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Monday, June 6, 2022

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UPTET प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगने से बीएड खेमें में बेचैनी, डीएलएड खेमा कर रहा मजबूत पैरवी

Posted: 06 Jun 2022 05:53 PM PDT

UPTET प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगने से बीएड खेमें में बेचैनी, डीएलएड खेमा कर रहा मजबूत पैरवी


बीएड वालों के लिए UPTET 2021 का प्रमाणपत्र जारी करने पर हाईकोर्ट की रोक बरकरार रहने से बीएड खेमें में  खलवली मच गयी है. डीएलएड वाले अपना पक्ष मजबूती से रख रहे हैं. क्योंकि कुछ राज्यों ने बीएड को प्राइमरी से बाहर कर दिया है. अब देखना यह है कोर्ट में राज्य सरकार क्या पक्ष रखती है. 


जानिए क्या हुआ था विगत की सुनवाई में 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी टेट पास करने वाले बीएड डिग्री धारकों को पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने पर पहले से लगाई गई रोक बरकरार रखी है। कोर्ट ने मामले में स्थगन आदेश को बढ़ाते हुए एनसीटीई को 14 जुलाई तक जवाब दाखिल करने को कहा है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने प्रतीक मिश्रा व चार अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।


मंगलवार को सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि एनसीटीई जब तक नोटिफिकेशन जारी नहीं करेगी, वह कुछ नहीं कर सकती है। तो कोर्ट ने एनसीटीई को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की सुनवाई अब जुलाई में होगी। याची पक्ष की ओर से अधिवक्ता तान्या पांडेय ने तर्क दिया कि मामले में यूपी सरकार और एनसीटीई दोनों बच रहे हैं। वे स्थिति को स्पष्ट नहीं कर रहे हैं।


याची पक्ष का तर्क था कि राजस्थान हाईकोर्ट ने एनसीटीई (नेशनल कौंसिल फॉर टीचर एजूकेशन) के 28 जून 2018 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें बीएड डिग्री धारकों को भी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने के लिए पात्र माना गया है।


कहा गया कि जब नोटिफिकेशन ही रद्द कर दिया गया तो बीएड डिग्री धारक प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने के पात्र ही नहीं रहे। लिहाजा टेट 2021 पास करने वाले बीएड डिग्री धारकों को पात्रता प्रमाण पत्र न जारी किए जाएं। कोर्ट ने तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए टेट 2021 में क्वालीफाई करने वाले बीएड डिग्री धारकों को पात्रता प्रमाण पत्र अगली सुनवाई तक न जारी करने का आदेश दिया था। साथ ही परीक्षा नियामक प्राधिकारी से भी जानकारी मांगी थी।

समाज कल्याण के 489 स्कूलों में भर्ती पर रोक, छात्रों के अनुपात में अधिक शिक्षक होने पर लिया गया निर्णय

Posted: 06 Jun 2022 05:52 PM PDT

समाज कल्याण के 489 स्कूलों में भर्ती पर रोक, छात्रों के अनुपात में अधिक शिक्षक होने पर लिया गया निर्णय


प्रयागराज : बेसिक शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त और समाज कल्याण विभाग से संचालित व अनुदानित प्रदेश के 489 प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती और वित्तीय अनुमोदन पर रोक लगा दी गई है। अनु सचिव शासन ने 11 मई को निदेशक समाज कल्याण विभाग को पत्र लिखकर इन स्कूलों में चयन के लिए गठित समिति भंग कर दी है। साथ ही छात्र-शिक्षक अनुपात तार्किक बनाने का अनुरोध किया है।


समाज कल्याण विभाग ने अनुदानित स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों एवं उनमें पंजीकृत व उपस्थित छात्र-छात्राओं की सूचनाएं अक्टूबर 2021 में जिला समाज कल्याण अधिकारियों से जुटाई तो पता चला कि 489 स्कूलों में कुल 71006 छात्र पंजीकृत हैं। इन स्कूलों में स्वीकृत 3676 पदों के सापेक्ष 1759 शिक्षक कार्यरत हैं। कक्षा एक से पांच तक के इन स्कूलों में शिक्षकों के औसतन 7.5 पद स्वीकृत हैं। जबकि छात्र-छात्राओं की संख्या काफी कम है।

कुछ स्कूलों में 23 से 25 तक हैं शिक्षक: यह भी पता चला कि कुल स्कूलों में शिक्षकों के स्वीकृत पदों की संख्या 23 से 25 तक है। शासन का मानना है कि शिक्षा के सार्वभौमीकरण के बाद समाज कल्याण के इन प्राथमिक स्कूलों की उपादेयता ही समाप्त हो चुकी है क्योंकि बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से प्रति एक से डेढ़ किमी. पर स्कूल स्थापित किए गए हैं।

भविष्य में जरूरत होने पर परीक्षा से होगी भर्ती: शासन ने साफ किया है कि भविष्य में जरूरत होने पर समाज कल्याण के अनुदानित स्कूलों में प्रतियोगी परीक्षा के जरिए शिक्षकों की भर्ती होगी।

30 से कम छात्र वाले स्कूल बंद होंगे

आदेश में साफ है कि जिन स्कूलों में 30 से कम बच्चे पंजीकृत हैं उन्हें अनुदान सूची में बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। इन स्कूलों के छात्रों को बेसिक शिक्षा विभाग के निकटस्थ स्कूलों में प्रवेश देकर शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में समायोजित करने को कहा है।

अल्पसंख्यक संस्थानों की भर्ती में शक्तियां सीमित : हाइकोर्ट

Posted: 06 Jun 2022 05:49 PM PDT

अल्पसंख्यक संस्थानों की भर्ती में शक्तियां सीमित : हाइकोर्ट

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि वित्तीय सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान में लिपिक भर्ती के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की नियुक्ति प्रक्रिया में राज्य सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।


यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने अलीगढ़ के अल्पसंख्यक संस्थान श्री उदय सिंह जैन कन्या इंटर कॉलेज में कार्यरत लिपिक मनोज कुमार जैन की याचिका पर दिया है। याचिका के अनुसार विद्यालय प्रबंध समिति ने याची की लिपिक संवर्ग में नियुक्ति जनवरी 2018 में की थी, जिस पर जिला विद्यालय निरीक्षक ने वित्तीय स्वीकृति प्रदान करने से मना कर दिया था। याची ने डीआईओएस के आदेश के विरुद्ध याचिका की, जिसमें न्यायालय ने डीआईओएस के आदेश को निरस्त करते हुए पुन: आदेश करने का निर्देश दिया, लेकिन डीआईओएस ने फिर वित्तीय स्वीकृति प्रदान करने में असहमति जताई।


अहम फैसला : अल्पसंख्यक संस्थानों को कर्मचारियों की नियुक्ति का है विशेषाधिकार


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक अहम आदेश में कहा है कि सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत विशेष अधिकार प्राप्त है।

इस अधिकार के तहत वह अपने यहां कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकते हैं, उसमें राज्य सरकार की ओर से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने मनोज कुमार जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। याचिका में कहा गया कि विद्यालय प्रबंध समिति ने याची की लिपिक संवर्ग में नियुक्ति जनवरी 2018 में की थी, जिस पर जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) ने वित्तीय स्वीकृति प्रदान करने से मना कर दिया था।

याची ने वर्ष 2018 में डीआईओएस के आदेश के विरुद्ध हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसमें कोर्ट ने जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेश को निरस्त करते हुए पुन: आदेश जारी करने का निर्देश दिया था। किंतु जिला विद्यालय निरीक्षक ने दूसरी बार भी वित्तीय स्वीकृति प्रदान करने में अपनी असहमति जताई थी।

शिक्षा विभाग ने विज्ञापन पर उठाए थे सवाल

माध्यमिक शिक्षा विभाग ने अपने प्रतिशपथ पत्र में बताया कि विद्यालय प्रबंधन समिति द्वारा लिपिक पद हेतु दिए गए विज्ञापन की न तो विभाग से अनुमति ली गई थी और न ही विज्ञापन में न्यूनतम आवश्यक योग्यता, आयु सीमा और वेतनमान का वर्णन किया गया था।

 विभाग का कहना था कि विद्यालय प्रबंधन ने चयन समिति में जिला अधिकारी द्वारा नामित सदस्य एवं आरक्षित वर्ग के सदस्य के स्थान पर विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं सहायक अध्यापक को सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जो कि चयन समिति की निष्पक्षता एवं पारदर्शिता पर संदेह उत्पन्न करते हैं।

याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वित्त पोषित अल्पसंख्यक माध्यमिक विद्यालय में लिपिक संवर्ग में भर्ती हेतु जिला विद्यालय निरीक्षक की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के पश्चात कहा कि सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक विद्यालयों में लिपिक भर्ती हेतु जिला विद्यालय निरीक्षक का पूर्व अनुमोदन आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों की नियुक्ति के मामले में चयन समिति में जिला अधिकारी द्वारा नामित एवं आरक्षित वर्ग के सदस्य को शामिल करना भी आवश्यक नहीं है ।अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता भंग नहीं कर सकती सरकारहाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार अल्पसंख्यक संस्थानों पर प्रशासनिक अधिकार के नियम थोपकर उनकी स्वायत्तता भंग नहीं कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि जिला विद्यालय निरीक्षक चयनित अभ्यर्थी की नियुक्ति को बिना अर्हता पाए जाने पर ही अवैध ठहरा सकता है। कोर्ट ने कहा कि जिला विद्यालय निरीक्षक ने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था को संविधान द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकारों की उपेक्षा कर दो बार आदेश दिया है।


डीआईओएस का आदेश निरस्त, करना होगा वेतन का भुगतान

कोर्ट ने जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा लिपिक को वित्तीय सहमति न प्रदान करने संबंधी आदेश को निरस्त करते हुए याची को वर्ष 2018 से वित्तीय सहमति प्रदान करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने याची को अगले तीन महीनों में वर्ष 2018 से अद्यतन अवधि तक का वेतन भुगतान करने का निर्देश दिया, साथ ही अगले 3 महीनों में एरियर भुगतान न होने की स्थिति में याची को 12 फीसदी ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही राज्य को भुगतान में देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी से ब्याज की वसूली करने की छूट दी है।

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