| ऋग्वेद वर्णित दारिद्रय नाशक श्री सूक्त हिंदी अर्थ सहित Posted: 16 Jul 2022 06:30 AM PDT ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥1॥ अर्थ – हे सर्वज्ञ अग्निदेव ! सुवर्ण के रंग वाली, सोने और चाँदी के हार पहनने वाली, चन्द्रमा के समान प्रसन्नकांति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी को मेरे लिये आवाहन करो।तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥2॥अर्थ – अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवी को, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं सोना, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि को प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो।अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥3॥अर्थ – जिन देवी के आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं तथा जो हस्तिनाद को सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवी का मैं आवाहन करता हूँ; लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों।कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रांज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।पद्मेस्थितां पद्मवर्णांतामिहोप ह्वये श्रियम् ॥4॥अर्थ – जो साक्षात ब्रह्मरूपा, मंद-मंद मुसकराने वाली, सोने के आवरण से आवृत, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, अपने भक्तों पर अनुग्रह करनेवाली, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तींश्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्येअलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥5॥अर्थ – मैं चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों के द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता लक्ष्मीदेवी की शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ।आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातोवनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।तस्य फलानि तपसा नुदन्तुया अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥6॥अर्थ – हे सूर्य के समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल हमारे बाहरी और भीतरी दारिद्र्य को दूर करें।उपैतु मां देवसखःकीर्तिश्च मणिना सह।प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥7॥अर्थ – देवि ! देवसखा कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों अर्थात मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥8॥अर्थ – लक्ष्मी की ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन और क्षीणकाय रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ। देवि ! मेरे घर से सब प्रकार के दारिद्र्य और अमंगल को दूर करो।गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥9॥अर्थ – जो दुराधर्षा और नित्यपुष्टा हैं तथा गोबर से ( पशुओं से ) युक्त गन्धगुणवती हैं। पृथ्वी ही जिनका स्वरुप है, सब भूतों की स्वामिनी उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ अपने घर में आवाहन करता हूँ।मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥10॥अर्थ – मन की कामनाओं और संकल्प की सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हो। गौ आदि पशु एवं विभिन्न प्रकार के अन्न भोग्य पदार्थों के रूप में तथा यश के रूप में श्रीदेवी हमारे यहाँ आगमन करें।कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥11॥अर्थ – लक्ष्मी के पुत्र कर्दम की हम संतान हैं। कर्दम ऋषि ! आप हमारे यहाँ उत्पन्न हों तथा पद्मों की माला धारण करनेवाली माता लक्ष्मीदेवी को हमारे कुल में स्थापित करें।आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥12॥अर्थ – जल स्निग्ध पदार्थों की सृष्टि करे। लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! आप भी मेरे घर में वास करें और माता लक्ष्मीदेवी का मेरे कुल में निवास करायें।आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥13॥अर्थ – अग्ने ! आर्द्रस्वभावा, कमलहस्ता, पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मों की माला धारण करनेवाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे यहाँ आवाहन करें।आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥14॥अर्थ – अग्ने ! जो दुष्टों का निग्रह करनेवाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करनेवाली यष्टिरूपा, सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें।तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥15॥अर्थ – अग्ने ! कभी नष्ट न होनेवाली उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आवाहन करें, जिनके आगमन से बहुत-सा धन, गौएँ, दासियाँ, अश्व और पुत्रादि को हम प्राप्त करें।यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥16॥अर्थ – जिसे लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्नि में घी की आहुतियाँ दे तथा इन पंद्रह ऋचाओं वाले श्री सूक्त का निरन्तर पाठ करे।पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सं नि धत्स्व ॥17॥अर्थ – कमल के समान मुखवाली ! कमलदल पर अपने चरणकमल रखनेवाली ! कमल में प्रीति रखनेवाली ! कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाली ! समग्र संसार के लिये प्रिय ! भगवान विष्णु के मन के अनुकूल आचरण करनेवाली ! आप अपने चरणकमल को मेरे हृदय में स्थापित करें।पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षि पद्मसम्भवे।तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥18॥अर्थ – कमल के समान मुखमण्डल वाली ! कमल के समान ऊरुप्रदेश वाली ! कमल के समान नेत्रोंवाली ! कमल से आविर्भूत होनेवाली ! पद्माक्षि ! आप उसी प्रकार मेरा पालन करें, जिससे मुझे सुख प्राप्त हो।अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने।धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥19॥अर्थ – अश्वदायिनी, गोदायिनी, धनदायिनी, महाधनस्वरूपिणी हे देवि ! मेरे पास सदा धन रहे, आप मुझे सभी अभिलषित वस्तुएँ प्रदान करें।पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्।प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥20॥अर्थ – आप प्राणियों की माता हैं। मेरे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, हाथी, घोड़े, खच्चर तथा रथ को दीर्घ आयु से सम्पन्न करें।धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना ॥21॥अर्थ – अग्नि, वायु, सूर्य, वसुगण, इन्द्र, बृहस्पति, वरुण तथा अश्विनी कुमार – ये सब वैभवस्वरुप हैं।वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥22॥अर्थ – हे गरुड ! आप सोमपान करें। वृत्रासुर के विनाशक इन्द्र सोमपान करें। वे गरुड तथा इन्द्र धनवान सोमपान करने की इच्छा वाले के सोम को मुझ सोमपान की अभिलाषा वाले को प्रदान करें।न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।भवन्ति कृतपुण्यानां भक्त्या श्रीसूक्तजापिनाम् ॥23॥अर्थ – भक्तिपूर्वक श्री सूक्त का जप करनेवाले, पुण्यशाली लोगों को न क्रोध होता है, न ईर्ष्या होती है, न लोभ ग्रसित कर सकता है और न उनकी बुद्धि दूषित ही होती है।सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे।भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेत्रिभुवनभूतिकरि प्र सीद मह्यम् ॥24॥अर्थ – कमलवासिनी, हाथ में कमल धारण करनेवाली, अत्यन्त धवल वस्त्र, गन्धानुलेप तथा पुष्पहार से सुशोभित होनेवाली, भगवान विष्णु की प्रिया लावण्यमयी तथा त्रिलोकी को ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली हे भगवति ! मुझपर प्रसन्न होइये।विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्।लक्ष्मीं प्रियसखीं भूमिं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥25॥अर्थ – भगवान विष्णु की भार्या, क्षमास्वरूपिणी, माधवी, माधवप्रिया, प्रियसखी, अच्युतवल्लभा, भूदेवी भगवती लक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ।महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥26॥अर्थ – हम विष्णु पत्नी महालक्ष्मी को जानते हैं तथा उनका ध्यान करते हैं। वे लक्ष्मीजी सन्मार्ग पर चलने के लिये हमें प्रेरणा प्रदान करें।आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः ॥27॥अर्थ – पूर्व कल्प में जो आनन्द, कर्दम, श्रीद और चिक्लीत नामक विख्यात चार ऋषि हुए थे। उसी नाम से दूसरे कल्प में भी वे ही सब लक्ष्मी के पुत्र हुए। बाद में उन्हीं पुत्रों से महालक्ष्मी अति प्रकाशमान शरीर वाली हुईं, उन्हीं महालक्ष्मी से देवता भी अनुगृहीत हुए।ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः।भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥28॥अर्थ – ऋण, रोग, दरिद्रता, पाप, क्षुधा, अपमृत्यु, भय, शोक तथा मानसिक ताप आदि – ये सभी मेरी बाधाएँ सदा के लिये नष्ट हो जाएँ।श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥29॥अर्थ – भगवती महालक्ष्मी मानव के लिये ओज, आयुष्य, आरोग्य, धन-धान्य, पशु, अनेक पुत्रों की प्राप्ति तथा सौ वर्ष के दीर्घ जीवन का विधान करें और मानव इनसे मण्डित होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करे।॥ ऋग्वेद वर्णित श्री सूक्त सम्पूर्ण ॥ |
| वर्तमान युग के मनीषी - महायोगी पायलट बाबा Posted: 15 Jul 2022 08:34 PM PDT 
भारतीय सेना के विंग कमांडर कपिल सिंह राजपूत ने 1962 में चीन, 1965 में पाकिस्तान और 1971 के बंगलादेश युद्ध में अपने शौर्य का परिचय दिया। देश ने उन्हें वीर चक्र और सेना मैडल से भी सम्मानित किया । लेकिन विधाता ने तो उनकी भूमिका कुछ और ही तय कर रखी थी। सन 1996 में जब वह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में मिग विमान उड़ा रहे थे, तभी विमान में कोई तकनीकी खराबी आ गई और अचानक विमान नियंत्रण से बाहर हो गया। विमान हादसे का शिकार होते ही रहते हैं, उन्होंने भी मान लिया कि बचना नामुमकिन है। मृत्यु सामने खड़ी थी कि तभी चमत्कार हो गया। उन्हें लगा कि कॉकपिट में उनके गुरु हरि बाबा खड़े हैं। उसके बाद विमान सुरक्षित बेस कैंप पर उतार लिया गया। बेस कैम्प पर उनके अधिकारी व साथी चिंतित मुद्रा में स्थिति पर नजर रखे हुए थे। उन्होंने भी मान लिया था कि दुर्घटना होने ही बाली है। इसलिए जब विमान ने सुरक्षित भूमि को स्पर्श किया, तो सभी हैरत में आ गए। जिस समय कपिल सिंह साथियों से वधाई व शाबासी ले रहे थे, तभी पास की झाडिओं में से हरी बाबा बाहर आये और हाथ फैलाकर कपिल सिंह से दो रुपये मांगे। कपिल ने सादर दो रुपये उन्हें दिये और बाबा वापस घूमकर झाड़ियों में गुम हो गए। आश्चर्य से अधिकारी ने पूछा कौन थे ये, कहाँ से आये और कहाँ चले गए। कपिल ने जबाब दिया, मुझे बचाने आये थे, मुझे बचाकर चले गए। लेकिन उस घटना के बाद उन्होंने तय किया कि अब वह सेना की लड़ाई से दूर शांति और आध्यात्म का जीवन बिताएंगे । सेना की नौकरी छोड़ने के बाद अपने गुरु के निर्देश पर हिमालय की नंदा देवी घाटी में 16 साल तक तपस्या, ध्यान व योग किया। जब वापस लौटे तो पूरी तरह रूपांतरित हो चुके थे। लोगों ने उन्हें नाम दिया पायलट बाबा। आईये उनके जीवन पर एक विहंगम दृष्टि डालें -15 जुलाई 1936 को रोहतास जिला सासाराम में कपिल सिंह का जन्म हुआ। घर वालों ने प्यार से 'ललन' कह कर पुकारा। दार्जलिंग से स्कूली शिक्षा पूर्ण कर सन 1957 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जैविक रसायन विज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त की। और उसके बाद देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत कपिल सिंह ने भारतीय वायु सेना में प्रवेश किया और जैसा कि पूर्व में ही वर्णन किया अपने शौर्य व राष्ट्र प्रेम का परिचय दिया।विंग कमांडर से पायलट बाबा बनने के बाद उन्होंने आम जन के कल्याण व उन्हें सत्य के मार्ग पर ले जाने हेतु 'विश्व शांति अभियान' के तहत विभिन्न राष्ट्रों की आध्यात्मिक यात्रा की जिनमें –जापान ,अमेरिका,रूस ,युक्रेन ,ब्रिटेन ,फ्रांस व जर्मनी और अन्य यूरोपियन राष्ट्र प्रमुख है | इन देशों की यात्रा द्वारा 'योग' ,'ध्यान' और 'क्रिया योग' को माध्यम बना समूचे विश्व को भारतीय संस्कृति से एक बार पुनः परिचय कराने में पायलट बाबा की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं |भारत में भी 'दस महाविद्या' और 'महामृत्युंजय यज्ञ 'यज्ञ सहित १०८ से अधिक यज्ञ कराये। वह अब तक 100 से भी अधिक बार समाधि ले चुके हैं। इसमें सबसे लम्बी समाधि 30 दिनों की थी। जबकि 9 दिन तक जल समाधि और एक दिन तक बिना ऑक्सीजन वाले कमरे में रहे हैं। कहा जा सकता है कि यज्ञ व समाधि के माध्यम से पूरे देश को उन्होंने आध्यात्मिक उर्जा व शक्ति से मथ डाला | आज भी जब वे आयु के छियासी वर्ष पूर्ण कर चुके हैं, अस्वस्थ भी हैं, अहर्निश चिंतन व मनन के साथ मानव कल्याण और विश्व शांति हेतु निरंतर प्रयास रत हैं। प्रेम और भक्ति ही उनके अंदर वास करती है और वह अधिक से अधिक जन कल्याण के लिए संकल्प बद्ध हैं। |