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Saturday, October 3, 2020

परिकल्पना समय

परिकल्पना समय


देश के किसानों को वेतन व भत्ता देने वाली सरकार होगी सच्ची हितैषी ।

Posted: 03 Oct 2020 03:42 AM PDT

--संतोष कुमार तिवारी 


कृ
षि अधिनियम को लेकर इस समय किसान, नेता, मीडिया और अन्य लोग भी काफी चर्चा कर रहे है। सरकार इस अधिनियम को किसानो के लिए 'राम बाण' अधिनियम मान रही है तो विपक्ष के नेता और कुछ किसान संगठन इसे 'मीठा जहर' सिद्ध करने पर तुले है। जबकि सच्चाई यह है कि कुछ बातों पर दोनो पक्ष सही है जबकि कुछ बातों पर दोनो पक्ष गलत है। हालांकि देश में कृषि विशेषज्ञ है वे सरकार के तरफ से लाये गये इस अधिनियम के बारे मे काफी मंथन करने के बाद ही सार्वजनिक किये होंगे। लेकिन सरकार ने अधिनियम में जो आवश्यक वस्तु अधिनियम (भंडारण) के अन्तर्गत भंडारण की छूट दे दी है इससे  हो सकता है कि कालाबाजारी में वृद्धि हो और छोटे किसान या भंडारण करने वालो को नुकसान हो सकता है। क्योकि सरकार ने केवल दो स्थिति (युद्ध और महामारी) मे भंडारण पर रोक लगाई है। लेकिन बाकी समय में भंडारण किया जा सकता है।

सरकार ने मूल्य आश्वासन व बंदोबस्त सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से किसानों को कांटेक्ट फार्मिंग की छूट दे दी है। जिसमे किसान बडी बडी कम्पनियों से कॉन्टेक्ट पर खेती कर सकता है। जिसमें यह सुविधा होगी कि किसान और कम्पनी के साथ फसल के पहले ही दाम निश्चित हो जायेगा। और फसल हो जाने के बाद कम्पनी अपने निश्चित दाम पर आकर किसान से फसल खरीद लेगा। लेकिन इसमें एक समस्या है वह है कि कम्पनी और किसान के बीच में जो कॉन्टेक्ट होगा वह अधिकारियो के माध्यम से होगा। यदि यही किसानों के गांव के मुखिया के माध्यम से हो तो किसान और मजबूत रहे लेकिन इस में अधिकारी के माध्यम से होगा। इसमें एक समस्या और दिख रही है कि कम्पनी से जो दाम फसल बोने के पहले निश्चित हो जायेगा उसी दाम पर कम्पनी को देना है जो सरकार के तरफ से जारी समर्थन मूल्य से कम भी हो सकता है और अधिक भी। कम्पनी से जो दाम निश्चित है उससे सरकारी दाम कम है तो किसान को लाभ होगा यदि सरकारी दाम अधिक है तो किसान को कॉन्टेक्ट फार्मिंग में घाटा भी हो सकता है। वैसे वर्तमान सरकार इस अधिनियम को लाने में सफल हुई जबकि 2012 में डा मनमोहन की सरकार में ही कांटेक्ट फार्मिंग की योजना थी लेकिन जारी न हो सकी। 

 इस अधिनियम में तीसरी बात यह है कि सरकार कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य के तहत बिचौलिए को समाप्त करने की बात करती है। ठीक है कि बिचौलिए कभी कभार मनमानी करते है लेकिन छोटे किसानों के लिए बिचौलिए काफी सहायक साबित होते है। इसकी वजह यह है कि किसान जब अपने अनाज को लेकर मंडी में जाता है तो वहां भी काफी दिक्कत होती है और इस परेशानी से थककर किसान औने पोने दाम पर बेच देता है। सरकार जो न्यूनतम समर्थन मूल्य निश्चित करती है। उसमें मात्र 6% ही किसान बेच पाते है बाकी94% किसान खुले बाजार में बेचते है। इसकी वजह यह है कि या तो किसान के पास संशाधन नही है या व्यवसाय मे खोट है। जो किसानों को सही लाभ नही दिला पा रही है।

 इस अधिनियम को लेकर किसानों में आशंका है कि सरकार  न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त करना चाहती है जबकि सरकार ने मंडी और एमएसपी को न समाप्त करने की बात कह रही है। सरकार का तर्क है कि किसानों को दोनो विकल्प खुला है कि वे चाहे तो मंडी में बेचे चाहे तो आनलाइन खुले बाजार में। लेकिन यहां सवाल पैदा होता है कि शांता समिति की एक रिपोर्ट में एमएसपी को समाप्त करने की बात कही गई है और एक भाजपा के वरिष्ठ नेता ने भी एमएसपी से सरकार पर एक हजार करोड का अधिभार पडने की बात मानी है। क्योकि सरकार जब गेहूं बीस रूपये में खरीदती है और 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सभी को दो रूपये किलो गेहूं देती है तो घाटा तो होता ही है। लेकिन सरकार को एमएसपी के अलावा अन्य फिजूल अधिभार को समाप्त करना चाहिए। न कि केवल किसानों से जुडे न्यूनतम  समर्थन मूल्य को ही निशाना बनाना है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट रूप से मंडी और एमएसपी को समाप्त करने की बात को नकार दिया है। सत्ता पक्ष इस अध्यादेश को किसान हितकारी बता रहे हैं। जबकि विपक्षी दल के नेता व कुछ किसान संगठन इसका खुल कर विरोध कर रहे हैं। पंजाब सरकार जो भाजपा की सहयोगी पार्टी है। उसने भी खुल कर विरोध किया है। हद तो तब हो गई कि जब पंजाब की एक मंत्री ने इस अध्यादेश को किसान विरोधी बताते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। जबकि जून में जब इसे लेकर अध्यादेश लाया गया तब मंत्री भी मौजूद थी और उस समय विरोध नही की और न ही इस्तीफा दिया। लेकिन किसानों के उग्र आंदोलन को देखते हुए राजनीतिक फायदे के लिए मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। सहयोगी दल की एक मंत्री के इस्तीफा देने के बाद बात बिगड़ती जानकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मीडिया के सामने आए और अध्यादेश को किसान हितैषी बताया। उन्होंने कहा कि कृषि अध्यादेश 2020 को लेकर विपक्ष द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा है। इस अध्यादेश में ऐसा कहीं नही लिखा है कि सरकार उपज का न्यूनतम मूल्य निर्धारित नही करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि सरकार सिर्फ किसान की उपज का न्यूनतम मूल्य ही निर्धारित नही करेगी, बल्कि उसकी खरीदी भी करेगी। लेकिन बिचौलियों को समाप्त करेगी। इनकी वजह से ही किसानों का शोषण हो रहा है। इनके समर्थक ही चिल्ला रहे हैं। क्योंकि इस अध्यादेश के खिलाफ वही लोग हैं, जो इनके हितैषी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि इस किसान मंडियों को समाप्त नही किया जा रहा है। किसान मंडियां यथावत रहेगी । किसान इन मंडियों में अपनी उपज बेच सकेगा। इस अध्यादेश मे किसान को यह भी आजादी दी गई है कि अगर वह अपनी उपज मंडी में न बेच कर बाहर भी बेचना चाहे तो बेच सकता है।

अब यहां जब सब कुछ इतना अच्छा है, तो फिर उसका विरोध क्यों हो रहा है? विरोध के पीछे किसानों का हित कम जबकि राजनीति अधिक प्रभावी है। क्योंकि जो लोग आज इस नये कृषि अधिनियम का विरोध कर रहे है। उनको केवल इस अधिनियम में केवल नकारात्मक चीजे ही दिख रही है। सकारात्मक लाभ जानबूझकर छिपा रहे है। जिससे राजनीतिक रोटी सेंकने में आनंद आये। एक बात तो सर्वविदित है कि देश की कोई भी राजनीतिक दल या नेता सच में देश के किसानो का हित नही चाहती है। दल और नेता केवल अपने स्वार्थ के लिए एयर कंडिशन रूम में बैठकर राजनीति करते है। और किसानो और किसान संगठन को केवल आन्दोलन या विरोध करने के लिए प्रेरित करते है। और यह हमेशा से होता आया है। और यही बात इस बार भी देखने को मिल रही है। 
 देश के किसानो की वजह से ही सकल घरेलू उत्पाद काफी मजबूती के साथ आगे रहता है लेकिन सरकारें किसानो को केवल लॉलीपॉप देकर मूर्ख बनाती है। और हमेशा ही आगे बनाती रहेंगी। इसकी वजह है देश के नेताओ का दोगलापन। क्योकि यही नेता जब पक्ष में रहते है तो सरकार की सभी योजना को 'अमृत' बताते है लेकिन विपक्ष में हो जाने पर सारी योजनाएं केवल 'जहर' हो जाती है। और कुछ किसान संगठन बिना दिमाग लगाये इनके चाल में फंस जाते है। और विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन करने लगते है। देश में किसानों की दुर्गति के लिए सभी सरकारें जिम्मेदार है। वह 1947 से लेकर अबतक की सरकारें है। जो केवल किसानों को मोहरा बनाकर अपना उल्लू सीधा करती है। मोदी सरकार किसानों की आय को दुगुना करने की बात करती है और इसी क्रम में शायद अधिनियम में बदलाव भी हो रहा है। लेकिन इसका सही लाभ कितने किसानों को हो रहा है शायद यह आंकडा सरकार के पास नही जाता है। आंकडा तो सरकार के पास जाता है वह भी फर्जी आंकडा। क्योकि विभागों के अधिकारी अपने हिसाब से सरकार को मनमानी आंकडा बनाकर भेज देते है और सरकार उसे सही मान लेती है। जो सच में सही जानकारी से काफी दूर है यह आंकडा। आय बढने की बात पर याद आया कि देश में वर्तमान सरकार किसानों की आय दुगुना करने के मूढ में है लेकिन बीते 75 वर्ष में किसानों की आय दो गुना नही बल्कि बीस गुना से अधिक बढी है। तो क्या यह मान लिया जाये कि सरकार अब किसानों की वर्तमान आय से दुगुना करेगी कि आजादी के समय की तत्कालीन आय से दुगुना करना चाहती है? देश भर को अनाज उपलब्ध कराने वाला किसान आज 'गरीबी' और परेशानी से 'आत्महत्या' कर रहा है। जबकि देश के सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों को 'वेतन' के अलावा विभिन्न तरह का 'भत्ता' देकर किसान को गरीब और सरकारी कर्मचारी और अधिकारी को अमीर बनाने का खेल चल रहा है। विदित हो कि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी का आय बीते 75 वर्ष में दो सौ गुना बढ गया है। जबकि बेचारा किसान केवल आत्महत्या करने के लिए जी रहा है। यह है भारत देश के नेताओ का असली चेहरा। जो देश के अन्नदाताओं को इतनी क्रूरता से मीठा जहर देकर मार रहे है।

आखिर देश के किसानों के साथ ऐसा क्यों कर रही है सरकारें? जो सरकारें सच में किसान की हितैषी है तो वे किसानों को निश्चित वेतन, विभिन्न  तरह का भत्ता,फसल की सुरक्षा की गारंटी व बीमा तथा व्यापार में शत प्रतिशत का सहयोग देने का काम करें। देश का किसान भी कभी आत्महत्या नही करेगा। आन्दोलन नही करेगा। लेकिन ये राजनीतिक दल और नेता 'किसानों' का भला कभी नही चाहेंगे क्योकि जब किसान मजबूत हो जायेगा तो इनकी राजनीति बंद हो जायेगी। केवल सभी नेता और राजनीतिक दल घड़ियाली आंसू बहाकर किसानों के साथ होने का वादा करते है जबकि वादा कभी नही निभाते है। 

 सरकार को चाहिए कि इस अधिनियम को लेकर किसानों में जो समस्या आ रही है उस पर चर्चा हो और उस बात को कृषि विशेषज्ञ भी अपने हिसाब से और भी बेहतर सुधार करने का प्रयास करे। क्योकि इस समय देश कोरोना महामारी की चपेट में है। देश की आर्थिक स्थिति पूरा देश देख रहा है। और सरकार के लिए इस समय किसान ही संकट मोचन साबित हो रहे है। और इस संकट काल में किसान भी सरकार से नाराज हो जायेगे तो आगामी फसल पर इसका असर दिख सकता है और जब कृषि का सहयोग कम होगा तो भारत की दशा और भी खराब हो सकती है। अतः सरकार को कोई भी फैसला किसानो को अपने पक्ष में ही रखकर करना श्रेयस्कर है। क्योकि जब अन्नदाता खुश रहेगा तो भारत में कम से कम खाद्य वस्तुओं की दिक्कत तो नही होगी। इसलिए सरकार को हर फैसला में किसानों के हित को प्राथमिकता देना जरूरी है।


शिक्षक पात्रता परीक्षा क्या सरकारी ठगी है ?

Posted: 03 Oct 2020 03:27 AM PDT


( बार-बार शिक्षक पात्रता परीक्षा का शिक्षकों की भर्ती के अभाव में क्या औचित्य है? सच में ये बेरोजगार युवाओं को लूटने का सरकारी धंधा बन गया है. हरियाणा में दस-दस बार शिक्षक पात्रता परीक्षा पास कर चुके युवाओं को अभी तक नौकरी की कोई आस नहीं है. इस बात का सबसे बड़ा सबूत है ये है कि सरकार को भर्ती के अभाव में इनकी पात्रता को मजबूर होकर पांच से सात करना पड़ा.  हरियाणा एवं केंद्र की आगामी परीक्षा का बेरोजगारों को लूटने के अलावा कोई औचित्य नहीं है. अगर सरकार को शिक्षकों कि आवश्यकता ही है तो पहले से उत्तीर्ण युवाओं को नौकरी दी जाये. पात्रता अवधि नेट की तरह आजीवन होनी चाहिए.  कोरोना के चलते जब भर्ती परीक्षाओं को रोक दिया है तो शिक्षक पात्रता करवाने के पीछे लूटने के अलावा कौन सी मंशा है. युवाओं को इसका एक सुर में विरोध करना चाहिए.)

-प्रियंका सौरभ 

देश भर में शिक्षकों की भर्ती के लिए पिछले डेढ़ दशक से शिक्षक भर्ती परीक्षा का आयोजन किया जाता है, इस परीक्षा की खास बात ये है कि केंद्रीय शिक्षक पात्रता के अलावा सभी राज्य सरकारें अपनी तरफ से अलग-अलग राज्य शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करवाती है. केंद्रीय पात्रता परीक्षा तो साल में दो-दो बार आयोजित की जाती है. मगर इन पात्रता पास अभ्यर्थियों में से मुश्किल से एक प्रतिशत को लम्बे  इंतज़ार  के बाद शिक्षक बनने का मौका मिल पाता है. आखिर ये बेरोजगार युवाओं को लूटने का तरीका बंद क्यों नहीं होता? नई शिक्षा नीति में इस लूट प्रथा पर नकेल क्यों नहीं लगाई गई?


आखिर क्यों केंद्रीय शिक्षक पात्रता पास युवाओं को राज्य में भी अलग से पात्रता उत्तीर्ण करनी पड़ती है. मकसद साफ़ है परीक्षा के नाम पर पैसों की लूट. राजस्थान राज्य सम्भवत एक ऐसा राज्य है जो शिक्षक पात्रता परीक्षा तभी लेता है जब वहां शिक्षकों की भर्ती निकलती है. उसी आधार पर वहां पात्रता परीक्षा आयोजित होती है और कट ऑफ निर्धारित होती है. कितना अच्छा तरीका है ये. आखिर केंद्र और अन्य राज्य इस राजस्थानी पद्धति को नहीं अपनाते? बाकी राज्यों के अभ्यर्थियों को बार-बार परीक्षाओं के नाम पर क्यों ठगा जाता है?

जाहिर है हरियाणा में हर साल लगभग पांच पांच लाख अभ्यर्थी शिक्षक पात्रता परीक्षा में हर पेपर के लिए एक हज़ार रुपए की फीस भरकर बैठते है. नतीज़न सरकार को अरबों की कमाई होती है. लेकिन सरकार को तो कमाई होती है,  इसके बदले युवाओं के सपने बिक जाते है. हरियाणा में प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती हुए लगभग दस साल हो गए है. बाकी शिक्षक भर्तियों का भी यही हाल है. जब सरकार को भर्ती ही नहीं करनी तो क्यों सरकार बार-बार ये परीक्षा करवाकर बेरोजगारों को शिक्षक बनाने के नाम पर ठग कर रही है.

बार-बार शिक्षक पात्रता परीक्षा का शिक्षकों की भर्ती के अभाव में क्या औचित्य है? सच में ये बेरोजगार युवाओं को लूटने का सरकारी धंधा बन गया है. हरियाणा में दस-दस बार शिक्षक पात्रता परीक्षा पास कर चुके युवाओं को अभी तक नौकरी की कोई आस नहीं है. इस बात का सबसे बड़ा सबूत  ये है कि सरकार को भर्ती के अभाव में इनकी पात्रता को मजबूर होकर पांच साल से सात करना पड़ा.  हरियाणा में आगामी शिक्षक पात्रता परीक्षा का बेरोजगारों को लूटने के अलावा कोई औचित्य नहीं है. अगर सरकार को शिक्षकों कि आवश्यकता ही है तो पहले से उत्तीर्ण युवाओं को नौकरी क्यों नहीं दी जा रही. कोरोना के चलते जब भर्ती परीक्षाओं को रोक दिया है तो शिक्षक पात्रता करवाने के पीछे लूटने के अलावा कौन सी मंशा है. युवाओं को इसका एक सुर में विरोध करना चाहिए.

मेरा मकसद इन परीक्षाओं की रोक का कतई नहीं है. ये परीक्षा ली जाये और पारदर्शी तरिके से ली जाये. मगर तभी ली जाये जब भर्ती आ जाये. भर्ती घोषणा के उपरांत सरकार पात्रता परीक्षा ले ताकि उत्तीर्ण युवा भर्ती में भाग ले सके. या फिर सरकार इस बात की गारंटी दे की दो साल में एक बार शिक्षक भर्ती अवश्य होगी. और उत्तीर्ण प्रतिशत भी भर्ती के एक अनुपात में हो ताकि प्रतिभाशाली युवा शिक्षक बन सके.मगर हरियाणा जहां हर साल शिक्षक पात्रता परीक्षा ली जाती है वहां उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की पांच साल की पात्र अवधी दो-दो बार समाप्त हो चुकी है मगर भर्ती नहीं आई. ऐसे में इस परीक्षा का क्या औचित्य है? इसलिए शिक्षक पात्रता अवधि नेट की तरह आजीवन करने कि सख्त जरूरत है.

हरियाणा के  स्कूलों में अध्यापकों की भर्ती के लिए हज़ारों पद खाली है लेकिन प्रदेश सरकार की ओर से शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करने वालों की कोई सुध नहीं ले रही है। इनकी नियुक्तियों को लेकर अधिकारी भी कुछ बोलने से कतरा रहे हैं। ऐसे में हर स्तर की परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों को लेकर सालों बाद भी सरकार कोई निर्णय नहीं ले सकी है। हरियाणा बोर्ड की ओर से आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा में हर साल लाखों अभ्यर्थी क्रमश: प्राथमिक, जूनियर और सीनियर स्तर की परीक्षा में उत्तीर्ण होते है।

शिक्षा विभाग हरियाणा में जेबीटी के करीब 9 हजार रिक्त पदों पर रेगुलर जेबीटी शिक्षकों की भर्ती करने की मांग को लेकर प्रदेशभर के जेबीटी पात्रता पास उम्मीदवारों ने पिछले कई सालों से विरोध जताना शुरू कर रखा है मगर सरकार इसकी तरफ ध्यान दिए बगैर हर साल नई पात्रता परीक्षा ले लेती है। मगर शिक्षक भर्ती नहीं करती. जेबीटी एचटेट पास एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष  के अनुसार प्रदेश के शिक्षा विभाग में जेबीटी शिक्षकों के करीब दस हजार पद सालों से खाली हैं, जिन पर रेगुलर जेबीटी भर्ती की जानी है। मगर इन  पदों को भरने में सरकार कोई रूचि नहीं ले रही. ये बेरोजगारों के साथ खेल नहीं है तो क्या है?

सरकार की ओर से  स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती  नहीं निकाली जाती अगर निकाल दी जाती है, तो सालों तक पूरी नहीं होती. ऐसे में ये परीक्षा पास करने वालों की कोई सुध नहीं ली जा रही है। प्रदेश सरकार की ओर से प्राथमिक और जूनियर  स्तर पर भर्ती को लेकर कोई निर्णय नहीं होने से शिक्षकों की कमी का खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं। शिक्षकों की भर्ती नहीं होने से प्राथमिक विभाग एवं  गणित और विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों में बच्चों की नींव मजबूत नहीं हो पा रही है।

और आज जब कोरोना के नाम पर सरकार ने सभी भर्ती परीक्षाओं पर रोक लगा रखी है तो ये परीक्षा लेने की सरकारों को क्या जल्दी है. ये पब्लिक है जनाब सब जानती है. इन परीक्षाओं का देश भर में एक सुर में विरोध होना चाहिए. तभी ये लूट परीक्षा बंद होगी. पिछले 8 सालों से हरियाणा सरकार जेबीटी शिक्षकों की भर्ती नहीं कर रही है। एचटेट पात्रता परीक्षा प्रमाण पत्र सात साल के लिए मान्य है और पिछले 8 सालों से जेबीटी शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन ही जारी नहीं हुआ। इसलिए लाखों की संख्या में एचटेट पास पात्र अभ्यर्थियों का प्रमाणपत्र बिना भर्ती में शामिल हुए अमान्य हो जाएगा।

युवाओं को इस पात्रता परीक्षा का खुलकर विरोध करना चाहिए और अपनी बात सरकार के समकक्ष रखकर इसका स्थायी समाधान निकलवाना चाहिए अन्यथा ये ठगी जारी रहेगी और बेरोजगार शिक्षक  पात्र अभ्यर्थी भर्ती के नाम पर लुटते रहेंगे.



-रिसर्च स्कॉलर , दिल्ली यूनिवर्सिटी,
कवयित्री,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

त्रासदी है नारी का बार-बार नौंचा जाना!

Posted: 03 Oct 2020 03:17 AM PDT

 --ललित गर्ग


रिन्दों एवं वहशियों के चलते एक और निर्भया ने दम तोड़ दिया। एक बार फिर गैंगरेप और भीषण यातनाओं का शिकार हुई यूपी के हाथरस जिले की 19 साल की दलित लड़की ने 15 दिनों तक मौत से जूझने के बाद मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस जघन्य, वीभत्स एवं दरिन्दगीपूर्ण गैंगरेप कांड से न केवल समूचा देश अशांत एवं शर्मसार हुआ है बल्कि कलंकित भी हुआ है। एक बार फिर नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नौंचने वाली इस घटना ने हमें झकझोर दिया है। यह त्रासद घटना बता रही हैं कि देश में लड़कियां अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। समूचे देश को करुणा-संवेदनाओं में डूबोने इस घटना ने अनेक सवाल फिर से खड़े कर दिये हैं।

दिल्ली के निर्भया मामले के बाद जैसी जनक्रांति देखने को मिली थी, उससे यह उम्मीद बंधी थी कि अब शायद देश में महिलाओं को इस तरह की त्रासदियों से नहीं गुजरना पड़ेगा। लेकिन बलात्कार कानूनों के सख्ती के बावजूद ना बलात्कार रुके, ना दरिन्दगी, ना ही महिलाओं की हत्याएं। हाथरस की बेटी से दरिन्दगी हुई, इसकी पुष्टि उसकी मौत से होती है। उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ी गई और जीभ काटी गई। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों जैसा सिलसिला चल पड़ा है। इस राज्य को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित राज्य में शामिल कर दिया है। यह राज्य लम्बे समय से अपराध का गढ़ रहा है, यहां की पुलिस एवं प्रशासन भ्रष्ट एवं अराजक रही है, अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से इन अपराधी मानसिकताओं पर नियंत्रण पाने की कोशिशें हो रही है।

बेटी तो बेटी होती है, हाथरस की दलित बेटी भी बेटी ही है, भले उसे व्यक्तिगत रूप से कम ही लोग जानते रहे होंगे, लेकिन वह दरिन्दगी के 15 दिन तक जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने के बाद अंततः वह हार गयी। उसकी दर्दनाक दास्तान ने देश की करोड़ों महिलाओं की वेदना को मुखर ही नहीं किया है बल्कि उसने समाज को फिर सोचने को मजबूर कर गई। हाथरस की यह क्रूर एवं अमानवीय घटना महाभारतकालीन उस घटना का नया संस्करण है जिसमें राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़कर खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने का प्रयास हुआ था। इस वीभत्स घटना में मनुष्यता का ऐसा भद्दा एवं घिनौना स्वरूप सामने आया है। एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए हंै कि आखिर  कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती यह कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं।

इन ज्वलंत सवालों के उत्तर हमने निर्भया के समय भी तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन इस तलाश के बावजूद इन घटनाओं का बार-बार होना दुःखद है और एक गंभीर चुनौती भी है। इस मौत ने गैंगरेप जैसे अपराध से निपटने में प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की घोर विफलता को भी उजागर किया है, यह भी जाहिर किया है कि उत्तरप्रदेश की पुलिस एवं प्रशासन की जड़ो में भ्रष्टता एवं अराजकता तीव्रता से व्याप्त है, किसी बड़े क्रांतिकारी सफाई अभियान एवं सख्त उपायों से ही उनमें बदलाव लाया जा सकता है। भले ही अब स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि हाथरस के सभी दोषियों के लिए कठोरतम सजा सुनिश्चित की जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की जांच के लिए एसआईटी भी गठित कर दी है। हाथरस कांड की विडम्बना एवं वीभत्सता यह है कि कुछ लोग बाकायदा एक मंच का बैनर लेकर आरोपियों को बचाने की कोशिश करते नजर आए। यह घटना सीधे तौर पर बताती हैं कि निर्भया कांड के बाद जो भी कदम उठाए गए, वे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नाकाफी साबित हुए हैं।

एक बड़ा सवाल यह भी है कि जांच और सजा के लिए बनाए गए लंबे-चैड़े तंत्र का संभावित अपराधियों में कोई खौफ क्यों नहीं दिख रहा है? दिल्ली के निर्भया मामले के बाद उमड़े जनाक्रोश के दबाव में जो बदलाव कानूनों में किए गए उनका भी समाज पर कोई खास असर नहीं देखने को मिल रहा। कुछ असर हुआ है तो सिर्फ इतना कि बलात्कार के जघन्य मामलों में अपराधियों को तुरत-फुरत मृत्युदंड देने की मांग हर संभव मंच से उठने लगी है। इसका नतीजा हैदराबाद पुलिस मुठभेड़ के रूप में देखने को मिला, जहां बलात्कार के संदिग्ध अपराधियों को उससे भी ज्यादा संदिग्ध ढंग से मौत के घाट उतार दिया गया। अपराधियों को अदालत से जल्दी सजा मिलनी चाहिए, जिसके लिए न समाज में कोई आग्रह दिखता है, न सरकारी तंत्र में। युवती दलित पृष्ठभूमि से थी और गिरफ्तार चारों आरोपी उच्च जाति के हैं। यही कारण है कि अपराधियों को दंडित करने की बजाय उनकी जाति और धर्म के आधार पर उनके बचाव में खड़े होने की प्रवृत्ति जरूर दिखने लगी है जो कठुआ रेप कांड के बाद अब हाथरस कांड में भी सामने आई है। ऐसी सोच के रहते क्या भारत कभी सभ्य समाज बन पाएगा? पुलिस-प्रशासन पर संदेह करने के अनेक कारण है, रात के अंधेरे में बिना पारिवारिक भागीदारी के पीड़िता का अंतिम संस्कार क्यों किया गया? पुलिस एवं प्रशासन की मंशा एवं भूमिका पर सवाल ही सवाल हैं। उम्मीद करें कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश और मुख्यमंत्री योगी की तत्परता से इन सवालों के अधिक भरोसेमंद जवाब सामने आएंगे और ऐसी त्रासद घटनाओं पर नियंत्रित की दृष्टि से चेतना जगेगी।

हर बार की इस तरह की घिनौनी घटना सवाल तो खडे़ करती हंै, लेकिन बिना उत्तर के वे सवाल वहीं के वहीं खड़े रहते हैं। यह स्थिति हमारी कमजोर मानसिकता के साथ-साथ राजनीतिक विसंगतियों को भी दर्शाती है। शासन-व्यवस्था जब अपना राष्ट्रीय दायित्व नैतिकतापूर्ण नहीं निभा सके, तब सृजनशील शक्तियों का योगदान अधिक मूल्यवान साबित होता है। हमारी मानसिकता में बदलाव नहीं हो रहा है, तभी बार-बार निर्भया, कठुआ एवं हाथरस जैसे कांड हमें झकझोर कर रह जाते हैं। हमारे सुषुप्तावस्था के कारण ही बलात्कार-व्यभिचार- गैंगरेप और बच्चियों के साथ भीषण यातनाओं बढ़ रही हैं बल्कि कड़े कानूनों की आड में निर्दोष लोगों को फंसाने का ध्ंाधा भी पनप रहा है। जिसमें असामाजिक तत्वों के साथ-साथ पुलिस भी नोट छाप रही है।

हमें जीने के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने को विवश होना पड़ता है। जरूरत सख्ती बरतने की है, अगर बलात्कारियों के बच निकलने के रास्ते बंद करने के साथ ही उनको दिया जाने वाला दंड बाकी समाज के लिए एक कठोर सबक का काम करेगा तभी यह अपराधी मानसिकता के लोगों को ऐसे अपराध करने से रोकेगा। लेकिन इसके बावजूद अगर ऐसी वारदात नहीं रुक रही हैं, तो यह सोचना जरूरी है कि इस दिशा में और क्या किया जाए? इस समस्या का केवल कानून में समाधान खोजना भी एक भ्रांति है, समस्या के समाधान की दिशा में आधा-अधूरा प्रयत्न है। सबसे जरूरी है उन स्थितियों को खत्म करना, जो ऐसे अपराधों का कारण बनती हैं। बलात्कार जैसे अपराध कुंठित मानसिकता के लोग करते हैं, लेकिन ऐसी कुंठाएं कई बार महिलाओं के प्रति हमारी सामाजिक सोच से उपजती हैं। महिलाओं को सिर्फ कानूनों में ही नहीं, सामाजिक धारणा के स्तर पर बराबरी का दर्जा देकर और उनकी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ाकर ही इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है। इससे हम ऐसा समाज भी तैयार करेंगे, जो कुंठित मानसिकता वालों को बहिष्कृत कर सकेगा। प्रश्न यह भी है कि आखिर हमारे देश में महिलाओं को लेकर पुरुषों में ही इतनी कुंठाएं क्यों है? इन कुंठाओं को समाप्त कैसे किया जाये, इस पर भी तटस्थ चिन्तन जरूरी है।

60, मौसम विहार, तीसरा माला, डीएवी स्कूल के पास, दिल्ली-110051
फोनः 22727486, 9811051133

पूरा विश्व कोरोना से जूझ रहा है ऐसे में सयुंक्त राष्ट्र कहाँ है?

Posted: 03 Oct 2020 03:34 AM PDT

 


( संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं में बदलाव, व्यवस्थाओं में बदलाव, स्वरूप में बदलाव आज समय की मांग है. भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र के सुधारों को लेकर लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. आज संयुक्त राष्ट्र को भारत कि तर्ज पर कार्य करने की अहम जरूरत है. हम पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं. यह हमारी संस्कृति, संस्कार और सोच का हिस्सा है. संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने हमेशा विश्व कल्याण को ही प्राथमिकता दी है.  जनकल्याण से जगकल्याण हो तभी  संयुक्त राष्ट्र के मकसद सही मायने में हल होंगे.)

--- डॉo सत्यवान सौरभ, 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र आमसभा की बैठक को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने इस विश्व निकाय की ताकतवर संस्थाओं में भारत की दावेदारी पेश की. उन्होंने पूछा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार की प्रक्रिया कब पूरी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की आमसभा को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संबोधित किया. इस दौरान प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में बड़े बदलावों की वकालत की. उन्होंने कहा कि भारत के लोग यूएन की अहम संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का इंतजार कर रहे हैं.

मोदी जी ने पुछा कि पिछले 8-9 महीने से पूरा विश्व कोरोना वैश्विक महामारी से संघर्ष कर रहा है. इस वैश्विक महामारी से निपटने के प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र आज कहां है? . संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं में बदलाव, व्यवस्थाओं में बदलाव, स्वरूप में बदलाव आज समय की मांग है. भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र के सुधारों को लेकर लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के फैसले लेने वाली बॉडी से अलग रखा जाएगा. एक ऐसा देश, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां विश्व की 18 फीसदी से ज्यादा जनसंख्या रहती है, जहां सैकड़ों भाषाएं हैं, सैकड़ों बोलियां हैं, अनेकों पंथ हैं, अनेकों विचारधाराएं हैं. जिस देश ने सालों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने और सैकड़ों सालों की गुलामी, दोनों को जिया है, जिस देश में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव दुनिया के बहुत बड़े हिस्से पर पड़ता है. उस देश को आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा?

संयुक्त राष्ट्र ने इस साल 75 साल पूरे किए। संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक दिवसीय उच्च स्तरीय बैठक में, ऐतिहासिक क्षणों को मनाने के लिए, विश्व के नेता एक साथ आते हैं। यह बैठक, 'द फ्यूचर वी वांट, यूएन वी नीड: रीफ्लिमेटिंग आवर कलेक्टिव कमिशन टू मल्टीलैटलिज्म', एक ऐतिहासिक घटना है, जैसा कि 75 वर्षों में पहली बार हुआ। संयुक्त राष्ट्र का जन्म युद्ध से दूर रखने के इरादे से बनाए गए एक और अंतरराष्ट्रीय संगठन की साख  से हुआ था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, वर्साय की संधि के हिस्से के रूप में जून 1919 में राष्ट्र संघ बनाया गया था। हालांकि, जब 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो लीग बंद हो गई और जिनेवा में इसका मुख्यालय पूरे युद्ध में खाली रहा।
 
 नतीजतन, अगस्त 1941 में, अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल ने कनाडा के न्यूफ़ाउंडलैंड के दक्षिण-पूर्वी तट में स्थित प्लेसेंटा खाड़ी में नौसैनिक जहाजों में एक गुप्त बैठक की। दोनों देशों के प्रमुखों ने अंतर्राष्ट्रीय शांति प्रयासों और युद्ध से संबंधित मुद्दों की एक सीमा के लिए एक निकाय बनाने की संभावना पर चर्चा की। साथ में उन्होंने एक बयान जारी किया जिसे अटलांटिक चार्टर कहा जाने लगा। यह एक संधि नहीं थी, लेकिन केवल एक पुष्टि थी जिसने संयुक्त राष्ट्र के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इसने "अपने देशों की राष्ट्रीय नीतियों में कुछ सामान्य सिद्धांतों को साकार करने की घोषणा की, जिस पर उन्होंने दुनिया के लिए बेहतर भविष्य की अपनी आशाओं को आधारित किया।" दिसंबर 1941 में संयुक्त राज्य अमेरिका युद्ध में शामिल हो गया, पहली बार 'संयुक्त राष्ट्र' शब्द राष्ट्रपति रूजवेल्ट द्वारा उन देशों की पहचान करने के लिए तैयार किया गया था, जो धुरी शक्तियों के खिलाफ संबद्ध थे।

संयुक्त राष्ट्र अंततः 51 देशों द्वारा अनुसमर्थित होने के बाद 24 अक्टूबर, 1945 को अस्तित्व में आया, जिसमें पांच स्थायी सदस्य (फ्रांस, चीन गणराज्य, सोवियत संघ, ब्रिटेन और अमेरिका) और 46 अन्य हस्ताक्षरकर्ता शामिल थे। महासभा की पहली बैठक 10 जनवरी, 1946 को हुई। संयुक्त राष्ट्र के चार मुख्य लक्ष्यों में शामिल थे,अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना,अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना और इन सामान्य सिरों की प्राप्ति में राष्ट्रों के कार्यों के सामंजस्य के लिए केंद्र में होना।

इसके गठन के समय, संयुक्त राष्ट्र में केवल 51 सदस्य राज्यों, स्वतंत्रता आंदोलनों और बाद के वर्षों में डी-उपनिवेश शामिल थे, इसकी सदस्यता का विस्तार हुआ। वर्तमान में, 193 देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र पिछले 75 वर्षों में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दावा करता है। इसने बड़ी संख्या में वैश्विक मुद्दों जैसे कि स्वास्थ्य, पर्यावरण, महिलाओं के बीच महिला सशक्तिकरण के समाधान के लिए अपने दायरे का विस्तार किया है। इसके गठन के तुरंत बाद, इसने 1946 में परमाणु हथियारों के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध होने का प्रस्ताव पारित किया। 1948 में, चेचक, मलेरिया, एचआईवी जैसी संचारी रोगों से निपटने के लिए इसने विश्व स्वास्थ्य संगठन बनाया। वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोनोवायरस महामारी से निपटने वाला शीर्ष संगठन है।

1950 में,संयुक्त राष्ट्र ने द्वितीय विश्व युद्ध के कारण विस्थापित हुए लाखों लोगों की देखभाल के लिए शरणार्थियों के लिए उच्चायुक्त बनाया। 1972 में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम बनाया गया था। हाल ही में 2002 में संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र की आपराधिक अदालत की स्थापना की। मगर कई मामलों में संयुक्त राष्ट्र अपने कार्यों को सही तरह नहीं कर पाया  उदाहरण के लिए, 1994 में, संगठन रवांडा नरसंहार को रोकने में विफल रहा। 2005 में, संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में कांगो गणराज्य में यौन दुराचार का आरोप लगाया गया था, और इसी तरह के आरोप कंबोडिया और हैती से भी आए हैं। 2011 में, दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन 2013 में छिड़े गृहयुद्ध में हुए रक्तपात को समाप्त करने में असफल रहा था।

आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधारों की आवश्यकता है. संयुक्त राष्ट्र एक बड़ी दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है और विडंबना यह है कि इसके इतने महत्वपूर्ण निकाय में केवल 5 स्थायी सदस्य हैं। सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व करती है और इस प्रकार यह दुनिया में शक्ति के बदलते संतुलन के साथ गति में नहीं है। वीटो की शक्ति को एक बड़ी समस्या है क्योंकि पी 5 सदस्य अक्सर उन देशों को पीड़ित करने वाले प्रस्तावों को प्रभावित करते हैं, जिन्हें बढ़ने के लिए एक मंच की आवश्यकता होती है। सदस्य राष्ट्र जो कि संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंग की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए विश्वसनीयता और क्षमता  की वैधता सुनिश्चित करने के लिए एक उपस्थिति होनी चाहिए।

इस प्रकार, "अर्ध-स्थायी" सीटों की एक नई श्रेणी पेचीदा है। यूएनएससी के गठन के समय, बड़ी शक्तियों को परिषद का हिस्सा बनाने के लिए विशेषाधिकार दिए गए थे। यह इसके उचित कामकाज के साथ-साथ 'राष्ट्र संघ' संगठन की विफलता से बचने के लिए आवश्यक था। सुदूर पूर्वी एशिया, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका जैसे क्षेत्रों का परिषद की स्थायी सदस्यता में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं और उभरती विश्व शक्तियों के रूप में जी 4 (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) जैसे मंचों का उदय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों के बाद जोर दे रहा है।

संयुक्त राष्ट्र का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता से हुआ था। इसकी नींव के समय, इसे मुख्य रूप से विश्व शांति बनाए रखने और भावी पीढ़ियों को युद्ध की बुराइयों से बचाने के लक्ष्य के साथ काम सौंपा गया था। अगले 10 साल, जिन्हें सतत विकास के लिए कार्रवाई और वितरण के दशक के रूप में नामित किया गया है, हमारी पीढ़ी के लिए सबसे महत्वपूर्ण होंगे। यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हम कोविद -19 महामारी से उभरकर बेहतर निर्माण करते हैं या नहीं। अगले दस वर्षों के लिए सूचीबद्ध लक्ष्यों में ग्रह और पर्यावरण की सुरक्षा, शांति, लिंग समानता और महिला सशक्तिकरण, डिजिटल सहयोग और स्थायी वित्तपोषण को बढ़ावा देना शामिल है।

आज संयुक्त राष्ट्र को भारत कि तर्ज पर कार्य करने की अहम जरूरत है. हम पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं. यह हमारी संस्कृति, संस्कार और सोच का हिस्सा है. संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने हमेशा विश्व कल्याण को ही प्राथमिकता दी है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने की प्रतिष्ठा और इसके अनुभव को हम और  संयुक्त राष्ट्र विश्व हित के लिए उपयोग करें.  जनकल्याण से जगकल्याण हो. भारत की आवाज हमेशा शांति, सुरक्षा, और समृद्धि के लिए उठी है और उठेगी. भारत की सांस्कृतिक धरोहर, संस्कार, हजारों सालों के अनुभव, विकासशील देशों को ताकत देंगे तभी  संयुक्त राष्ट्र के मकसद सही मायने में हल होंगे.

-रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, 
दिल्ली यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली। 

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