क्रांतिदूत |
| Posted: 08 Jul 2022 07:18 AM PDT
अदालत को बताया गया कि उसे नोएडा पुलिस ने मंगलवार को गिरफ्तार कर जमानत पर रिहा कर दिया था. रिहा होने के बाद अब छत्तीसगढ़ पुलिस उसे गिरफ्तार करना चाहती है. उन पर आरोप है कि उन्होंने राहुल गांधी के बारे में भ्रामक दावों के साथ एक वीडियो शेयर किया। रंजन ने अदालत को सूचित किया कि उन्होंने इस खबर को वापस ले लिया है और यहां तक कि इसके लिए ऑन एयर माफी भी मांगी है।इस मामले में न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि एक ही मामले में रंजन के खिलाफ कई प्राथमिकी दर्ज की गई थीं, इसलिए टीटी एंटनी का मामला लागू होगा। टीटी एंटनी मामले में, अदालत ने कानून बनाया था कि कार्रवाई के एक ही कारण के लिए दूसरी प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती है।आज रोहित रंजन को तो राहत मिल गई, किन्तु हैरत की बात है कि इसी प्रकार की मांग लेकर बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने उसी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, किन्तु उन्हें राहत के स्थान पर फटकार मिली। नूपुर शर्मा ने भी 1 जुलाई 2022 को सुप्रीम कोर्ट के सामने यही तो गुहार लगाई थी कि कार्रवाई के एक ही कारण के लिए उसके खिलाफ कई प्राथमिकी दर्ज की गई हैं, और इस तथ्य को देखते हुए कि वह गंभीर खतरे में है, प्राथमिकी को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए ताकि उसे अलग-अलग शहरों की यात्रा न करनी पड़े ।किन्तु सुनवाई के दौरान, न्यायाधीश सूर्य कांत और पारदीवाला ने विषय से हटकर कई विवादास्पद बयान दिए, यहाँ तक कि इस्लामी जिहादियों द्वारा कन्हैया लाल का सिर कलम करने के लिए भी मुख्य रूप से नूपुर शर्मा को दोषी ठहराया गया, जिससे यह सन्देश गया कि हत्यारे नैतिक रूप से लगभग निर्दोष प्रतीत होने लगे ।इस्लामवादियों द्वारा फैलाई गई अराजकता और प्रतिगामी विचारों के लिए नूपुर शर्मा को दोषी ठहराते हुए, जो अस्पष्ट रूप से इस्लामी पैगंबर की किसी भी आलोचना को 'ईशनिंदा' घोषित करते हैं, देश की शीर्ष अदालत ने आश्चर्यजनक रूप से इस्लामवादियों द्वारा फैलाई गई घृणा और हिंसा की अनदेखी की और इसके बजाय नूपुर शर्मा को दोषी ठहराया है। जबकि उन्होंने केवल वही कहा था जो इस्लामी हदीसों में लिखा है, और दुनिया भर के इस्लामी विद्वानों द्वारा उनकी पुष्टि की गई है।सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने यहाँ तक कहा कि नूपुर शर्मा और उनकी "बदजुबानी" ही इस्लामवादियों द्वारा आज देश में फैलाई जा रही अराजकता के लिए दोषी है, इतना ही नहीं तो कन्हैया लाल की क्रूर हत्या के लिए भी वही जिम्मेदार हैं और उन्हें देश से माफी मांगनी चाहिए।दिलचस्प बात यह है कि जब ये टिप्पणियां, जो लिखित आदेश में शामिल नहीं थीं, की जा रही थीं, नूपुर शर्मा के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को टीटी एंटनी मामले का भी उल्लेख किया था। इस्लामवादियों द्वारा फैलाई जा रही अराजकता के लिए नूपुर शर्मा को दोषी ठहराने के ठीक बाद, न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने टीटी एंटनी मामले में निर्धारित कानून के आवेदन को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया और नूपुर शर्मा को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा।न्यायमूर्ति सूर्यकांत की इस टिप्पणी के बाद जो बहस हुई वह और भी खराब थी।जब यह बताया गया कि अर्नब गोस्वामी को अदालतों द्वारा समान राहत दी गई थी, तो न्यायाधीश कांत कहते हैं कि पत्रकार उन प्रवक्ताओं की तुलना में एक अलग पायदान पर हैं जो "गैर-जिम्मेदाराना बयान देने वाले दूसरों को लताड़ रहे हैं"। जब यह कहा गया कि कानून हर नागरिक के लिए निर्धारित किया गया है, तो हैरानी से, न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि हर नागरिक एक जैसा नहीं होता है और यहां तक कि गोस्वामी को भी "विशेष उपचार" दिया जाता था। जब यह बताया गया कि व्यापारियों को भी समान राहत दी गई है, तो न्यायमूर्ति कांत ने बस इतना कहा कि उनका "विवेक" संतुष्ट नहीं था और इसलिए, कोई राहत नहीं दी जाएगी।नूपुर शर्मा मामले में न्यायाधीशों ने कानून और मिसाल को लागू करने से इनकार कर दिया, जो लगभग सभी के लिए समान रूप से लागू होता है - पत्रकार, व्यवसायी और अन्य औसत नागरिक। स्पष्ट ही न्यायाधीशों ने नूपुर शर्मा के खिलाफ इन टिप्पणियों को पारित करते हुए अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर अनर्गल और तथ्यहीन बात की, यहाँ तक कि उन्होंने कानून को लागू करने से ही इनकार कर दिया। अगर यह कहा जाए कि वे राजनैतिक कारणों से नूपुर शर्मा को पसंद नहीं करते थे, इसलिए उन्होंने कानून को ताक पर रखकर बातें कीं, तो क्या गलत होगा ?न्यायपालिका हर नागरिक की रक्षा करने के लिए है - बिना किसी डर या पक्षपात के - चाहे न्यायाधीश व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी को पसंद करें या नहीं। भारतीय न्याय तंत्र के स्थान पर अगर नूपुर शर्मा को शरिया अदालत में भी पेश कर दिया जाता, तो वे वहां से निश्चित ही निर्दोष सिद्ध हो जातीं, क्योंकि वहां कम से कम उनकी बात सुनी जाती।रोहित रंजन मामले में फैसले के साथ, न्यायाधीश सूर्यकांत और परदीवाला को अपने हाथों न्याय के गंभीर गर्भपात पर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है अगर न्यायालय न्यायाधीशों की व्यक्तिगत पसंद नापसंद के आधार पर मनमाने ढंग से उनकी सनक और खुन्नस में निर्णय करने लगेंगे तो आम जनता का भारत के न्याय तंत्र पर भरोसा कैसे कायम रहेगा ? |
| स्वतंत्र भारत में गौ रक्षा आंदोलन के सूत्रधार - तेजस्वी सन्यासी करपात्री जी महाराज Posted: 07 Jul 2022 01:54 AM PDT हम हर धार्मिक आयोजन में जयघोष करते हैं - धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो। सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करने के बाद तेजस्वी सन्यासी करपात्री जी महाराज ने सन १९४० में सनातन धर्म के पुनरुत्थान हेतु धर्मसंघ की स्थापना की थी, यह नारे उसी समय से लगाए जा रहे हैं। ध्यान दीजिये - हम अधर्मी या पापी के नाश की नहीं, अधर्म और पाप के नाश की बात करते हैं। हर अधर्मी का ह्रदय परिवर्तन हो वह धर्म परायण बने, यही अभिलाषा इन नारों में छुपी हुई है। यही तो है सनातन संस्कृति की सुंदरता और विशेषता। करपात्री जी की धर्मपरायणता और विद्वत्ता को देखते हुए उनसे शंकराचार्य पद स्वीकार करने के लिए आग्रह किया गया, किन्तु उन्होंने अपना जीवन लक्ष्य कुछ भिन्न बताकर विनम्रता पूर्वक इंकार कर दिया। यह अलग बात है कि आज तीन पूज्यपाद शंकराचार्य उनके ही शिष्य हैं।सत्य के पूजार्री कहे जाने वाले महात्मा गांधी जी ने घोषणा की थी कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर से होगा, लेकिन उनका यह कथन कोरा शिगूफा सिद्ध हुआ कोरा वाग्विलास प्रमाणित हुआ। इससे क्षुब्ध होकर स्वामी करपात्री जी ने भारत अखंड रखने की आवाज बुलंद की तो लाहौर जेल में बंद कर दिए गए। जेल से छूटने के बाद कांग्रेस के मिथ्याचार से क्षुब्ध होकर उन्होंने १९४८ में रामराज्य परिषद नामक दल बनाया, जिसने १९५७ के पहले आम चुनाव में तीन लोकसभा सीटें जीतीं। राजस्थान विधानसभा में भी इस दल के लगभग २५ सदस्य चुने गए।संभवतः आज की युवा पीढी को 6 नवम्बर, 1966 के उस काले दिन की जानकारी भी नहीं होगी, जिस दिन आजाद भारत में असंख्य गो-प्रेमियों और साधू संतों का दिल्ली की सडकों पर क्रूर नरसंहार किया गया था। उस घटना की चर्चा के पूर्व आईये पहले करपात्री जी की जीवन वृत्त पर एक नजर डालते हैं -विक्रमी संवत् 1964 सन् 1907 ईस्वी श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वितीया को ग्राम भटनी, ज़िला प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में एक सनातन धर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण श्री रामनिधि ओझा व श्रीमती शिवरानी के पुत्र रूप में करपात्री जी का आविर्भाव हुआ । नाम रखा गया हरिनारायण ओझा | होनहार बिरवान के होत चीकने पात के अनुसार बचपन से ही उनका रुझान भगवद्भक्ति की ओर था। 9 वर्ष की अल्पायु में ही उनका महादेवी जी के साथ विवाह संपन्न हो गया, किन्तु दुनियादारी से विरक्त हरिनारायण जी ने सत्रह वर्ष की आयु में ही घर छोड़कर ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली और हरि नारायण से ' हरिहर चैतन्य ' बन गए ।तत्पश्चात उन्होंने पंडित श्री जीवन दत्त महाराज, पंजाबी बाबा श्री अच्युत मुनि जी महाराज तथा षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत आदि का ज्ञान प्राप्त किया । हिमालय पर जाकर साधना रत रहे, तदुपरांत काशी धाम में शिखासूत्र का परित्याग कर विधिवत संन्यास की दीक्षा ली । ढाई गज़ कपड़ा एवं दो लंगोटी मात्र उनके वस्त्र रह गए, जिसमें शीतकाल, ग्रीष्म ऋतू और वर्षा को सहन करना उनका स्वभाव बन गया । उनकी बुद्धि इतनी तीव्र थी कि एक बार जो पढ़ते, उसे आजीवन भूलते नहीं थे । गंगातट पर फूंस की झोंपड़ी में एकाकी निवास, तथा घरों से भिक्षाग्रहण कर, चौबीस घंटों में एक बार भोजन करना, और वह भी हाथ की अंजुली में जितना समाये, उतना भर, इसी वृत्त के कारण उनका नाम करपात्री प्रसिद्ध हो गया । भूमिशयन, निरावरण चरण पद यात्रा और एक टांग पर खड़े होकर तपस्या की कठोर साधना उनकी दिनचर्या बन गई। वे प्रतिदिन रात्रि डेढ़ बजे ही निद्रा त्यागकर ध्यान करतें तदुपरांत दस किलोमीटर पैदल चलते। इस भ्रमण काल में भी वे श्री सूत्र का पाठ करते रहते। स्नान उपरांत ढाई घंटे शीर्षासन लगाकर सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती का सम्पुट सहित पाठ करते। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें 'धर्मसम्राट' की उपाधि प्रदान की गई।आजादी के बाद से ही हिंदुओं में गौ वंश की हत्या पर रोक लगाने और देश के सभी बूचड़ खानों को बंद कराने की मांग जोर पकड़ने लगी थी | सन 1966 आते आते यह मांग एक प्रबल आंदोलन के रूप में बदल गयी | कहने को तो उस आंदोलन में अनेक हिन्दू संगठन और नेता शामिल थे , परन्तु अपनी निर्भीकता और ओजस्वी भाषणों के कारण संत " करपात्री " जी महाराज उनमें अग्रणी थे |तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने जब संतों द्वारा की गई गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग को ठुकरा दिया, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। भारत साधु समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इस धरने में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। जैन मुनि सुशील कुमार तथा सार्वदेशिक सभा के प्रधान लाला रामगोपाल शालवाले और हिन्दू महासभा के प्रधान प्रो॰ रामसिंह जी भी बहुत सक्रिय थे। श्री संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी तथा पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ तथा महात्मा रामचन्द्र वीर के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे।हिंदू पुलिस बल साधू संतों पर कठोरता बरतने में ढिलाई कर सकता है, यह मानकर इस आंदोलन से नियतने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने विशेष रूप से कश्मीर पुलिस बल के जवान बुलबाये थे। प्रदर्शनकारी पूर्णतः शांतिपूर्ण थे और उनके साथ भारी संख्या में महिलायें और बच्चे भी मौजूद थे। अचानक कुछ शरारती तत्वों ने ट्रांसपोर्ट भवन के पास कुछ वाहनों को आग लगा दी। यह घटना देखते ही तुरन्त संसद के दरवाजे बंद कर दिए गए और धमाकों की आवाज आने लगी। इसके बाद तो चारों तरफ धुंआ उठने लगा। निहत्थे और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी गई ,जिससे लगभग १२०० साधु और गौभक्त मारे गए । इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री " गुलजारी लाल नंदा " ने अपना त्याग पत्र दे दिया | माना जाता है कि संतों पर गोली चलाने का आदेश दिए जाने से वे अत्यंत ही क्षुब्ध हो गए थे और इस कांड के लिए इंदिरा जी को जिम्मेदार मानते थे |करपात्री जी महाराज व अनेक गौभक्त गिरफ्तार कर दिल्ली की तिहाड़ जेल में डाल दिए गए। इतना ही नहीं तो जेल में करपात्री जी की हत्या के उद्देश्य से फांसी की सजा पाए कुख्यात अपराधियों से हमला भी करवाया गया, किन्तु उनके शिष्यों ने सारे निर्मम प्रहार अपने ऊपर लेकर उनकी प्राणरक्षा की। इसके बाद भी लोहे की किसी नुकीली कील से करपात्री जी की आँख फोड़ने का प्रयास हुआ, आँख तो नहीं फूटी, पर घाव अवश्य हो गया। उधर संत राम चन्द्र शर्मा वीर आमरण अनशन पर डटे रहे। अंततः 166 दिनों के बाद उनकी मृत्यु के साथ ही उनका सत्याग्रह पूर्ण हुआ । गौरक्षा के लिए अपने प्राण होम करने वाले संत " राम चन्द्र वीर " के 166 दिवसीय अनशन ने "गौ रक्षा" का विषय न केवल भारतीय जन मानस में गहराई तक पहुँचाया, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकृष्ट किया |आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रेस की बहुत बातें की जाती हैं, लेकिन उस समय के किसी भी अखबार ने इंदिरा गांधी द्वारा साधुओं पर गोली चलने की खबर छापने की हिम्मत नहीं दिखायी | सिर्फ मासिक पत्रिका "आर्यावर्त " और "केसरी " ने इस खबर को छापा था | और कुछ दिन बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका " कल्याण " ने अपने विशेषांक " गौ अंक में विस्तार सहित यह घटना प्रकाशित की थी | कल्याण के उसी अंक में इंदिरा को सम्बोधित करके स्वामी करपात्री जी ने श्राप दिया था - "तूने निर्दोष साधुओं की हत्या करवाई है . फिर भी मुझे इसका दुःख नही है | लेकिन तूने गौ हत्यारों को गायों की हत्या करने की छूट देकर जो पाप किया है वह क्षमा के योग्य नहीं है | इसलिये मैं आज तुझे श्राप देता हूँ।जो भी हो करपात्री जी महाराज की विलक्षण प्रतिभा व वक्तृत्व कला का वर्णन करते हुए उनके शिष्य और जगन्नाथ पुरी स्थित गोवर्धन पीठ के वर्तमान शंकराचार्य पूज्य्पाद स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी अपने प्रवचनों में करपात्री जी महाराज का एक रोचक संस्मरण भी सुनाते हैं। जिन दिनों पूज्य करपात्री जी काशी में चातुर्मास कर रहे थे, उन्हीं दिनों काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में सभी धर्म, संप्रदाय, मत मतान्तरों की एक संगोष्ठी आयोजित हुई। स्व. प्रद्यानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की प्रेरणा से सनातन धर्म की व्याख्या हेतु पूज्य करपात्री जी महाराज से निवेदन किया गया। चूंकि विश्वविद्यालय काशी की सीमा से बाहर स्थित है और सन्यासी चातुर्मास में सीमा उल्लंघन नहीं करते अतः उनका प्रवचन रिकॉर्ड किया गया। बाद में वह संगोष्ठी का सबसे उत्तम प्रवचन मान्य किया गया। इतना ही नहीं तो इंदिरा जी ने भी प्रतिक्रिया दी - सनातन धर्म सबसे श्रेष्ठ धर्म, जिसके सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता सर्वश्रेष्ठ उद्घोषक करपात्री जी। बाद में जब करपात्री जी को यह प्रसंग बताया गया तो उन्होंने विरक्त भाव से कहा कि यदि मुझे पहले बता दिया जाता कि इस सबके पीछे इंदिराजी हैं, तो मैं प्रवचन देता ही नहीं।भारत विभाजन का विरोध करने के कारण लाहौर जेल में, तथा गौवध पर प्रतिबन्ध की मांग के कारण दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहे स्वामी करपात्री जी द्वारा लिखित अद्भुत ग्रन्थ :- वेदार्थ पारिजात, रामायण मीमांसा, विचार पीयूष, मार्क्सवाद और रामराज्य, परमार्थ सार संस्कृत ग्रन्थ व उसका हिंदी अनुवाद आदि से उनकी विद्वत्ता का बोध होता है ।२९ जनवरी १९८२ को यह अद्भुत तेजस्वी सन्यासी "परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज"इस असार संसार से विदा लेकर प्रभु चरणों में विलीन हो गए | उनकी मृत्यु का कारण दिल्ली की तिहाड़ जेल में आँख पर आया वही घाव था, जो हिंसाचारियों के प्रहार से हुआ था। एलोपेथिक दवा न लेने के व्रत के चलते उन्होंने उसका उपचार कराया नहीं और आँख में जीवन भर पीड़ा सहते रहे। कहा जा सकता है कि गौरक्षा हेतु ही करपात्री जी ने भी अपना जीवन उत्सर्ग किया। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर को केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी की पावन गोद में जल समाधी दी गई।दुर्भाग्य यह है कि गो-वध को रोकने के लिए पुरानी पीढ़ी ने जो कुर्बानी दी, उसकी जानकारी भी आज की पीढी को नहीं है । दुःख की बात यह भी है कि जो सरकार आज सत्ता में है उसे भी न तो गो-वध पर प्रतिबंध लगाने के बारे में रूचि है और ना ही गौ संरक्षण की चिंता । गो-रक्षा का मुद्दा यदाकदा उठता भी है तो महज राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए । अन्यथा क्या कारण है कि न तो पशुवधशालाओं की संख्या घट रही और ना ही गौशालाओं की संख्या बढाने की ओर किसी का ध्यान !२०१४ के लोकसभा चुनाव के पूर्व मांस की गुलाबी क्रान्ति के स्थान पर दूध की धवल क्रान्ति का दिखाया गया सपना भी संभवतः जुमला ही रहा होगा। |
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