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Sunday, July 10, 2022

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गुरू पूर्णिमा क्यों मनाएं - कैसे मनाएं।

Posted: 10 Jul 2022 01:33 AM PDT


हम ऐसी भूमि पर पैदा हुए हैं, जिसने सदैव दुनिया का मार्गदर्शन किया है । इसीलिए हमारे हर पर्व हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई सन्देश छुपा हुआ है, ज्ञान, त्याग, तपस्या और मानव कल्याण का सन्देश। गुरुपूर्णिमा भी हजारों वर्षों से चला आ रहा हमारा ऐसा ही पारंपरिक त्योहार है, जिसे महर्षि वेदव्यास के जन्म दिवस अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। अब प्रश्न उठता है, कौन थे ये वेदव्यास और ऐसा इन्होने क्या किया कि हजारों वर्षों से हर वर्ष उनका जन्म दिवस मनाया जा रहा है। इसका संक्षेप में उत्तर होगा कि अगर भारत का ज्ञान, भारत के वेद आक्रामकों के इतने हमलों के बाद, सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद भी सुरक्षित रहे, तो इन्हीं व्यास जी की दूरदर्शिता के कारण।

कहने को तो वे ऋषि पराशर और एक मछुआरे की पुत्री सत्यवती के पुत्र थे। श्याम वर्णी व्यास जी का जन्म भी हुआ तो एक निर्जन द्वीप में। अतः नाम भी हुआ कृष्ण द्वैपायन व्यास। अतः सामाजिक दृष्टि से देखें तो समाज मान्य होने का कोई कारण ही नहीं। लेकिन पुरातन काल में भारत ज्ञान को पूजता था। यह वैशिष्ट्य उसके नाम में ही निहित है। भा का अर्थ ज्ञान, जहाँ ज्ञान पिपासा हो, वह भारत।
अब विचार करें कि इन व्यास जी ने ऐसा कौन सा कार्य किया कि समाज ने न केवल उन्हें प्रतिष्ठा दी, वरन भगवान वेदव्यास कहकर पूजनीय माना। वस्तुतः चारों वेद किसी एक व्यक्ति द्वारा लिखित पुस्तकें नहीं हैं। तपस्या करने वाले ऋषियों ने अस्तित्व के सत्य को देखा, समझा जाना, और उनके द्वारा मन्त्र रूप में वह शिष्यों को दिया गया । इन मंत्रों को ही "वेद" कहा जाता है।

वेदव्यास ने इन सभी ऋचाओं (मंत्रों) को संहिता के रूप में एकत्रित किया और उन्हें विभिन्न शाखाओं के साथ चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के रूप में संपादित किया। उन्होंने न केवल वेदों का संपादन किया,अपितु उन्होंने कुछ परिवारों को प्रत्येक शाखा आवंटित करके वेदों की रक्षा करने की व्यवस्था भी की। उन परिवारों पर वेदों की उस शाखा की रक्षा करने की जिम्मेदारी थी। उन्होंने विभिन्न समुदायों से संबंधित परिवारों को ज्ञान की अन्य शाखाओं जैसे सर्जरी, आयुर्वेद, वास्तुकला आदि को भी आवंटित किया। इस प्रकार, प्रत्येक परिवार, प्रत्येक समुदाय वेदों की सुरक्षा करने वाला संरक्षक बन गया ।

इस ज्ञान को पिता द्वारा पुत्र को, गुरु द्वारा शिष्य को प्रदान करने का कार्य इस प्रकार किया गया कि हमारा भारत, इतने आक्रमणों के बावजूद भी हजारों वर्षों तक ज्ञान की भूमि बना रह सका। ज्ञान, आध्यात्मिक विद्या की विशिष्ट शाखा की रक्षा करना और इसे गुरु से सीखकर आने वाली पीढ़ी को इसे देने के लिए प्रतिबद्ध होना प्रत्येक परिवार का पवित्र कर्तव्य बन गया। इस व्यवस्था के जनक व्यास जी ही थे, अतः उनके नाम के साथ वेद भी जुड़ गया और आदि गुरू मानकर कृतज्ञता पूर्वक उनकी जयंती को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा ।
अब वेदव्यास तो हमारे काल में हैं नहीं, अतः इस दिन हम उन सभी गुरुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने हमें हमारे जीवन में कुछ भी सिखाया या जो हमारे लिए महत्वपूर्ण है। गु का अर्थ अज्ञान, अन्धकार और रु का अर्थ नष्ट करने वाला | जो अज्ञान का अन्धकार हटाये, दूर करे वही गुरू | जहां से कोई शिक्षा मिले, उसे गुरू कहा जा सकता है। एक और बात महत्वपूर्ण है। अगर सीखने की इच्छा है तो व्यक्ति किसी से भी सीख सकता है। अगर हमारे अंतस में शिष्य भाव है, तो हम सृष्टि की हर वस्तु से कुछ न कुछ सीख सकते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं भगवान दत्तात्रय, जिन्होंने अपने आसपास के कीट पतंगों से लेकर सूर्य चन्द्रमा तक से कुछ ना कुछ ज्ञान प्राप्त किया और इस प्रकार चौबीस गुरू बनाये। आईये उनमें से कुछ का वर्णन देखें, कि किससे उन्होंने क्या सीखा।
वायु से निरंतर गतिशील रहना ,जल से सब को शुद्ध बनाना ,सदा सरल और तरल रहना ,अग्नि से अपने संपर्क में आने वाली हर बस्तु को अपने जैसा ही बना लेना, सूर्य से नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरंतर करना, चन्द्रमा से अपने पास प्रकाश ना होने पर भी सूर्य से याचना कर पृथ्वी को चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी लोक-सेवक, विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश होकर ना बेठना और फिर आगे बढ़ने के साहस को बार -बार करते रहना धेर्यवान चन्द्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है !
दाने के लालच में जाल में फंसने वाला कबूतर ज्ञान देता है कि लोभ और अविवेक से पतन होता है ! शीत ऋतु में अंग जकड जाने और वर्षा के कारण मार्ग अवरुद्ध रहने के कारण भूखा अजगर मिटटी खा कर काम चलाते हुए धेर्य पूर्वक दुर्दिन को सहन करता है, उससे सहनशीलता की शिक्षा मिलती है ! फूलों का मधुर रस संचय कर दूसरों के लिए समर्पित करने वाली मधुमक्खी सिखाती है कि मनुष्य को स्वार्थी नहीं परमार्थी होना चाहिये ! कामातुर हाथी मायावी हथनियों द्वारा प्रपंच में फँसा कर बंधन में बाँध दिया गया और फिर आजीवन त्रास भोगता रहा ! यह देख कर वासना के दुष्परिणाम समझ में आते हैं इसी प्रकार जीभ की लोलुप मछली भी मछुए के फंदे में फंसकर सीख देती है कि इंद्रियलिप्सा के क्षणिक आकर्षण में जीव का कितना बड़ा अहित होता है !


पिंगला वेश्या जब तक युवा रही तब तक उसके अनेक ग्राहक रहे ! लेकिन वृद्ध होते ही वे सब साथ छोड़ गए ! रोग और गरीबी ने उसे घेर लिया ! लोक में निंदा और परलोक में उसकी दुर्गति देखकर शिक्षा मिलती है कि समय चूक जाने पर पछताना ही बाकी रह जाता है ! किसी पर विश्वास ना करके धूर्तता की नीति अपनाने वाला कौवा घाटे में ही रहा,उसे सब का तिरस्कार मिला और अभक्ष खा कर संतोष करना पड़ा !यह देख कर समझ में आता है कि धूर्तता और स्वार्थ की नीति अंतत हानिकारक ही होती है ! राग ,द्वेष ,चिंता ,काम ,लोभ ,क्रोध से रहित जीव कितना कोमल ,सोम्य और सुन्दर लगता है कितना सुखी और शांत रहता है यह किसी नन्हे बालक को देखकर समझा जा सकता है ! चूडियाँ पहनकर धान कूट रही महिला की चूड़ियाँ आपस में खड़कती थीं ! वो चाहती थी की घर आये मेहमान को इसका पता ना चले इसलिए उसने हाथों की बाकी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक एक ही रहने दी तो उनका आवाज करना भी बंद हो गया ! यह देख दत्तात्रय जी ने विचार किया कि अनेक कामनाओ के रहते मन में संघर्ष उठते हैं ,पर यदि एक ही लक्ष्य नियत कर लिया जाए तो सभी उद्वेग शांत हो जाएँ ! सर्प दूसरों को त्रास देता है और बदले में सबसे त्रास ही पाता है, जो यह बताता है की उद्दंड ,आतताई, आक्रामक और क्रोधी होना किसी के लिए भी सही नहीं है !
कहने का आशय यह कि हम सभी परस्पर जुड़े हुए और अन्योन्याश्रित हैं। इसलिए हममें से प्रत्येक किसी न किसी को कुछ न कुछ सिखाते भी हैं, और सीखते भी हैं। जन्म के बाद से माँ बच्चे को, बड़ों, शिक्षकों, गाय, पेड़ आदि को नमस्कार करना सिखाती है, जो कि जीवित प्राणी है। वह बच्चे को किताबों, भोजन, उपकरणों आदि जैसी निर्जीव चीजों को सम्मान देना भी सिखाती है।
कई बार हम अवसाद, आत्म-हीनता, अज्ञान, स्वार्थ, देहबुद्धि, अहंकार आदि के अंधेरे में फंस जाते हैं। ऐसे समय में जो भी हमारी मदद करता है और हमें इससे बाहर निकलने में मदद करता है और वस्तुतःहमारी आंखें खोलता है, वह गुरु, माता-पिता, दादा-दादी, दोस्त, भाई-बहन, शिक्षक, पड़ोसी आदि कोई भी हो सकते हैं। वे हमारे गुरु हैं। किन्तु यदि हम अभिमानी हैं तो स्वयं नारायण हमें सिखाने आ जाएँ, तो भी हम नहीं सीख सकते। हमारे जीवन में ऐसे कौन से अवसर हैं जब किसी ने हमें बहुत अच्छी तरह निर्देशित किया और हमारी आँखें खोलीं। आइए आज उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करें ।
गुरुपूर्णिमा के दिन, हम अपने आप को याद दिलाते हैं कि ईश्वर जो चराचर में व्याप्त है, वह हमें हमारे आसपास के सभी लोगों के माध्यम से सिखाता है। हमने अपने आस-पास के लोगों से क्या सीखा हैं, किससे सीखा है, यह इंसान हो सकता है, यह जानवर, पक्षी, पेड़ और यहां तक कि निर्जीव चीजें भी हो सकती हैं।
दूसरों से सीखने की यह विनम्रता, दूसरों से सीखने की यह तत्परता हर जगह ईश्वर को देखने के लिए हमारे मन को शुद्ध करती है। ईश्वर द्वारा प्रतिपादित यह चराचर हमें कई चीजें सिखा सकता है। आइए हम संकल्प लें कि चराचर से मैं प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखूंगा।


हमारे यहाँ पुरातन काल में शिक्षक या गुरू आश्रम बनाकर रहता था तथा निस्वार्थ भाव से समाज के प्रति अपना कर्तव्य मानकर ज्ञान दान करता था ! गुरू का व्यक्तित्व, अनुभव, जानकारी, ज्ञान, चरित्र, स्वभाव हर दृष्टि से इतना श्रेष्ठ होता था कि बड़े से बड़े राजा महाराजा भी उनके सामने नतमस्तक होते थे ! शिक्षा देना केवल पढ़ाना मात्र नहीं था, व्यवहार तथा योग्यतानुसार कौशल की शिक्षा भी इसमें सम्मिलित थी ! और सबसे बड़ी बात यह कि यह कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं था, आय का साधन भी नहीं था ! कर्तव्य बुद्धि तथा धर्म भाव से की गई एक प्रकार की तपस्या थी ! इसीलिए भारत में गुरू के प्रति पूज्य भाव था !
गुरू शिष्य परंपरा में राजा का पुत्र हो या निर्धन का बालक, सभी आश्रम में साथ साथ रहकर अध्ययन करते थे | ज्ञान प्राप्ति उपरांत वे अपने जीवन व समाज की संरचना करते थे | शिष्यों ने मानवीय मूल्यों को कितना धारण किया है, गुरू उसकी परीक्षा लेते थे | गुरू अपने सम्पूर्ण ज्ञान का समर्पण करता था | उसे सर्वोत्तम सुख तब मिलता था, जब उसे लगता था कि उसका शिष्य उससे एक कदम आगे निकल गया | गुरू परशुराम और शिष्य भीष्म जब किसी कारण आमने सामने आये, तब पराजित होने पर भी परशुराम गदगद हो गए | उन्होंने भीष्म को युगों युगों तक अक्षय कीर्ति का आशीर्वाद दिया | यही परम्परा भारतीय सांस्कृतिक चेतना के मूल तत्वों में से एक है |
गुरू को शिष्यों द्वारा दी गई दक्षिणा को समर्पण कहना अधिक उपयुक्त होगा ! शिष्य गुरू के लिए सर्वस्व समर्पित करता था | जैसे कि क्षत्रपति शिवाजी ने अपने गुरू समर्थ स्वामी रामदास को किया ! अपना सम्पूर्ण राज्य उन्हें अर्पित करने के बाद समर्थ का आदेश स्वीकार कर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया !
समर्पण का अर्थ है, सम्यक अर्पण, बिना अहंकार और अपेक्षा के उत्कृष्ट मनोभाव से समर्पित होना | यद्यपि गुरू कुछ मांगता नहीं था, किन्तु उनकी इच्छा का अनुमान कर अधिकतम देने की इच्छा रहती थी शिष्य की ! चूंकि यह भुगतान नहीं समर्पण था, अतः लोंग इलायची या स्वर्ण भण्डार में कोई अंतर नहीं था ! ऐसी अनोखी थी यह परंपरा, जिसमें भाव मुख्य था, बस्तु गौण !
व्यक्ति में क्षरण हो सकता है, किन्तु विचार में तत्व में नहीं! शायद यही कारण रहा कि गुरू गोबिंद सिंह जी को कहना पड़ा कि मेरे बाद किसी को गुरू नहीं मानना ! इसलिए पूर्व के गुरुओं ने जो उपदेश दिए, उनका संकलन कर गुरू ग्रन्थ साहब को गुरू मानने का उन्होंने निर्देश दिया ! अनुयाइयों के इसका कडाई से पालन भी किया ! आज इसके परिणाम स्वरुप सारे गुरुद्वारे समाजसेवा के केंद्र के रूप में विकसित हो गए हैं !
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी चिरंतन त्याग तपस्या व बलिदान के प्रतीक भगवा ध्वज को गुरू के रूप में सम्मुख रखा ! उसके पीछे भी यही भाव था कि व्यक्ति में क्षरण संभव है, किन्तु तत्व में नहीं !
इस समर्पण पर्व की महिमा अगर कुछ लोग भी अंगीकार कर पायें, हृदयंगम कर पायें तो त्यौहार सार्थक ! समर्पण धन का ही नहीं, समय का भी ! तत्व के लिए, विचार के लिए, देश और समाज के लिए अपना समय और श्रम देना भी समर्पण है ! भावना की ही तो बात है !
समर्पण का मूर्तिमंत उदाहरण हैं राधा ! द्वारका में कृष्ण की कई रानियाँ थीं, किन्तु वे सदा गोकुल की राधा का स्मरण करते थे, इससे रानियों के मन में द्वेष था ! कृष्ण ने रानियों को शिक्षा देने के उद्देश्य से एक नाटक रचा ! वे सुबह उठे नहीं और कारण पूछने पर पेट में दर्द की शिकायत की ! वैद्य बुलाये गए, औषधि दी गई, पर दर्द होता तो ठीक होता ना ? कृष्ण का दर्द का नाटक चालू रहा ! तभी देवर्षि नारद वहां आये और भगवान की लीला का अनुमान कर रानियीं के सामने ही प्रश्न किया, भगवन आप तो सर्वज्ञ हो, आप ही बताओ कि आपका दर्द कैसे ठीक होगा ?
भगवान ने कहा कि कोई भक्त अगर अपने पाँव धोकर मुझे पिलाएगा तो ही यह दर्द ठीक होगा ! किन्तु कोई भी रानी इसके लिए तैयार नहीं हुई ! भला कौन नारी यह पाप कर नरक का भागी बनेगी ? भगवान की इच्छा जानकर नारद गोकुल गए तथा राधा जी को भगवान के कष्ट व उपचार की जानकारी दी ! राधा ने तुरंत अपने पैर धोकर उन्हें दे दिए और आग्रह किया कि जाकर जल्द कृष्ण को पिला दें ! उन्हें अपने नरकगामी होने की चिंता नहीं, अपने प्रियतम के कष्ट का ही ध्यान रहा ! यही है समर्पण !
चित्तोड़ में भामाशाह का मंदिर है | निजी जीवन में वे अतिशय कंजूस थे | बेटे अगर कुछ माँगते तो दस बार पूछते | किन्तु जब राष्ट्र को आवश्यकता हुई तो जीवन भर का संचित धन २५ हजार स्वर्ण मुद्राएँ और २५ लाख रुपये महाराणा प्रताप को सैन्य बल पुनर्गठन हेतु समर्पित कर दिए | राणा प्रताप ने कहा मैं राजा हूँ किसी से दान नहीं ले सकता | तो तर्क किया, यह दान नहीं समर्पण है | मैं आपको नहीं मेवाड़ को दे रहा हूँ, अपनी मातृभूमि को दे रहा हूँ |
आईये इस बार गुरुपुर्णिमा के अवसर पर हम भी संकल्प लें - हम राष्ट्र और समाज के लिए, मानवता के कल्याण के लिए कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। यही तो है गुरू पूर्णिमा में अन्तर्निहित सन्देश।

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