताओं का सर्वेक्षण पूर्ण कर लिया गया है और इस योजनान्तर्गत 47 हजार 423 लाभुकों को ऋण प्रदान करा दिया गया है।
श्री आनंद किशोर ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से पटना म्यूजियम और बिहार म्यूजियम के सब-वे अलाइन्मेंट के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने पार्किंग, डिजास्टर मैंनेजंमेंट सिस्टम आदि के संबंध में जानकारी दी।
श्री आनंद किशोर ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से सात निश्चय-2 के अंतर्गत 'मुख्यमंत्री वृद्धजन आश्रय स्थल योजना' के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने इस योजना के उद्देश्य, कार्यप्रणाली के संबंध में विस्तृत जानकारी दी।
समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने निर्देश देते हुए कहा कि कार्य योजना के अनुरुप पटना मेट्रो रेल के निर्माण कार्य में तेजी लाएं ताकि जल्द से जल्द लोगों को इसका लाभ मिल सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार म्यूजियम अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया गया है। बिहार म्यूजियम में बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। पटना म्यूजियम के और बेहतर ढ़ंग से बन जाने के बाद पर्यटकों की संख्या और बढ़ेगी। पटना म्यूजियम और बिहार म्यूजियम के बीच सब-वे टनल कनेक्शन का निर्माण जल्द से जल्द शुरु करें। इसका निर्माण बेहतर ढंग से कराएं। टनल में बेहतर एयर सिस्टम एवं रौशनी का इंतजाम हो और लोगों के आवागमन में किसी प्रकार की असुविधा न हो इसका ध्यान रखें।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सात निश्चय-2 के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा निराश्रित एवं बेसहारा वृद्धजनों को आश्रय हेतु 'मुख्यमंत्री वृद्धजन आश्रय स्थल योजना' के क्रियान्वयन पर तेजी से काम शुरू करें। आश्रय स्थल में खाने-पीने, चिकित्सकीय सुविधाओं के साथ-साथ अन्य सुविधाओं की व्यवस्था रखें। यहां वृद्धजनों के स्वस्थ एवं गरिमापूर्ण जीवनयापन हेतु जरुरी सुविधाओं का इंतजाम रखें।
बैठक में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री दीपक कुमार, मुख्य सचिव श्री आमिर सुबहानी, विकास आयुक्त श्री विवेक कुमार सिंह, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डॉ0 एस0 सिद्धार्थ, नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव श्री आनंद किशोर, मुख्यमंत्री के सचिव श्री अनुपम कुमार, मुख्यमंत्री के विशेष कार्य पदाधिकारी श्री गोपाल सिंह एवं दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के अधिकारीगण उपस्थित थे।

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भारतीय नव वर्ष

Posted: 01 Apr 2022 08:24 AM PDT

भारतीय नव वर्ष 

बसंत बहारों फागुनी रंग बयारों से पाकर यौवन,पूरा भारत झूम रहा है आज

अवनि और अंबर प्रफुल्लित हो रहे, सभी देव सुमन वर्षा रहे आज

मंद पवन के झोकों से चहुं ओर बह रही, सुरभि सुगंधित आज

दशों दिशाएं पुलकित हैं, भारत की महिमा के गीत गा रहीं आज

देख छटा भारत भूमि की , प्रकृति सृष्टि भी पुलक रही है आज

सूर्य-शशि में होड़ लगी है, भारत माता की आरती कौन उतारे आज

भारत माता का वैभव श्रंगारित स्वरूप देख, ऋद्धि सिद्धि भी लजा रहीं हैं आज

पूरा भारत नव दुर्गा की नवधा भक्ति शक्ति की, उपासना शुरू कर रहा आज

जवान, किसान, युवा, उद्यमी, स्त्री-पुरुष, सब में  सृजन साकार हो रहा आज

उत्तर- दक्षिण,पूरब- पश्चिम खुशियां छायीं,सब एक सूत्र में बॅ॑ध रहे आज

उत्साह, ऊर्जा की लहर उठाता, युग बोध की स्मृति जगाता,नव वर्ष आ गया आज

पुण्य धरा भारत की घर घर में धन-धान्य की, खुशहाली लाती आज

शस्यश्यामला भारत माता सतरंगी, परिधान पहन है हर्षाती आज

आर्यावर्त भरतखण्ड की इस पुण्यभूमि की,यश कीर्ति गा रहा विश्व आज

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्रति वर्ष, है हमारा नव वर्ष, प्रकृति सृष्टि भर जाती है चिर यौवन से आज....

बसंत बहारों फागुनी रंग बयारों से पाकर यौवन, पूरा भारत झूम रहा है आज.......

अवनि और अंबर प्रफुल्लित हो रहे, सभी देव सुमन वर्षा रहे आज ......

       जय भारत जय हिन्द


      चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"
  (ओज कवि एवं राष्ट्रवादी चिंतक)
        अहमदाबाद, गुजरात
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